Public Administration: Current Legal/Constitutional Status of Cooperative Societies

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

सहकारी समितियों की वर्तमान वैधानिक/संवैधानिक प्रस्थिति (Current Legal/Constitutional Status of Cooperative Societies)

जनवरी, 2012 में केन्द्र सरकार दव्ारा अधिसूचित संविधान के 97वें संशोधन अधिनियम, 2011 दव्ारा देश में सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर दिया गया है। इस संविधान संशोधन दव्ारा मूल अधिकारों से संबंधित संविधान के भाग-3 में अनुच्छेद 19 (1) (स) के अंतर्गत नागरिकों को संगम या संघ बनाने के साथ -साथ सहकारी समितियाँ बनाने की स्वतंत्रता भी प्रदान की गई हैं। इस प्रकार- सहकारी समितियों का गठन अब मूल अधिकार बन गया है। इस संशोधन से नीति निदेशक तत्वों (संविधान के भाग-4) के तहत भी अनुच्छेद 43 (ब) जोड़कर सहकारी समितियों को राज्य दव्ारा प्रोत्साहन का उपबंध किया गया है। साथ ही संविधान में भाग-9अ के बाद 9 ब के अंतर्गत सहकारी समितियों संबंधी अनुच्छेद 243ZH से 243ZT तक जोड़े गये हैं।

इस संविधान संशोधन दव्ारा सहकारी समितियों की स्वायत एवं प्रजातांत्रिक कार्यपद्धति और उनके सदस्यों एवं अन्य हितधारकों (Share Holders) के प्रति प्रबंधन का उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने के लिए निम्नांकित महत्वपूर्ण प्रावधान किये गये हैं:

  • स्वैच्छिक निर्माण, सदस्यों के प्रजातांत्रिक नियंत्रण एवं उनकी आर्थिक भागीदारी तथा स्वायत कार्यप्रणाली के सिद्धांतों पर आधारित सहकारी समितियों का गठन, विनियमन एवं समापन।
  • एक सहकारी समिति के निदेशकों की संख्या 21 से अधिक नहीं होने संबंधी विनिर्देश।
  • सहकारी समिति के बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों और उसके पदाधिकारियों के लिए निर्वाचित होने की तिथि से 5 वर्षों का नियत कार्यकाल तथा उसके चुनावों के संचालन हेतु एक प्राधिकारी या निकाय का प्रावधान।
  • किसी सहकारी समिति के निदेशक मंडल (Board of Directors) को अधिकतम 6 माह की अवधि के लिए ही निलंबित किया जा सकेगा।
  • सहकारी समितियों का स्वतंत्र प्रोफेशनल ऑडिट कराया जाएगा और सहकारी समितियों के सदस्यों को सूचना का अधिकार होगा।
  • राज्य सरकारें सहकारी समितियों की गतिविधियों और लेखा (Accounts) की आवधिक रिपोर्ट प्राप्त कर सकेगी।
  • प्रत्येक ऐसी सहकारी समिति जिसमें अनुसूचित जाति या जनजाति के सदस्य हो, के बोर्ड में एक सीट अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए तथा दो सीटे महिलाओं के लिए आरक्षित होगी।
  • सहकारी समितियों से संबंधित अपराधों के संदर्भ में जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

सहकारी समितियों के गठन को मूल अधिकार की मान्यता देने से पूरे देश में कार्यरत लगभग 6 लाख सहकारी समितियों को स्वतंत्रता व स्वायत्ता के साथ विकास की प्रक्रिया से जुड़ने और राष्ट्र की औद्योगिक प्रणाली अथवा अर्थव्यवस्था में योगदान करने का अवसर प्राप्त हो सकेगा। वस्तुत: सहकारी समितियों के गठन का औचित्य इनके सहकारिता के सिद्धांतों समानता, समता व एकता तथा लोकतांत्रिक आदर्शों में निहित है।

वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिस्पर्धावादी युग में सहकारी समितियाँ परस्पर सहयोग (Mutual Cooperation) सद्भाव (Harmony) और एकता (Solidarity) को प्रोत्साहन देने वाली कार्यपद्धतियों पर जोर देती हैं। उल्लेखनीय है कि सहकारी साख समिमियों को पुनर्जीवन देने के लिए गठित कार्य बल (Task Force) की सिफारिशों के आधार पर भारत सरकार दव्ारा 106वाँ संविधान विधेयक, 2006 लाया गया था। इसका उद्देश्य देश में सहकारी समितियों का आर्थिक सुदृढ़ीकरण और उन्हें अधिक अधिकार संपन्न बनाना था।

भारत में सहकारिता की दिशा में संस्थागत प्रयास (Institutional Efforts in the Direction of Co-Operatives in India)

  • भारत में सहकारिता को बढ़ावा देकर आर्थिक गतिविधियों को दिशा देने के उद्देश्य से कई संस्थागत प्रयास किये गये हैं। इस दिशा में राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम की स्थापना 1963 में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य सहकारी समितियों के माध्यम से कृषि वस्तुओं तथा अन्य कुछ चयनित वस्तुओं के उत्पादन, वितरण, भंडारण तथा विपणन संबंधी कार्यक्रमों को आयोजित तथा प्रवर्तित करना है। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम के गठन के पूर्व भारत में 2 अक्टूबर, 1958 को राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नैफेड) का गठन हुआ था। यह राष्ट्रीय स्तर का एक शीर्ष सहकारी संगठन है। इसका प्रमुख कार्य चुनी हुई कृषि वस्तुओं को प्राप्त करके उनका, वितरण, निर्यात तथा आयात करना है। यह कृषि वस्तुओंं के अंतरराज्यीय व्यापार तथा निर्यात को प्रवर्तित करता है।
  • इसी क्रम में 1987 में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिषद (ट्राइफेड) का गठन जनजातियों को निजी व्यापारियों के शोषण से बचाने तथा उनके दव्ारा उत्पादित अथवा निर्मित वस्तुओं का उचित मूल्य दिलाने का उद्देश्य से की गयी।
  • कृषि विपणन व्यवस्था में सहकारी विपणन समितियाँ अत्यंत ही उपयोगी एवं महत्वपूर्ण कड़ी हैं। 10 या 10 से अधिक किसान मिलकर अपने उत्पादों को बेचने के उद्देश्य से सहकारी विपणन समितियों या बहुउद्देश्यीय सहकारी समितियों का निर्माण करते हैं। 1954 से पहले सहकारी साख समितियाँ तथा सहकारी विपणन समितियाँ अलग-अलग बनायी जाती थीं, पर 1954 के बाद बहुउद्देशीय समितियों का गठन हुआ। इसके अंतर्गत सभी सदस्य अपना अधिशेष उत्पाद (Surplus Product) समिति को बेचने के लिए सहमत होते हैं। जब सदस्य अपना सामान समिति को देते हैं तो उन्हें कुछ अग्रिम धनराशि (Advance Payment) प्राप्त हो जाती है। सहकारी विपणन समितियों के कारण जहाँ एक ओर विपणन व्यवस्था में पाये जाने वाले बिचौलियों की समाप्ति हो जाती है और किसानों के समय पर अपने उत्पादन के बदले अग्रिम प्राप्त हो जाता है, वहीं दूसरी ओर विपणन समितियाँ कृषकों के संघ की भी भूमिका निभाती हैं जिससे उन्हें अपने उत्पादन का उचित मूल्य मिल सके।

भारत में दुग्ध सहकारिता अथवा श्वेत क्रांति (Milk Co-Operatives or White Revolution in India)

