Public Administration: Efforts Towards Developing Universal Free Health Coverage System in India

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

भारत में सर्वव्यापी नि: शुल्क स्वास्थ्य कवरेज सिस्टम विकसित करने की दिशा में प्रयास (Efforts Towards Developing Universal Free Health Coverage System in India)

सर्वव्यापी स्वास्थ्य, उचित मूल्य पर आवश्यक दवाइयों व इलाज का प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँच संभव बनाने हेतु 12वीं पंचवर्षीय योजना में ग्रामीण व शहरी दोनों इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के विस्तार और सुदृढ़ीकरण के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य का प्रावधान किया गया है। प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य और संक्रामक एवं असंक्रामक रोग नियंत्रण जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी कार्यों में भी सर्वव्यापी कवरेज (Universal Coverage) की कुछ विशेषताएँ हैं। स्वास्थ्य संबंधी इन कार्यों में उठाये गये निम्न कदम शामिल हैं-

  • नि: शुल्क मातृत्व स्वास्थ्य सेवा जिसमें जन्म पूर्व जाँच, आयरन-फॉलिक एसिड पूरक प्रदान कराना, जन्म पश्चात्‌ देखभाल तथा सुरक्षित गर्भपात सेवाएं शामिल हैं। हाल ही में प्रारंभ किये गये ‘जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में भी नि: शुल्क प्रसव माता को कार से लाने तथा ले जाने की सुविधा, नि: शुल्क आहार, दवाईयाँ, खाने की अन्य वस्तुएँ और रक्त की जाँच की गारंटी दी गई है। इसी प्रकार की सुविधाएँ नवजात शिशु के लिए भी है।
  • सर्वव्यापी रोग प्रतिरोधक कार्यक्रम में 7 बीमारियों के लिए नि: शुल्क टीकाकरण तथा गर्भवती महिलाओं के लिए नि: शुल्क टीकाकरण की सुविधा दी गई।
  • नि: शुल्क बाल स्वास्थ्य सेवा, जिसमें घर पर जन्में नवजात की देखभाल, चिकित्सालय में जन्में बालक की देखभाल, पोषण संबंधी देखभाल, ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट (ORS) तथा जिंक की आपूर्ति के साथ डायरिया का इलाज तथा एण्टीबायोटिक दवाओं की आपूर्ति के साथ निमोनिया का इलाज शामिल हैं। हाल ही में शुरू किये गये राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम में बाल स्वास्थ्य जाँच तथा आरंभिक देखभाल सेवा भी शामिल हैं।
  • संक्रामक रोग नियंत्रण, जिसमें मलेरिया, कालाजार, डेंगू, जापानी इनसेफलाइटिस एवं चिकनगुनिया, टीबी तथा कुष्ठ रोग शामिल हैं। असंक्रामक रोग नियंत्रण, जिसमें दृष्टिहीनता से बचाव के लिए नि: शुल्क कैटारेक्ट शल्य क्रिया, नि: शुल्क कार्निया प्रत्यारोपण, ग्लूकोमा, मधुमेह, रिटेनापैथी तथा बच्चों को नि: शुल्क एनक उपलब्ध कराना शामिल हैं।
  • किशोरावस्था सेवा में किशोरों की सुविधाओं के लिए किशोर प्रजनन एवं यौन स्वास्थ्य क्लिनिक तथा डब्ल्यूआईएफएस (साप्ताहिक आयरन फालिक एसिड पूरक डीवार्मिंग दवाईयों) का प्रबंध किया गया है।
  • परिवार नियोजन कार्यक्रमों में नि: शुल्क जानकरी उपलब्ध कराना, गर्भनिरोधक तथा परिवार नियोजन के अन्य साधनों को उपलब्ध कराना शामिल है।

शिशु मृत्यु दर के संदर्भ में भारत की स्थिति (India՚S Position in Terms of Infant Mortality Rate)

