Public Administration 1: Administrative Secretariat and Ministry of Defence

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प्रशासनिक स्तर पर सचिवालय (Administrative Secretariat)

सचिवालय का प्रधान कार्य मंत्रियों को आवश्यक कार्यों का संपादन में सलाह व सहायता प्रदान करना है। मंत्रालय मुख्य मोर्चे पर अपनी भूमिका संपादित करते नजर आते हैं, परन्तु पृष्ठीभूमि स्तर पर सचिवालयों कार्यों का संपादन करते हैं। सचिवालय व्यवस्था में अनम्यता के सिद्धांत का अनुपालन किया जाता है। सचिवालय प्रशासकीय विभाग के मस्तिष्क केन्द्र की भांति होते हैं। सचिवालय संगठन के शीर्ष पर सचिव होते हैं। सचिव अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य होते हैं। विभाग की सचिवालयी व्यवस्था के दो वर्ग हैं अधिकारी वर्ग और अधीनस्थ वर्ग। अधिकारी वर्ग में सचिव, उपसचिव, अवर सचिव होते हैं। बड़े विभागों में अतिरिक्त व संयुक्त सचिव का भी प्रावधान होता है। अतिरिक्त व संयुक्त सचिव समान श्रेणी या स्तर के होते हैं। इनका सचिवालयी कार्यों का संबंध में मंत्री से सीध संपर्क होता है। सचिवालय के अधीनस्थ कर्मचारियों में अनुभाग अधिकारी, सहायक तथा अवर लिपिक आते हैं।

Administrative Secretariat
  • सचिवालय की आधारभूत भूमिका स्टाफ या सलाहकारी रूप में होती है। सचिवालय और कर्मकारी अभिकरणों की व्यवस्था को अपनाना लोक नीति निर्धारण व कार्यान्वयन में अलगाव को स्वीकारने की ओर संकेत करता है। सचिवालय के शीर्ष प्रबंधन में समानज्ञों की स्थिति सशक्त होती है तब भी विशेषज्ञों की भी कुछ नियुक्तियाँ होती हैं।
  • प्रशासनिक स्तर पर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के मध्य समन्वय के संदर्भ में सचिव स्तरीय समितियों का प्रयोग किया जाता है। लोकनीति निर्माण में शीर्ष प्रबंधन की भूमिका ज्यादा होती है।
  • राजनीतिक प्रधान के अधीन विभाग का सचिवालयी संगठन कार्य करता है। सचिवालय ही कुशल कर्मचारी प्रदान करता है, जो नीतियों तथा कार्यक्रमों के प्रभावशाली क्रियान्वयन के लिये अपरिहार्य होते हैं। जब कोई नीति स्वीकार की जाती है तो उस नीति का निष्पादन पर निरंतर ध्यान रखना सचिवालय का ही काम है।

क्रियान्वयन स्तर पर निदेशालय/विभाग या कार्यकारी संगठन (Directorate/Department or Executive Organization at Implementation Level)

सचिवालय विभिन्न नीतियों के निर्माण में मंत्रालयों के प्रमुख मंत्रियों को सलाह व परामर्श देते है। इन नीतियों के क्रियान्वयन का दायित्व जिन संगठनों पर होता है उन्हें विभाग या मंत्रालय का कार्यकारी संगठन कहा जाता है। विभाग का प्रमुख विभागाध्यक्ष कहलाता है। इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। जैसे निर्देशक, महानिदेशक, आयुक्त, महानिरीक्षक आदि। इस प्रकार कार्यकारी अभिकरणी के शीर्ष पदाधिकारियों के कई पदनाम हो सकते हैं। इनका प्रमुख कार्य नीतियों का क्रियान्वयन करना होता है। क्षेत्रीय मुद्दों के संदर्भ में ये सचिवालय को अवगत कराते हैं तथा उन्हें तकनीकी सहायता देते है। इनके प्रशासनिक के साथ-साथ अर्द्धन्यायिक कार्य भी हो सकते हैं। यदि इनके समक्ष न्यायिक कार्य आते है तो इनके निर्णयों को संबंधित न्यायधिकरणी या न्यायलयों में चुनौती दी जाती है।