  • भारत में सहकारिता आंदोलन के इतिहास का वर्णन इस क्षेत्र के सबसे सफल प्रयोग की चर्चा के बिना पूरा नहीं हो सकता। यह प्रयोग अन्य सभी से बिल्कुल भिन्न था। इसकी शुरूआत एक साधारण स्तर पर गुजरात के कैरा (खेड़ा) जिले में हुई। यही आगे चलकर उस श्वेत क्रांति (White Revolution) का आरंभकर्ता साबित हुआ, जो सारे भारत में फैल गई। सहकारिता के आनंद मॉडल की चर्चा करना यहाँ आवश्यक है।
  • कैरा जिले के किसान बंबई शहर को दूध की आपूर्ति किया करते थे लेकिन उन्हें दूध के व्यापारी इस काम में धोखा देते थे। इसलिए उन किसानों ने प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता सरदार पटेल से इस संबंध में मदद के लिए मुलाकात की। सरदार पटेल इसी जिले के थे। उनके और मोरारजी देसाई के कहने पर किसानों ने एक यूनियन बनाई। वे एक दूध हड़ताल के जरिये बंबई सरकार पर दबाव डालने और उनकी यूनियन से सीधे दूध खरीदने पर मजबूर करने में सफल हुए। इस प्रकार कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ लिमिटेड का जन्म हुआ। इसका औपचारिक रजिस्ट्रेशन दिसंबर 1946 में हुआ और इसने आनंद नामक स्थान में एक साधारण सी शुरूआत की और इससे किसान प्रतिदिन 250 लीटर दूध की सप्लाई करने लगे। डॉ. वर्गीज कुरियन केरल के प्रतिभाशाली इंजीनियर थे, जो 1950 और 1973 के बीच यूनियन (संघ) के मुख्य कार्यकारी पद पर रहे। संघ की शुरूआत मात्र दो ग्राम सहकारी संस्थाओं से हुई थी, जिनमें से प्रत्येक में सौ से भी कम सदस्य थे। 1995 तक आते-आते संस्थाओं की संख्या 954 हो गई और कुल सदस्यता 5,37, 000 और दूध का कारोबार 250 लीटर प्रतिदिन से बढ़कर 10 लाख लीटर प्रतिदिन हो गया। इस तेज विकास के दौरान यूनियन की गतिविधयों में बड़़ी विविधता आई। 1955 में उसने दूध पाउडर तथा मक्खन बनाने की फैक्ट्री लगाई। उसी वर्ष यूनियन ने अपने उत्पादों के लिए अमूल शब्द का प्रयोग करना शुरू किया। वस्तुत: यह नाम ग्लैक्सों और नैस्ले जैसी दुनिया की सबसे शक्तिशाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करने लगा और समूचे भारत में एक घरेलू नाम बन गया।
  • 1960 में एक और फैक्ट्री लगाई गई यह प्रतिवर्ष 600 टन पनीर और 2500 टन बच्चों का दूध उत्पादित करने के लिए थी। यह दुनिया में पहली ऐसी फैक्ट्री थी जिसने भैंस के दूध से बड़े पैमाने पर इन वस्तुओं को बनाना शुरू किया। 1964 में पशु भोजन बनाने के लिए एक आधुनिक फैक्ट्री लगाई गई। समय के साथ कंप्यूटरप्रणाली का प्रयोग भी होने लगा। ग्राम सभा के जरिये क्षमतावान कृत्रिम गर्भधारण सेवा लागू की गई ताकि पशुधन की गुणवत्ता सुधारी जा सके। हरे चारे के लिए उच्च गुणवत्ता वाले चारा बीज विकसित किये गये। यहाँ तक कि पशुओं के लिए टीके का भी विकास किया गया। किसान परिवारों में पशुओं की देखभाल करने वाली महिलाओं को शिक्षित करने के लिए विशेष प्रयत्न किये गये। साथ ही आनंद में ‘इंस्टीट्‌यूट ऑफ सरल मैनेजमेंट’ की स्थापना की गई। 1974 में आनंद में गुजरात सहकारी दुग्ध व्यापार संघ लिमिटेड की स्थापना की गई, जो जिले में सहकारी उत्पाद बेचने के लिए शीर्षस्थ संस्था थी। सहकारिता के कारण कैरा जिले के ग्रामीणों का जीवन स्तर काफी सुधर गया। आनंद मॉडल की एक विशेषता इसकी जनतांत्रिक कार्यप्रणाली थी। प्रबंधकों ने साधारण सदस्यों से सीध संपर्क बनाये रखा और उनके हितों की उपेक्षा नहीं की, भले ही वे निम्न जाति के भूमिहीन ही क्यों न हों।
