Public Administration: Key Tips to Make E-Governance Effective

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भूख, निर्धनता व विकास से संबंधित मुद्दे (Issues Relating to Hunger, Poverty and Development)

ई-शासन को प्रभावी बनाने के लिए प्रमुख सुझाव (Key Tips to Make E-Governance Effective)

  • ई-शासन परियोजनाओं में कई संघटक होते हैं, जिनमें से सभी को कार्यान्वित किया जाना आवश्यक है। इसके क्रियान्वयन के दौरान एक संपूर्ण दृष्टिकोण आवश्यक है।
  • ई-शासन परियोजनाओं का कार्यान्वयन के प्रयोजनार्थ संघटकों में विभाजित किया जाना चाहिए। वे संघटक जो आईसीटी से स्वयं को संबद्ध करते हैं, को पहले प्रारंभ किया जाना चाहिए।
  • ई-शासन परियोजनाओं की पहुँच सरकारी निजी भागीदारी मॉडल के माध्यम से बढ़ाई जा सकती है, जो लागत प्रभावी भी होगी।
  • सभी हितधारकों को विशेषकर जी2 बी परियोजनाओं और ई-अधिशासन की पहलों में भाग लेेने और उसका लाभ उठाने के लिए दक्षता निर्मित करनी चाहिए।
  • सर्वोत्तम विक्रेताओं और अद्यतन प्रौद्योगिकी के बावजूद कर्मचारियों की गहन भागीदारी अनिवार्य है।
  • समान परियोजनाओं में अन्य संगठनों के अनुभवों से महत्वपूर्ण सीख ली जा सकती है। प्रत्येक ई-अधिशासन परियोजना में चक्र को पुन: घुमना आवश्यक नहीं है।
  • ई-शासन परियोजना का उचित कार्यकरण सुनिश्चित करने के लिए घनिष्ठ अनुवीक्षण और निरंतर पृष्ठीभूमि संबंधी जानकारी आवश्यक है।
  • ई-शासन परियोजनाओं की सफलता के लिए प्रौद्योगिकी समाधान प्रदायक और आंतरिक क्षेत्र विशेषज्ञों के बीच घनिष्ठ सहयोग महत्वपूर्ण है।
  • कर्मचारियों की पूरी मन से भागीदारी के साथ उच्चतम स्तर पर राजनीतिक समर्थन सफलता की संभावना को बढ़ा देता है।
  • कर्मचारियों का क्षमता निर्माण किसी भी ई-अधिशासन परियोजना की सफलता के लिए अनिवार्य है।
  • उच्चतम राजनीतिक स्तर से समर्थन कार्यान्वयन में आने वाली समस्याएँ दूर करने में सहायता करता है।
  • विभिन्न विभागीय संगठनों के कार्यकलापों के बीच अभिमुखता और समन्वय से ई-अधिशासन के अधीन बेहतर सेवाएँ प्रदान की जाती है।
  • सरकारी कर्मचारियों को आईसीटी वातावरण के अनुकूल होने और कार्य करने के लिए प्रेरित किया जाना आवश्यक है।
  • कर्मचारियों की सक्रिय भागीदारी और क्षमता निर्माण ई-अधिशासन परियोजनाओं की सफलता के लिए आवश्यक है।
  • परियोजनाओं के लिए योजना बनाते और समय सीमा नियुक्त करते समय संगठन को इलेक्ट्रॉनिक तैयारी का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए।
  • क्षेत्र विशेषज्ञों की भागीदारी मुख्य पूर्वाश्यकता है।
  • हितधारकों को पूर्ण सुरक्षित प्रणाली के माध्यम से त्रुटियों की पहचान करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  • प्रणाली में लचीलापन अनिवार्य है।
  • पारगन अवधि मेंं पुरानी प्रणाली से कतिपय प्रक्रियाओं को जारी करने की अनुमति दी जा सकती है।
  • प्रयोक्ताओं को नई प्रणाली स्वीकार्य करने के लिए लक्षित पहलों पर अधिक ध्यान देने और संसाधनों की आवश्यकता है।
  • सेवा सुपुदर्गी के लिए बैंचमार्क सृजित करने और प्रयोक्ताओं को सूचित करना अपेक्षित है।
  • ई-शासन परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए ध्यान केंद्रित दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसके लिए संगठन के भीतर पृथक दल सृजित किए जाने की आवश्यकता है।
  • कानूनी ढांचे में किए जाने वाले परिवर्तनों का आकलन अग्रिम रूप से किए जाने की आवश्यकता है।