विभागों के प्रकार (Kinds of Departments) : संगठन की संरचना एक आकार कार्य की प्रकृति एवं आंतरिक संबंधों के आधार पर विभागों में विभिन्नता होती है।

  • एकात्मक विभाग: एकात्मक विभाग प्रकार का कार्य करते हैं और किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिये संगठित होते हैं। उदाहरणार्थ प्रतिरक्षा विभाग, अंतरिक्ष विभाग इत्यादि।
  • संघात्मक विभाग: संघात्मक विभाग अनेक प्रकार के कार्य करते हैं। संघात्मक विभाग के अनेक उपविभाग होते हैं। संघात्मक विभाग बहुमुखी होते हैं। उदाहरणार्थ गृह विभाग; प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग।
  • प्रचालन विभाग: ये विभाग संक्रियात्मक कार्य करते हैं। ये क्रियाओं के परिचालन में अपना योगदान देते हैं जैसे-डाक विभाग, रेल विभाग आदि।
  • समन्वयात्मक विभाग: ये विभाग समन्वय एवं पर्यवेक्षणात्मक कार्य करते हैं जैसे- सामान्य प्रशासन विभाग।
    • इसके अतिरिक्त कुछ विभाग ऐसे होते हैं जिनका अधिकांश कार्य कार्यालय तक ही सीमित रहता है। इनके अंतर्गत कोई क्षेत्रीय इकाई भी नहीं होती है। उदहारणार्थ वित्त विभाग।
    • मंत्री इच्छा, सचिव मस्तिष्क और कार्यकारिणी प्रमुख हाथों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जहाँ सरकारी नीतियों के निष्पादन के लिए कार्यकारी निर्देशन के विकेन्द्रीकरण तथा क्षेत्रीय अभिकरणों की स्थापना की आवश्यकता होती है वहाँ मंत्रालय के अधीन सहायक संगठन भी होते हैं जिन्हें संलग्न और अधीनस्थ कार्यालय कहा जाता है। संबंद्ध मंत्रालय दव्ारा निर्धारित नीतियों के परिचालन हेतु ये संलग्न कार्यालय आवश्यक कार्यकारी निर्देश देने के लिये उत्तरदायी होते हैं। ये तकनीकी सूचना के भंडार के रूप में कार्य करते हैं तथा मंत्रालयों को संबंधित प्रश्नों के तकनीकी मामलों में मंत्रणा देते हैं। अधीनस्थ कार्यालय क्षेत्रीय विभागों या अभिकरणों के रूप में कार्य करते हैं और सरकारी निर्णयों के विस्तृत निष्पादन के लिये उतरदायी होते हैं। सामान्यत: वे किसी संलग्न कार्यालय के निर्देशन में कार्य करते हैं। जहाँ सन्निहित कार्यकारी निर्देश बहुत अधिक नहीं होता वहाँ ये सीधे मंत्रालय के अधीन कार्य करते हैं।
    • मंत्रालय प्रशासन के सफल संचालन में मंत्री, सचिवालय, विभाग या कार्यकारी संगठन तथा संलग्न और अधिनस्थ कार्यालय संलग्न रहते हैं। अच्छे प्रशासन के लिये आवश्यक है कि इन सभी घटकों के कार्यों का स्पष्ट उल्लेख और विभाजन किया जाये तथा ये अब आपस में मिलकर कार्य करें।

मुख्य कार्यकालिका अभिकरणों को निम्नांकित प्रकारों में बाँटा जा सकता है-

  • संलग्न कार्यालय (Attached Offices)
  • अधीनस्थ कार्यालय (Subordinate Offices)
  • विभागीय उपक्रम (Departmental Undertaking)
  • कंपनी अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत कंपनी (Registered Companies)
  • विशेष कानून दव्ारा स्ाापित बोर्ड या नियम (Board and Corporations)
  • सोसाइटी रजिस्ट्रेशन अधिनियम के अधीन पंजीकृत सोसाइटी (Registered Societies)

