Public Administration: Strategy of Health Infrastructure Development

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

12 वीं पंचवर्षीय योजना में स्वास्थ्य अवसरंचना विकास की रणननीति (Strategy of Health Infrastructure Development in 12th Five Year Plan)

  • 12वीं पंचवर्षीय योजना का उद्देश्य सभी स्वास्थ्य सुविधा केन्द्रों (उपकेन्द्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों, जिला अस्पतालों, रेफरल अस्पतलों एवं मेडिकल कॉलेजो) को कंप्यूटरीकृत एवं उनको आपस में जोड़ना तथा नये इंटरफेस सृजित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करना भी होना चाहिए। रोग के बारे मेंं सही सूचना के अभाव और संकाम्रक रोगों के प्रकोप की जानकारी के मद्देनजर शुरूआती चेतावनी की विफलता को सुधारने के लिए ठोस निगरानी प्रणालियांँ सृजित करने एवं उसे बनाये रखने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जा सकता है।
  • स्वास्थ्य अवसंरचना के संदर्भ में स्थिति का मूल्यांकन इस बात से किया जा सकता है कि एकीकृत रोग निगरानी प्रणाली ने पूर्णतया सेवा प्रदान नहीं की है तथा असंचारी रोगों की निगरानी अभी ही शुरू हुई है।
  • 12वीं योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में कहा गया है कि जिला स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूती दिये जाने की आवश्यकता है, साथ ही संक्रामक रोगों तथा असंचारी रोगों के जोखिम कारकों के लिए भरोसेमंद एवं सही रिपोर्टिंग नेटवर्क विकसित करने के लिए गैर सरकारी संगठनों के स्वास्थ्य परिचर्या प्रदायकों के साथ लिंक स्थापित किया जाना चाहिए। ऐसा नेटवर्क विकसित करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि ऐसी सूचना के बीना नीति एवं कार्यक्रम योजना कमज़ोर पड़ जायेगी एवं प्रभाव मूल्यांकन करना कठिन हो जाएगा। इस प्रकार निगरानी एवं मूल्यांकन के लिए “ठोस स्वास्थ्य सूचना प्रणाली” निर्मित करना आवश्यक है।
  • 12वीं पंचवषीर्य योजना के अंत तक ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य प्रदान करने की व्यवस्था के लिए आवश्यक बुनियादी अवसंरचना को पूरा करना आवश्यक है। इसके लिए मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ केंद्रो एवं समूदायक स्वास्थ्य को आइपीएचएस मानकों के अनुरूप उन्नत करने, प्रसव कक्ष एवं ऑपरेशन थियेटर बनाने, (जो कि मातृ मृत्यु को कम करने के लिए आवश्यक है) और नए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निर्मित करने सहित अवसंरचना विकास के लिए राज्यों हेतु पर्याप्त योजनागत सहायता की आवश्यकता होगी। प्रखण्ड एवं जिला स्तरों पर सरकारी नैदानिक सेवाओं को सुदृढ़ किया जाना होगा। इसके लिए न केवल संरचना को उन्नत करना आवश्यक होगा बल्कि पर्याप्त मानव संसाधन सहायता एवं सुविकसित सेवा प्रदानगी प्रोटोकोल भी आवश्यक होगा।
  • 12वीं योजना में इस बात पर जोर दिया गया है कि राज्यों में औषद संग्रह एवं भंडारण, चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन, निगरानी एवं कोल्ड चेन प्रबंधन जैसी अनुषंगी सेवाओं के लिए अवसंरचना के अभाव की स्थिति को दूर करना है। नए मेडिकल एवं नर्सिंग कॉलेजों की वरियता प्राप्त अल्प सेवित राज्यों एवं जिलों में जिला अस्पताल से जोड़ा जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि 25 लाख एवं इससे अधिक जनसंख्या वाले जिलों में ऐसे कॉलेजों की स्थापना के लिए प्राथमिकता दी जाएगी। बशर्तें की उस समय वहाँ उनका अभाव हो। 12वीं योजना में स्वास्थ्य मूद्दों के लिए स्थानीय रूप से उपयुक्त निराकरण पाने के लिए अनुसंधान का वित्त पोषण करना चाहिए।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्दिकोण प्रपत्र में इस बात की सिफारिश की गयी है कि विस्तृत उपकेन्द्रों एवं पूर्णतया कार्यशील प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों के नेटवर्क को एक प्रणाली के रूप में प्रभावी बनाये जाने की जरूरत है और यह तभी होगा जब रेफर किये गये रोगियों को ले जाने-लाने के लिए त्वरित सेवाएंँ उपलब्ध हों। मौजूदा 1084 सचल चिकित्सा यूनिटों को बढ़ाकर इसे प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में उपलब्ध कराया जाएगा। सचल चिकित्सा यूनिटों को कतिपय क्षेत्रों को भी समर्पित किया जा सकता हैं जहाँ घूमंतु लोगों की संख्या काफी है। यह सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है कि प्रत्येक सचल चिकित्सा यूनिट में आवश्यक आपाताकालीन उपकरण, औषध बुनियादी नैदानिक उपकरण एवं प्रशिक्षण पैरामेडिक हैं। सचल चिकित्सा यूनिटों में फायर-ब्रिगेड प्रभाग को हस्तांतरित करने (जैसा कि कई विकसित राष्ट्रों में चलन है) की संभावना का पता लगाया जाएगा।