सामाजिक न्याय और अवधारणात्मक विवेचन (Conceptual Interpretation of Social Justice)

सामाजिक न्याय का सिद्धांत (Principle of Social Justice)

  • ‘सामाजिक न्याय’ शब्द का प्रयोग पहली बार 1840 में सिसली के एक पादरी ‘लुइगी तापारेली द एजेग्लियो’ (Luigi Taparelid Azeglio) दव्ारा किया गया था, जबकि इस शब्द को पहचान 1848 में एन्टोनियो रोस्मिनी सरबाली (Antonio Rosmini Serbali) ने दिलायी।
  • सामाजिक न्याय का उद्देश्य राज्य के सभी नागरिकों को न्याय उपलब्ध कराना है। समाज के प्रत्येक वर्ग के कल्याण के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता अर आजादी आवश्यक है। भारत एक कल्याणकारी राज्य है। यहाँ सामाजिक न्याय का मुख्य उद्देश्य लैंगिक, जातिगत, नस्लीय एवं आर्थिक भेदभाव के बिना सभी नागरिकों की अधिकारों तक समान हुँच सुरक्षित करना है।
  • मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच बड़ा विवाद रहा है। 20वीं सदी मे सामाजिक न्याय की अवधारणा के तीव्र विकास के साथ ही उपरोक्त दोनों मूल्यों में व्याप्त मतभेद और भी गहराया गया है। इसलिए इन दोनों में सामनजस्य स्थापित करने की आवश्यकता है। इस बात को देखते हुए विभिन्न देशों ने इन मूल्यों में सामंजस्यपूर्ण संतुलन स्थापित करने के लिए भिन्न भिन्न संवैधानिक रूपरेखाओं को अपनाया। अत: जहाँ पश्चिमी पूँजीवादी देशों ने अपनी संवैधानिक रणनीतियों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रमुखता दी, वहीं समाजवादी देशो ने सामाजिक न्याय को सर्वप्रमुख माना।
  • एक समाजवादी लोकतंत्र होने के बावजूद भारत ने उदारवादी लोकतांत्रिक मॉडल को अपनाया है, जिसमें मूलभूत मानवाधिकारों पर बल दिया गया है। परिणामस्वरूप भारत के संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय में संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से संविधान के भाग III में मौलिक अधिकारों के रूप में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को और भाग (IV) में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अंतर्गत सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया हैं।
  • ‘सामाजिक न्याय’ शब्द को कठोर प्रतियोगिता के विरुद्ध कमजोर वृद्ध, दीन हीनों महिलाओं, बच्चों और अन्य सुविधा वंचितों को राज्य दव्ारा संरक्षण के अधिकार के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। सामाजिक न्याय सुविधा वंचिता को आवश्यक आकस्मिक सहायता भी प्रदान करता है ताकि उन्हें समाज के अग्रणी तबके के समान अवसर प्राप्त हो सकें। