महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-11: Important Political Philosophies for Competitive Exams

Download PDF of This Page (Size: 167K)

समष्टिवाद

फ़ेबियनवाद की ही प्रेरणा से इंग्लैंड तथा आसपास के कुछ देशों में एक मध्यवर्गीय समाजवादी आंदोलन शुरू हुआ जिसे समष्टिवाद कहा गया। इसे ’राज्य समाजवाद’ भी कहा जाता है। यह किसी विशेष दार्शनिक या विचारक की विचारधारा नहीं है। इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम और स्वीडन के कई अलग-अलग विचारकों से इसका संबंध जोड़ा जाता है।

समष्टिवाद की मूल मान्यता यह है कि समस्त ’मूल्य’ का जन्मदाता समाज है। उदाहरण के लिए, भूमि का मूल्य सिर्फ इसलिए है कि समाज को उसकी जरूरत है। जहाँ समाज की जरूरतें ज्यादा होती हैं, वहाँ भूमि या वस्तुओं के मूल्य भी ज्यादा हो जाते हैं। चूँकि समस्त ’मूल्य’ का जन्म समाज के हाथों होता है, इसलिए उस पर समाज का ही नियंत्रण और अधिकार होना चाहिए, थोड़े से ज़मींदारों या पूंजीपतियों का नहीं जो अपने लाभ के लिए सामाजिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन करते हैं। यह तभी हो सकता है जब समाज को लाभ पहुँचाने वाली सार्वजनिक सेवाएँ, जैसे सड़कें, रेलमार्ग, नहरें तथा खानें समुदाय के ही अधीन हों पर, चूँकि समुदाय इस विशाल कार्य को अपने आप संभालने में समर्थ नहीं, इसलिए उसके पास कोई ऐसा प्रतिनिधि संगठन होना चाहिए जिसमें सबकी इच्छा (अर्थात्‌ ’सामूहिक इच्छा’) को अभिव्यक्ति मिले, जो इसी ’सामूहिक इच्छा’ के निर्देशों के अनुसार काम करे और समाज दव्ारा उत्पन्न मूल्यों को संपूर्ण समाज के हित में नियोजित करे। समष्टिवादियों की दृष्टि में यह संगठन राज्य ही हो सकता है। उनका आदर्श लोकतांत्रिक राज्य का है, जिसमें सत्ता पूरे समुदाय के प्रतिनिधियों के हाथों में रहेगी और उनकी सहायता के लिए विशेषत: प्रशासक नियुक्त किए जाएंगे। ऐसी व्यवस्था मजदूरों को पूंजीपतियों की मनमानी से मुक्त करा सकेगी।

भारत में समाजवाद के रूप

अगर समाजवाद को उसके मूल दर्शन के स्तर पर देखा जाए तो वह न तो सिर्फ आधुनिक काल की विचारधारा है और न ही वह सिर्फ पश्चिमी देशों तक सीमित है। भारतीय संस्कृति में कई ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो किसी न किसी स्तर पर समाजवादी मूल्यों से संबंध रखते हैं। भारत के कई दर्शनों ’अपरिग्रह’ में (धन व भौतिक सुविधाओं को एकत्रित न करना) तथा ’अस्तेय’ (अन्य व्यक्तियों के धन व वस्तुओं की चोरी न करना) जैसे नैतिक आदर्श प्रस्तावित किए गए हैं जो गहरे स्तर पर समाजवाद के इस आदर्श से संगति रखते हैं कि आर्थिक संसाधनों का वितरण समतामूलक ढंग से होना चाहिए। ’सर्वे भवन्तु सुखिन:’ जैसे आदर्श भी समाजवाद के मूल्यों से जुड़ते हैं।

आधुनिक काल में जब भारतीय विचारकों ने मार्क्सवाद तथा समाजवाद के अन्य प्रकारों को जाना तो स्वाभाविक रूप से उन पर इन विचारों का असर पड़ा। दूसरी तरफ वे भारतीय संस्कृति में मौजूद समाजवादी मूल्यों से भी प्रभावित थे। परिणाम यह हुआ कि उन्होंने समाजवाद के पश्चिमी और भारतीय प्रारूपों का संश्लेषण कर दिया और नए तरीके का समाजवाद प्रस्तावित किया। नीचे कुछ भारतीय समाजवादियों के विचारों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।

Master policitical science for your exam with our detailed and comprehensive study material