भाग-10 नागरिकता-पंचायत व्यवस्था से संबंधित प्रावधान (Part-10 Citizenship: Provision related to Panchayat system)

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पंचायत व्यवस्था से संबंधित प्रावधान :-

  • पंचायत व्यवस्था के अंतर्गत सबसे निचले स्तर पर ग्राम सभा होगी। इसमें एक या एक से अधिक गांव शामिल किये जा सकते हैं। ग्राम सभा कि शक्तियों के संबंध में राज्य विधानमंडल दव्ारा कानून बनाया जाएगा।

  • जिन पंचायतों की जनसंख्या 20 लाख से कम है उनमे दो स्तरीय पंचायत अर्थात जिला स्तर व गांव स्तर पर का गठन किया जाएगा और 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्या में ़स्तरीय पंचयत की स्थापना की जाएगी।

  • सभी स्तर की पंचायतों के सभी सदस्यों को चुनाव वयस्क मतदाताओं दव्ारा प्रत्येक पांच वर्ष बाद किया जाता है जिला पंचायतों के सदस्यों का चुनाव अप्रत्यक्ष, गांव स्तर के प्रधान व सदस्य वार्ड (निगरानी) मेंबर (दल) होता है तथा खंड का चुनाव अप्रत्यक्ष दव्ारा होता है तथा इसका अध्यक्ष ब्लोक (खंड) हेड (शीर्ष) कहलाता है तथा इसके सदस्य बी.डी.सी. होते हैं।

  • सभी स्तर की पंचायतों को कार्यकाल पांच वर्ष होगा लेकिन इसका विघटन पांच वर्ष से पहले भी किया जा सकता है किन्तु विघटन की दशा में 6 मास के अंतर्गत चुनाव कराना आवश्यक होगा।

अनु. 243 (घ)-स्थानो का आरक्षण

  • एससी/एसटी के लिए जनसंख्या अनुपात में 30 प्रतिशत का आरक्षण प्राप्त होगा।

  • एससी/एसटी की महिलाओं को 30 प्रतिशत का 1/3 प्रतिशत तथा अन्य महिलाओं को शेष 1/3 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाएगा।

  • डीबीसीएस को जितना विधामंडल निर्धारित करेगी उतना आरक्षण मिलेगा।

अनु. 243 (ट)-पंचायतो के लिए निर्वाचन आयोग।

अनु. 243 (झ)- वित्तीय स्थिति के पुनर्विलोकन के लिए वित्त आयोग का गठन।

अनु. 41- कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता प्रदान करना- वृद्धो को रोजगार वृद्धावस्था पेंशन (पूर्वसेवार्थ वृत्ति) योजना।

अनु. 42-काम की न्यायोचित, मानवोचित दशा का होना तथा प्रसुति सहायता प्रदान करना।

अनु. 43- कर्मकारो को जीवन निर्वाह (मजदूरी)

अनु. 43 (ए)-42 वां सं सं अधिनियम 1976-उद्योगों के प्रबंध में मजदूरों की भागीदारी।

अनु. 44- सभी नागरिकों के लिए एक समान आचार संहिता।

अनु. 45-6 वर्ष से कम आयु के बालको को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करना। (अनु.21 (ए) 86वां 2002)

अनु. 46-अनुसूचित जाति एवं जनजाति तथा समाज के दुर्बल वर्गों को शिक्षा प्रदान करना तथा उनके अर्थसंबंधी हितो का पक्षपोषण करना

अनु. 47-पोषाहार स्तर, जीवनस्तर में वृद्धि करना तथा लोक व्यवस्था में सुधार करने का प्रयास करना।

अनु. 48-कृषि एवं प्शुपालन का आधुनिक ढंग से एवं वैज्ञानिक ढंग से विकास करना।

  • भारत का प्रथम अनुसुचित जनजाति विश्वविद्यालय एम.पी. (मध्यप्रदेश) में है।

  • उड़ीसा सर्वाधिक कुपोषणग्रस्त है।

अनु. 48-(ए)-42वां स.स.अ. 1976-पर्यावरण की रक्षा एवं संवर्धन करना।

अनु. 49-प्राचीन महत्व के स्मारको वस्तुओ व स्थानों की रक्षा करना।

अनु. 50-लोक सेवा (कार्यपालिका) से न्यायपालिका को पृथक करना (बाकी पृथक्करण)

अनु. 51-अंतरराष्ट्रीय शांति-सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करना तथा आपसी विवादो का शांतिपूर्ण समाधान करना।

मूल अधिकार व नीति निदेशक तत्व में अंतर:-

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ मूल अधिकार न्यायालय के दव्ारा प्रवर्तनीय है। जब कि निदेशक तत्व न्यायालय के दव्ारा लागू कराया नहीं जा सकता अर्थात- यह अपरिवर्तनीय है।

  • मूल अधिकार अधिकांशत नकरात्मक है जो राज्य को कुछ करने से मना करता है जब कि निदेशक तत्व अधिकांशत सकरात्मक हैं जो राज्य को कुछ करने का निर्देश देता है।

  • मूल अधिकारों त्याग नहीं किया जा सकता जैसे जीवन के अधिकार में मरने का अधिकार शामिल नहीं है जब की निदेशक तत्व में तत्वों का त्याग किया जा सकता है।

  • राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनु.20 व 21 को छोड़कर मूल अधिकार को निलंबित किया जा सकता है किन्तु निदेशक तत्वों को किसी भी दशा में निलंबित नहीं किया जा सकता।

  • मूल अधिकारों का उद्देश्य राजनीतिक लोकतंत्र को स्थापित करना जब कि निदेशक तत्वों का उद्देश्य सामाजिक तथा आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करते हुए लोक कल्याणकारी राज्य का मार्ग प्रसस्थ करना है।

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