Public Administration 1: Environment and Forest Ministry: Divisions

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पर्यावरण और वन मंत्रालय (Environment and Forest Ministry)

  • पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) योजना बनाने, पदोन्नति, समन्वय के लिए केन्द्र सरकार के प्रशासनिक ढाँचे में एक नोडल एजेंसी है और यह भारत के पर्यावरण और वानिकी नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की देखरेख करता है।
  • म्त्राांलय की प्राथमिक चिंता झीलों और नदियों, इनकी जैव विविधता, वन और अन्य जीवन, जानवरों के कल्याण सुनिश्चित करना है, और प्रदूषण की रोकथाम और कमी सहित देश के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करना है। इन नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करते समय मंत्रालय मानव कल्याण के सतत्‌ विकास और वृद्धि के सिद्धांत दव्ारा निर्देशित होता है।
  • म्त्राांलय संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के लिए देश में नोड्‌ल एजेंसी, दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम (एसएसीईपी) , इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के लिए इंटरनेशनल सेंटर के रूप में कार्य करता है।

म्त्राांलय के व्यापक उद्देश्य हैं:

  • वनस्पति, जीव, वन और वन्य जीवों का संरक्षण और सर्वेक्षण
  • रोकथाम और प्रदूषण का नियंत्रण
  • अपमानित क्षेत्रों में वनीकरण और उत्थान
  • पर्यावरण का संरक्षण
  • जानवरों का कल्याण सुनिश्चित करना।

प्रभाग (Divisions)

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के प्रमुख प्रभाग निम्नलिखित हैं-

  • वन सेवा
  • जलवायु परिवर्तन
  • राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय
  • प्रोजेक्ट टाइगर

हेग घोषणा (Hague Declaration)

पर्यावरण के संबध में हेग घोषणा 11 मार्च, 1989 को हेग में की गई और इस पर चौबीस देशों के प्रतिनिधियों ने हस्ताक्षर किए।

घोषणा में निम्नलिखित पहलुओं को महत्व मिला है-

  • जीने का अधिकार एक ऐसा अधिकार है, जिससे अन्य सभी अधिकार उत्पन्न होते हैं। इस अधिकार का आश्वासन देना विश्व में सभी देशों के प्रभारियों का सर्वोपरि दायित्व है।
  • प्रमाणित वैज्ञानिक अध्ययनों ने विशेष रूप से वायुमंडल के तापित हो जाने तथा ओजोन परत के अपकर्ष से जुड़े खतरों की मौजूदगी और संभावना व्यक्त की है।
  • मौजूदा वैज्ञानिक ज्ञान के अनुसार इस घटनाक्रम के परिणाम पारिस्थितिकीय प्रणाली और कुल मिलाकर मुनष्य जाति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण हितों को खतरें में डाल सकते हैं। क्योंकि इस समस्या का विस्तार ग्रह व्यापी है इसलिए इसके समाधान केवल विश्व स्तर पर ही तैयार किए जा सकते हैं।
  • वायुमंडल को प्रभावित करने वाले अधिकांश नि: स्सरण आजकल औद्योगीकृत देशों में पाए जाते हैं और यही वे देश हैं जिनमें बदलाव की जरूरत सबसे अधिक है और यही वे देश हैं, जिनके पास इस समस्या से प्रभावी रूप से निपटने के लिए सबसे अधिक संसाधन उपलब्ध हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से औद्योगीकृत देशों पर विकासशील देशों की (जोकि वायुमंडल में बदलाव के कारण अत्यधिक नकारात्मक रूप से प्रभावित होंगे) , मदद करने का विशेष दायित्व है। हालाँकि इस प्रक्रिया के लिए उनमें से अनेक का दायित्व आज की तारीख में बहुत मामूली हो सकता है। हेग घोषणा का पाठ निम्नानुसार है-

प्रत्येक देश के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों पर कोई भी प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना हस्ताक्षरकर्ता निम्न सिद्धांत स्वीकार करते हैं-

