Public Administration: Discrimination Faced by Disabled People in India

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भारत में असुरक्षित, वंचित एवं उपेक्षित समूह/समुदाय (Vulnerable, Marginalized and Disadvantaged Groups/Communities in India)

भारत में महिलाओं के साथ होने वाला भेदभाव और उनकी असुरक्षा (Discrimination and Vulnerability Faced by Woman in India)

2011 के जनगणना आँकड़ों के अनुसार भारत का लिंगानुपात 940 (1000 पुरुषों पर 940 महिलाएँ) है। महिलाएँ हमारे समाज का गैर-बराबरी वाला अर्द्ध-भाग हैं। देश में महिलाएँ जीवन भर सभी तरह के भेदभाव का सामना करती है। पितृ सत्तात्मक समाज, सांस्कृतिक व्यवहारों, सामाजिक निषेधों, अंधविश्वासों तथा हानिकारक पंरपराओं की वजह से महिलाएँ (ग्रामीण महिलाएँ, बालिका शिशु, दलित महिलाएँ) हमेशा असुरक्षित रही हैं। भारत में साक्षरता दर 65.46 प्रतिशत है, जबकि साक्षरता का औसत राष्ट्रीय प्रतिशत 74.04 प्रतिशत है।

अब हम निम्नलिखित फ्लोचार्ट के माध्यम से भारत में महिलाओं की असुरक्षा की स्थिति को समझने का प्रयास करेंगे-

Discrimination and Vulnerability Faced by Woman

भारत में नि: शक्त लोगों के साथ होने वाला भेदभाव (Discrimination Faced by Disabled People in India)

स्याुंक्त राष्ट्र के आकलन के अनुसार वर्तमान में विश्व में 500 मिलियन नि: शक्त लोग हैं। साथ ही युद्ध एवं विनाश, अस्वस्थ्यकर जीवन दशाओं, तथा नि: शक्तता के संबंध में ज्ञान के अभाव में नि: शक्त लोगों की संख्या दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। आमर्त्य सेन कहते हैं कि नि: शक्त लोग विकासशील देशों में न केवल सर्वाधिक वंचित हैं, बल्कि वे सर्वाधिक उपेक्षित भी हैं। नि: शक्त लोग सभी सामाजिक और आर्थिक विकास के अवसरों से वंचित हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं से उन्हें वंचित रखा जाता है। भारत में नि: शक्त व्यक्तियों की समस्या से निपटने में राज्य की आधारभूत अवसंरचना पूरी तरह से अपर्याप्त है। लगभग 70 फीसदी नि: शक्त लोग बेरोजगार हैं। लगभग दसियों लाख तो गंभीर नि: शक्तता के चलते बर्बादी के कगार पर हैं। शारीरिक रूप से नि: शक्त लोगों पर कम से कम ध्यान तो दिया जाता है, जबकि मानसिक रूप से पीड़ितों की समाज दव्ारा अनदेखी कर दी जाती है। शारीरिक समस्याओं के साथ ही साथ उन्हें सामाजिक कंलक एवं सामाजिक बहिष्कार भी झेलना पड़ता है।

भारत में नि: शक्त व्यक्तियों के समक्ष आने वाली कुछ प्रमुख समस्याएँ (Few Major Problems Face by Disabled in India)

  • सार्वजनिक परिवहन के वाहनों तक पहुँच में अत्यधिक समस्या तथा इनके प्रति नागरिकों में सहानुभूति का अभाव।
  • नि: शक्त लोगों के साथ कार्यस्थल पर ही भेदभाव किया जाता है, जैसे कि उनका वेतन भी सामान्य स्तर से कम ही होता है।
  • नि: शक्त लोगों के साथ कार्यस्थल, घर तथा सार्वजनिक स्थल पर लैंगिक दुर्व्यवहार किया जाता है।
  • 2011 की जनगणना के अनुसार नि: शक्त लोग कुल जनसंख्या के 2.1 प्रतिशत हैं। पुलिस स्टेशन और न्यायालयों में विशेष सहायता केन्द्रों के अभाव तथा परामर्श केन्द्रों की कमी के चलते नि: शक्त लोगों के साथ होने वाला भेदभाव और भी गंभीर हो जाता है।
  • एक मोटा अनुमान है कि भारत में 120 लाख बच्चे नि: शक्तता से पीड़ित हैं। इनमें से केवल 1 फीसदी बच्चों की ही विद्यालयों तक पहुँच है। जो बच्चे प्रमस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित हैं उनमें अल्प-पोषण एक बहुत ही गंभीर समस्या है। भारत में नि: शक्तता से पीड़ित 80 प्रतिशत बच्चों की जीवन प्रत्याशा 40 वर्ष से अधिक नहीं हैं।
  • नि: शक्तता से पीड़ित युवा महिलाएँ अपनी उम्र के नि: शक्तता से पीड़ित पुरुषों की अपेक्षा अधिक कठिन चुनौतियों का सामना करती हैं। नि: शक्तता से पीड़ित महिलाओं को नि: शक्त पुरुषों के समान अवसर भी प्राप्त नहीं होते हैं।
  • चूँकि कमजोर वृद्ध लोग, मानसिक रूप से पीड़ित तथा कैंसर के रोगी समाज दव्ारा बहिष्कृत कर दिए जाते हैं अत: सबसे अधिक दुष्प्रभाव इन्हीं लोगों पर पड़ता है। यहाँ तक कि इन लोगों के परिवार में भी इनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है।

