Public Administration: Constitutional Safeguards and Provisions for Scheduled Tribes in India

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अनुसूचित जातियों, शोषित वर्ग, अल्पसंख्यकों व अनुसूचित जनजातियों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Law, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Scheduled Castes, Depressed Class, Minorities and Scheduled Tribes)

अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes)

भारत में अनुसूचित जनजातियाँ जिन्हें आदिवासी (मूल निवासी) कहा जाता है केन्द्रीय उत्तरपूर्व तथा दक्षिण भारत में फेले हुए हैंं ये आदिवासी भारत में आगमन से पूर्व लगभग 1500 ई. पू. से रहते हैं। पहले आर्यों तथा इनके बाद मुगलों एवं ब्रिटिश आगमन के कारण ये जनजातियाँ सामाजिक व भौगोलिक रूप से अलग थलग पड़ गयी। ये विभिन्न प्रकार की भाषा बोलते थे। धार्मिक रूप से भी ये पृथक थीं। इनमें से कुछ ने जीववाद, कुछ ने हिन्दू, कुछ ने इस्लाम एवं कुछ ने ईसाई धर्म अपना लिया। अधिकांश जनजातियाँ की सामाजिक रीतियों के कारण इन्हें हिन्दू जनसंख्या की मुख्यधारा से नहीं जोड़ा जा सका। भारतीय जनजाति समूह सामुदायिक रूप से संपत्ति के मालिक होते थे और व्यक्तिगत तौर पर किसी भी संपत्ति के मालिक नहीं होते थे।

औपनिवेशक संस्थाओं ने एक भूमि प्रशासन लागू किया तथा जनजातीय भूमि को लावारिस मानकर उसमें हस्तक्षेप किया। इसने अंग्रेजों के विरुद्ध अनेक विद्रोहों को जन्म दिया। जनजातीय विद्रोह भारत के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। मालपहारिया विद्रोह (1772 में) , 1815 व 1832 में कच्छ विद्रोह, 1818 में भील विद्रोह, 1931 में छोटा नागपुर का ‘हो’ विद्रोह, 1846 में उड़ीसा का खोंड विद्रोह व 1855 में बिहार का संथाल विद्रोह, विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। भारतीय राष्ट्रीयता के प्रणेताआंे में बिरसा मुंडा, कान्हू संथाल व तारव्या भील का नाम प्रमुख है। भारत की कुल विस्थापित जनसंख्या का 55 प्रतिशत अनुसूचित जनजातियों का है। पिछड़े समुदायों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के प्राथमिक आधार निम्न हैं-

  • किसी परिभाषित भौगोलिक क्षेत्र की पारंपरिक आजीविका, विशिष्ट सांस्कृतिक लक्षण आदि जिनमें जनजातीय जीवन के विभिन्न रंग हों।
  • ऐसी भाषा, रीति-रिवाज, परंपरायें, धार्मिक मत, कला आदि जो प्राचीन संस्कृति की आजीविका के स्वरूप को दर्शाते हों।
  • शैक्षणिक एवं आर्थिक विकास का अभाव।

भारत में कुछ प्रमुख जनजातियाँ इस प्रकार हैं: अंडमानीस, बोड़ो, मारो, भील, चकमा, नागा, संथाल, गौंड, बैगा, लेपचा, जारावा, निकोबारीस।

अनुसूचित जनजातियों हेतु भारत में संवैधानिक एवं प्रावधान (Constitutional Safeguards and Provisions for Scheduled Tribes in India)

अनुसूचित जनजातियों की परिभाषा (Definition of Scheduled Tribes)

  • अनुच्छेद 345 अनुसूचित जनजाति
  • अनुच्छेद 366 (25) परिभाषा

आर्थिक, सामाजिक व सार्वजनिक रोजगार/लोक नियोजन से जुड़े संरक्षण (Protection Related to Economic, Social and Public Employment Public Planning)

  • अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर विभेद का प्रतिषेध
  • अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता
  • अनुच्छेद 19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • अनुच्छेद 46 अनुसूचित जाति, जनजाति व दुर्बल वर्गों के शैक्षणिक व आर्थिक हितों की रक्षा
  • अनुच्छेद 35 सेवाओं व पदों पर अनुसूचित जनजाति व जाति के दावे

राजनीतिक रक्षोपाय (Political Safeguards)

  • अनुच्छेद 330 लोकसभा में अनुसूचित जाति एवं जनजाति हेतु आरक्षण
  • अनुच्छेद 332 राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जाति एवं जनजाति हेतु आरक्षण
  • अनुच्छेद 243 घ पंचायतों में आरक्षण
  • अनुच्छेद 243 ट नगरपालिकाओं में आरक्षण

मॉनिटर करने वाली संस्थायें (Monitoring Agencies)

अनुच्छेद 338 क राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग

अनुसूचित जनजातियों की परिभाषा और विनिर्देशन (Definition and Specification of Scheduled Tribes)

परिभाषा (Definition)

अनुसूचित जनजातियों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (25) में इस प्रकार परिभाषित किया गया है यथा “ऐसी जनजातियाँं या जनजाति समुदाय अथवा ऐसी जनजातियों या जनजाति के भाग जिन्हें इस संविधान के प्रायोजनार्थ अनुच्छेद 342 के अधीन अनुसूचित जनजातियाँ समझा जाता है।”

विनिर्देशन (Interpretation)

संविधान के अनुच्छेद 342 में एक अनुसूचित जनजाति के रूप में किसी जनजाति के विनिर्देशन का प्रावधान है।

342 अनुसूचित जनजातियाँ (342 Scheduled Tribes)