  • कैरा सहकारिता की सफलता से इस दुग्ध आंदोलन का पूरे भारत भर में फैलना स्वाभाविक था, क्योंकि भारत कृषि व पशुपालन प्रधान देश था। 1960 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री को लिखा कि आनंद के नमूने पर अन्य राज्यों में भी कार्यक्रम लागु किये जाने चाहिए। इस दिशा में उनकी पहल पर 1965 में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) का निर्माण किया गया। वर्गीज कुरियन इस दिशा में उपनी क्षमता सिद्ध कर चुके थे ओर वे इसके अवैतनिक अध्यक्ष बनाए गए साथ ही बड़े गर्व से अपना वेतन कैरा के उत्पादकों के एक कर्मचारी के रूप में लेते रहे। उनके आग्रह पर “राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड” को दिल्ली नहीं, आनंद (गुजरात) में स्थापित किया गया।
  • यह एक अलग किस्म का संगठन बन गया, जिसका ढ़ाँचा उसके उद्देश्यों के अनुरूप था। इसके कैरा से कई लोग शामिल किये गये। एनडीडीबी ने “दुग्ध की नदी अभियान” शुरू किया जो आनंद के अनुभवों को अन्य जगहों में लागू करने की कोशिश थी। 1995 तक आते आते सारे देश में 170 दुग्ध क्षेत्रों में 69,875 गाँव डेयरी सहकार (Dairy Cooperatives) बन चुके थे। उनकी कुल सदस्यता 89 लाख किसानों की थी। यह प्रसार काफी प्रभावोत्पादक था। फिर भी इससे भारत के कुल दुग्ध उत्पादन का मात्र 6.3 प्रतिशत ओर बेचे गए दुग्ध का मात्र 22 प्रशित ही पूरा होता है।
  • “दुग्ध की नदी अभियान” के विश्व बैंक आकलन विभाग दव्ारा किए गए एक अध्ययन में यह दर्शाया गया है कि आनंद नमूने को अन्य जगहों पर लागू करने से कितना फायदा हुआ है। अध्ययन के नतीजों से पता चलता है कि गुजरात के समान बहुमुखी नतीजे अब देश के अन्य भागों में भी सामने आ रहे हैं।
  • पहले अभियान के फलस्वरूप दुग्ध आपूर्ति में भारी वृद्धि हुई और इस कारण दुग्ध उत्पादकों की आय में खासकर गरीबों की आय में खासी वृद्धि हुई। जहाँ राष्ट्रीय दुग्ध उत्पादन में 1969 तक 0.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई, वही इस अभियान के बाद वह 4 प्रतिशत तक पहुँच गई। 1995 में रुपये के मूल्य के हिसाब से सहकारी संस्थाओं दव्ारा डेयरी किसानों को अदा की गई रकम 1972 में 2.1 अरब रुपये से बढ़कर 1995 में 34 अरब तक पहुँच गयी। गाँव के अध्ययन से पता चलता है कि डेयरी काम किसानों का एक महत्वपूर्ण काम बनता जा रहा है। कुछ मामलों में तो वह आय का मुख्य स्त्रोत बनता जा रहा है, खासकर गरीबों में किये गए एक आकलन के अनुसार इससे फायदा उठाने वालों में 60 प्रतिशत सीमांत या छोटे किसान और भूमिहीन है।
  • यह भी ध्यान देने योग्य बिंदु है कि आनंद मॉडल का उदाहरण जाति, लिंग व धर्म से ऊपर बैठकर गरीबों तक पहँुचता है। 1970 के दशक के मध्य में पहली बार ग्रामीण महाराष्ट्र में आरंभ की गई ग्रामीण रोजगार स्कीम को भी लगभग यह नतीजे निकले हैं। इसे फिर आंध्र प्रदेश समेत अन्य राज्यो में भी अपनाया। उसक मुख्य लाभ भूमिहीन को मिला जो खासतौर पर पिछड़ी जातियों व जनजातियों के थे।

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