Public Administration 1: Care and Protection of Children Amendment Bill, 2010

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भारत में बच्चों के संरक्षण एवं बेहतरी हेतु तंत्र, कानून व संस्थायें (Mechanism, Laws and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Children in India)

बालकों का लैगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम 2012 (Protection of Children from Sexual Offences Act 2012)

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 को 10 मई, 2012 को राज्य सभा दव्ारा, जबकि 22 मई, 2012 को लोक सभा दव्ारा पास किया गया। लैंगिक दुरुपयोग एवं शोषण से बालकों के संरक्षण से संबंधित प्रावधानों को और अधिक कठोर बनाने के लिए यह अधिनियम बनाया गया। इस तरह पहली बार बालकों के साथ होने वाले लैंगिक अपराधों के संबंध में पृथक कानून का निर्माण किया गया।
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को बालक के रूप में परिभाषित करता है और 18 वर्ष से कम आयु के सभी बालकों को यौन उत्पीड़न एवं पोर्नोग्राफी से संरक्षण प्रदान करता है। इस तरह पहली बार ही इन अपराधों को भी कानून में स्पष्ट रूप से परिभाषित भी किया गया। अधिनियम में इन अपराधों के संबंध में कठोर दंड का प्रावधान भी किया गया है, जो अपराध की गंभीरता पर निर्भर करेगा। दंड की प्रकृति साधारण से लेकर विभिन्न समयावधि के सश्रम कारावास तक की हो सकती है। इसके अलावा अधिनियम में जुर्माने का प्रावधान भी किया गया है, जो न्यायालय दव्ारा निर्धारित किया जाएगा।

अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराध इस प्रकार हैं (Punishments for Offences Covered in the Act Are)

  • गंभीर यौन उत्पीड़न।
  • अतिनिकृष्ट गंभीर यौन उत्पीड़न।
  • यौन उत्पीड़न।
  • अतिनिकृष्ट यौन उत्पीड़न।
  • बालकों का यौन उत्पीड़न।
  • पोर्नोग्राफी के लिए बालकों का उपयोग करना।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ (Salient Features of the Act)

न्यायिक प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर पर बालकों के हितों को सर्वोपरि प्राथमिकता देते हुए अधिनियम के तहत चलने वाले आपराधिक मामलों के लिए विशेष न्यायालयों के गठन का प्रावधान किया गया है। अधिनियम में साक्ष्यों को जुटाने एवं अपराधों की जाँच-पड़ताल तथा सुनवाई की प्रक्रिया को बालकों के अनुकूल बनाए रखने का प्रावधान किया गया है। इसके लिए-