  • राष्ट्रपति किसी राज्य अथवा संघ शासित प्रदेश के संबंध में तथा उस राज्य के राज्यपाल के परामर्श के पश्चात्‌, सार्वजनिक सूचना दव्ारा जनजातियों या जनजाति समुदायों अथवा जनजातियों या जनजाति समुदायों के भागों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा, जिन्हें इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, उस राज्य अथवा संघ शासित प्रदेश जैसा भी मामला हो, के संबंध में अनुसूचित जनजातियांँ माना जाएगा।
  • संसद खंड (1) के अधीन जारी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अनुसूचित जातियों को सूची में विधि दव्ारा किसी जनजाति या जनजाति समुदाय को अथवा किसी जनजाति या जनजाति समुदाय के समूह या भाग को शामिल कर सकती है या हटा सकती है, किन्तु उल्लिखित खंड के तहत जारी किसी अधिसूचना को किसी उत्तरवर्ती अधिसूचना दव्ारा परिवर्तित नहीं किया जाएगा।

साधारण प्रावधान (General Provisions)

अनुच्छेद 244-अनुसूचित क्षेत्रों व जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन (Article 244 Administration of Scheduled Areas and Tribal Areas)

  • अनुच्छेद 244 (1) के तहत अनुसूचित क्षेत्र वे क्षेत्र होंगे जिन्हें राष्ट्रपति की सलाह के साथ अनुसूचित क्षेत्र घोषित करेंगे (5वीं अनुसूची)
    • अनुच्छेद 244 (2) के तहत वे क्षेत्र आते है जिन्हें असम, मेघालय, मिजोरम, त्रुिपरा में जनजातीय क्षेत्र घोषित किया गया है। इसमें इन क्षेत्रों हेतु जिला परिषदें या क्षेत्रीय परिषदें बनाने का उपबंध है। इन परिषदों को विस्तृत कानूनी, न्यायिक एवं प्रशासनिक शक्तियाँ दी गई हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के प्रथम उपबंध के अधीन अनुदान: 275 (1) के पहले उपबंध में अनुसूचित जनजातियों के कल्याण को बढ़ावा देने हेतु तथा अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन का स्तर बढ़ाने हेतु विशेष आर्थिक मदद का उल्लेख है।
  • अनुच्छेद 339-अनूसचित क्षेत्रों के प्रशासन और अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के बारे में संघ का नियंत्रण।

भारत में अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण और बेहतरी के लिए विधि और विधायन (Law and Legislation for the Betterment and Protection of Scheduled Tribes in India)

अनुसूचित जाति की पहचान (How Scheduled Tribes Are Notified)

  • ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द दरअसल एक प्रशासनिक खोज है, ताकि स्वतंत्र भारत में इस वर्ग को संवैधानिक सुरक्षा एवं लाभ मिल सकें। जन जनजातीय मंत्रालय (Tribal Ministry) को किसी समुदाय को किसी राज्य की अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के संबंध के प्रस्ताव प्राप्त होता है तब मंत्रालय इस प्रस्ताव को संविधा के अनुच्छेद 342 के अनुसार संबंधित राज्य सरकार/संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासन को भेज देता है। यदि संबंधित राज्य सरकार उपरोक्त प्रस्ताव को स्वीकृत करती है तो यह प्रस्ताव भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) को भेज दिया जाता है। यदि RGI इस प्रस्ताव से सहमत होता है तो वह इस प्रस्ताव को केन्द्र सरकार को भेज देता है तत्पश्चात केन्द्र उसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग को भेजता हैं। यदि आयोग भी इसे स्वीकृति दे देता है, तो इस प्रस्ताव को संबंधित मंत्रालयों से चर्चा के बाद निर्णय हेतु कैबिनेट को भेज दिया जाता है।
  • इसके बाद इस मामले को संसद में एक विधेयक के रूप में रखा जाता है ताकि राष्ट्रपति आदेश में संशोधन किया जा सके।

अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारी की मान्यता) अधिनियम, 2006 (The Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006)

पृष्ठभूमि (Background)

  • वनवासी इस देश के निर्धनतम लोगों में आते हैं। अनेक जनजातियों एवं अन्य वन समुदायों के लिए वन, जीवन, पहचान, रिवाजों और परंपराओं के साधन हैं। वनों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियाँ एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी सदियों से वनों पर अपनी आजीविका के लिए आश्रित हैंं परन्तु इन वन निवासियों को अपने पूर्वजों को भूमि पर अधिकार प्राप्त करने हेतु संघर्ष करना पड़ता है।
  • वन निवासियों एवं वनों को पृथक नहीं किया जा सकता। साथ ही जनजातीय जीवन वनों के परिस्थितिकीय संसाधनों को भी सुरक्षित रखता है। अपनी भूमि, जिस पर यह समुदाय शताब्दियों से रह रहा है, से अलग होने के भय ने इस वर्ग को मानसिक व शारीरिक रूप से इन वनों से वंचित कर दिया है। अत: इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने के लिए सरकार ने ‘अनुसूचित जनजातिय’ तथा अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (जिसे सामान्यत: वन अधिकार कानून 2006 (Forest Rights Act, 2006) कहते हैं) पारित किया। यह कानून 1 - 1-2008 से अपने सभी प्रावधानों के साथ लागू हो गया।
  • यह कानून वन अधिकारों की पहचान से कुछ अधिक है। यह अधिनियम वन भूमि स्वामियों, ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं को यह अधिकार देता है कि अपने वनों को संरक्षित करे। किसी भी ‘सामुदायिक वन संसाधन’ के सुरक्षित अभिशासन की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण अधिनियम माना गया है।

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