महत्वपूर्ण राजनीतिक दर्शन Part-8: Important Political Philosophies for Competitive Examsfor Competitive Exams

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जर्मन सामाजिक लोकतंत्र

1848 ई. में मार्क्स और एंजल्स ने ‘कम्युनिस्ट (साम्यवादी) मैनिफैस्टो (घोषणापत्र) ’ का प्रकाशन किया था जिसमें वर्ग संघर्ष और हिंसक क्रांति को अनिवार्य बताया गया था। यह सिद्धांत 1840 के दशक की परिस्थितियों को केन्द्र में रखकर बनाया गया था जिसे इंग्लैंड में ‘भूखा दशक’ कहा जाता है। इस समय राज्य का स्वरूप पूर्णत: शोषणकारी तथा विशिष्टवर्गवादी था और उसे जनसाधारण की समस्या से कोई लेना-देना नहीं था। किन्तु, 1850 के दशक में यूरोप की परिस्थितियां बदलने लगीं और कुछ ऐसे परिवर्तन दिखने लगे जो लोक-कल्याणकारी राज्य के उदवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू भव की ओर इशारा करते थे। इन परिस्थितियों में कुछ विचारक को लगने लगा कि हिंसक क्रांति की जगह शांतिपूर्ण उपायों से भी समाजवादी आदर्शो की उपलब्धि की जा सकती है। ऐसा पहला प्रसिद्ध विचार जर्मनी में ‘जर्मन सामाजिक लोकतंत्र’ के नाम से विकसित हुआ। इसके समर्थकों में सबसे महत्वपूर्ण विचारक फ़र्डिनेंड लासाल थे।

फ़र्डिनेंड लासाल (तथा जर्मन सामाजिक लोकतंत्र) के वैचारिक योगदान को निम्नलिखित बिन्दुओं में समझा जा सकता है-

  • लासाल मार्क्सवाद के ऐतिहासिक भौतिकवाद के इस निष्कर्ष से सहमत है कि निकट भविष्य में पूंजीवाद का पतन और मजदूर वर्ग का उत्थान होना अनिवार्य है, परन्तु इसकी प्रक्रिया और राज्य की भूमिका जैसे बिन्दुओं पर वह मार्क्सवाद से अलग रास्ता चुनता है।
  • उसने पूंजीवाद के अंतर्गत मजदूर के शोषण की व्याख्या करते हुए एक नया सिद्धांत विकसित किया जिसे ‘मजदूरी का लौह नियम’ कहा जाता है। इस सिद्धांत का अर्थ है कि पूंजीवाद के अंतर्गत मजदूर की औसत मजदूरी सिर्फ इतनी ही होती है कि उससे उसका निर्वाह हो जाए, उससे अधिक नहीं। ऐसी मांग और पूर्ति के नियम के कारण होता है।
  • एक ऐसे समाजवाद की स्थापना की जानी चाहिए जिसमें वस्तुओं का उत्पादन और नियंत्रण कुछ सहकारी समितियों के हाथ में हो तथा निर्णय प्रक्रिया में मजदूरों की भी प्रभावी हिस्सेदारी हो। ऐसा होने पर मजदूरों को अपनी मेहनत का पूरा मूल्य मिलेगा और वे सिर्फ निर्वाह स्तर पर काम करने को मजबूर नहीं होंगे।
  • समाजवाद की स्थापना के लिए हिंसक क्रांति की आवश्यकता नहीं है। इसकी जगह, ज्यादा व्यावहारिक उपाय यह है कि सभी मजदूर एक राजनीतिक दल के रूप में संगठित हो जाएँ और सरकार पर दबाव बनाकर सार्वजनिक वयस्क मताधिकार की प्रणाली शुरू कराएँ। चूँकि मजदूर वर्ग की जनसंख्या ज्यादा है, इसलिए लोकतंत्र के भीतर पूंजीपति उसकी शक्ति को नहीं रोक सकेंगे। राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हो जाने पर मजदूर वर्ग के संसद सदस्य समाजवाद स्थापित करने वाले कानून बनाएंगे जिससे आर्थिक व्यवस्था भी उनके पक्ष में आ जाएगी। राज्य को समाप्त नहीं किया जाएगा बल्कि उसे लोक-कल्याणकारी स्वरूप दिया जाएगा। इसलिए, वर्तमान में मजदूर आंदोलन का तात्कालिक लक्ष्य यही होना चाहिए कि विधानमंडल में बहुमत प्राप्त किया जाए।

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