  • अधिनियम में अपराध के आशय के लिए, फिर चाहे अपराध हुआ हो या नहीं और उसका कारण कुछ भी हो, जुर्माने का प्रावधान किया गया हैं। अपराध के प्रयास के लिए, अपराध होने के लिए निर्धारित दंड का आधार तक निर्धारित किया गया है, और इसे भी अपराध करने के अंतर्गत शामिल किया गया है। यौन कार्यों के लिए बच्चों की तस्करी को भी इसके अंतर्गत ही शामिल किया गया है।
  • जघन्य अपराधों जैसे कि गंभीर यौन उत्पीड़न निकृष्ट गंभीर यौन उत्पीड़न, यौन उत्पीड़न आदि में दोषमुक्त साबित करने का भार दोषी पर होगा।
  • इस प्रावधान को बच्चों की असुरक्षा एवं अबोधपन को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। साथ ही कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए गलत आशय से की गई झूठी शिकायत और गलत सूचना के लिए भी दंड का प्रावधान किया गया है। सूचना देने को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के दंड को सांपेक्षिक रूप से कम कठोर (6 महीने तक) रखा गया है। यदि झूठी शिकायत किसी बच्चे के खिलाफ की गई है तो दंड अधिक (1 वर्ष) होगा।
  • विशेष न्यायालय की अनुमति के बिना बालक की पहचान को सार्वजनिक करने के संबंध में मीडिया पर प्रतिबंध लगाया गया है। मीडिया दव्ारा इस प्रतिबंध का उल्लंघन करने पर दंड की अवधि 6 महीने से लेकर 1 वर्ष तक हो सकती है।
  • विशेष बाल अपराध इकाई (SJPU) अथवा स्थानीय पुलिस के पास शिकायत दर्ज होने के बाद जितनी जल्दी हो सके बालक के राहत एवं पुनर्वास के लिए 24 घंटे के अंदर उसे शीघ्रतिशीघ्र आश्रय स्थल अथवा आसपास के अस्पताल में भर्ती कराने जैसे देखभाल एवं संरक्षण के उपाय किए जाने चाहिए। विशेष बाल अपराध इकाई (SJPU) अथवा स्थानीय पुलिस दव्ारा भी शिकायत दर्ज होने के 24 घंटे के अंदर संबंधित बालक के मामले की सूचना बाल कल्याण समिति को सौंपी जानी चाहिए, ताकि बालक का दीर्घकालिक पुनर्वास सुनिश्चित हो सके।
  • कानून के अंतर्गत केन्द्र एवं राज्य सरकार को इस बात की जिम्मेदारी दी गई है कि वे टेलीविजन, रेडियो, प्रिंट मीडिया जैसे मीडिया माध्यमों से आम जनता, बालकों तथा उनके माता-पिताओं में इस अधिनियम के प्रावधानों के संबंध में जागरूकता फैलाएँ। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग तथा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग इस अधिनियम की निगरानी के लिए नामनिर्दिष्ट प्राधिकरण हैं।

बाल अपराध न्याय अधिनियम, 1986 (बाल अपराध न्याय अधिनियम 2000 दव्ारा प्रतिस्थापित) (Juvenile Justice Act, 1986 [Replaced by Juvenile Justice Act 2000] )

  • भारत सरकार ने वर्ष 1986 में बाल अपराध न्याय अधिनियम को अधिनियमित किया था। 1989 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) को अपनाया। भारत ने 1992 में संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय को स्वीकार कर लिया। यह अभिसमय, बिना न्यायिक कार्यवाही के उल्लंघन के समाज में बालकों के एकीकरण के अधिकार को रेखांकित करता है। अत: इस अभिसमय में निर्धारित मानकों को पूरा करने के लिए सरकार दव्ारा कानून को दोबारा लिखने की जरूरत महसूस की गई। और इसलिए वर्ष 2000 में बाल अपराध न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम दव्ारा पुराने कानून को प्रतिस्थापित किया गया।
  • इस अधिनियम में 18 वर्ष से कम आयु के हर व्यक्ति को बालक माना गया है। इसमें दो लक्षित समूहों को चिन्हित किया गया है: ऐसे बालक जिन्हें देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता है, तथा ऐसे बाल अपराधी जिनके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया चल रही है। यह कानून न केवल बालकों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करता है, बल्कि विभिन्न व्यक्तियों के उन अधिकारों को भी संरक्षण प्रदान करता है, जिस समय वे बालक थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यदि किसी अपराध के होने के समय कोई व्यक्ति बालक था, तो जब तक उस मामले की सुनवाई चलेगी, तब तक उस व्यक्ति को 18 वर्ष से कम का ही माना जाएगा।
  • नया कानून बालकों के लिए और भी अनुकूल है और यह बालकों को सर्वोत्कृष्ट देखभाल एवं संरक्षण उपलब्ध कराने के लिए उचित देखभाल एवं सरंक्षण उपायों की व्यवस्था करता है। नये कानून के अंतर्गत एक बाल अपराधी और एक उपेक्षित बालक में स्पष्ट अंतर किया गया है।

अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ (Salient Features of the Act)

