आदिवासी विद्रोह (Tribal Rebellion) Part 3

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बिरसा मुंडा आंदोलन

1857 ई. के पश्चात्‌ मुंडाओं ने सरदार आंदोलन चलाया लेकिन इससे मुंडा और अन्य आदिवासियों की स्थिति में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं आया। शांतिपूर्ण उपायों से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में विफल होकर मुंडाओं ने उग्र रूख अपनाया। सरदार आंदोलन के विपरीत बिरसा आंदोलन उग्र और हिंसक था। यह विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आरंभ किया गया था। इसलिए इसका स्वरूप भी मिश्रित था। यह एक ही साथ आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तन तथा धार्मिक पुनरूत्थान चाहता था। इसका आर्थिक उद्देश्य था दिकू जमींदारों दव्ारा हथियाए गए आदिवासियों की कर मुक्त भूमि की वापसी जिसके लिए आदिवासी लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे, मुंडार सरकार से न्याय पाने में विफल होकर अंग्रेजी राज को समाप्त करने एवं मुंडार राज की स्थापना का स्वप्न देखने लगे। वे सभी ब्रिटिश अधिकारियों और ईसाई मिशनरियों को अपने यहाँ से बाहर निकाल देना चाहते थे। आंदोलन का उद्देश्य मुंडाओं के लिए एक नए धर्म की स्थापना भी करना था। इस आंदोलन के नेता बिरसा मुंडा थे जिन्होंने धर्म का सहारा लेकर मुंडाओं को संगठित किया। उनके नेतृत्व में मुंडाओं ने 1899-1900 ई. में विद्रोह कर दिया।

1899 ई. में क्रिसमस के दिन मुंडाओं का व्यापक और हिंसक विद्रोह आरंभ हुआ। विद्रोह का प्रभाव समूचे छोटानागपुर में फैल गया। चिंतित होकर सरकार ने विद्रोह के दमन का निश्चय किया। सरकार को पुलिस और सेना की सहायता लेनी पड़ी। मुंडाओं ने छापामार युद्ध का सहारा लेकर पुलिस और सेना का सामना किया। फरवरी, 1900 ई. में बिरसा गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें राँची जेल में रखा गया। उन पर सरकार ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया। मुकदमे के दौरान जेल में ही हैजा होने से बिरसा की मृत्यु 9 जून, 1900 को हुई। बिरसा की गिरफ्तारी और मौत ने आंदोलनकारियों की कमर तोड़ दी। परिणामस्वरूप बिरसा मुंडा आंदोलन भी विफल हो गया। आदिवासियों को इस आंदोलन से तत्काल कोई लाभ तो नहीं हुआ परन्तु सरकार को उनकी गंभीर स्थित पर विचार करने को बाध्य होना पड़ा। आदिवासियों की जमीन का सर्वे करवाया गया। 1908 ई. में छोटानागपुर काश्तकारी कानून पारित हुआ। इससे मुंडाओं को जमीन-संबंधी अधिकार मिले एवं बेगारी से मुक्ति भी। इस रूप में यह आंदोलन सफल भी रहा।