  • भारत में शिशु मृत्यु दर के बारे में सर्वेक्षण व अनुसंधान होते रहे हैंं। इसी क्रम में सेंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे 2011 के अंतर्गत भारत में शिशु मृत्यु दर की राज्यवार स्थितियों का उल्लेख किया गया है। इस सर्वे के अनुसार भारत में मध्य प्रदेश में शिशु -माता मृत्यु दर सर्वाधिक है। मध्य प्रदेश में 100 में से 32 नवजात शिशुओं की औसत मृत्यु होती है। इसके बाद उत्तर प्रदेश में (3) स्थिति गंभीर है। सर्वे के अनुसार, केरल में शिशु मृत्यु दर में तेजी से कमी हुई है। साथ ही तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र में यह दर 24 रह गई है। सर्वे में माना गया है कि भारत में पैदा होने वाले सभी बच्चे जीवित बचने की समान संभावनाएँ नहीं रखते। इस दृष्टि से शिशु मृत्यु दर बढ़ना एक गंभीर खतरा है।
  • सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े परिवारों में जन्म लेने वाले शिशुओं की मौत का सबसे ज्यादा खतरा रहता है। गरीब परिवारों में पैदा होने वाले शिशुओं की मृत्यु की अधिक संभावना के कारणों में दूषित वातावरण, कुपोषण, जरूरी दवाओं की कमी और आवश्यक सुविधाओं का अभाव आदि शामिल है।

शिशु मृत्यु दर मेें विभेद स्तर (Differentiation Level in Infant Mortality Rate)

भारत में शिशु मृत्यु दर के संदर्भ में कई स्तरों पर विभिन्नताएँ पायी जाती है। इन्हें निम्नांकित पाँच स्तरों पर समझा जा सकता है-

  • अंतरराज्यीय विषमता: नवाजात शिशु मृत्यु दर में सर्वाधिक क्षेत्रीय असमानता बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान में पायी जाती है।
  • शहरी और ग्रामीण विषमता: नवजात शिशुओं में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के मुताबिक भारी विषमता विद्यमान है। शहरी क्षेत्रों में नवजात शिशु मृत्यु दर ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा कम है, लेकिन शहरी गरीबों में हालात ग्रामीण क्षेत्रों से भी खराब है।
  • शिक्षा के स्तर पर: नवजात शिशु मृत्यु दर में माता के शैक्षिक स्तर से विषमता के संकेत मिले हैं। अशिक्षित माता के गर्भ से पैदा होने वाले शिशुओं की शिक्षित माता के गर्भ से पैदा होने वाले शिशुओं की अपेक्षा मृत्यु की अधिक संभावना रहती है।
  • माता की आयु के आधार पर: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार, नवजात शिशुओं की मृत्यु का सीधा संबंध माता की उम्र से है। जितनी कम उम्र की मां होगी उसके शिशु के मरने की संभावनाएँ उतनी ही अधिक होगी।
  • जातीय विषमता: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों में पैदा होने वाले शिशुओं में अन्य जातियों के शिशुओं की अपेक्षा अधिक मृत्यु दर पायी जाती है।

उल्लेखनीय है कि भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त कार्यालय दव्ारा 7 जुलाई, 2011 को वर्ष 2007 - 09 के लिए मातृत्व मृत्यु दर अनुपात पर सेंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे बुलेटिन और वर्ष 2009 के लिए एसआरएस पर वार्षिक सांख्यिकीय रिपोर्ट जारी की गई थ्ी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि मातृत्व मृत्यु दर 2004 - 06 की तुलना में 2007 - 09 के दौरान 254 से घटकर 212 हो गयी है। अर्थात प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर मृत माताओं की संख्या 212 हो गयी है। यह एक संतोषजनक स्तर कहा जा सकता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में मातृत्व मृत्यु अनुपात में वर्ष 1990 और 2015 के मध्य तीन-चौथाई कमी लाना शामिल है तथा भारत के लिए वर्ष 2015 तक इसे 109 तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। भारत के संदर्भ में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत रखे गये मातृत्व मृत्यु दर के लक्ष्य को 2007 - 09 की अवधि में तीन राज्यों केरल (81) , तमिलनाडु (97) व महाराष्ट्र (104) ने प्राप्त कर लिया है। उल्लेखनीय है कि केरल ने इस लक्ष्य को 2004 - 06 की अवधि में ही प्राप्त कर लिया था।

