आदिवासी विद्रोह (Tribal Rebellion) Part 1

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भूमिका

भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना भारतीय समाज एवं अर्थव्यवस्था के औपनिवेशीकरण और धीरे-धीरे उसे दबाए रखने की लंबी प्रक्रिया का नतीजा थी। इस प्रक्रिया ने हरेक स्तर पर भारतीय समाज में क्षोभ और असंतोष को जन्म दिया। आदिवासी विद्रोह इसी असंतोष का प्रस्फूटन था। 19वीं शताब्दी में आदिवासियों के कई महत्वपूर्ण विद्रोह हुए, इनमें चुआर और हो विद्रोह, कोल विद्रोह, संथाल विद्रोह, रंपा विद्रोह, मुंडा विद्रोह, भील विद्रोह और रामोसी विद्रोह महत्वपूर्ण हैं। आदिवासियों ने विद्रोह के दौरान असीम शौर्य बलिदान और साहस का परिचय दिया। इसे दबाने के लिए अंग्रेजों को काफी क्रूरतापूर्ण कार्रवाई करनी पड़ी।

आदिवासी विद्रोह के कारण

अंग्रेजी शासन ने जब आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश किया तो उनके बीच का असंतोष काफी बढ़ा। यह असंतोष इसलिए भी स्वाभाविक था कि अंग्रेजी शासन के इस क्षेत्र में पदार्पण से आदिवासियों के जीवन में हस्तक्षेप बढ़ा। आदिवासी आमतौर पर अलग-थलग रहते थे, उनमें स्वतंत्रता की एक खास प्रवृत्ति थी। इस प्रवृत्ति के कारण वे किसी प्रकार के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं कर पाते थे। अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों को ब्रिटिश घेरे में लेने का प्रयास किया। उन्होंने आदिवासी सरदारों को जमींदार का दर्जा दिया और लगान की नई प्रणाली कायम की। आदिवासियों दव्ारा उत्पादित अन्य वस्तुओं पर नए कर भी लगाए गए। इस प्रकार स्वछंद जीवन में आए हस्तक्षेप ने विद्रोह को अपरिहार्य बना दिया।

आदिवासी इलाके में बाहरी लोगों के प्रवेश से उनके समस्त आर्थिक और सामाजिक जीवन अस्त-व्यस्त हो गए। पहले ये स्वछंद रूप से झूम विधि से जंगल को काटकर खेती करते थे, अब उनके ये अधिकार समाप्त कर दिए गए। जंगली उत्पाद भी प्राप्त करने पर रोक लगा दिए गए। फलत: आदिवासी किसान मजदूर बनने को विवश हुए। महाजनों और अधिकारियों ने शोषण और अत्याचार को बढ़ावा दिया। बढ़ते हुए शोषण के खिलाफ विद्रोह आवश्यक था।

ईसाई मिशनरियों के इस क्षेत्र में घुसपैठ से भी आदिवासियों में असंतोष बढ़ा। आदिवासियों को यह लगने लगा कि ये मिशनरी ईसाई धर्म के माध्यम से उन्हें गुलाम बनाएंगे। यह विश्वास तब और बढ़ा जब इन धर्म प्रचारकों ने उनके धार्मिक विश्वास पर आघात करना शुरू कर दिया। ये सारे असंतोष ही विद्रोह के कारण थे।