समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 9

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हिन्दूओं में समाज सुधार आंदोलन की उपलब्धियां

नारी मुक्ति आंदोलन

भारतीय समाज की आधी आबादी समाज के आधुनिक काल में प्रवेश के पश्चात्‌ भी दु:ख तकलीफ और उत्पीड़न का जीवन जीने पर मजबूर थी। इन्हीं वजहों से आधुनिक भारत के सभी सुधार आंदोलनों ने नारी उत्थान की वकालत की और कमोबेश वे इस प्रयास में सफल भी रहे। इस संबंध में पहला महत्वपूर्ण प्रयास सती प्रथा का उन्मूलन करना था, जो 1789 से किए जा रहे कंपनी (संघ) के प्रयासों के बावजूद समाप्त नहीं हुआ था। इस प्रथा के विरुद्ध राजा राममोहन राय की पीढ़ी में लोकमत बना, जिसने सती प्रथा के उन्मूलन के लिए सरकार से हाथ मिलाया। राममोहन राय ने उत्साह-पूर्वक सती प्रथा के विरुद्ध शक्तिशाली अभियान छेड़ा, जिसमें उन्होंने अपने कुछ मित्रों और बंगाली पत्रिका कौमुदी को प्रमुख साधन बनाया। यह अभियान तब तक जारी रहा जब तक इसे बेंटिक के 1829 के रेगुलेशन (विनियमन) दव्ारा अवैध घोषित नहीं किया गया।

बहु-विवाह, कुलीनता और बाल-विवाह जैसी प्रथाओं पर भारत के सभी प्रसिद्ध आधुनिक सुधारकों ने प्रहार किया। 1872 का ’स्थानीय विवाह अधिनियम’ केशवचन्द्र के प्रयासों से पारित हुआ और इसने कम उम्र में विवाह की प्रथा को समाप्त किया और बहु-विवाह को दंडनीय बना दिया। इस अधिनियम के अंतर्गत विधवा-विवाह और अंतर्जातीय विवाह को भी मान्यता प्रदान की गई। आर्य समाज तथा बी. एम. मालाबारी, आधुनिक भारत के महान पारसी सुधारक ने भी ’बाल विवाह’ के विरुद्ध जन भावनाओं को जगाया। सरकार भी सुधारकाेें की सहायता के लिए आगे आई और उसने 1892 में ’एज (उम्र) ऑफ (की) कन्सेंट (सहमति) एक्ट’ (अधिनियम) को पारित किया जिसके अंतर्गत विवाह की आयु को दस से बढ़ा कर बारह वर्ष कर दिया गया। 1929 में राय साहब हरविलास शारदा का बाल विवाह विधेयक भी विधान सभा और विधान परिषद दव्ारा पारित हुआ। इस अधिनियम का लक्ष्य 18 साल से कम उम्र के लड़कों और 14 साल से कम उम्र की लड़कियों के विवाह को निऱूत्साहित करना था।

विधवा विवाह से संबंधित आंदोलनों के इतिहास में देखने से स्पष्ट होता है कि 18वीं शताब्दी के मध्य में ढ़ाका के राजा वल्लभ दव्ारा हिन्दू समाज में विधवा विवाह को मान्यता दिलाने के प्रयास किए गए थे, किन्तु वे सफल नहीं हो सके थे। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने अपने असाधारण साहस और उत्साह से विधवा विवाह को मान्यता दिलाने का प्रयास किया। उन्हें कट्‌टरपंथियों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। पंडित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने अपनी लेखनी और भाषणों से यह सिद्ध करने की कोशिश की कि विधवा विवाह शास्त्रसम्मत है। उनके कई अनुयायी भी बन गए। इसके बाद उन्होंने इसकी मान्यता के रास्ते में आने वाली कानूनी अड़चनों को भी समाप्त करने के लिए प्रयास किए। 1856 में अधिनियम को पारित कराने के ये प्रयास सफल हुए। इसने विधवा विवाह को मान्यता प्रदान की। इसी समय विधवा विवाह के प्रसार के लिए ब्रह्य समाज भी प्रयासरत था। केशवचन्द्र सेन 1859 ई. से ही इसे मान्यता दिलाने के लिए गंभीरतापूर्वक प्रयास कर रहे थे। बांसनगर (बंगाल) के बाबू शशिपद बनर्जी शीघ्र ही विशिष्ट कार्यकर्ता के रूप में सामने आए और उनके परिश्रम के विस्मयकारी परिणाम हुए। 1857 ई. में उन्होंने हिन्दू विधवा गृह की स्थापना की जिसने अपने पूरे कार्यकाल में विधवाओं को शिक्षित करने का उत्कृष्ट कार्य किया। पंडित विष्णु शास्त्री ने बंबई में 1866 ई. में एक विधवा विवाह संघ की स्थापना की। गुजरात के अहमदाबाद में भी एक पुनर्विवाह संघ की स्थापना की गई। 1884 ई. से ही श्री मालाबारी के लेखों के माध्यम से इस विषय को नया महत्व मिला। श्री आर. जी. भंडारकर, जी.जी. अगरकर और डी. के. कर्वे जैसे लोगों ने विधवाओं की स्थिति और भाग्य के उत्थान के लिए काफी कार्य किया। श्री कर्वे ने 1899 ई. में विधवा विवाह संघ को पुनर्जीवित किया। उन्होंने पूना शहर में हिन्दू विधवा गृह की स्थापना की जो आगे चलकर महिला विश्वविद्यालय की स्थापना का आधार बना। पंडित रमाबाई सदन (1889, 1893) बंबई, मैसूर महारानी विद्यालय, मैसूर आर्य समाज एवं सत्य शोधक समाज, पंजाब तथा हिन्दू विधवा सुधार लीग, लखनऊ ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किए।

आधुनिक काल में नारियों की शिक्षा में सतत विकास हुआ। वे अधिक से अधिक संख्या में पर्दे से बाहर आकर सामाजिक और राजनीतिक मामलों में बढ़-चढ़ कर दिलचस्पी ले रही हैं। 1926 ई. में पहली बार अखिल भारतीय महिला महासम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसने नारियों के शैक्षणिक और सामाजिक उत्थान के लिए विचारों का संयोजन किया। नारी वयस्क मताधिकार आंदोलन ने भी काफी सफलता हासिल की। गुलामी प्रथा 18वीं शताब्दी से चली आ रही एक दयनीय प्रथा थी, जो देशभर में फैली थी। सुधारकों ने इस प्रथा को भी समाप्त करने के प्रयास किए।