  • अधिनियम यह निर्धारित करता है कि 18 वर्ष से कम आयु के लड़के एवं लड़की को बालक माना जाएगा।
  • अधिनियम स्पष्ट करता है कि बाल अपराध से संबंधित मामलों को 4 महीने की समयावधि के अंतर्गत निपटाया जाएगा।
  • किसी एक जिले अथवा जिलों के एक समूह के लिए एक बाल अपराध न्याय बोर्ड (पूर्व में जिसे बाल अपराध न्यायालय के रूप में जाना जाता था) तथा बाल कल्याण समिति (पूर्व में जिसे बाल अपराध कल्याण बोर्ड के नाम से जाना जाता था) का अनिवार्य रूप से गठन किया जाए।
  • बालकों के पुनर्वास और सामाजिक एकीकरण पर विशेष बल देते हुए दत्तक ग्रहण, त्वरित देखभाल, आर्थिक संरक्षण एवं अनुरक्षण जैसे विकल्पों का प्रावधान किया गया है।
  • अधिनियम में विधि के अधीन किसी भी समुदाय दव्ारा बालकाेें के दत्तक ग्रहण को अनुमति दी गई है। बाल अपराध न्याय बोर्ड को इस बात के लिए प्राधिकृत किया गया है कि वह एकल माता-पिताओं तथा ऐसे माता-पिताओं जिनके पहले से संतान हैं उन्हें समान लिंग के और बच्चे गोद लेने की अनुमति दे सकता है।
  • बाल अपराध न्याय कार्यक्रम के माध्यम से बाल न्याय अधिनियम में उल्लिखित सभी तरह की सेवाएँ उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी बालक किसी भी परिस्थिति में कैद में न रहे तथा बाल अपराधी के संबंध में दी जाने वाली सेवाओं में गुणात्मक सुधार लाया जा सके और बाल अपराधों के साथ होने वाले सामाजिक अन्याय को रोकने तथा जिनके साथ सामाजिक अन्याय हुआ है उनके पुनर्वास के लिए स्वैच्छिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जा सके।
  • बाल अपराध न्याय कार्यक्रम के अंतर्गत केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को अन्वेषण गृहों बाल अपराधी गृहों और विशेष गृहों की स्थापना और रख-रखाव तथा जिन बालकों पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है तथा जिन बच्चों को देखभाल एवं संरक्षण की आवश्यकता है उनके लिए अनुरक्षण गृह के निर्माण में सहायता उपलब्ध कराती है।

बाल अपराध न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2010 (The Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2010)

  • इस विधेयक दव्ारा अधिनियम से उस प्रावधान को हटा दिया है, जिसके अनुसार ऐसे बाल अपराधियों अथवा बालकों के लिए अधिनियम में विशेष उपचार का प्रावधान किया गया था जो कुष्ठ रोग, यौन संक्रमित रोग, हेपीटाइटिस-बी और टीबी से पीड़ित हों अथवा जिनका पूरी तरह से मानसिक विकास नहीं हुआ हो।
  • विधेयक में एक अन्य प्रावधान को भी प्रतिस्थापित किया गया है, जिसके अनुसार किसी भी सक्षम प्राधिकारी को इस बात के लिए प्राधिकृत किया गया है कि कुष्ठ रोग, अपूर्ण मानसिक विकास तथा मादक द्रव्य व्यसन से पीड़ित बालकों को विशेष गृह से ऐसे बालकाेे के लिए सुनिश्चित सुविधाओं के लिए स्थानांतरित किया जा सकता है।
  • इस विधेयक में यह प्रावधान किया गया हैं कि यदि मानसिक रूप से पीड़ित अथवा मद्यपान या माद्रक द्रव्य व्यसनी बालक के व्यवहार में किसी कारणवश परिवर्तन होता है तो सक्षम प्राधिकारी ऐसे बालक को मनोचिकित्सक अस्पताल अथवा मनोचिकित्सक नर्सिंग होम में स्थानांतरित कर सकता है।
  • ऐसी स्थिति में जब किसी बालक को मनोचिकित्सक के पास स्थानांतरित कर दिया जाता है तो सक्षम प्राधिकारी उस बालक को एकीकृत पुनर्वास केन्द्र भेज सकता है, यदि मनोचिकित्सक ने उस बालक को वहाँ से ले जाने के संबंध में प्रमाण-पत्र दे दिया हो।

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