कार्यपालिका अभिकरणों में इनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रकार संलग्न व अधीनस्थ कार्यालय का है। कार्यालय नियम प्रक्रिया में इन कार्यालयों की व्याख्या की गयी है। जहाँ शासकीय नीतियों को लागू करने के लिये विकेन्द्रीकरण की आवश्यकता होती है वहाँ मंत्रालय के अधीन सहायक कार्यालय होते हैं जिन्हें संलग्न और अधीनस्थ कार्यालय कहते हैं। संलग्न कार्यालय मंत्रालय दव्ारा निर्धारित नीतियों को लागू करने के लिए कार्यकारिणी निर्देशन देने के प्रति उत्तरदायी होते हैं। अधीनस्थ कार्यालय क्षेत्रीय कार्यालय के समान कार्य करते हैं या शासकीय निर्देशों के विस्तृत रूप से लागू करने के प्रति उत्तरदायी होते हैं। सामान्य रूप से अधीनस्थ कार्यालय संलग्न कार्यालय के निर्देशन के अधीन कार्य करते हैं।

मंत्रालय व विभाग: वर्तमान परिदृश्य (Ministries and Departments Recent Scenario)

यद्यपि 91 वें संविधान संशोधन दव्ारा मंत्रियों की संख्या सीमित की गई लेकि तब भी मंत्रियों की संख्या ज्यादा है। प्रत्यक्ष रूप में कई मंत्रियों के पास दो या अधिक मंत्रालयों की स्थितियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। अनुबंधों दव्ारा विशेषज्ञों की नियुक्तियों के प्रयास किये गये हैं। सलाहकारी समितियों, आयोगों, मंडलों आदि का प्रयोग बढ़ा है। ‘ंपंचायतीराज का विषय’ राज्यों को देखना है फिर भी इसके लिए संघ में मंत्रालय हैं उदाहरणार्थ पंचायती राज्य मंत्रालय, मंत्रालयों के संपर्क में शोध व अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए कुछ नोड्‌ल संस्थाओं का विकसित किया जा रहा है। उदाहरणार्थ वित्त के विषयों में वित्तीय प्रबंधन का राष्ट्रीय संस्थान (National Institute of Financial Management) फरीदाबाद को विकसित किया जा रहा है। मंत्री-सचिव, संबंधों में परिवर्तन के लिए कुछ नवीन परिदृश्यों का वर्णन किया जा सकता है जैसे-आउटकम बजट के माध्यम से त्रैमासिक जवाबदेही उभरी है। सूचना के अधिकार अधिनियम से लोकनीतियों में पारदर्शिता बढ़ी है। नागरिक चार्टरों का प्रयोग उभरा है। जनशिकायत निवारण में निदेशकों या न्यायधिकरणों का प्रयोग उभरा है। न्यायपालिका की सक्रियता और न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही बढ़ी है। लोकनीति विषयों में मंत्रियों को सचिवों के अतिरिक्त विशेषज्ञों नागरिक समाज या अन्य सलाहकारी समितियों की सहायता भी उपलब्ध हुई है। लोकनीति विषयों में लोकनीति इकाइयों का भी प्रयोग किया गया है। मंत्रियों के सशक्त समूहों के प्रयोग की स्थितियों उभरी हैं।

रक्षा मंत्रालय (Ministry of Defence)

परिचय (Introduction)

भारत सरकार रक्षा और उसके हर घटक को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है। राष्ट्रपति सशस्त्र बल के सर्वोच्च कमांडर हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी मंत्रिमंडल के साथ टिकी हुई है। यह देश की सुरक्षा के संदर्भ में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए सशस्त्र बलों के लिए नीतिगत ढाँचा और साधन प्रदान करता है। रक्षा मंत्री रक्षा मंत्रालय का प्रमुख होता है। रक्षा मंत्रालय का प्रमुख कार्य रक्षा और सुरक्षा से संबंधित सभी मामलों पर सरकार की नीति निर्देश प्राप्त करने और सेवा मुख्यालय, इंटर सर्विसेज संगठनों, उत्पादन प्रतिष्ठानों और अनुसंधान और विकास संगठन को लागू करने के लिए उनसे बातचीत करना है। सरकार के नीति निर्देशों और आवंटित संसाधनों के भीतर अनुमोदित कार्यक्रमों के निष्पादन का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। रक्षा मंत्रालय के चार विभाग होते हैं-

  • रक्षा विभाग (डीओडी)
  • रक्षा उत्पादन (डीडीपी)
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास (डीडीआर एंड डी)
  • पूर्व सैनिक कल्याण विभाग के विभाग और वित्त डिवीजन