Public Administration: Financial Inclusion and Cooperatives in India

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

दुग्ध सहकारिता का प्रभाव (Impact of Milk Cooperatives)

  • विश्व बैंक के अध्ययन के अनुसार, दुग्ध अभियान और डेयरी प्रसार का एक नतीजा स्थानीय डेयरी सामान उत्पादन उद्योग के प्रसार के रूप में सामने आया। अब सिर्फ 7 प्रतिशत सामान आयात किया जाता है। इसमें पशुओं का भोजन, उनके स्वास्थ्य, कृत्रिम प्रजनन, प्रबंध सूचना सेवा, डेयरी इंजीनियरिंग और खाद्य तकनीक इत्यादि शामिल हैं। आधारभूत अवसंरचना और तकनीक के स्थानीय स्वरूप के कारण लागत मूल्य में भी भारी कमी आई, जिससे उत्पादकों दव्ारा दूध लाना-ले जाना, उसका हिसाब-किताब करना आसान हो गया है, और साथ ही लागत व्यय में अनावश्यक वृद्धि भी रोकना संभव हो पाया है।
  • दुग्ध अभियान के फलस्वरूप दुग्ध सहकारों का प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर या शिक्षा पर भी बढ़़ा है। इस आंदोलन के जरिये महिला शक्ति में वृद्धि की संभावना को देखते हुए ‘दूध की नदी अभियान’ के अंतर्गत ‘सेवा’ (सेल्फ एम्पलॉयड वीमन्स एसोसिएशन) जैसी -स्वैच्छिक संस्थाओं के सहयोग से लगभग 6 हजार महिला डेयरी सहकारी समितयों (WDCS) की स्थापना की गयी। इनमें सिर्फ महिलाएँ ही सदस्य होती हैं और प्रबंधन समितियों में भी सिर्फ वे ही होती हैं। ये समितियाँ आम तौर पर पुरुषों की समितियों से अधिक जवाबदेही से काम करती है। दूध से हो रही आय पर अधिकार के जरिये महिलाओं को अपना जीवन तय करने में अधिक आजादी मिलती है। साथ ही वे घर से बाहर निर्णयकारी प्रक्रिया में भाग ले पाती है और इस प्रकार उनकी प्रबंधन एवं नेतृत्वकारी क्षमताओं को विकसित होने का पूरा मौका मिलता है।
  • आनंद मॉडल का प्रसार केवल् दूध के क्षेत्र में ही नहीं हुआ। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की पहल पर फलों, सब्जियों, तिलहन उत्पादकों और नमक के छोटे उत्पादकों तथा पेड़ उगाने वाली सहकारी संस्थाएँ भी स्थापित की गयी। यह कैरा यूनियन ही थी जिसने इस काम में तकनीक और प्रशिक्षित व्यक्तियों के रूप में सहायता की। इसके दौरान निहित स्वार्थी, खासकर शक्तिशाली तेल बीज व्यापारियों के तीखे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। देश के कुछ भागों में सहकारों की स्थापना की कोशिश करने वाली एनडीडीबी टीम को शारीरिक क्षति पहुँचाने की धमकियाँ दी गयी। यहाँ तक कि कुछ कार्यकर्ता रहस्यमय ढंग से मृत पाये गये। फिर भी यह आंदोलन आगे बढ़ता रहा। देश के कई भागों में सहकारी फल, सब्जी केन्द्रों की दुकान उतनी ही सामान्य बात हो गयी जितना कि सहकारी दुग्ध केन्द्र। एनडीडीबी का ‘धारा ब्रांड’ तेल दूध के क्षेत्र में ‘अमूल’ के समान ही प्रसिद्ध हो गया।

भारत में वित्तीय समावेशन व सहकारिता (Financial Inclusion and Cooperatives in India)

  • भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, वित्तीय समावेशन से अभिप्राय अल्प आय तथा कमजोर वर्ग के उस बड़े समूह को जो सामान्य रूप से प्रचलित बैंकिंग प्रणाली सेवा तथा लाभ प्राप्त करने से वंचित है, वहनीय लागत (Affordable Cost) पर बैंकिंग सेवाएँ उपलब्ध कराना है। यह वह वर्ग है जो जागरूकता के अभाव या अनभिज्ञता के चलते या बैंकिंग सेवा की अनुपलब्धता के कारण या वर्तमान, बैंकिंग सेवा में प्रचलित जटिल तथा लंबी एवं समय लगने वाली औपचारिकताओं के कारण बैंकिंग सेवा से लाभान्वित नहीं हो पाता है और बाध्य होकर अपने गांव के साहूकार से अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए अत्यंत ही ऊँची ब्याज दर पर बिना किसी प्रत्याभूति या औपचारिकता के ऋण प्राप्त करता है।
  • इसलिए रिजर्व बैंक की दृष्टि में वित्तीय समावेशन का लक्षित वर्ग गरीब तथा कमजोर वर्ग है जिसमें श्रमिक, भूमिहीन, सीमांत किसान जो ग्रामीण क्षेत्र में रहता है या ऐसा श्रमिक जैसे रिक्शा चालक, जुलाहा या अन्य असंगठित मजदूर जिन्हें शहरों में अपनी जीविका के लिए परिश्रम करना पड़ता है, आते हैं। वस्तुत: वित्तीय समावेशन विकास की एक आवश्यक कड़ी है।
  • हाल के समय में भारत में सूक्ष्म वित्त सेवाओं की आपूर्ति (Delivery of Micro-Finance Services) के प्रभावी उपकरण के रूाप् में स्वयं सहायता समूहों की सक्रियता बढ़ी है। भारत में ग्रामीण निर्धनता का एक प्रमुख कारण ग्रामीणों की साख (Credit) व वित्तीय सेवाओं तक पहुँच का न होना है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (NSSO) के 59वें दौर के सर्वेक्षण में स्पष्ट किया गया है कि 51 प्रतिशत कृषक परिवारों (Farmer Households) की संस्थागत अथवा गैर-संस्थागत दोनों ही स्त्रोतों के माध्यम से भी सूक्ष्म साख (Micro Credit) तक पहुँच नहीं है। 73 प्रतिशत परिवारों के पास किसी वित्तीय संस्थान से कोई साख संपर्क (Credit Link) नहीं है। उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों में तो स्थितियाँ और भी गंभीर रही हैं। उत्तर-पूर्वी राज्यों में वित्तीय सेवाओं के विस्तार पर सुझाव देने के लिए वर्ष 2006 में ऊषा थोराट समिति का गठन किया था।

इस समिति की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत्‌ हैं-

  • इन क्षेत्रों में वाणिज्यिक बैंकों की नयी शाखाएँ खोलना और विद्यमान इकाइयों (Existing Units) में खातों की संख्या में वृद्धि करना।
  • वाणिज्यिक बैंकों तक पहुँच में वृद्धि के लिए बिजनेस करेसपॉन्डेट (Business Correspondent) अथवा फेसिलिटेटर मॉडल को अपनाना।
  • सूचना प्रौद्योगिकी का व्यापक प्रयोग और मुद्रा प्रबंधन (Currency Management) एवं विदेशी विनिमय सुविधा की उपलब्धता में सुधार करना।
  • बैंको के माध्यम से बीमा व पूंजी बाजार उत्पादों को उपलब्ध कराना।
  • इलेक्ट्रॉनिक क्लियरिंग और रियलटाइम ग्रास सेटेलमेंट सिस्टम की शुरूआत करना।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को मजबूती देना।
  • स्थापित व प्रभावी स्वयं सहायता समूहों को सहकारी समितियों के रूप में बदलना।

रंगराजन समिति (Rangrajan Committee)

