महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-18: Important Political Philosophies for Competitive Exams

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मार्क्सवादी दर्शन/विचारधारा

मार्क्सवाद एक जटिल विचारधारा है जिसमें बहुत से विचार निहित हैं। उन सभी विचारों की समग्रता को ही मार्क्सवाद कहा जाता है।

मार्क्सवाद के प्रमुख विचारों का परिचय इस प्रकार है-

  • मार्क्सवाद के दो प्रमुख सिद्धांत हैं-’दव्ंदव्ात्मक भौतिकवाद’ तथा ’ऐतिहासिक भौतिकवाद’। ’दव्ंदव्ात्मक भौतिकवाद’ का संबंध प्रकृति और जगत के नियमों की व्याख्या से है जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद मनुष्य के संपूर्ण इतिहास की व्याख्या है।

  • मार्क्सवाद का मानना है कि प्रकृति की हर वस्तु तथा दुनिया के प्रत्येक समाज में कुछ अंतर्विरोध होते हैं जिनके कारण उनके भीतर ’वाद’ और ’प्रतिवाद’ में दव्ंदव् की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है। इन दोनों के संघर्ष के माध्यम से एक तीसरी अवस्था ’संवाद’ का उदभव होता है। ’संवाद’ वस्तुत: ’वाद’ और ’प्रतिवाद’ की ही कुछ विशेषताओं को जोड़कर तथा कुछ को छोड़कर एक समझौते की तरह विकसित होता है। आगे चलकर ’संवाद’ खुद ही ’वाद’ बन जाता है तथा उसके विरुद्ध पुन: ’प्रतिवाद’ का विकास होता है। ’वाद’ और ’प्रतिवाद’ तथा ’संवाद’ की इस त्रिस्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से ही सारा विकास होता है। अत: विकास के लिए ’दव्ंदव्’ या ’संघर्ष’ जरूरी है।

  • मानव समाज का सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि इसमें एक ’बुनियादी ढाँचा’ होता है तथा शेष ’ऊपरी ढाँचे’ होते हैं। ’बुनियादी ढाँचा’ ’उत्पादन प्रणाली’ को कहते हैं जिसके दो पक्ष हैं-’उत्पादन की शक्तियांँ तथा ’उत्पादन के संबंध’। उत्पादन प्रणाली से ही समाज का संपूर्ण ढांचा निर्धारित होता है। उत्पादन की शक्तियों या उत्पादन के संबंधों में परिवर्तन आने से उत्पादन प्रणाली बदल जाती है। समाज के शेष सभी ढाँचे जैसे सामाजिक मान्यताएँ, राजनीति, कला, संस्कृति इत्यादि इसी से निर्धारित होते हैं तथा उत्पादन प्रणाली के बदलने पर वे भी बदल जाते हैं। इस संबंध में मार्क्स का प्रसिद्ध कथन है कि ”हाथ की चक्की सामंतवाद पैदा करती है जबकि भाप का इंजन पूंजीवाद पैदा करता है।”

  • इतिहास की व्याख्या में मार्क्स ने सबसे ज्यादा महत्व ’उत्पादन के संबंधों’ को दिया है। उनका मानना है कि इतिहास के किसी चरण में कुछ व्यक्ति बलपूर्वक उत्पादक शक्तियों के मालिक बन जाते हैं जबकि बाकी लोग सिर्फ श्रम-शक्ति अर्थात्‌ मेहनत के प्रयोग से जीवित रहने को बाध्य होते हैं। यह शोषण प्राचीन काल से ही शुरु हुआ और समाज दो वर्गों शोषक तथा शोषित में विभाजित हो गया। इतिहास की व्याख्या का अर्थ यही है कि इन वर्गों के दव्ंदव् के माध्यम से युगों के परिवर्तन को समझा जाए। मार्क्स का कथन है- ”आज तक के सभी समाजों का इतिहास सिर्फ वर्ग संघर्ष का इतिहास है।”

