Public Administration: India Adopted the Concept of Welfare State

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सामाजिक न्याय और अवधारणात्मक विवेचन (Conceptual Interpretation of Social Justice)

भारत ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कैसे अपनाया (How India Adopted the Concept of Welfare State)

संवैधानिक उपाय (Constitutional Measures)

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के समय संविधान निर्माता सामाजिक समानता और लोगों के कल्याण की भावना से अत्यधिक प्रभावित थे। उनका मानना था कि इतने महत्वपूर्ण कार्य को केवल राज्य दव्ारा ही किया जा सकता है। भारतीय संविधान का निर्माण 20वीं सदी के मध्य में किया गया जो कि सामाजिक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का समय था। अत: भारत के संविधान ने भी सरकार के एक स्पष्ट दर्शन को अपनाया और यह सुनिश्चित किया कि भारत का गठन एक सामाजिक कल्याणकारी राज्य के रूप में किया जाएगा।
  • संविधान की प्रस्तावना स्पष्ट रूप से यह इंगित करती है कि लोगों का सामान्य कल्याण भारत के संघ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य है। प्रस्तावना में सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समता सुनिश्चित की गई है। हालाँकि “कल्याणकारी राज्य” शब्दावली का संविधान में कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन भारतीय संविधान का अंतिम लक्ष्य और उद्देश्य इसकी ओर स्पष्ट संकेत करते हैं।

सामाजिक कल्याण के लिये राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों के अंतर्गत विभिन्न प्रावधान-

  • अनुच्छेद 38: राज्य लोगों के कल्याण की अभिवृद्धि के लिये प्रयास करेगा।
    • राज्य आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 39: राज्य विशेष रूप से अपनी नीति को निदेशित करेगा-
    • सभी नागरिकों को जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार होगा।
    • राज्य सामूहिक हित को सुनिश्चित करेगा।
    • आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चलें कि उत्पादन के साधनों का सर्वसाधारण के लिये अहितकारी संकेद्रण न हो।
    • समान कार्य के लिए समान वेतन।
    • किसी भी आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर श्रमिक पुरुष, महिला और बच्चे का शोषण नहीं होगा।
    • बालकों को स्वतंत्र और गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर और सुविधायें दी जायें और बालकों और अल्पव्य व्यक्तियें की शोषण से रक्षा की जाए।
  • अनुच्छेद 39 क: राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे कि समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और वह विशिष्टता यह सुनिश्चित करने के लिए कि आर्थिक या किसी अन्य नियोग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए। उपर्युक्त विधान या स्कीम दव्ारा या किसी अन्य रीति से नि: शुल्क विधिक सहायता की व्यवस्था करेगा।
  • अनुच्छेद 41: राज्य अपनी आर्थिक सामर्थ्य और विकास की सीमाओं के भीतर काम पाने के शिक्षा पाने के और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और नि: शक्तता तथा अन्य अनहं अभाव की दशाओं में लोक सहायता पाने के अधिकार को प्राप्ति कराने का प्रभावी उपबंध करेगा।
  • अनुच्छेद 42: राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए और प्रसूति सहायता के लिए उपबंध करेगा।
  • अनुच्छेद 46: राज्य, जनता के दुर्बल वर्गो के, विशिष्टता, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा और सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षा करेगा।
  • अनुच्छेद 47: राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादय पेयों, और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 48 के: राज्य, देश के र्प्यावरण के संरक्षण तथा संवर्धन का और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

लोगों की खुशहाली कल्याणकारी राज्य का प्रमुख लक्ष्य है और यह तभी हो सकता है जब सभी के पास पर्याप्त रूप से खाने के लिए भोजन, रहने के लिए घर हो, कम से कम सिर ढकने के लिए एक हल्की-फुल्की छत हो और जीविकोपार्जन करने के लिए कुछ काम हो। हमारे संविधान में नीति-निदेशक तत्वों के माध्यम से इन सभी उपायों की व्यवस्था की गई है। सभी सरकारों तथा राजनीतिक व्यवस्था ने सामाजिक-आर्थिक कलयाण की विभिन्न योजनाओं, गरीबी उन्मूलन तथा सामाजिक उत्थान के दव्ारा कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को मजबूती प्रदान की है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाने तथा एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में भारतीय संविधान ने एक निर्णायक भूमिका निभायी है।

सामाजिक उपाय (Social Measure)

  • संविधान की उद्देशिका में भारत को एक समाजवादी राज्य घोषित किया गया है और यह शब्द अपने आप में सरकार की सामाजिक कल्याण के प्रति जवाबदेहिता को सुरक्षित करने का एक अर्धपूर्ण प्रमाण है। लेकिन भारत में समाजवाद को रूसी समाजवाद के संदर्भ नहीं समझा जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ सभी संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण होता है और राज्य ही सभी नागरिकों के कल्याण को सुनिश्चित करता है। भारतीय संविधान में समाजवाद आय की असमानता को समाप्त करने और जीवन स्तर के मानकों को सुधारने के लक्ष्य के रूप में निहित है। डी. एस. नाकरा बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने समाजवाद के संदर्भ में स्पष्ट करते हुए व्यक्त किया-
  • एक समाजवादी राज्य का प्रमुख उद्देश्य आय तथा प्रतिष्ठा की असमानता और जीवन स्तर में विद्यमान असमानता को समाप्त करना है। समाजवाद का मूल ढांचा कार्यरत लोगों को गरिमापूर्ण जीवन और विशेषकर जीवन पर्यंत सुरक्षा उपलब्ध कराना है।
  • (समाजवाद शब्द उद्देशिका में प्रारंभ से नहीं था, बल्कि इसे 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से संविधान में शामिल किया गया) ।
Social Measure

राजनीतिक व प्रशासनिक उपाय (Political and Social Measures)

  • उदारीकरण के आगमन और उसके उपरांत आये भूमंडलीकरण से भारत ने तकनीक अनुसंधान एवं विकास सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था के समग्र कल्याण के क्षेत्र में नई ऊँचाईयों को छुआ है, लेकिन साथ ही बेहतर जीवन स्तर आवास शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग में भी अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।
  • देश में सामाजिक राजनैतिक और आर्थिक न्याय की स्थापना में नौकरशाही एवं प्रशासन प्रमुख भूमिका निभाते हैं। 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ ही लोक कल्याणकारी राज्य की प्रवृति को बनाए रखने की दृष्टि से नोकरशाही की प्रासंगिकता में कई गुना वृद्धि हुई है। अब इस नौकरशाही को विकास प्रशासन के नाम से जाना जाता है।

भारत में कल्याणकारी राज की स्थापना में नौकरशाही/प्रशासन को एक अभिकर्ता के रूप में स्थापित करने वाले प्रावधान-

  • स्थानीय प्रशासन दव्ारा जन-समर्थक व्यवहार करना।
  • शक्ति का अधिकाधिक विकेनदीकरण (73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन)
  • समाजिक -आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक -निजी सहभागिता को प्रोत्साहन
  • सक्रिय और कार्योन्मुखी प्रशासन
  • लाइसेंस राज की समाप्ति
  • कल्याणकारी योजनाओं (आर. टी. आई, सिटीजन चार्टर इत्यादि) , (ई-शासन और सुशासन) में अधिकाधिक जवाबदेहिता ओर पारदर्शिता।

विभिन्न नीतिगत पहलों के सकारातमक परिणाम प्राप्त करने के लिए जिला, प्रखंड ओर पंचायत स्तर पर प्रशासन का अधिकाधिक सामंजस्यपूर्ण होना।

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