Public Administration: Development Process and Development Industry

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

प्रस्तावना (Introduction)

विकास परिवर्तन की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया व अवस्था है। जब कोई भी परिवर्तन सामाजिक मूल्यों के अनुरूप तथा अच्छाई से प्रेरित होता है तो उसे प्रगति (Progress) कहते हैं परन्तु विकास परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विभेदीकरण (differentiation) की वृद्धि होती है तथा यह सदैव ऊपर की ओर होता है। विकास का संबंध सामाजिक मूल्यों से नहीं है। अत: यह अच्छाई और बुराई दोनों ओर हो सकता है। विकास एक अवस्था (Stage) से दूसरी अवस्था (Stage) में परिवर्तन की गति को प्रकट करता है।

विकास की धारणा बहुआयामी है। एक राष्ट्र में विकास स्तर अथवा अवस्था की बात करें, तो तीन चरण (Stage) सामने आते हैं-

  • प्रथम, राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार, मंत्रिमंडल, आर्थिक मामलों की समिति योजना आयोग राष्ट्रीय विकास परिषद्, केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन, भारतीय रिजर्व बैंक ने सेबी जैसी इकाइयाँ विकास की दशा व दिशा तय करती है। आर्थिक संवृद्धि, आर्थिक सामाजिक विकास और सतत्‌ व समावेशी विकास के लिए नीति निर्माण की जिम्मेदारी इन्हीं की होती है।
  • दव्तीय, राज्य स्तर पर राज्य सरकार व उसका मंत्रिमंडल, राज्यों की विधानसभाएँ योजना आयोग आदि निकाय राज्य योजनाओं को कार्यरूप प्रदान करते हैं।
  • तृतीय, स्थानीय स्तर पर विकास कार्यक्रमों को गति देने में ग्राम पंचायतों, नगर निकायों, गैर सरकारी संगठनों स्वयं सहायता समूहों और विभिन्न गैर लाभकारी एवं स्वयं सेवी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

विकास के स्वरूप (Forms of Development)

विकास के प्रमुख स्वरूपों को निम्नांकित श्रेणियों में विभक्त किया जाता है-

  • आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) : आर्थिक संवृद्धि से आशय किसी समयावधि में किसी अर्थव्यवस्था में होने वाली वास्तविक आय की वृद्धि से है। सामान्यतया यदि सकल राष्ट्रीय घरेलू उत्पाद तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो रही हो तो इसे आर्थिक संवृद्धि माना जाता है। विकास का यह स्वरूप परिमाणात्मक (Quantitative) होता है।
  • आर्थिक विकास (Economic Development) : आर्थिक विकास की धारणा आर्थिक संवृद्धि की धारणा से कहीं अधिक व्यापक है। आर्थिक विकास जीवन की गुणवत्ता से संबंधित है। इसलिए इसमें आर्थिक संवृद्धि के पक्षों के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं के स्वरूप में परिवर्तन, शिक्षा तथा साक्षरता दर, जीवन प्रत्याशा, पोषण का स्तर, स्वास्थ्य सेवाएँ आदि शामिल हैं।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन आर्थिक विकास को अधिकारिता (Entitlement) तथा क्षमताओं (Capabilities) के विस्तार के रूप में परिभाषित करते हैंं उनका अधिकारिता का दृष्टिकोण जीवन पोषण (Life Sustenance) तथा आत्म सम्मान (Self Esteem) से संबंधित है, जबकि क्षमता स्वतंत्रता प्रदान करने से संबंधित है। अधिकारिता कुछ कार्यों को करने की क्षमता को जन्म देती है, वहीं स्वतंत्रता से आशय आवश्यकता (Want) , अनभिज्ञता (Ignorance) तथा गंदगी (Squalor) के दोषों से मुक्ति है।

मानव विकास (Human Development)