भारत में परिवार नियोजन: नीति का कार्यक्रम (Family Planning Policy Program in India)

  • भारत में विश्व में प्रथम देश है जिसने परिवार नियोजन को सरकारी नीति के रूप स्वीकार किया। वर्ष 1951 से पूर्व भारत में जनसंख्या को एक समस्या के रूप में नहीं देखा गया। संभवत: इसके पूर्व यह माना गया कि जनसंख्या की वृद्धि कोई अहित नहीं करती परन्तु 1951 में भारत सरकार ने जनसंख्या की वृद्धि को गंभीरता से लिया तथा पहली बार 1952 में ‘राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम’ शुरू किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य जन्मदर को उस सीमा तक कम करना था, जिससे जनसंख्या को अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के अनुरूप स्तर पर स्थापित किया जा सके।
  • 1961 की जनगणना रिपोर्ट के पूर्व परिवार नियोजन कार्यक्रम को बहुत छोटे पैमाने पर लिया गया था। इसके संबंध में क्लीनिकल दृष्दिकोण अपनाया गया था। इसमें प्रजनन तथा जनांकिकीय के क्षेत्र में अनुसंधान पर बल दिया गया था।
  • इसके अंतर्गत राज्य स्तर तथा केन्द्रीय स्तर पर क्लिनिकल सेवा प्रदान कराने वाले संगठनों को स्थापित करने पर बल दिया गया, परन्तु प्रथम योजना में ‘रिदेम प्रत्यागम’ प्रयोग में आया। 1961 की जनगणना के बाद जिसमें जनसंख्या की वृद्धि प्रत्याशित वृद्धि से बहुत अधिक थी। जनसंख्या की समस्या के समाधान के लिए ‘क्लीनिकल प्रत्यागम के साथ प्रसार सेवा’ को जोड़ दिया गया।
  • तीसरी पंचवर्षीय योजना में यांत्रिक उपागम (Mechanical Approach) अपनाया गया। 1961 - 62 में परिवार नियोजन को एक नया स्वरूप प्रदान किया गया। इसे परिवार के संपूर्ण कल्याण के साथ जोड़ दिया गया और यह परिवार नियोजन से हटकर ‘परिवार कल्याण नियोजन कार्यक्रम’ (Family Welfare Planning Programme) बन गया। 1966 में परिवार नियोजन विभाग सृजित किया गया। इस विभाग ने स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन और शहरी विकास मंत्रालय में कार्य करना शुरू किया।
  • चूंकि परिवार नियोजन ऐच्छिक था तथा इसमें स्वीकार गर्भनिरोधक की किसी विधि को चुना जा सकता था, इसलिए इसे ‘कैफ्टेरिया प्रत्यागम’ कहा गया, जिसका प्रयोग चौथी पंचवर्षीय योजना में किया गया। काहिरा में हुए इंटरनेशनल कान्फ्रेंस ऑन पापुलेशन डेवलपमेंट तथा बीजिंग में हुए इंटरनेशनल वीमेन्स कान्फ्रेंस में भारत एक हस्ताक्षरकर्ता था, इसलिए यह आवश्यक था कि भारत अपने परिवार नियोजन कार्यक्रम में परिवर्तन लाये।
  • इसलिए 15 अक्टूबर, 1997 को भारत सरकार ने प्रजनन व बाल स्वास्थ्य कार्य (Reproductive and Child Health Programme-RCH) शुरू किया जो 9वीं पंचवर्षीय योजना का प्रमुख कार्यक्रम बना। इस कार्यक्रम में जनसंख्या की समस्या को हल करने के लिए अलग सोच विकसित की गयी, जिसमें परिवार नियोजन सेवाओं को प्रजनन स्वास्थ्य के संदर्भ में अलग से देखा गया।
  • 8वीं योजना में जनसंख्या नियंत्रण के संबंध में ‘विकेंद्रित नियोजन तथा नियंत्रण’ की नीति अपनायी गयी। इसके कारण विशिष्ट क्षेत्र की समस्याओं के अनुरूप क्षेत्रानुसार रणनीति के लाभ प्राप्त होने की आशा प्रकट की गयी।