  • संयुक्त राष्ट्र के तंत्र के भीतर या तो मौजूदा संस्थानों का सुदृढ़ीकरण करके अथवा एक नया संस्थान बनाकर एक नया तापन से संघर्ष करने के लिए जिम्मेदार होगा तथा उसमें निर्णय लेने की ऐसी क्रियाविधियांँ शामिल रहेंगी जोकि यदि किसी मौके पर सर्वसम्मत सहमति नहीं हुई है तो भी प्रभावी होंगी।
  • इस आशय का सिद्धांत कि यह संस्थानात्मक प्राधिकरण ऐसे जरूरी अध्ययन हाथ में लेगा या शुरू करेगा जिनमें अपेक्षित प्रौद्योगिकी को सुलभ बनाया जाएगा। इसके अतिरिक्त वायुमंडल की सुरक्षा के संवर्धन अथवा गारंटी के लिए इन्स्टूमेंटस निर्मित करना और मानक परिभाषित करना और उनके अनुपालन की निगरानी करना।
  • नए संस्थानात्मक प्राधिकरण के ऐसे निर्णयों, जोकि अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के नियंत्रण के अध्याधीन हाेें के प्रभावी कार्यान्वयन तथा अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त उपायों का सिद्धांत।
  • उपर्युक्त सिद्धांतों के लिए संस्थानात्मक तथा वित्तीय रूप से एक प्रभावी और सुसंगत आधार प्रदान करने के आवश्यक कानूनी दस्तावेज संबंधी बातचीत।

जिन राज्यों तथा सरकार के अध्यक्षों अथवा जिनके प्रतिनिधियों ने इस घोषणा के नीचे अपने हस्ताक्षर करके इस घोषणा के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है वे इस प्रकार परिभाषित सिद्धांतों को निम्न दव्ारा बढ़ावा देने का अपना संकल्प दोहराते हैं-

  • संयुक्त राष्ट्र के भीतर तथा संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान के अधीन मौजूदा एजेंसियों के निकट तालमेल और सहयोग से अपनी पहल को और आगे बढ़ाना।
  • विश्व के सभी देशों को तथा इस क्षेत्र में सक्षम अंतरराष्ट्रीय संगठनों को आईपीसीसी दव्ारा अध्ययनों को ध्यान में रखते हुए, संस्थानात्मक प्राधिकरण के लिए जरूरी तंत्र परिपाटियाँ तथा अन्य कानूनी दस्तावेज तैयार करने एवं वायुमंडल के संरक्षण के लिए तथा जलवायु बदलाव विशेष रूप से वैश्विक तापन का प्रतिकार करने के निमित ऊपर बताए गए अन्य सिद्धांतों के कार्यान्वयन के लिए आमंत्रित करना।
  • विश्व के सभी देशों से तथा इस क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय संगठनों से प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण से संबंधित समझौतों पर हस्ताक्षर करने तथा उनकी संपुष्टि करने के लिए आग्रह करना।
  • विश्व के सभी देशों से मौजूदा घोषणा का समर्थन करने का आग्रह करना।

जल संसाधन मंत्रालय (Ministry of Water Resources)

  • सितंबर, 1985 के केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों के पुनर्गठन में तत्कालीन सिंचाई और विद्युत मंत्रालय को विभाजित कर दिया गया और सिंचाई विभाग को जल संसाधन मंत्रालय के रूप में पुनर्गठित किया गया। देश के जल संसाधनों के विकास के लिए आयोजन की जरूरत को एक समन्वित ढंग से स्वीकार किए जाने का परिणाम यह हुआ कि मंत्रालय की प्रकृति में बदलाव आ गया और देश के जल संसाधनों से संबंधित सभी मामलों के संबंध में मंत्रालय को नोड्‌ल भूमिका सौंप दी गई।
  • जल संसाधन मंत्रालय के रूप में पुन: नामित किए जाने साथ ही इस नए परिप्रेक्ष्य में, मंत्रालय की अपेक्षित भूमिका की पूर्ति की दिशा में सोद्देश्य उपाय किए गए। जल नीति तैयार करना एक अनिवार्यता थी जिसमें अन्य बातों के साथ-साथ जल के विभिन्न उपयोगों के लिए प्राथमिकताएँ निर्धारित की गई हों। अत: इस पक्ष की ओर ध्यान देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद का गठन किया गया। इस परिषद ने सिंतबर, 1987 में राष्ट्रीय जल नीति अपना ली।

