महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-3: Important Political Philosophies for Competitive Exams

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स्वेच्छातंत्रवाद-

1950 ई. के बाद विश्व की स्थितियाँ बदलने के कारण पुन: उदारवाद के स्वरूप में संशोधन हुआ। दव्तीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व बैंक और आई.एम.एफ. जैसी संस्थाएँ निर्मित हुई और धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में निजीकरण, उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण की शुरूआत हुई। इस समय नकारात्मक उदारवाद की विचारधारा एक बार पुन: नए रूप में उभरी जिसे स्वेच्छातंत्रवाद कहा गया। इस सिद्धांत के समर्थकों में चार दार्शनिक प्रमुख हैं- आइज़िया बर्लिन, एफ.ए. हेयक, मिल्टन, फ्रायडमैन तथा रॉबर्ट नॉजिक। इनके सामान्य विचार इस प्रकार हैं-

  • व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए-धर्म से, समाज से, परंपरा से और परिवार से ताकि वह अपनी नियति स्वयं निर्धारित कर सके।

  • ’मुक्त बाजार प्रणाली’ न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने के लिए सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था है। व्यक्ति समाज के लिए कितना योगदान करता है, इसका सटीक मूल्यांकन करके बाजार उसे उतना ही लाभ प्रदान करता है। अत: वितरणमूलक न्याय प्रदान करने हेतु एकमात्र निष्पक्ष प्रणाली बाजार व्यवस्था है।

  • ये चिंतक सामाजिक न्याय के विरोधी हैं। इनका स्पष्ट कहना है कि जब भी राज्य सामाजिक न्याय का प्रयास करता है, तब राज्य की शक्तियाँ बढ़ने से व्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है। फिर जिन व्यक्तियों से कुछ छीनकर अन्य वर्गों को वितरित किया जाता है, उनकी अधिकारिता का भी उल्लंघन होता हैं।

  • जहाँ तक राज्य का प्रश्न है, ये राज्य को अधिक शक्तियाँ देने के विरोधी है। इनके अनुसार राज्य के मुख्य कार्य हैं-

  • कानून व्यवस्था बनाए रखना।

  • वे नियम बनाना जो अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में माने जाएंगे तथा यह देखना कि उन नियमों का पालन होता रहे।

  • जो व्यक्ति मुक्त बाजार प्रतिस्पर्धा में चलने के काबिल न हों, उनके लिए कल्याणकारी उपाय करना।

  • वे सभी कार्य करना जिन्हें बाजार प्रणाली करने में असमर्थ है।

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