भारत में नए वर्ग का उदय (The rise of the new class in India) Part 2 for Competitive Exams

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प्रशासनिक एवं अधिकारी वर्ग का उदय

अंग्रेज मूलत: एक व्यापारी वर्ग के रूप में भारत आए। व्यापार से प्राप्त लाभ एवं भारत की तत्कालीन परिस्थितियों से प्रेरित होकर वे यहाँ पर साम्राज्य स्थापित करने को प्रेरित हुए। साम्राज्य स्थापित करने के उपरांत उन्हें शासन करने के लिए एक अधिकारी वर्ग की आवश्यकता महसूस हुई। चूँकि वे भारत पर अपने प्रभाव एवं नियंत्रण को मजबूत करना चाहते थे, अत: इस काम का दायित्व कंपनी (संघ) के अधिकारियों को ही सौंपा गया। जैसे-जैसे साम्राज्य का विस्तार हुआ कंपनी का प्रशासनिक दायित्व भी बढ़ता गया। ब्रिटिश प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अब भारत में नियुक्त किए जाने लगे, पर इन अधिकारियों को भारत में नियुक्त करना अधिक महंगा पड़ता था। भारत में शासन करने के लिए उन्हें विशेष प्रशिक्षण की भी आवश्यकता पड़ती थी। इस समस्या से निपटने के लिए इस बात पर बल दिया गया कि भारतीय भी इन सिविल (नागरिक) सेवाओं में शामिल हो सकते हैं। इसके लिए संश्रावित जनपद सेवा का प्रारंभ किया गया। सत्येन्द्र नाथ टैगोर इस सेवा में शामिल होने वाले पहले भारतीय थे। उनके उपरांत सुरेन्द्र नाथ बनर्जी एवं सुभाष चन्द्र बोस भी इस सेवा के लिए चुने गए। पर दोनों ने ही राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर इस सेवा से त्यागपत्र दे दिया, पर कई लोग ऐसे थे जो इस सेवा में शामिल होकर अंग्रेजों की सेवा करते रहें। चूँकि यह वर्ग अपनी जरूरतों के लिए अंग्रेजों पर निर्भर था, अत: यह अंग्रेजों के प्रति स्वामीभक्त भी था। वास्तव में यही वर्ग उनके औपनिवेशिक हितों का संरक्षक था। अंग्रेज इसे साम्राज्य का इस्पाती चौखट कहते थे।

साम्राज्यीय आवश्यकताओं के बावजूद अंग्रेजों ने सिविल सेवाओं में नियुक्ति के लिए सुनियोजित नीति का अवलंबन किया। आरंभ में इन भारतीयों की संख्या एक चौथाई से अधिक नहीं हो सकती थी। परन्तु धीरे-धीरे इनकी संख्या भी बढ़ने लगी। 1947 के आसपास इनकी संख्या लगभग आधी हो गई।

राष्ट्रीय आंदोलन के आरंभिक दिनों में यह वर्ग अंग्रेजों के प्रति अधिक निष्ठावान था, पर जैसे-जैसे राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार होता गया, यह वर्ग भी राष्ट्रीय भावना से अछूत नहीं रहा। 1947 तक आते-आते स्थिति बिल्कुल बदल चुकी थी। यह वर्ग अब राष्ट्रीय हितों के प्रति अधिक समर्पित हो चुका था। इस प्रकार राज्य का इस्पाती चौखट साम्राज्य को ही निगलने को आतुर था। सिविल सेवकों की बदलती निष्ठा ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया।

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