Public Administration: Accelerated Irrigation Benefit Programme

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सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय (Government Policies and Interventions for Development in Various Sectors and Issues Arising Out of Their Design and Implementation)

त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (Accelerated Irrigation Benefit Programme)

  • त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम भारत सरकार का एक फ्लैगशिप कार्यक्रम है जो 1996 - 97 में ऐसे राज्यों को ऋण सहायता उपलब्ध कराने के लिए शुरू किया था, जिनकी अधूरी वृहद/मध्यम सिंचाई परियोजनाएँ पूरी होने के अग्रिम चरणों में थी। उत्तर-पूर्वी राज्यों, सिक्किम, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्यों और ओडिशा के जिलों की सतही लघू सिंचाई परियोजनाओं को 1999 - 2000 से इस कार्यक्रम के अंतर्गत केन्द्रीय ऋण सहायता उपलब्ध कराई गई है। अप्रैल, 2004 से इस कार्यक्रम में अनुदान का भाग भी शामिल कर लिया गया है।
  • दिसंबर, 2006 से प्रभावी वर्तमान त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के मानकों के अनुरूप चुनिंदा परियोजनाओ को गैर-विशेष श्रेणी वाले राज्यों की वृहद और मध्य सिंचाई परियोजनाओं के लिए परियोजना लागत का 25 प्रतिशत और विशेष श्रेणी वाले राज्यों वृहद, मध्यम/लघु सिंचाई परियोजनाओं के लिए 90 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। 7 जुलाई, 2009 तक इस कार्यक्रम के अंतर्गत 9908 सतही लघु सिंचाई परियोजनाओं के लिए राज्य सरकारों को 36534 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराई जा रही है। इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद से अब तक 109 वृहद/मध्यम और 6584 सतही लघु सिंचाई योजनाएँ पूरी कर ली गई हैं। मार्च, 2009 तक वृहद मध्यम सिंचाई परियोजनाओं दव्ारा 5.44 मिलियन हेक्टेयर और सतही लघु सिंचाई परियोजनाओं दव्ारा 0.45 मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त सिंचाई क्षमता सृजित की गई है।
  • त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के तहत 2008 - 09 की अवधि के लिए 4300 करोड़ की राशि आबंटित की गई। प्रधानमंत्री प्रोत्साहन पैकेज के तहत इसे 2,300 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि आबंटित की गयी है। त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम के मौजूदा दिशा-निर्देशों के अनुसार सूखा प्रवण जनजातीय क्षेत्रों के अंतर्गत लाभ पाने वाले एवं प्रधानमंत्री राहत पैकेज के तहत लाभ पाने-वाले कृषि संकट से जूझ रहे महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल के जिले तथा कम सिंचाई सुविधा वाले राज्यों को इस कार्यक्रम में शामिल किया जा सकता है।

यूनिसेफ-इंडिया दव्ारा वर्ष 2012 में भारत के सामाजिक कल्याणकारी फ्लैगशिप कार्यक्रमों की मूल्यांकन रिपोर्ट (Evaluation Report of India՚s Social Welfare Flagship Programmes in 2012 by UNICEF-India)

