Public Administration: Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged Groups/Communities in India

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भारत में असुरक्षित, वंचित एवं उपेक्षित समूह/समुदाय (Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged Groups/Communities in India)

असुरक्षित समूह का अर्थ (Meaning of Vulnerable Groups)

  • “असुरक्षित” समूह का अर्थ अत्यंत स्पष्ट है। साधारण शब्दों में कहा जाए तो, ऐसे समूह जो शारीरिक अथवा भावनात्मक क्षति की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील होते हैं या समाज में अपेक्षाकृत कम लाभ की स्थिति में होते हैं; उन्हें असुरक्षित समूह में शामिल किया जा सकता है। इसी प्रकार असुरक्षित समूह में ऐसे लोगों को शामिल किया जाता है, जो न तो आरामदायक जीवन जीने में सक्षम होते हैं और न ही इन्हें विकास के समुचित अवसर ही उपलब्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रतिकूल सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक दशाओं के चलते वे अपने मूलभूत मानवाधिकारों का उपयोग करने में भी सक्षम नहीं होते हैं।
  • मानवाधिकारों की परिभाषा के अंतर्गत यह जनसंख्या का वह तबका है, जिसके साथ अक्सर भेदभावपूर्ण व्यवहार होता है और इन्हें शोषण से बचाने के लिए राज्य दव्ारा विशेष संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। यूरोपीय संघ के अनुसार, “वे समूह जो आम जनता की तुलना में अधिक गरीबी और सामाजिक बहिष्कार के शिकार होते है वे असुरक्षित कहलाते हैं।” प्रजातीय अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, नि: शक्त व्यक्तियों बेघरो तथा मादक द्रव्य, व्यसनी, अकेले रह रहे वृद्ध तथा बच्चे सभी असुरक्षित समूहों के अंतर्गत ही आते हैं, और ये सभी प्राय: मुश्किलों का सामना करते हैं, जिससे इन्हें शिक्षा का निम्न स्तर तथा बेरोजगारी जैसे सामाजिक बहिष्कार के अन्य रूपों का सामना करना पड़ता है।

हाशिये पर चले गए समूह का अर्थ (Meaning of Marginalized Groups)

हाशिये पर चले गए समूह से तात्पर्य ऐसे समूह से है जो सामाजिक रूप से बहिष्कृत है तथा जिसे समाज की मुख्यधारा से हाशिए पर धकेल दिया गया है। ऐसे समूह प्राय: अल्पसंख्यक समूह के अंतर्गत आते हैं और सामान्यत: इनके हितों की अनदेखी की जाती है। हाशिये पर चले गए समूहों सामान्यत: वंचित समूहों के रूप में जाना जाता है, ये लाभ से वंचित समाज के ऐसे समूह हैं जो संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने तथा सामाजिक जीवन में पूर्ण सहभागिता हेतु संघर्षरत रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हाशिये पर चले गए लोग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी रूप से उपेक्षित और बहिष्कृत भी हो सकते हैं और इसलिए वे असुरक्षित होते हैं।

उपेक्षित-समूह का तात्पर्य (Meaning of Disadvantaged Groups)

मानवाधिकारों संबंधी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार उपेक्षित समूह के अंतर्गत वे लोग आते हैं जिनकी प्रत्याभूत अधिकारों तक स्वतंत्र पहुँच सुनिश्चित नहीं होती है। सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक दशाओं के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न देशों में इनकी परिभाषा बदलती रहती है। सामान्य रूप से महिलाएँ, बच्चे, सामाजिक-आर्थिक, एवं सांस्कृतिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्ग, नि: शक्त और अल्पसंख्यक सभी उपेक्षित समूह के अंतर्गत आते हैं। इन लोगों की ऐसी स्थिति के लिए मुख्य रूप से निर्धनता ही उतरदायी है। इसके अतिरिक्त जिन लोगों के साथ लिंग, प्रजाति तथा जन्म के आधार पर किसी भी समुदाय अथवा धर्म में विभेद किया जाता है, सामान्यत: उन्हें भी उपेक्षित लोगों में शामिल किया जा सकता है। हालाँकि इन लोगों के साथ होने वाले भेदभाव का स्वरूप प्रत्येक समाज में भिन्न-भिन्न हो सकता है।

विश्व में असुरक्षित, वंचित एवं हाशिये पर चले गए समूह (The Vulnerable, Disadvantaged and Marginalized Groups in the World)

प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक प्रत्येक समाज में ऐसे अनेकों उदाहरण मिल सकते हैं, जहाँ समाज के किसी समूह के साथ विभेदात्मक व्यवहार देखने को मिलता है। सामान्यत: असुरक्षित, उपेक्षित एवं हाशिये पर चले गए समूहों के साथ होने वाला विभेदात्मक व्यवहार प्राय: उनके अपमान, उत्पीड़न एवं डराने-धमकाने के रूप में देखने को मिलता है और ऐसे व्यवहार को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक परंपराओं तथा सांस्कृतिक कारकों से समर्थन भी प्राप्त होता है।