  • मार्क्स के अनुसार, शोषित वर्ग की समस्याओं का एक ही समाधान है कि वह संगठित होकर हिंसक क्रांति करे। वर्ग चेतना अर्थात्‌ अपने वर्ग की वास्तविक स्थितियों तथा हितों की समझ पैदा होने पर शोषित वर्ग अपने अधिकारों के लिए जागरूक होता है और क्रांति की संभावना बनती है। दास व्यवस्था या सामंतवाद के दौर में छोटी-छोटी क्रांतियाँ होती हैं किन्तु पूंजीवाद के विरुद्ध एक वैश्विक क्रांति की संभावना बनती है क्योंकि पूंजीवाद में हजारों की संख्या में मजदूर साथ-साथ रहते और काम करते हैं तथा उनके मध्य आपसी संवाद कायम करने में विशेष समस्या नहीं होती। गौरतलब है कि मार्क्स को गांधी जी तथा स्वप्नदर्शी समाजवादियों दव्ारा समर्थित ’हृदय -परिवर्तन’ के विचार से कोई आस्था नहीं है क्योंकि उसके अनुसार यह एक कल्पना है, यथार्थ नहीं।

  • मार्क्सवाद का मानना है कि सभी सामाजिक समस्याओं की जड़ ’निजी संपत्ति की धारणा में छिपी है। निजी संपत्ति ही समाज में विषमताएँ पैदा करती है। इसके कारण एक वर्ग में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अमीरी का संचरण होता रहता है जबकि दूसरे वर्ग में सभी पीढ़ियाँ गरीबी व शोषण झेलते रहने को मजबूर होती हैं। जब तक निजी संपत्ति की धारणा का पूर्ण विनाश नहीं होगा, तब तक समाज में समानता की स्थापना नहीं हो सकेगी। मार्क्स का दावा है कि क्रांति के बाद समाजवाद तथा साम्यवाद में निजी संपत्ति का अस्तित्व नहीं रहेगा।

  • मार्क्सवाद में निजी संपत्ति की व्याख्या ’अधिशेष/अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत’ दव्ारा की जाती हे। इस सिद्धांत के अनुसार पूंजीपति की आय, जिसे वह लाभ कहता है, वस्तुत: ’अधिशेष मूल्य’ या ’चोरी की आय’ है। मार्क्स के अनुसार उत्पादन का अर्थ वस्तु के मूल्य में होने वाली वह वृद्धि है जो किसी श्रमिक दव्ारा अपनी श्रम शक्ति के प्रयोग के कारण होती है। वह एडम स्मिथ जैसे उदारवादी दार्शनिकों के इस विचार को नहीं मानता कि पूंजी भूमि और उद्यमशीलता भी उत्पादन के अनिवार्य साधन होते हैं। उसके अनुसार भूमि व पूंजी सारे समाज की होती है और उत्पादन प्रक्रिया में निहित संपूर्ण खतरा भी सारा समाज मिलकर उठा सकता है। मूल्य की वास्तविक वृद्धि सिर्फ श्रम से होती है, अत: संपूर्ण उत्पादित मूल्य श्रमिक को ही मिलना चाहिए।

    किन्तु पूंजीपति श्रमिक दव्ारा उत्पादित मूल्य का एक बड़ा अंश लाभ के नाम पर अपने पास रख लेता है। यदि एक मजदूर 12 घंटे काम करके 120 रू. मूल्य का उत्पादन करे और उसे उस श्रम के बदले सिर्फ 20 रू. दिये जाएं तो शेष 100 रू. अधिशेष मूल्य है। इस अर्थ में देखें तो मजदूर दव्ारा किये गये 12 घंटो के श्रम में से उसे सिर्फ दो घंटो के कार्य का भुगतान मिलता है जबकि शेष उत्पादन पर पूंजीपति बिना श्रम किये कब्जा कर लेता है। अधिशेष मूल्य को मार्क्स ने ’चुराई गई आय’ भी कहा है। उसने अधिशेष मूल्य पर कब्जा करने वाले शोषक वर्गों को ’परजीवी’ बताया है।