  • यूनिसेफ इंडिया ने वर्ष 2012 में भारत के समाज कल्याण फ्लैगशिप कार्यक्रमों का मूल्यांकन किया और कार्यक्रमों में व्यक्तियों व समुदायों की बहिष्करण संबंधी स्थितियों की पहचान की। इसने फ्लैगशिप कार्यक्रमों में ‘समावेशिता’ के संवर्धन (Inclusiveness Promotion) की आवश्यकता महसूस की।
  • सबसे पहले इसने भारत के ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ (Total Sanitation Campaign) का मूल्यांकन किया जिसे वर्ष 1999 में शुरू किया गया था और उसका उद्देश्य वर्ष 2012 तक ग्रामीण क्षेत्रों में सभी को स्वच्छता सुविधा (शौचालय) प्रदान करना था। इस अभियान का उद्देश्य स्कूलों व आँगनवाड़ी केन्द्रों में वृद्धि करना था। इस योजना में लड़कियों पर विशेष ध्यान देने की अपेक्षा की गई थी।
  • लेकिन रिपोर्ट (2012) में कहा गया है कि इस योजना में सामाजिक बहिष्करण को दूर करने के पर्याप्त प्रयास नहीं किये गये हैं। अनुसूचित जाति व जनजाति समुदायों के लोगों के संदर्भ में यह योजना पूर्ण रूप से संवेदनशील नहीं रही है।
  • रिपोर्ट में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के संदर्भ में कहा गया है कि इस योजना में विभिन्न संवेदनशील वर्गो (Vulnerable Groups) की पहचान की गयी है और उसके अनुरूप उन्हें स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने का प्रयत्न किया गया है। परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केन्द्रों की दूरी के चलते संपर्कहीनता, लाेेक परिवहन का अभाव आदि के चलते कुछ व्यवधान विद्यमान हैं।
  • मिशन को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ नवाचारी तरीकों (Innovative Methods) को अपनाना होगा जैसे- निगरानी प्रणाली, व्यवहारगत परिवर्तन संचार (Behavioural Change Communication) , सेवा आपूर्ति (Service Delivery) , लोक-निजी भागीदारी (PPPs) , मांग-पक्ष वित्तीयन (Demand Side Financing) जैसे बीमा व वाउचर कार्यक्रम, कर्मचारियो का प्रशिक्षण व उन पर निगरानी, औषधि की आदिम जनजातीय प्रणालियों पर अनुसंधान कार्य व नियोजन क्षमताओं का विकास आदि।
  • रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत आवंटित बजट के उपयोग में आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल एवं तमिलनाडु का कार्य निष्पादन बेहतर रहा है। यूनिसेफ इंडिया की तरफ से निर्मित इस मूल्यांकन रिपोर्ट में एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (ICDS) में सामाजिक बहिष्कार के स्तर व दशाओं की पहचान खासकर अनुसूचित जाति व जनजाति समुदाय के बच्चों के संदर्भ में की गयी है। रिपोर्ट के निष्कर्ष में कहा गया है कि आईसीडीएस स्कीम में यह प्रावधान है कि प्रत्येक 1000 की जनसंख्या पर एक आँगनवाड़ी केन्द्र होना चाहिए। लेकिन जनजातीय क्षेत्रों (Tribal Areas) में इस संदर्भ में जनसंख्या मानक को कम (700 पर एक आँगनवाड़ी केन्द्र) किया गया है। रिपोर्ट का कहना है कि आईसीडीएस के सार्वभौमीकरण के प्रयासों के प्रति सरकारी तंत्र में विशेष रुचि नहीं देखी गयी है। राज्यों में आँगनवाड़ी केन्द्रों की स्थापना के बावजूद अल्पपोषण व कुपोषण की स्थितियाँ गंभीर रूप से विद्यमान हैं। इस योजना के अंतर्गत सेवा आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार पर विशेष ध्यान देने की बात रिपोर्ट में कही गयी हैं। फोकस-2006 रिपोर्ट में भी समाज वैज्ञानिक जीन द्रीज दव्ारा सामाजिक असमातनाओं को दूर कर आईसीडीएस के सार्वभौमीकरण की सिफारिश की गयी।

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत आयुष क्षेत्र के विकास हेतु प्रयास (Efforts for the Development of Aayush Sector under NRHM)