  • वर्ष 2007 में ‘भारत में वित्तीय समावेशन’ पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करने के लिए सी. रंगराजन समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहराई से अध्ययन किया। समिति ने पिछड़े व सुदूरवर्ती क्षेत्रों (Remote Areas) में बैंकिंग एवं स्वयं सहायता समूहों का सशक्तीकरण तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को पुर्नजीवित करने पर गहराई से विचार किया। इस समिति ने साख तक पहुँच (Credit Access) के मामले में व्यापक अंतक्षेत्रीय व अंतराक्षेत्रीय विषमताओं की पहचान की। रंगराजन समिति ने विभिन्न क्षेत्रों में ऋणग्रस्तता (Indebtedness) के स्तर का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि उत्तर-पूर्वी, पूर्वी व मध्य भारतीय क्षेत्रों में 80 प्रतिशत से अधिक किसान परिवारों की औपचारिक स्त्रोतों से साख (Credit) तक पहुँच नहीं है जिसके चलते अनौपचारिक स्त्रोतों (महाजन, साहूकार आदि) पर निर्भरता बढ़ती है और व्यक्ति ऋणग्रस्तता के जाल में उलझते चले जाते हैं। दक्षिण भारतीय राज्यों में स्थिति उत्तर-पूर्वी, पूर्वी व मध्य क्षेत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत ठीक है। दक्षिणी क्षेत्रों में बैंकिंग व्यवहारों का विस्तार हुआ है।
  • रंगराजन समिति ने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) की ही तर्ज पर ‘संयुक्त दायित्व समूह’ (Jointly Liability Groups) के गठन की सिफारिश की, जिसमें फसल बटायीदार, काश्तकार कृषक और पट्‌टेदार शामिल होंगे। इसके सदस्यों की संख्या 12 - 15 के मध्य होगी। इसमें लघु तथा सीमांत किसान अपनी भूमि-धारिता को इसके पास जमा करके उर्वरकों का क्रय कर सकते हैं।
  • रंगराजन समिति ने राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन मिशन के गठन की सिफारिश की। भारतीय रिजर्व बैंक तथा केन्द्र व राज्य सरकारें इस मिशन की अंग होगी। समिति ने यह भी सुझाव दिया कि, वाणिज्यिक तथा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को प्रतिवर्ष कम से कम 250 नये कृषकों तथा गैर-कृषक परिवारों को शामिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। समिति ने ‘वित्तीय समावेशन संवर्द्धन और विकास कोष’ तथा ‘वित्तीय समावेशन तकनीकी कोष’ स्थापित करने की सिफारिश की। समिति ने यह भी सुझाव दिया कि नाबार्ड एक्ट में ऐसा परिवर्तन किया जाना चाहिए, जिससे शहरी निर्धनों (Urban Poors) को भी सूक्ष्म वित्त सेवाएँ उपलब्ध हो सकें।
  • उल्लेखनीय है कि रंगराजन समिति ने अपने अध्ययन में यह पाया था कि देश के 17 राज्यों व संघ शासित प्रदेश के 256 जिलों (कुल 617 जिलों में से) में गंभीर साख बहिष्करण (Acute Credit Exclusion) 95 प्रतिशत से अधिक क्रेडिट असंतुलनों के साथ विद्यमान है। अत: इसे दूर करने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास करने होंगे। समिति ने कहा है कि देश में वित्तीय बहिष्करण (Financial Exclusion) के होने के 4 प्रमुख कारण विद्यमान रहे हैं-
    • आनुषंगिक (Collateral) सुरक्षा प्रदान करने में अक्षमता।
    • दुर्बल साख, अवशोषण क्षमता (Poor Credit Absorption Capacity)
    • संस्थाओं तक अपर्याप्त पहुँच।
    • कमज़ोर सामुदायिक नेटवर्क।
  • मानव विकास के संकेतकों की दृष्टि से और मानव विकास सूचकांक में बेहतर स्थान होने के लिए वित्तीय समावेशन की सही दशा व दिशा होनी आवश्यक है। वित्तीय समावेशन की प्रक्रिया मानव संसाधन के विकास स्थायी परिसंपतियों को बढ़ावा देती है। एक लोक कल्याणकारी व समाजवादी समाज के प्रतिरूप वाले राष्ट्र भारत में वित्तीय समावेशन एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।

स्व- विनियामक प्राधिकरण (Self-Regulatory Authorities)