Vulnerable, Disadvantaged and Marginalized Groups

संयुक्त राष्ट्र (UN) ने इन वंचित और असुरक्षित वर्गों के अधिकारों को संपूर्ण विश्व में पहचान दिलवाने के उद्देश्य से कई घोषणाएँ, अभिसमय और प्रसंविदाएँ अपनाई हैं। हालांकि वंचित वर्गों की दयनीय दशा का मुख्य कारण उनकी कमजोर आर्थिक स्थिति होती है परन्तु इसके साथ ही लिंग, नि: शक्तता, सांस्कृतिक कारण आदि भी इस विभेद के लिए समान रूप्ज्ञ से जिम्मेदार हैं।

असुरक्षित, हाशिये पर चले गए और उपेक्षित वर्ग/समुदाय कौन -से हैं? (Who Are Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged?)

  • महिलायें और बालिकाएँ (Women and Girls) : सामान्यत: महिलाएँ एवं बालिकाएँ पूरे विश्व में ही उपेक्षित हैं। जबकि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों की महिलाएँ घोर निर्धनता तथा अन्य सामाजिक, सांस्कृतिक एवं अपमानजनक परंपराओं के कारण अधिक असुरक्षित हैं। विश्व में बच्चे सर्वाधिक उपेक्षित समूह के अंतर्गत आते हैं।
  • बच्चे (Children) : विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में बच्चे गरीबी, कुपोषण तथा अन्य तरह के सामाजिक सांस्कृतिक शोषण जैसी अनेकों समस्याओं का सामना करते हैं। सीमेंट उद्योग-निर्माण स्थलों तथा काँच उद्योग जैसे खतरनाक उद्योगों में काम करने वालेे बाल श्रमिक, श्रमिक एवं कम आयु के बच्चे भी असुरक्षित की श्रेणी में ही आते हैं।
  • शरणार्थी (Refugees) : शरणार्थी से तात्पर्य उन लोगों से है जो अपने देश से किसी दूसरे देश में अस्थायी शरण हेतु पलायन कर जाते हैं। इस पलायन का कारण अकाल गृह युद्ध, धार्मिक भेदभाव, प्रजातीय विभेद आदि कुछ भी हो सकता है। ऐसे लोगों को उनके देश में प्रत्याभूत सभी मानवाधिकार प्राप्त नहीं होते। साथ ही वे जिस विदेशी धरती पर पलायन कर जाते हैं, वहां भी ये मानवाधिकारों से वंचित रहते हैं।
  • आंतरिक रूप से विस्थापित लोग: ये वे लोग हैं जिन्हें देश के अंदर सशस्त्र संघर्ष, हिंसा की स्थिति, मानवाधिकारों के उल्लघंन मानवीय अथवा प्राकृतिक आपदा के परिणामस्वरूप उत्पन्न परिस्थितियों के चलते देश के ही अंदर रहते हुए अपने घरों या आवास स्थलों को छोड़ना पड़ता है।
  • व्यक्ति/समुदाय के लिए राज्यविहीनता की स्थिति: किसी व्यक्ति या समुदायों के लिए राज्यविहीनता की स्थिति कई कारणों के फलस्वरूप उत्पन्न होती है, जैसे किसी राष्ट्र में अल्पसंख्यक समूह के साथ विभेदात्मक व्यवहार का होना, किसी राज्य के स्वतंत्र होने अथवा एक नया राज्य बनने पर उस भू-भाग में रह रहे सभी निवासियों को नागरिकों का दर्जा प्राप्त न हो पाना। राज्यविहीनता की स्थिति का तात्पर्य है, किसी व्यक्ति या समूह के पास किसी भी राज्य की नागरिकता का न होना। चूँकि इन लोगों के पास किसी राज्य की नागरिकता नहीं होती हैं अत: स्वतंत्रतापूर्वक अपने मानवाधिकारों के उपयोग की दृष्टि से ये अत्यधिक असुरक्षित होते हैं।
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक: ऐसे लोग जो किसी देश की बहुसंख्यक जनता के बहुसंख्यक समूह का हिस्सा नहीं हैं, उस देश संदर्भ में अल्पसंख्यक कहलाएंगे।
Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged

किसी भी देश में बहुसंख्यकों के अत्यधिक प्रभुत्व के कारण ये अल्पसंख्यक अपने राजनीतिक, नागरिक और मानव अधिकारों का लाभ नहीं उठा पाते हैं फलस्वरूप विभिन्न प्रकार के सामाजिक उत्पीड़न का शिकार होते हैं।