  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत 2009 - 13 के दौरान आयुष विकास के लिए राज्यों और केन्द्र शासित क्षेत्रों को 553 करोड़ रुपये दिये गये हैं। इसके फलस्वरूप देश में 803 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, 113 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और 24 जिला अस्पतालों में नयी आयुष सुविधाओं की स्थापना हुई तथा 379 विशिष्ट आयुष अस्पतालों और 415 औषधालयों का उन्नयन किया गया।
  • देश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में अनुबंध के आधार पर कुल मिलाकर 11.478 आयुष चिकित्सकों और 4,894 आयुष अर्द्ध-चिकित्सा कर्मचारियों को नियुक्त किया गया है।
  • 11वीं योजना में आयुष विभाग में चार महत्वपूर्ण क्षेत्रों- शिक्षा, अनुसंधान, औषधि विकास और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न योजनाएँ लागू की गई हैं। इन योजनाओं से होम्योपैथिक को भी बहुत लाभ हुआ है। गाँवों में आशा नामक 8 लाख 6 हजार सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की नियुक्त की गयी है ताकि समुदायों और स्वास्थ्य प्रणाली के बीच संबंध सुगम बनाए जा सके।
  • चिकित्सालयों में प्रसव के मामले 2005 - 06 में 7 लाख थे और पिछले दो वर्षों में यह आँकड़ा करीब 1 करोड़ 10 लाख तक पहुँच गया है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए 11 राज्यों में 415 स्वास्थ्य केन्द्रों में 25 हजार से अधिक अतिरिक्त बिस्तर मंजूर किये गये हैं। प्रसव के दौरान उचित देखभाल के लिए प्रत्येक गर्भवती महिला तक पहुँचने और हर बच्चे के समुचित टीकाकरण के लिए नाम, पते और टेलीफोन आधारित जच्चा बच्चा निगरानी प्रणाली शुरू की गयी है। 7 जून, 2013 तक इसके तहत 4.3 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं और 3.5 करोड़ से अधिक बच्चों का आँकड़ा एकत्रित किया गया है। हाल ही में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम पहल शुरू की गई है, जो महाराष्ट्र में ठाणे जिले के जनजातीय विकास खंड में 6 फरवरी, 2013 से प्रारंभ की गई है। इस कार्यक्रम के तहत जन्म से लेकर 18 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों की विकृति, रोग एवं विकलांगता के लिए जाँच भी की जाती है।

ग्रामीण अवसंरचना के सुधार में प्रमुख फलैगशिप कार्यक्रमों की भूमिका का मूल्यांकन (Evaluation of the Role of Major Flagship Programmes in the Reform of Rural Infrastructure)

  • 11वीं योजना मे ग्रामीण अवसंरचना के सुधार, महत्वपूर्ण स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण, मानव पूंजी व सामाजिक पूंजी के विकास के लक्ष्यों को गति देने में भारत सरकार के कुछ महत्वपूर्ण फलैगशिप कार्यक्रमों की प्रभावी भूमिका रही है। ग्रामीण अवसंरचना के विकास जैसे मुख्य विषय ने “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम” व भारत निर्माण कार्यक्रम की सत्ता को स्थापित करने में बुनियादी समर्थन प्रदान किया। पिछले 5 वर्षों से इसने लगभग 9,000 मिलियन लोगों को कुल 110,000 करोड़ रुपये से अधिक राशि के व्यय पर काम उपलब्ध करवाया। मनरेगा ने इस मामले में बहुत योगदान दिया, जिसका प्रमाण यह तथ्य है कि लाभभोगियों के मध्य अनुसूचित जाति/जनजाति के परिवारों का योगदान 51 - 56 प्रतिशत रहा और कर्मचारियों में 41 - 50 प्रतिशत महिलाएँ रहीं। इससे वित्तीय समावेश को भी बढ़ावा मिला, जिसमें मनरेगा कार्यबल के अंतर्गत आने वाली जनसंख्या के निर्धन वर्गों के लिए 100 मिलियन से अधिक बैंक पोस्ट ऑफिस खाते खोले गए हैं।
  • इंदिरा आवास योजना (आईएवाई) कार्यक्रम ने निर्धनता रेखा से नीचेे रहने वाले 22.5 मिलियन परिवारों को घर उपलब्ध कराया, जबकि 3.5 मिलियन स्वयं सहायता समूहों से भी अधिक को एसजीएसवाई के तहत गठित किया गया। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत आने वाले क्षेत्र में, जिसमें 65 से अधिक बीपीएल जनसंख्या के लिए पेंशन उलब्ध कराई जाती थी, इसे 2009 - 10 में 21.6 मिलियन लाभभोगियों तक बढ़ाया गया। पात्रता की आयु 60 वर्ष तक की गई। 12वीं योजना में लाभधारयों की संख्या महत्वपर्ण ढंग से बढ़ जायेगी।

