भाग-3 नागरिकता-मूल अधिकार (Part-3: Citizenship-Fundamental Right)

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भाग-3 मूल अधिकार Part-3 Fundamental Right

अनुच्छेद 12-

परिभाषा (राज्य शब्द की)

अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य में शामिल हैं।

  • संघ की सरकार

  • संघ की संसद

  • राज्य की सरकार

  • राज्य के विधानमंडल

  • स्थानीय प्राधिकारी (नगर पालिका जिला मंडल, पंचायतें)

  • अन्य प्राधिकारी (राजस्थान विद्युत बोर्ड (परिषद), सहकारी समिति आदि)

अनुच्छेद 13- मूल अधिकारों से असंगत या उनका अल्पीकरण करने वाली विधियांँ।

  • अनुच्छेद 13 (i) यदि संविधान के लागू होने से पूर्व की विधि मूल अध्कािरी से असंगत है तो वह शून्य होगी।

  • 13 (ii) यदि कोई ”विधि” इस मांग के दव्ारा प्रदान किये गये मूलाधिकारों को न्यून/कम करता है तो वह विधि उस मात्रा तक शून्य होगी।

प्रश्न:- क्या संसद अनुच्छेद 368 (संविधान संसोधन) के दव्ारा मूल अधिकारों में संसोधन कर सकती है?

उत्तर:- हां , कर सकती है।

प्रश्न:- संविधान की व्याख्या के लिए कम से कम कितने न्यायाधीश होते हैं या होने चाहिए?

उत्तर:- कम से कम 5 होने चाहिए।

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ 1951 में शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ के मामले में यह प्रश्न उठाया गया कि संसद मूलाधिकारों को संसोधित कर सकती है या नहीं। इस मामले में न्यायालय ने निर्णय दिया कि अनुच्छेद 368 में विहित प्रक्रिया के अनुसार संविधान का संसोधन विधि के अंतर्गत नहीं आता इसलिए संसद संविधान में संसोधन कर सकती हैं।

  • सज्जन सिंह v s राजस्थान राज्य (1965) के अनुसार संसद संविधान में संसोधन कर सकती है।

  • गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)

संसद संविधान में संसोधन नहीं कर सकती है।

  • 11 न्यायाधीश इसकी सुनवाई कर रहे थे

  • न्यायालय का यह निर्णय 6:5 के बहुमत से दिया गया।

  • 24वां स.स.अ. (1971) (इंदिरा गांधी के समय)

    संसद मूलाधिकारों के साथ संविधान के किसी भाग में संसोधन कर सकती है।

  • केशवानन्द आरती बनाम केरल राज्य (1973)-

स्सांद मूल अधिकारों में संसोधन कर सकती है पर उसके मूलभूत ढांचों में नहीं।

  • 13 न्यायाधीश (सबसे ज्यादा) इसकी सुनवाई कर रहे थे।

  • न्यायालय का यह निर्णय 7:6 के बहुमत से दिया गया।

  • 42वां स.स.अ. 1976-

    • स्सांद दव्ारा किये गये संविधान संसोधन की वैधता को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    • स्सांद की संविधान संसोधन पर कोई परिसीमा नहीं होगा।

  • मिनर्वामिल vs भारत संघ (1980)- 5 न्यायाधीशों ने सुनवाई की

  • इसमें निर्णय लिया गया कि संविधान में संसोधन करके की जाने वाली उक्त व्यवस्था असंवैधानिक है तथा संसद संविधान संसोधन के माध्यम से संविधान के मूल ढांचे में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है।

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