कार्य (Functions)

यह मंत्रालय देश के जल संसाधनों के विकास और विनियमन के लिए नीतिगत मार्गदर्शी सिद्धांत और कार्यक्रम तैयार करने के लिए जिम्मेदार है। मंत्रालय को निम्न कार्य सौंपे गए हैं-

  • जल संसाधन क्षेत्र में समग्र आयोजन, नीति निर्माण, समन्वय और मार्गदर्शन।
  • सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं (वृहद और मध्यम) का तकनीकी मार्गदर्शन, छानबीन, स्वीकृति और निगरानी।
  • क्षेत्रीय विकास के लिए सामान्य आधार तंत्रीय तकनीकी और अनुसंधान सहयोग।

अंतरराज्यीय जल विवादों तथा अंतरराज्यीय जल विवाद अधिनियम में प्रस्ताविक संशोधनों पर सरकारिया आयोग की सिफारिशें

आमतौर पर यह देखने में आया है कि अंतरराज्यीय मुद्दों का समाधान करने के लिए गठित न्यायाधिकरण निर्णय/पंचाट देने में काफी समय लगा देते हैं। सरकारिया आयोग ने इस मामले पर ध्यान दिया। सरकारिया आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अन्तरराज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित अध्याय XVIIमें निम्नानुसार सिफारिश की है-

  • जब अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956 का 33वां) के खंड 3 के अधीन किसी राज्य से कोई प्रार्थना-पत्र प्राप्त होता है तो केन्द्रीय सरकार के लिए विवाद उठाने वाले किसी भी राज्य से प्रार्थना -पत्र की प्राप्ति की तारीख के अधिक से अधिक एक वर्ष के भीतर एक न्यायाधिकरण की स्थापना करना जरूरी होगा। अन्तरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम को इस प्रयोजन के लिए समुचित रूप से संशोधित कर दिया जाए।
  • अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम को संशोधित करके केन्द्रीय सरकार को जरूरी होने पर अपने आप से एक न्यायाधिकरण स्थापित करने के लिए प्राधिकृत किया जाए जबकि केन्द्रीय सरकार इस बात से संतुष्ट हो कि इस तरह का विवाद वस्तुत: मौजूद है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर एक डाटा बैंक और सूचना प्रणाली होनी चाहिए और इस प्रयोजन के लिए शीघ्रातिशीघ्र एक उपयुक्त तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए। अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम में इस आशय का एक प्रावधान भी होना चाहिए कि राज्यों को आवश्यक डाटा देना पड़ेगा जिस प्रयोजन के लिए न्यायाधिकरण को एक न्यायालय के अधिकार दिए जा सकते हैंं
  • अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम को यह सुनिश्चित करने के लिए संशोधित किया जाए कि न्यायाधिकरण का पंचाट उसकी स्थापना की तारीख से पाँच वर्षों के भीतर प्रभावी होना चाहिए। तथापि यदि न्यायाधिकरण किन्हींं कारणों से ऐसा महसूस करता है कि पाँच वर्ष की अवधि बढ़ाई जानी चाहिए तो केन्द्रीय सरकार न्यायाधिकरण दव्ारा कहे जाने पर अवधि बढ़ा सकती है।
  • अन्तरराज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 को इस प्रकार संशोधित किया जाए कि न्यायाधिकरण के पंचाट में वही ताकत तथा उसके पीछे वही आदेश होना चाहिए जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के किसी आदेश अथवा डिक्री का होता है ताकि न्यायाधिकरण के पंचाट को वस्तुत: बाध्यकारी बनाया जा सके।

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