12वीं पंचवर्षीय योजना व संपूर्ण स्वच्छता अभियान का मूल्यांकन (12th Five Year Plan and Evaluation of Total Sanitation Programme)

  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में स्पष्ट किया गया है कि निरंतरता का प्रश्न संपूर्ण स्वच्छता अभियान (Total Sanitation Campaign) में प्रभावशाली सफलता को कुछ हद तक कमजोर कर देता है। शौचालय के निर्माण कार्य को जल्दी करवाने के लिए पंचायती राज संस्थाओं के मध्य निर्मल ग्राम पुरस्कार (NGP) प्रोत्साहन प्रतियोगिता रखी गई है, परन्तु इसका कोई सुनिश्चित अनवरत उपयोग दिखाई नहीं दिया।
  • यह समस्या इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि ‘संपूर्ण स्वच्छता अभियान’ तीव्र गति से राज्य के नेतृत्व में आता गया है और अक्सर इसे समुदाय स्तर पर आवश्यक जागरूकता निर्मित करने के सचेत प्रयास के बिना ही क्रियान्वित किया गया। कार्यक्रम को अक्सर निधि उपयोग पूरा करने की आकांक्षा से संचालित किया गया न कि जागरूकता निर्माण तथा मांग उत्पादन प्रक्रिया के साथ संघटित रूप से जोड़ा गया।
  • संपूर्ण स्वच्छता अभियान की एक सीमितता (Limitation) किसी देश में प्रस्तुत किये गये विकल्पों की सीमित श्रृंखला है, जिसमें अत्यंत विधितापूर्ण भौगोलिक, हाइड्रोलॉजिकल, मौसम और साामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ (उच्च जल स्तर, प्रवण बाढ़, पथरीली भूमि, रेगिस्तान/जल दुर्लभ क्षेत्र और बहुत ही कम तापमान वाली स्थितियाँ) शामिल होती हैं। यह भी स्पष्ट है कि शौचलयों का उपयोग जल की आपूर्ति के प्रावधान के बिना अनवरत रूप से नहीं किया जा सकता है और बहुत से निर्मल ग्राम कार्यक्रम गांव इसमें असफल हुए क्योंकि कभी भी प्रस्तावित जल आपूर्ति क्रियान्वित नहीं की गई। इसके साथ ही, शुद्ध पेय जल को बिना गुणत्तापूर्ण स्वच्छता के सुनिश्चित नहीं किया जा सका।
  • पेयजल आपूर्ति योजनाओं को भी खराब व्यवस्था का सामना करना पड़ा है। जल आपूर्ति योजनाओं के संचालन और रख-रखाव की जिम्मेदारी पंचायती राज संस्थाओं पर है, परन्तु बहुत से राज्यों में इस जिम्मेदारी को असंतोषजनक ढंग से वर्णित किया गया है और यह पर्याप्त निधि तथा पीआरआई के लिए प्रशिक्षित मानव बल के हस्तांतरण दव्ारा समर्थित नहीं है। पंचायती राज संस्थाएँ और ग्रामीण पेयजल तथा स्वच्छता समिति (VWSC) उन पूर्ण योजनाओं को अपने कार्यक्षेत्र में नहीं लेना चाहतीं, जो योजना और कार्यकुशलता तथा सुरक्षित रखरखाव की कमी भी जल आपूर्ति योजनाओं को तत्काल असफलता की ओर अग्रसर करते हैं।

