महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-20: Important Political Philosophies for Competitive Exams

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मार्क्स के बाद मार्क्सवाद के रूप

मार्क्स की मृत्यु 1883 ई. में हुई। उससे पहले 1870 के दशक में एडवर्ड बर्नस्टीन जैसे विचारक मार्क्स के हिंसक क्रांति के सिद्धांत को खारिज करके ’विकासवादी समाजवाद’ की धारणा प्रस्तुत कर चुके थे। खुद मार्क्स ने भी अपनी मृत्यु से कुछ पहले अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों के बारे में स्वीकार किया था कि हिंसक क्रांति के बिना भी समाजवाद की ओर बढ़ना संभव हो सकता है।

मार्क्स के बाद मार्क्सवाद दो भागों में बंट गया। पहले वर्ग में वे विचारक शामिल हैं जो ’क्रांति’ और ’वर्ग-संघर्ष’ के सिद्धांतों में आस्था रखते है और ’धर्म’ ’राष्ट्र’ तथा ’राज्य’ जैसी संस्थाओं का निषेध करते हैं। इन विचारकों के वर्ग को पारंपरिक मार्क्सवाद कहा जाता है। लेनिन तथा माओ जैसे क्रांतिकारियों का संबंध इसी समूह से है। दूसरे वर्ग में वे विचारक आते हैं जिन्होंने हिंसक क्रांति और वर्ग संघर्ष के सिद्धांतों को बदली हुई स्थितियों में अनावश्यक मानकर मार्क्सवाद की व्याख्या नए तरीके से की। इन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि पूंजीवाद के नए रूप किस तरह समाज के विभिन्न वर्गों को छलते हैं। विचारकों के इस वर्ग को ’नवमार्क्सवाद’ कहा जाता है।ं यह वर्ग 20वीं शताब्दी की शुरुआत में विकसित हुआ। इसमें एंटोनियो ग्राम्शी, एरिक फ्रॉम और हर्बर्ट मारक्यूज जैसे विचारक प्रमुख तौर पर शामिल हैं।

इनमें से कुछ प्रमुख विचारकों के विचार नीचे दिए जा रहे हैं।

लेनिन का मार्क्सवाद

मार्क्स के सैद्धांतिक मार्क्सवाद को व्यावहारिक रूप तब मिला जब लेनिन ने 1917 में तत्कालीन सोवियत संघ में ’बोल्शेविक क्रांति’ की और क्रांति के पश्चात्‌ साम्यवादी दल की तानाशाही स्थापित की। इससे पहले यूरोप में कई समाजवादी विचारक दावा कर चुके थे कि मार्क्स के ’क्रांति’ तथा ’वर्ग-संघर्ष’ जैसे विचार अव्यावहारिक हैं, पर लेनिन ने ऐसी सभी आलोचनाओं को खारिज करते हुए साबित कर दिया कि समाजवाद क्रांति का विचार निरर्थक नहीं है। चूँकि व्यावहारिक स्तर पर यह पहला मार्क्सवादी प्रयोग था और इस प्रयोग में मार्क्स के बताए रास्ते को थोड़ा बदला गया था; इसलिए स्वाभाविक तौर पर लेनिन को आवश्यकता महसूस हुई कि वह मार्क्सवाद के सिद्धांतों को बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप पुन: व्याख्यायित करेे। उसने पारंपरिक मार्क्सवाद में निम्नलिखित संशोधन किये-

ढवस बसेेंत्रष्कमबपउंसष्झढसपझ यह आवश्यक नहीं है कि क्रांति पूंजीवाद के चरम विकास के बाद ही हो। क्रांति किसी भी देश में हो सकती है। शर्त मात्र इतनी है कि वहाँ शोषण का तंत्र कमजोर होना चाहिए। जिन देशों में पूंजीवाद विकसित नहीं हुआ है, वहाँ भी शोषण तंत्र कमजोर होने पर क्रांति हो सकती है। रूस में पूंजीवाद का अधिक विकास नहीं होने के बावजूद इसलिए क्रांति हो सकी क्योंकि रूस में शोषण का तंत्र तोड़ा जा सकने लायक था।

  • क्रांति पूरे विश्व में एक साथ हो, यह भी आवश्यक नहीं है। समाजवाद का आगमन सभी देशों में उनकी स्थितियों के अनुसार हो सकता है। लेनिन ने इस बात पर बल दिया कि प्रत्येक समाजवादी देश को अन्य देशों में क्रांति के लायक परिस्थितियाँ निर्मित करने के लिए सहायता देनी चाहिए।

  • कम विकसित देशों में साम्राज्यवाद ही पूंजीवाद का रूप है क्योंकि पूंजीपति ही साम्राज्यवाद को साधन बनाकर गरीब देशों के संसाधन लूटते हैं। अत: साम्राज्यवाद के शिकार देशों में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को क्रांति ही माना जाएगा।

  • राज्य को एक झटके में समाप्त करना संभव नहीं है। उसकी आवश्यकता तब तक बनी रहेगी तब तक पूरे विश्व में साम्यवाद स्थापित न हो जाए।

  • क्रांति केवल मजदूरों के माध्यम से संभव नहीं होगी। उसमें कृषकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। यह विचार इसलिए दिया गया था क्योंकि तत्कालीन रूस में पूंजीवाद विकसित नहीं हुआ था और मजदूर वर्ग की संख्या काफी कम थी। वहाँ ज्यादा संख्या किसानों की थी और उन्हें साथ लिए बिना क्रांति को सफल बनाना असंभव था।

  • मार्क्स ने माना था कि मजदूरों में वर्ग-चेतना अपने आप पैदा होगी। लेनिन ने माना था कि सामान्य मजदूरों में इतनी समझ नहीं होती कि वे अपने आप शोषण की प्रक्रिया को समझ सकें तथा अपने वर्ग हितों को पहचानकर उनके पक्ष में संगठित हो जाएँ। इसलिए उसने वर्ग चेतना से युक्त मजदूरों (तथा कुछ बुद्धिजीवियों) को साथ लेकर ’साम्यवादी दल’ की स्थापना की जिसे न केवल क्रांतिकारी वर्ग चेतना का प्रचार-प्रसार करना था बल्कि क्रांति के पश्चात्‌ तानाशाही का संचालन भी करना था।

  • साम्यवादी दल के संगठन के संबंध में लेनिन ने ’लोकतांत्रिक केन्द्रवाद’ का सिद्धांत दिया इसका अर्थ है कि दल का नेतृत्व कौन करेगा, इसका फैसला दल के भीतर चुनाव दव्ारा किया जाएगा; किन्तु दल के सदस्य जिन व्यक्तियों को नेतृत्व के लिए चुन लेंगे, उसके बाद वे उनके (नेतृत्व के लिए चुने गए व्यक्तियों के) आदेशों को मानने को बाध्य होंगे। यही सिद्धांत सबसे नीचे के स्तर से शुरू होकर सर्वोच्च स्तर तक लागू होगा।

कुछ लोगों का मत है कि लेनिन ने मार्क्स को जितना स्वीकारा है, उससे कहीं अधिक मार्क्सवाद को खारिज कर दिया है। किन्तु, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मार्क्स ने अपने दर्शन को परिस्थतियों से परे कभी नहीं माना। सच यह है कि अगर वह खुद वास्तविक क्रांति के समय जीवित होता तो शायद अपने सिद्धांतों में वही परिवर्तन करता जो लेनिन ने किये। इस रूप में लेनिन मार्क्सवाद का खंडन नहीं बल्कि तार्किक विस्तार करता है।

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