  • प्रवासी श्रमिक: विश्व के अलग-अलग हिस्सों में प्रवासी श्रमिक शब्द के अलग-अलग अर्थ हैं। इनका संबंध अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय दोनों तरह के प्रवासियों से है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कई विकासशील देशों में आर्थिक वैश्वीकरण, बेरोजगारी और निर्धनता के चलते नौकरी की तलाश में लोग एक देश से दूसरे देश में चले जाते हैं। प्रवसन की वजह से ये लोग जिस देश रहते हैं, वहांँ इन्हें अत्यंत कम अथवा न के बराबर सामाजिक संरक्षण प्राप्त होता है। कई बार तो महिलाओं, बच्चों तथा असुरक्षित एवं उपेक्षित समूहों के लोगों का विभिन्न गैर-कानूनी कार्यों के लिए अवैध व्यापार भी किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रवासी श्रमिक वह व्यक्ति है जो उस देश में वैतनिक गतिविधि में संलिप्त है अथवा संलिप्त रहा है, जहाँ का वह नागरिक नहीं है।
  • नि: शक्त व्यक्ति: नि: शक्त व्यक्तियों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा के अनुसार ऐसा व्यक्ति जो जन्मजात शारीरिक अथवा मानसिक अक्षमता के चलते पूर्णत: या आंशिक रूप से व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं है, उसे नि: शक्त कहा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति पहले कभी भी किसी दुर्बलता का शिकार रहा है तो उसे भी नि: शक्त माना जा सकता है; और ऐसी दुर्बलता में शारीरिक, संवेदी, और संज्ञानात्मक अथवा विकास संबंधी अक्षमताओं को शामिल किया जा सकता है। ऐसे लोग जो मानसिक विकार जैसे कि मनोविकृति अथवा मानसिक दुर्बलता के शिकार हैं, उन्हें भी नि: शक्त की श्रेणी में ही रखा जाता है।
    • नि: शक्त व्यक्तियों को समाज में नकार दिया जाता है, क्योंकि सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि राष्ट्र निर्माण अथवा सृजनात्मक आर्थिक गतिविधियों में उनका योगदान बहुत ही सीमित होता है। नि: शक्त व्यक्तियों के साथ घर, शैक्षिक संस्थानों, कार्यस्थल और यहाँ तक कि सार्वजनिक परिवहन में भी विभेद किया जाता है। और इसलिए उन्हें समाज में हाशिए पर चले गए लोग माना जाता है। नि: शक्त व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए विश्व की सभी सरकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अनेक विधियों एवं नीतियों का निर्माण किया है।
  • वृद्ध: 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों को सामान्यत: वृद्ध माना जाता है। प्राय: परिवार जनों, समाज तथा अन्य स्तरों पर इन लोगों के अधिकारों का हनन किया जाता है। बड़े होने के नाते हमे उनके अधिकारों को संरक्षित करना चाहिए। सामाजिक नीति एवं विकास शाखा की संयुक्त राष्ट्र की इकाई के अनुसार विश्व में आज 700 मिलियन से अधिक वृद्ध लोग रहते हैं। जैसे-जैसे वृद्ध व्यक्तियों की शारीरिक सक्रियता कम होती जाती है, वैसे-वैसे उनकी असुरक्षा भी बढ़ती जाती है। इसलिए वैश्विक स्तर पर विभिन्न सरकारों एवं संस्थाओं ने इन लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना वृद्धावस्था पेंशन योजना तथा चिकित्सा सहायता जैसे प्रावधान भी किए हैं।
  • एच. आई. वी पॉजिटिव/एड्‌स पीड़ित लोग: इस सर्वाधिक घातक बीमारी से पीड़ित लोगों के साथ संपूर्ण विश्व में आम जीवन में कई तरह से विभेद किया जाता है। एच. आई. वी संक्रमित व्यक्ति पूरे विश्व में सामाजिक रूप से बहिष्कृत लोग हैं। इस बीमारी से पीड़ित बच्चों पर सर्वाधिक बुरा प्रभाव पड़ता हैं, क्योंकि ऐसे बच्चों को समाज उनके शिक्षा के मूल अधिकार तक से वंचित कर देता है।
  • यायावर/खानाबदोश (Nomadic) : यायावर/खानाबदोश जीवन जीने वाले व्यक्ति किसी एक देश अथवा क्षेत्र या फिर विश्व के किसी भी भाग में निरंतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं। चूँकि इन लोगों के पास अपना कोई स्थाई पेशा, या जीविकोपार्जन के उचित साधन नहीं होते अत: वे कभी भी समाज का स्थाई हिस्सा नहीं बन पाते हैं फलस्वरूप उनके दव्ारा अधिकार प्राप्त करना अत्यंत दुष्कर हो जाता है।
  • लैंगिक अल्पसंक: लेस्बियन/गे और ट्रांसजेंडर्स: भिन्न लैंगिक उन्मुखता के चलते अपनी विशिष्ट यौन प्राथमिकता के कारण ये समूह प्राय: समाज दव्ारा अवमानना एवं उपेक्षा के शिकार होते हैं। ट्रांसजेंडर्स समाज में कई तरह की समस्याओं का सामना करते हैं, इनमें उनके जीवन एवं स्वतंत्रता के मूलभूत अधिकार भी शामिल हैं। समान लिंग के युगल को समाज दव्ारा बहिष्कृत कर दिया जाता है। इन समूहों के लोग प्रत्येक स्तर पर विभिन्न प्रकार के विभेदात्मक व्यवहार का सामना करते हैं परिणामस्वरूप समाज मेें उनकी संरचनात्मक सहभागिता में कमी आती है।

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