  • मार्क्सवाद ’राज्य’ का विरोध करता है; अत: वह ’अराजकतावाद’ का समर्थक है। मार्क्स का दावा है कि राज्य चाहे जैसा भी हो, वस्तुत: वह उच्च वर्ग के धन से संचालित होता है तथा उसी के हितों का पोषण करता है। उदाहरण के लिए, लोकतंत्र में राज्य पूंजीपतियों को संपत्ति का अधिकार देकर उनकी संपत्ति की सुरक्षा की गांरटी (विश्वास) देता है जो कि वस्तुत: निम्न वर्ग को गरीब बनाए रखने की साजिश है। पुलिस, सेना, अधिकारीतंत्र आदि का प्रयोग इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ही किया जाता है। मार्क्सवाद के अनुसार, समानता की अवस्था लाने के लिए राज्य का पूर्ण अंत होना जरूरी है। उसका दावा है कि साम्यवाद में ’राज्य लुप्त हो जाएगा’

  • मार्क्स ने ’धर्म’ का विरोध किया है। उसकी राय में धर्म अफीम के समान है क्योंकि वह शोषित व्यक्ति को वास्तविक वर्ग-शत्रु से संघर्ष करने के स्थान पर अलौकिक सुखों के लिए प्रेरणा देकर भटका देता है। साथ ही, वह शोषित व पीड़ित व्यक्ति को विद्रोह या क्रांति की प्रेरणा देने की बजाय शांत रहने, सहनशील बनने तथा भाग्यवादी होने की सीख देता है। इसका परिणाम यह होता है कि शोषित व्यक्ति अपने शोषण, दुख तथा पीड़ा को अपनी नियति या भाग्य मानकर झेलने लगता है, उनके खिलाफ संघर्ष नहीं करता। मार्क्स की स्पष्ट घोषणा है कि समाजवाद तथा साम्यवाद में धर्म नहीं रहेगा। समाजवाद में धर्म मानना निषिद्ध होगा जबकि साम्यवाद में धर्म मनुष्य की चेतना से लुप्त हो चुका होगा।

  • मार्क्सवाद ’राष्ट्रवाद’ का भी विरोध करता है क्योंकि मार्क्स के अनुसार राष्ट्रवाद एक मिथ्या चेतना है जो कृत्रिम भौगोलिक, धार्मिक, भाषायी या सांस्कृतिक भावनाओं को उभार कर वास्तविक आर्थिक शोषण से मजदूर वर्ग का ध्यान भटकाती है। मार्क्स राष्ट्रवाद को पूंजीवाद का ही सांस्कृतिक पक्ष मानता है जिसे पूंजीवाद ने इसलिए उभारा है ताकि मजदूरों को नकली प्रश्नों में उलझाया जा सके। मार्क्स अंतरराष्ट्रवाद में विश्वास रखता है क्योंकि दुनिया भर के मजदूरों की हालत प्राय: एक-सी है, राष्ट्र के आधार पर उसमें कोई अंतर नहीं आता। उसने कहा है कि ’मजदूरों का कोई देश नहीं होता।’ उसने नारा भी यही दिया कि ’दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ’। उसका दृढ़ विश्वास था कि पूंजीवाद का चरम विकास होने पर वैश्विक क्रांति होगी जिससे समाजवाद का उद्भव होगा। गौरतलब है कि मार्क्स के बाद इस विचार को लेकर मार्क्सवादियों में काफी परिवर्तन दिखाई पड़ता है। लेनिन, स्टालिन तथा माओ ने अपने-अपने तरीके से मार्क्सवादी विचारधारा के भीतर राष्ट्रवाद को स्वीकार किया है।

  • मार्क्सवाद के समर्थकों का एक वर्ग विवाह और परिवार संस्थाओं का भी विरोधी है क्योंकि ये संस्थाएँ निजी संपत्ति की सुरक्षा और हस्तांतरण के लिए विकसित हुई हैं, न कि प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए। ऐसे मार्क्सवादियों का स्पष्ट मानना है कि नारी विवाह और परिवार के अंतर्गत शोषित वर्ग है, जबकि पुरुष शोषक वर्ग।

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