महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-4: Important Political Philosophies for Competitive Exams

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समतावाद

समकालीन उदारवाद की दूसरी शाखा ’समतावाद’ कहलाती है। यह शाखा सकारात्मक उदारवाद का विकसित रूप है, जिसने 1950 ई. के बाद स्वेच्छातंत्रवाद के विरुद्ध अपने कई तर्क प्रस्तुत किए। इस वर्ग में मुख्यत: दो विचारक शामिल हैं-सी.बी. मैक्फर्सन तथा जॉन रॉल्स। इन दोनों की मूल मान्यता यह है कि राज्य को कल्याणकारी कार्य तब तक करते रहना चाहिए जब तक निम्न वर्ग भी वैसी स्थितियाँ प्राप्त नहीं कर पाता जैसी उच्च वर्ग की हैं। जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत में एक काल्पनिक युक्ति का प्रयोग करते हुए साबित किया कि वर्तमान समय में उच्च और निम्न वर्ग के जितने अंतराल हैं वे इतिहास की अतार्किक स्थितियों से पैदा हुए हैं और उन्हें न्यायोचित मानकर नहीं चलाया जा सकता। मैक्फर्सन ने साबित किया कि पूंजीविहीन श्रमिकों के लिए मुक्त बाजार प्रणाली अत्यंत विषमतामूलक है।

समाजवाद

समाजवाद वर्तमान विश्व की सबसे प्रसिद्ध विचारधाराओं में से एक है किन्तु इसे पूरी स्पष्टता के साथ पारिभाषित करना संभव नहीं है। इसका कारण यह है कि हर समाजवादी विचारक ने समाजवाद की व्याख्या अपने दृष्टिकोण से की है। समाजवाद का अर्थ इतना अनिश्चित है कि एक विचारक सी.ई.एम. जोड का कहना है कि ”समाजवाद उस टोपी की तरह है जिसे विभिन्न लोगों ने इतना अधिक पहना है कि अब उसका अपना कोई निश्चित आकार नहीं बचा है।”

’समाजवाद’ शब्द का प्रयोग आमतौर पर तीन अर्थों में किया जाता है। पहले अर्थ में यह एक व्यापक विचारधारा है जो समाज के आर्थिक संसाधनों को समाज के सभी वर्गो में समतामूलक रीति से विभाजित करना चाहती है। इस दृष्टि से मार्क्सवाद भी समाजवाद का ही एक उपवर्ग है। दूसरे अर्थ में समाजवाद मार्क्सवाद के अंतर्गत इतिहास का वह चरण है जो पूंजीवाद के बाद क्रांति के परिणामस्वरूप आता है तथा जिसे ’सर्वहारा की तानाशाही’ भी कहा जाता है। तीसरे अर्थ में, समाजवाद का आशय समानता से भिन्न समाजवाद के उस रूप से जो हिंसक क्रांति और वर्ग संघर्ष जैसे उपायों के स्थान पर लोकतंत्र के मार्ग से आर्थिक समानता साधना चाहता है। आजकल जब समाजवाद की चर्चा की जाती है तो प्राय: समाजवाद का तीसरा अर्थ ही लिया जाता है जो बिना हिंसक उपायों के समतामूलक समाज की स्थापना से संबंधित है।

समाजवाद के इस रूाप् में सामान्यत: निम्नलिखित विशेषताएंँ देखी जा सकती हैं-

  • सभी समाजवादी मानते हैं कि राज्य या सरकार का काम समाज में आर्थिक समानता की स्थापना के लिए अधिकाधिक प्रयास करना है। इसलिये राज्य को ऐसे सभी कदम उठाने चाहिये जो इस उद्देश्य को साधने में सहायक हो सकते है; जैसे-प्रगतिशील कराधान, समाज के सभी सदस्यों को काम का अधिकार नि:शुल्क शिक्षा और निशुल्क चिकित्सा जैसे अधिकार।

  • समाजवाद यह नहीं कहता कि व्यक्ति को निजी संपत्ति अर्जित करने की बिल्कुल अनुमति न हो; न ही वह इस बात का समर्थक है कि निजी उद्यमशाीलता को पूर्णत: अस्वीकार कर दिया जाए; किन्तु वह चाहता है कि उत्पादन के प्रमुख साधन सार्वजनिक स्वामित्व में हों तथा उद्यमशीलता के नाम पर मुक्त बाजार को खुली छूट न दी जाए।

  • समाजवाद के समर्थक औद्योगिक उत्पादन प्रणाली का समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि औद्योगिक प्रणाली के अधिकाधिक प्रयोग से मानव समाज की सभी भौतिक जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।

  • समाजवादी सामान्यत: धर्म को एक रुढ़िवादी विचार मानते हैं और चाहते हैं कि मनुष्य की चेतना से धर्म समाप्त हो जाए; किन्तु ये लोग मार्क्सवादियों की तरह धर्म को पूरी तरह खारिज नहीं करते। यदि कोई व्यक्ति निजी जीवन में धर्म को मानना चाहे तो इन्हें कोई आपत्ति नहीं है।

जहाँ तक भारतीय राजनीति का प्रश्न है, उस पर कोई समाजवादी चिंतकों का असर है। स्वाधीनता संग्राम के दौर में आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओ के अलावा पंडित जवाहरलाल नेहरू भी समाजवाद के समर्थकों में शामिल थे। भारतीय संविधान के निर्माण की प्रक्रिया में समाजवाद के प्रभाव से ही कई नीति निर्देशक तत्वों को स्वीकार किया गया। 1976 में संविधान के 42वें संशोधन में तो संविधान की प्रस्तावना में ही ’समाजवाद’ शब्द जोड़ दिया गया। वर्तमान में भारत के कई राजनीतिक दल खुद को समाजवादी विचारधारा का वाहक बताते हैं, जैसे समाजवादी पार्टी (दल) जनता पार्टी और उसके विभिन्न धड़े भी समाजवाद को ही अपनी मूल विचारधारा बताते हैं, जैसे जनता दल एकीकृत, राष्ट्रीय जनता दल इत्यादि।

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