किसी व्यवसाय के स्व- विनियामक प्राधिकरण से आशय इसके सदस्यों के एक चयनित निकाय से है, जो समाज व राज्य के प्रति जिम्मेदारी के भाव के साथ उस व्यवसाय की वृद्धि एवं विकास के लिए जवाबदेह होता है। ऐसे स्व- विनियामक प्राधिकरण/निकाय के प्रकार्यों मेंं शामिल होने वाले विषय हैं: पेशेवर शिक्षा (Professional Education) के मुद्दे, पाठयक्रम अध्यापन मानक (Teaching Standards) , संस्थागत अवसंरचना (Institutional Infrastructure) , डिग्रियों की मान्यता, प्रक्टिशनर्स का नैतिक आचरण आदि।

देश में चिकित्सा व्यावसायियों वकील, चार्टर्ड अकाउन्टेन्टस, इंजीनियर व अन्य व्यावसायों के लोग स्व- विनियामक निकायों में कार्य करके राष्ट्र की उन्नति में योगदान करते हैं। वर्तमान में 6 प्रमुख पेशेवर निकाय इस रूप में विशेष कानूनों के तहत गठित किये गये हैं-

  • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के अंतर्गत गठित किया गया ‘बार काउन्सिल ऑफ इंडिया’ ।
  • भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत गठित ′ मेडिकल काउन्सिल ऑफ इंडिया।
  • चार्टर्ड अकाउन्टेन्टस अधिनिम, 1949 के अंतर्गत गठित ‘इंस्टीट्‌यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउन्टेन्ट्‌स ऑफ इंडिया’ (ICAI)
  • कॉस्ट एंड वर्क अकाउन्टेन्ट्‌स एक्ट, 1959 के अंतर्गत गठित ‘इंस्टीट्‌यूट ऑफ कॉस्ट एंड वर्क्स अकाउन्टेन्ट्‌स ऑफ इंडिया’ (ICWI) ।
  • कंपनी सेक्रेटरीज अधिनियम, 1980 के अंतर्गत गठित ‘इंस्टीट्‌यूट ऑफ कंपनी सेक्रेटरीज ऑफ इंडिया’ (ICSI) ।
  • आर्किटेक्ट एक्ट, 1972 के अंतर्गत गठित काउन्सिल ऑफ आर्किटेक्चर।

श्रमिक संघ (Trade Unions)

  • ट्रेड यूनियन एक्ट, 1926 के अनुसार एक ट्रेड यूनियन श्रमिकों व नियोक्ताओं के मध्य श्रमिक, श्रमिक के मध्य और नियोक्ता-नियोक्ता के मध्य संबंधों का विनियमन करने के उद्देश्य से गठित किया जाने वाला निकाय है, फिर चाहे वह स्थायी प्रकृति का हो अथवा अस्थायी। यह संगठन किसी व्यापार अथवा वाणिज्य के आचरण पर प्रतिबंधात्मक दशाओं को आरोपित करने के लिए गठित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि मजदूर संगठन/अधिनियम, 1926 मजदूर संगठनों को विधिक अस्तित्व (Legal Existence) प्रदान करता है। किसी भी मजदूर संगठन को इस अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत किया जा सकता है।
  • मजदूर संगठनों के लिए बने मूल अधिनियम में प्रावधान है कि एक ट्रेड यूनियन के 7 या अधिक सदस्य मजदूर संगठन अधिनियम, 1926 के अंतर्गत पंजीकरण के लिए आवेदन करने के योग्य हैं। 2001 में पंजीकरण हेतु आवेदन की इस शर्त में संशोधन किया गया, जिसमें कहा गया कि कोई भी श्रमिक ट्रेड यूनियन तब तक पंजीकृत नहीं किया जाएगा जब तक आवेदन करने वाले कम से कम 10 प्रतिशत अथवा 100 श्रमिक उस ट्रेड यूनियन के सदस्य न हो।
  • मजदूर संगठन अधिनियम, 1926 के प्रावधानों का उल्लंघन करने दंडात्मक कदम उठाने और पंजीकरण का सर्टिफिकेट वापस लेने अथवा उसे निरस्त करने का प्रावधान किया गया हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी ट्रेड यूनियन के उद्देश्यों को पूरा करने हेतु पदधारकों (Office Bearers) और सदस्यों को आपराधिक व सिविल दायित्वों (Criminal and Civil Liabilities) से उन्मुक्ति (Immunity) प्रदान की गई है।

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