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि यह सिद्धांत समाज के सुविधा संपन्न (Haves) एवं सुविधा वंचित (Have Notes) वर्गों के मध्य संतुलन स्थापित करता है। सामाजिक न्याय की संकल्पना का आविर्भाव सामाजिक अन्याय की पृष्ठीभूमि से हुआ है। यह सिद्धांत समाज में जन्म से प्रदत्त अक्षमता, जो बाद में सामाजिक, आर्थिक असमानता का कारण बनती है को हटाने का प्रयास करता हैं यह सबके लिए समान विकासीय दशाओं तथा प्रतिष्ठा और अवसर की समानता सुनिश्चित करता है सामाजिक न्याय न केवल एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करता है, बल्कि लोगों में विदव्ेष और असांमजस्य को भी समाप्त करता है। अत: भारत में एकता और सामाजिक स्थायित्व सुनिश्चित करने की दृष्टि से सामाजिक न्याय का अत्यधिक महत्व है। यद्यपि सामान्य हित के स्वीकृत मानक स्थापित करने के लिए न्याय का विधि सम्मत होना आवश्यक है।
  • भारत के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश के. सुब्बाराव के अनुसार, सामाजिक न्याय शब्द को दो अर्थों में समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय को हम व्यापक और सीमित दो अर्थों में समझ सकते हैं। सीमित अर्थों में इसका तात्पर्य लोगों के व्यक्तिगत संबंधों में अन्याय को समाप्त करने से है। जबकि व्यापक अर्थों मे इसका तात्पर्य लोगों के जीवन में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक संतुलन कायम करना है। अत: सामाजिक न्याय को व्यापक अर्थों में ही समझा जाना चाहिए। चूँकि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियाँ परस्पर अंतर्सबंधित हैं इसलिए जब तक समाज हर तरह से प्रगति नहीं कर लेता, तब तक सामाजिक न्याय को उसके सीमित अर्थों में भी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि सामाजिक न्याय एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना में सहायक होता है। … ″
  • अत: सामाजिक न्याय का उद्देश्य सुविधा संपन्न तबके को पीछे ढकेलना नहीं, बल्कि सुविधा संपन्न वर्ग के हितों को अनावश्यक एवं अतार्किक रूप से क्षति पहुँचाए बिना पिछड़े वर्ग का उत्थान करना है। सामाजिक न्याय न केवल समाज के सुविधा वंचित वर्ग की कीमत पर बढ़ने वाले अन्याय को रोकता है, बल्कि निर्धन और संपन्न के बीच संतुलित विकास तथा सुविधा वंचित वर्गों के लिए सार्वजनिक नियोजन और विभिन्न सार्वजनिक संस्थानों में समान अवसर सुनिश्चित करता है। सामाजिक न्याय की संकल्पना का मुख्य उद्देश्य पूंजीवादी सिद्धांत की कल्याणकारी विचारधारा को समाजवादी व्यवस्था के समतावादी लक्ष्य के साथ समायोजित करके समाज के प्रत्येक वर्ग का उत्थान एवं संतुलित विकास सुनिश्चित करना है।