सार्वभौमिक बुनियादी शिक्षा व संबंधित आयामों की वर्तमान स्थिति (12वीं योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र के संदर्भ में) [Current Status of Universal Basic Education and Related Dimensions (A Per Approach Paper of 12th Plan) ]

  • सर्व शिक्षा अभियान 2001 - 02 में अपने आरंभ से ही 6 - 14 आयु वर्ष के सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा प्रदान करने में मुख्य भूमिका निभाता आया है और इसने बुनियादी शिक्षा में काफी प्रगति की है। शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रभावी प्रवर्तन के लिए जरूरी है कि सूचना के अधिकार अधिदेश के तहत विजन, कार्यनीति तथा सर्व शिक्षा अभियान के मानदंडों का भी ध्यान रखा जाय। अलग-थलग बस्तियों, शिक्षा की दृष्टि से पिछड़े प्रखंडों और जिलों पर विशेष ध्यान देना होगा। स्कूल से बाहर रह रहे बच्चों को इसके दायरे में लेने की आवश्यकता है, जिसमें विशेष आवश्यकता वाले बच्चे और अनाथ बच्चे भी शामिल हैं। अनुसूचित जाति व जनजाति तथा अल्पसंख्यक बालिकाओं के पंजीकरण के संबंध में सामाजिक और लैंगिक अंतरालों को पाटने के लिए उन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र के अनुसार पहुँच और रिटेंशन (बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने) के बावजूद अधिकांश बच्चों के लिए लर्निंग आउटकम (पढ़कर सीखना) चिंता का गंभीर विषय बना हुआ है। इस विषय में कराये गये अध्ययनों का सुझाव है कि ग्रेड-5 में लगभग आधे बच्चे ग्रेड-2 की पाठ्‌य-पुस्तकों को पढ़ने में समर्थ नहीं हैं। 8 वर्षों की बुनियादी अवधि के दौरान न्यूनतम ज्ञान संबंधी दक्षताओं के सेट को सभी बच्चों में सुनिश्चित करने के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता है।
  • 12वीं योजना मेे विस्तार के उद्देश्यों को हासिल करने तथा गुणवत्ता संबंधी सुधार लाने के लिए और अधिक सार्थकता के साथ निजी क्षेत्रक को शामिल करने की संभावनाओं का पता लगाना होगा। निजी स्कूलों को मान्यता देते हुए सूचना के अधिकार अधिनियम का अधिदेश है कि सभी स्कूल चाहे उन्हें सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है या नहीं, उन्हें अनिवार्य रूप से वंचित रहे परिवारों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करनी होगी।
  • मध्याह्न भोजन योजना (मिड-डे-मील) जो कि माध्यमिक शिक्षा स्तर पर सभी सरकारी, स्थानीय निकायों एवं सहायता प्राप्त स्कूलों को समाहित करती है, ने उल्लेखनीय प्रगति की है परन्तु इसके कार्यान्वयन में सामने आई कुछ कमियों को दूर करने की आवश्यकता है। मध्याह्न भोजन योजना के दायरे का विस्तार करते समय राजकोषीय प्रोत्साहन जैसे कि कर छूट पर विचार करने से संभवत: इस योजना मेंं निजी सहभागिता को बढ़ावा मिलेगा।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए पड़ोसी निजी स्कूलों में सुनिश्चित करने के लिए एक पद्धति अपनाने की आवश्यकता है, ताकि ऐसे बच्चे मध्याह्न भोजन योजना से वंचित न रहें। मौजूदा माध्यमिक शिक्षा का स्तर (कक्षा 9 - 10) में सकल नामांकन अनुपात (GIR) लगभाग 60 प्रतिशत है, जो कि बहुत कम है और माध्यमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण करने की आवश्यकता अब महसूस होने लगी है और इस पर जोर भी दिया जाने लगा है।

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