  • संयुक्त राष्ट्र के ‘बाल मृत्यु के आकलन हेतु अंत: अभिकरण समूह’ दव्ारा वैश्विक, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तरों पर बाल मृत्यु की नवीनतम स्थिति संबंधी रिपोर्ट, 2011
  • वैश्विक स्तर पर 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर को 1990 के स्तर से 2015 तक दो-तिहाई कम करना (प्रति 1000 जीवित जन्म पर 29 तक लाना) संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों (MDGs) में चौथे लक्ष्य के रूप में शामिल है। इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र के ‘बाल मृत्यु के आकलन हेतु अंत: अभिकरण समूह’ (Inter-agency Group for Child Mortality) दव्ारा वैश्विक, राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तरों पर बाल मृत्यु की नवीनतम स्थिति संबंधी रिपोर्ट, 2011: बाल मृत्यु में स्तर एवं प्रवृत्तियां सितंबर 2011 से जारी की गई।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य 4 (MDG 4) की दिशा में कुल मिलाकर अब तक महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
  • इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व स्तर पर 5 वर्ष से कम आयु के मृत्यु प्राप्त बच्चों की संख्या 1990 के 12 मिलियन से घटकर 2010 में 7.6 मिलियन आ गई है।
  • संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बाल मृत्यु की सर्वाधिक दर उप-सहारा अफ्रीका में है जहाँ प्रत्येक 8 में से 1 बच्चा 5 वर्ष की आयु से पूर्व मौत का शिकार हो जाता है। दक्षिण एशिया में यह अनुपात 15 पर 1 है। विश्व की कुल बाल मृत्यु दर में से लगभग आधा पाँच देशों-भारत, नाइजीरिया, कांगो प्रजातांत्रिक गणराज्य, पाकिस्तान तथा चीन में घटित होता है। भारत 22 प्रतिशत व नाइजीरिया 11 प्रतिशत के साथ वैश्विक स्तर पर समस्त बाल मृत्यु के एक तिहाई के लिए जिम्मेदार है। इसका प्रमुख कारण इन देशों में कुपोषण का अत्यंत ऊँचा स्तर होना है, जिसमें बालकों में उत्तरजीविता की क्षमता (Survival Capacity) पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाती।

भारत में स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में प्रारंभ की गयी नवीनतम कार्यक्रम व योजनाएँ (Latest Programs and Schemes Launched in India Towards Health Protection)

स्वास्थ्य मानव विकास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकेतको में से एक है। भारत में स्वास्थ्य संरक्षण का प्रयास सामाजिक सुरक्षा उद्देश्यों के साथ मानव संसाधन विकास की रणनीति का अभिन्न हिस्सा है। भारतीय संविधान में कई अनुच्छेदों में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकों के स्वास्थ्य देखरेख व संरक्षण की अपेक्षा की गयी है। इन्हीं संदर्भों को ध्यान में रखकर भारत में हाल के समय में कुछ महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संरक्षण कार्यक्रम व योजनाएंँ शुरू की गयी हैं, जो विभिन्न वर्गों व समुदायों पर ध्यान केन्द्रित करती हैं। इनमें से कुछ प्रमुख निम्नवत्‌ हैं-

वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य की देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Program for Health Care of Senior Citizens)