मानव विकास की अवधारण 1990 के दशक में तब चर्चा में आयी, जब पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब उल हक व भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के तत्वावधान में मानव विकास सूचकांक (Human Development Index-HDI) का निर्माण किया। मानव विकास सूचकांक की धारणा क्षमताओं के विस्तार (Expansion of Capabilities) की अवधारणा पर आधारित है। इसलिए मानव विकास के मुख्यतया तीन संकेतों (Indicators) यथा-स्वास्थ्य (जन्म के समय जीवन प्रत्याशा) , शिक्षा (औसत विद्यालयी शिक्षा) तथा आय (क्रय शक्ति समता के आधार पर प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय) के अधिक से अधिक उन्नत होने की अपेक्षा की जाती है। महबूब उल हक ने मानव विकास के लिए आर्थिक विकास को अत्यंत आवश्यक माना है। उनके मतानुसार आर्थिक विकास निर्धनता के विरुद्ध लड़ाई है, चाहे वह निर्धनता किसी भी रूाप् में क्यों न हो। वर्ष 1990 में मानव विकास सूचकांक में मानव विकास को लोगों के अधिमानों (चयनों) के विस्तार (Enlarging People՚s Choices) के रूप में परिभाषत किया गया था।

सामाजिक विकास (Social Development)

मार्च 1995 में कोपेनहेगन (डेनमार्क) में सामाजिक विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था। सामाजिक विकास से आशय समाज की विभिनन इकाइयों, समूहों एवं समुदायों दव्ारा समाज के हितों की सुरक्षा की दिशा में गतिशील होना है। लोगों को समाज के विकास के कार्यों में भागेदारी हेतु प्रेरित करना और सामाजिक पूंजी (Social Capital) निर्माण की प्रक्रिया को गति देना सामाजिक विकास के दायरे में आता है। इन्हीं लक्ष्यों का संदेश सामाजिक विकास पर कोपेनहेगन घोषणा, 1995 में दिया गया थ।

सतत्‌ विकास (Sustainnable Development)

  • वर्ष 1983 में संयुक्त राष्ट्र महासभा दव्ारा विश्व पर्यावरण और विकास आयोग (जिसे ब्रेटैंड आयोग के नाम से भी जाना जाता है) की स्थापना की गई थी, इसकी अध्यक्षता नॉर्वे की प्रधानमंत्री ग्रो हर्लेम ब्रंटलैड दव्ारा की गई। 1987 में ब्रंटलैंड आयोग दव्ारा प्रकाशित अपनी रिपोर्ट “हमारा साझा भविष्य” (Our Common Future) में सतत्‌ विकास को परिभाषित किया गया। रिपोर्ट में सतत्‌ विकास को स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि, “सतत्‌ विकास ऐसा विकास है जो भावी पीढ़ियों की आवश्यकताएँ पूरी करने की क्षमता से कोई समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ियों की आवश्यकताएँ पूरी करता है।” सतत्‌ विकास की परिभाषा विकास प्रक्रिया को संसाधनों के कुशलतम उपयोग, संसाधन प्रबंधन और संसाधनों की उपयोगिता सुनिश्चत करने (Resource Mobilization) के रूप में देखती है। यह विकास की विभिन्न अवस्थाओं एवं प्रक्रियाओं में संतुलन पर बल देती है। ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट में सतत्‌ विकास के अंतर्गत दो मुख्य अवधारणाओं पर जोर दिया गया है-
  • प्रथम आवश्यकताओं (Needs) की अवधारणा विशेषकर विश्व के गरीब वर्ग की अनिवार्य आवश्यकताएँ, जिनके लिए अभिभावी प्राथमिकता (Overriding Priority) दी जानी चाहिए और दव्तीय, वर्तमान और भावी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्यावरण क्षमता पर औद्योगिकी की अवस्था तथा सामाजिक संगठन दव्ारा लगाये गए नियंत्रणों पर विचार।

समावेशी विकास (Inclusive Development)