सामाजिक न्याय से जुड़े सवाल-

  • सामाजिक न्याय में किसका वितरण करना है?
  • वितरण के संभावित लाभार्थी कौन होंगे?
  • वास्तविक लाभार्थी चुनने का आधार क्या होगा?
  • इस लाभ का स्वरूप कैसा होगा?
  • यह वितरण कौन करेगा?
  • न्यायपूर्ण वितरण के लिए सफलता या असफलता का आकन कैसे किया जाएगा?

सामाजिक न्याय की उत्पत्ति (Genesis of Social Justice)

  • मानव सभ्यता के इतिहास पर गौर करें तो साफ जाहिर होता है कि जैसे-जैसे समाज परिवर्तित होता गया, वैसे-वैसे समाज में न्याय की मूल अवधारणा भी परिवर्तित होती चली गई। उदाहरण के तौर पर, सदियों तक हमारा जीवन शास्त्रों दव्ारा निर्देशित होता रहा, लेकिन अब संविधान से संचालित होता है। शास्त्रों में न्याय की अवधारणा संविधान में निहित न्याय की अवधारणा से मूलत: भिन्न है। ठीक इसी तरह प्राचीन काल में न्याय का निर्धारण ईश्वरीय था। ईश्वर या किसी पैगम्बर दव्ारा जो कुछ कहा गया वही न्याय था। कालांतर में न्याय सूचक मापन का आधार इश्वरीय न होकर एक राजा के रूप् में लौकिक जीवन में न्याय का प्रतिरूप बना। न्याय की धारणा ईश्वरतंत्र (धर्मतंत्र) में राजतंत्र में परिवर्तित हुयी। लेकिन राजशाही में पुरोहित व सामान्य वर्गो की मुख्य भूमिका रही। न्यायिक अधिकार, नियमों के निर्माण और उनकी व्याख्या का अधिकार समाज में सीमित लोगों के पास ही था। इसके पीछे मूल धारणा यह थी कि कानून का निर्माण उसकी व्याख्या और उसके क्रियान्वयन का कार्य भी सभी के वश का नहीं है। इन कार्यो को केवल विशिष्ट व्यक्ति ही संपन्न कर सकते हैं और विशिष्ट व्यक्ति केवल विशिष्ट व्यक्तियों के यही ही जन्म लेते हैं।
  • कालांतर में कुलीनवादी व्यवस्था के अंतर्गत प्राप्त विशेषाधिकारों के चलते पुरोहित एवं सामंत वर्ग अकर्मण्य, अनाचारी और भ्रष्ट बन गए। परिणामस्वरूप जनसाधारण में उनके प्रति अनादर और असंतोष बढ़ा। विज्ञान के विकास के साथ चिंतन के क्षेत्र में व्यक्ति स्वतंत्र हुआ। फ्रांस में राज्य क्रांति हुई, जिससे पूरे यूरोप सहित विश्व के अन्य देशों में राजतंत्र एवं कुलीन तंत्र के विनाश का मार्ग प्रशस्त हुआ। न्याय का ईश्वरीय आधार समाप्त हो गया। वंश, कुल, वर्ण एवं जाति संबंधी जन्मगत न्यायिक विशेषाधिकार समाप्त हो गए। लोकतांत्रिक मूल्यों का स्थापना के साथ न्यायिक विकास और न्यायिक अधिकार पूर्णतया जन सामान्य के हाथ में आ गये।
  • डार्विनवाद के विकास और डार्विन दव्ारा दिये गये अस्तित्व के लिये संघर्ष के सिद्धांत के साथ मत्स्य न्याय (शक्तिशाली दव्ारा कमजोर का नियंत्रण) का सिद्धांत चर्चा का केन्द्र बना। लेकिन आगे चल कर मत्स्य न्याय एवं अहस्तक्षेप के सिद्धांतों की नैतिक खामियाँ उजागर हुयीं। क्योंकि पशु समाज मत्स्य न्याय के सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करता है, लेकिन मानव जीवन संस्कृति दव्ारा संचालित और संस्कृति के अनुरूप होता है, साथ ही मानव समाज में न्याय की प्रकृति शक्तिशाली से कमजोर की रक्षा है।
  • दव्तीय विश्व युद्ध के बाद एक नई वैश्विक व्यवस्था का सृजन हुआ। संयुक्त राष्ट्र के गठन के बाद ‘मानव अधिकार’ एवं संरक्षणात्मक भेदभाव (Positive Discrimination) की मूल धारणा ने सभी राष्ट्रों को प्रभावित किया। औद्योगीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण ने विश्व को एक बढ़े समाज में तब्दील कर दिया। आर्थिक समृद्धि के नये आयाम गढ़े गये। लेकिन साथ ही साथ दुनिया भर में आर्थिक विसंगतियों, सामाजिक पिछड़ेपन और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का प्रभाव बढ़ता चला गया। इन्हीं असमानताओं के चलते आज लोकतांत्रिक राज्य, ‘कल्याणकारी राज्य’ में परिवर्तित हो गये हैं। विकास एकल आयामी न हो, असुरक्षित और हाशिए पर चल रहे सामाजिक समूह समाज की मुख्य धारा से जोड़े जाएँ, गरीबी जड़ से खत्म कर दी जाए तथा सामाजिक कुरीतियाँ अपना अस्तित्व खो दें। इन सभी चुनौतियों के लिए आज दुनिया भर के राष्ट्र एक ऐसी न्यायपूर्ण व्यवस्था की ओर अग्रसर हो चुके हैं जिसे सामाजिक न्याय कहा जाता है और इसका मूल उद्देश्य सामाजिक विषमता को समाप्त करके शोषित समूहों का विकास करना और ऐसी नीतियों को निर्धारित करना है जो समाज को न्यायपूर्ण, समावेशी और कल्याणकारी बना सकें।

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