भारत में श्रमिक वर्ग और कृषकों के समक्ष असुरक्षा एवं भेदभाव (Vulnerability and Discrimination of Labour Class Peasants in India)

भारतीय कृषक वर्ग की विशेषताओं में समय के साथ-साथ काफी परिवर्तन हुआ है। नए उद्योगों के विकास और श्रम के नियमित प्रवसन के साथ ही भारतीय श्रमिक वर्ग का स्वरूप नियमित रूप से काफी परिवर्तित हुआ है और यह नवीन औद्योगिक प्रक्रिया के साथ-साथ अपने स्वरूप को रूपांतरित कर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की विस्तारवादी प्रकृति और इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकरण ने भारती श्रमिक वर्ग के समक्ष अनेक समस्याएँ उत्पन्न की हैं।

भारत में श्रमिक वर्ग की महत्वपूर्ण विशेषताएँ (Important Features of Indian Labour Class)

  • सामाजिक संघटन: भारत में अधिकांश उद्योगों में श्रमिक के रूप में अनुसूचित जातियों तथा अन्य निम्न जातियों के व्यक्ति कार्य करते हैं। अधिकांश श्रमिक या तो अशिक्षित होते हैं या फिर उन्होंने छोटी उम्र में ही विद्यालय छोड़ा हुआ होता है।
  • लैंगिक संघटन: विगत समय में लैंगिक दृष्टि से श्रम का स्पष्ट विभाजन था। महिलाएँ केवल बागान तथा वस्त्र उद्योग में कार्य करती थीं। जबकि पुरुष उद्योगों में कार्य करते थे। आज महिला एवं पुरुष समान रूप से सभी उद्योगों में संलग्न हैं। अधिकांश उद्योगों में बाल श्रमिक भी कार्य करते हैं।
  • जनजातीय श्रमिक: स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत में मैग्नीज, कोयला और लौह अयस्क जैसे कुछ कच्चे माल ग्रामीण एवं वन क्षेत्रों से ही प्राप्त किए जाते हैं। आज जनजातीय युवा इस्पात, लौह तथा अन्य खदान क्षेत्रीय उद्योगों में संलग्न है।

भारत में अनौपचारिक श्रमिक और उनकी समस्याएँ (Informal Labourers in India and Their Problems)

  • अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार अनौपचारिक श्रमिक वे हैं, जो बिना वैधानिक पंजीकरण के स्वनियोजित श्रमिक हैं तथा बिना वैधानिक पंजीकरण वाले उद्यमों में संलग्न श्रमिक, अवैतनिक पारिवारिक श्रमिक तथा अर्थव्यवस्था के औपचारिक या अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमों में गैर-वैधानिक तरीके से नियोजित श्रमिक हैं। भारत में श्रम कार्य में लगभग 480 मिलियन लोग संलग्न हैं, जिसमें से 94 प्रतिशत से अधिक अनिगमित और असंगठित हैं।
  • अनौपचारिक श्रम का उदाहरण: छोटे और हाशिए के किसान, जो पशुपालन, भवन निर्माण श्रमिक, लेदर वर्कर, जुलाहे, दस्तकार, सॉल्ट वर्कर, ईट के भट्‌टों, पत्थर की खदानों, लकड़ी चीरने के कार्य तथा तेल मिलों में कार्यरत हैं इसी श्रेणी में आते हैं।

असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों की असुरक्षा (Vulnerability of Labourers in Unorganized or Informal Sector)

Labourers in Unorganized or Informal Sector

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