  • समावेशी विकास का अर्थ है, किसी व्यक्ति, समूह एवं संस्था के विकास के लिए आवश्यक विविध दशाओं, आवश्यकताओं को एकीकृत रूप में पूरी करना ताकि व्यक्ति एक उद्देश्यपूर्ण एवं गरीमामय जीवन जी सके।
  • विकास का यह स्वरूप नागरिकों की प्रत्येक उस बुनियादी आवश्यकता की पहचान करता है और उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जिसके बिना व्यक्ति सामाजिक बहिष्कार (हाशिये पर चला जाना) अभाव एवं वंचना (Deprivation) का शिकार बन जाता है। समावेशी विकास विभिन्न वर्गों व समुदायों के लोगों के बहिष्करण को राष्ट्रीय प्रगति के मार्ग में एक अवरोध मानता है और राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जोड़़ने या दूसरे शब्दों में विकास के लाभों का समतामूलक वितरण सुनिश्चित करने की दिशा में सकिय होता है।
  • भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में ‘समावेशिता’ की अवधारणा पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया है। इसमें कहा गया है कि समावेशिता (Inclusiveness) की दृष्टि से प्रगति का अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि समावेशिता एक बहुआयामी अवधारणा है। स्कूलों तक बच्चों की सर्व सुलभ पहुँच, उच्चतर शिक्षा की अधिक सुलभता और शिक्षा का सुधार हुआ।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में कहा गया है कि समावेशिता (Inclusiveness) की मात्रा की जाँच करने के लिए इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक कृषि मंजूदरी की स्थिति क्या है? इसका कारण यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों की बड़ी संख्या प्रमुख रूप से भूमिहीन श्रमिकों की है और उनमें से अधिकांश अभी भी अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर करते हैं। यह देखना सुखद है कि 2007 से 2010 (कैलेण्डर वर्ष) के दौरान औसत वास्तविक मजदूरी दर में अखिल भारतीय स्तर पर 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

गैर-सरकारी संगठन (Non- Government Organisation-NGO)

  • विश्व बैंक ने गैर-सरकारी संगठनों को परिभाषित करते हुए कहा है कि, ″ ऐसे समूह और संस्थाएँ जो व्यापक तौर पर सरकरी निर्भरता से मुक्त होती हैं तथा व्यावसायिक उद्देश्यों के बजाय मानवीय अथवा सहकारी उद्देश्यों को लेकर चलना उनका गुण होता है … ऐसे निजी संगठन जो निर्धनों के हितों को आगे बढ़ाने, उनकी परेशानियों को कम करने, पर्यावरण की रक्षा करने, अथवा सामुदायिक विकास जैसे काम करने का बीड़ा उठाते हैं।
  • वस्तुत: गैर-सरकारी संगठन ऐसे संगठन होते हैं जो प्रकृति में बेहद विविधतापूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसी कोई सुसंगठित परिभाषा देना लगभग असंभव है जो इस विविधता को प्रस्तुत कर सके। पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठनों की परिभाषा में कहा जा सकता है कि ये नागरिक समाज पर आधारित ऐसे गैर-सरकारी संगठन हैं जो एक ‘उत्पादक’ , ‘सुरक्षात्मक’ अथवा वैकल्पिक दृष्टिकोण से पर्यावरण संबंधी समस्याओं के लिए आवाज उठाते हैं।

गैर-सरकारी संगठनों की उत्पत्ति (Origin of NGOs)

  • ऐतिहासिक दृष्टि से गैर-सरकारी संगठनों की उत्पत्ति सामान्तया दव्तीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिमी यूरोप में गठित होने वाली अनेक समितियों और आंदोलनों में मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि ये युद्ध के विनाशकारी प्रभावों के जवाब में मध्य वर्ग के विभिन्न व्यक्तियों की पहल के परिणाम थे। गैर-सरकारी संगठन के कुछ उदाहरण हैं- अंतरराष्ट्रीय रेडक्रॉस समिति, केयर (CARE) , वर्ल्ड विजन (Word Vision) और ऑक्सफैम। इन संगठनों को संयुक्त राष्ट्र में उनके दर्जे के कारण “गैर-सरकारी संगठन” कहा जाता है। इन समितियों व आंदोलनों की स्थापना विभिन्न मूल्यों की रक्षा और प्रोत्साहन हेतु हुई थी। तीसरी दुनिया (Third World) में गैर-सरकारी संगठनों की उत्पत्ति 20वीं शताब्दी के प्रारंभ के उपनिवेश विरोधी, सामंतशाही-विरोधी संघर्षों से, और 20वीं शताब्दी के मध्य में नवोदित राष्ट्रों में उत्तर औपनिवेशक काल में होने वाली राष्ट्र निर्माण की कवायद से बतायी जा सकती है।
  • 1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन और 1992 में एजेंडा-21 के निर्माण में भी गैर-सरकारी संगठनों की निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका रही जिसमें कानूनी दायित्व क्षेत्रों, आर्थिक विनियमन तथा पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन को पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय नियामक उपकरणों के रूप में देखा गया था। अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन मंच ने पर्यावरण से जुड़े विभिन्न कार्यकर्ताओं और संगठनों दव्ारा शुरू की गयी एक वैकल्पिक संधि प्रक्रिया को समन्वयन किया।

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