  • स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय दव्ारा वरिष्ठ नागरिक के स्वास्थ्य की देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (National Programme for the Health Care of the Elderly) 4 अप्रैल, 2013 को प्रारंभ किया गया। इस कार्यक्रम का उद्देश्य 12वीं पंचवर्षीय योजना में बुजुर्गों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करना हैं। माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक अनुरंक्षण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के अंतर्गत बुजुर्गो की देखभाल की जिम्मेदारी निभाना राज्यों का दायित्व है। इस उद्देश्य से यह कार्यक्रम शुरू किया गया है।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों को उपचारात्मक निवारक और पुनर्वास सुविधा उपलब्ध कराना है। इसके अन्य उद्देश्य हैं रेफरल प्रणाली को मजबूत करने के लिए श्रम शक्ति को विकसित करना एवं पुराने उम्र से संबंधित रोगों के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वरिष्ठ नागरिकों को कई स्तरों पर अलग से और विशेष प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएंँ प्रदान की जानी है। इसके अंतर्गत देश के विभिन्न भागों में 30 बिस्तरों वाले क्षेत्रीय जरा रोग केन्द्रों की स्थापना का निर्णय लिया गया है।
  • 21 राज्यों के 100 जिलों में केन्द्रीय स्वास्थ्य केन्द्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (PHC) में इसके उपकेन्द्र खोले जायेंगे। इस कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है और भविष्य में इसे पूरे देश में लागू किया जाएगा। इस कार्य के अंतर्गत 12वीं पंचवर्षीय योजना अवधि में देश के विभिन्न भागों में 12 अतिरिक्त जरा रोग केन्द्र खोले जाने का प्रस्ताव है। ऐसेे 5 केन्द्रों ने सेवा देना प्रारंभ कर दिया है। इस योजना का प्रारंभ 21 राज्यों के 30 जिलों में किया गया था। इस कार्यक्रम की मुख्य रणनीतियाँ निम्नवत हैं-
    • निवारक एवं प्रोत्साहक देखभाल।
    • बीमारियों का प्रबंधन।
    • वृद्धावस्था सेवाओं के लिए जनशक्ति का विकास।
    • चिकित्सकीय पुनर्वास एवं चिकित्सकीय साधनों की उपलब्धता।
    • सूचना, शिक्षा एवं संचार।

इस प्रकार यह कार्यक्रम वरिष्ठ नागरिकों के शारीरिक व मानसिक पुनर्वास के माध्यम से सामाजिक बहिष्करण के दंश से बचाने हेतु शुरू किया गया है।

राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (National Urban Health Mission)

  • शहरी जनसंख्या एवं विशेष रूप से शहरी निर्धनों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ व सेवाएं उपलब्ध कराने के लक्ष्य के साथ केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ‘राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन’ (National Urban Health Mission) प्रारंभ करेगा। यह उप-मिशन ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन’ के अंतर्गत होगा, जिसे 12वीं पंचचर्षीय योजना में प्रारंभ किया जाना है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन की योजना प्रस्ताव 11वीं पंचवर्षीय योजना में किया गया था, जिसके लिए 4500 करोड़ रुपये की योजना राशि निर्धारित की गयी थी। व्यय वित्त समिति ने 12 सितंबर, 2008 की बैंठक में इस योजना को मंजूरी दे दी थी। लेकिन यह योजना शुरू नहीं हो पायी थी।
  • प्रस्तावित राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन का उद्देश्य शहरी लोगों और विशेष रूप से मलिन बस्तियों में रहने वाले तथा अन्य कमजोर वर्ग के लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराना है। इस योजना को शहरी स्थानीय निकायों के सक्रिय सहयोग से चलाया जाना। इस योजना को पचास हजार और इससे अधिक आबादी वाले 7 महानगरों सहित 779 शहरों और कस्बों में चलाया जाएगा। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के बारे में 9 अक्टूबर 2012 को वित्त सचिव की अध्यक्षता में व्यय वित्त समिति की बैठक में चर्चा हुई थी। समिति ने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी के लिए प्रस्ताव की सिफारिश की, जिसके लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना मेें 22 हजार करोड़ रुपये की राशि रखी जाएगी, जिसमें केन्द्र सरकार का हिस्सा लगभग 17 हजार करोड़ रुपये होगा।
  • योजना आयोग ने 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012 - 17) के दौरान राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के लिए 15 हजार करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है, लेकिन मंत्रालय ने 12वीं योजना में इसके लिए लगभग 17 हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव किया। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ की तर्ज पर प्रारंभ किया जाएगा। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन वर्ष 2005 में 7 वर्षो के लिए आरंभ किया गया था जिसकी अवधि वर्ष 2012 में समाप्त हो रही थी, परन्तु इसे 5वर्ष का अतिरिक्त विस्तार दिया गया। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत शिशु एवं मातृ मृत्यु दर में कमी आई है और अस्पतालों में प्रसव का चलन बढ़ा है। हालाँकि सस्ती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। शहरी स्वास्थ्य अवसरंचना के विकास के लिए एकीकृत नीति नियोजन समय की मांग है।

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