भारती की नयी जनसंख्या नीति, 2000 (New Population Policy of India, 2000)

  • भारत सरकार दव्ारा जनसंख्या नियंत्रण व जनांकिकीय प्रबंधन की आवश्यकता महसूस करते हुए 15 फरवरी, 2000 को नयी जनसंख्या नीति की घोषणा की। इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि 2045 तक जनसंख्या में स्थिरता की स्थिति प्राप्त कर ली जाएगी। उत्तर एवं मध्य भारत की बड़ी जनसंख्या वाले राज्यों में सकल प्रजनन दर (TFR) के लक्ष्य 2.1 प्राप्त करने की दिशा में धीमी प्रगति होने के कारण जो वर्तमान में 2.8 बनी हुई है, स्थिर जनसंख्या की प्राप्ति के लक्ष्य को बढ़ाकर 2070 कर दिया है।
  • नयी जनसंख्या नीति का तात्कालिक उद्देश्य निरोधीकरण, स्वास्थ्य रक्षा अवस्थापना (Health Care Infrastructure) समन्वित प्रसूति सेवा (Integrated Delivery Service) , स्वास्थ्य कर्मियों आदि के संदर्भ में पिछली जनसंख्या नीति के अप्राप्त उद्देश्यों को प्राप्त करना होगा। जनसंख्या नीति का मध्यकालीन उद्देश्य अन्त: क्षेत्रीय रणनीति का परिश्रम के साथ क्रियान्वयन है जिससे कुल प्रजनन दरों को 2010 तक प्रति दंपत्ति 2 संतान के प्रतिस्थापन स्तर (Replacement Level) को प्राप्त किया जा सके। जनसंख्या नीति का दीर्घकालीन उद्देश्य जनसंख्या मेें स्थिरता प्राप्त करना है, जो आर्थिक विकास, सामाजिक विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के अनुरूप हो।
  • घोषित नय जनसंख्या नीति में छोटे परिवार की संकल्पना को प्राप्त करने के लिए 16 प्रोत्साहक (Promotional) तथा उत्प्रेरक (Motivational) उपायों की चर्चा की गयी है, जिसमें समुदाय स्तर पर प्रेरणा और गरीबी रेखा से नीचे के गरीब परिवारों के लिए योजना (जो दो बच्चों के बाद बंध्याकरण करा लें) , परिवार कल्याण से जुड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना, बालिका समृद्धि योजना का चालू रहना तथा मातृ लाभ योजना सम्मिलित हैं। इन उपायों में यह भी प्रस्तावित है कि गरीबी रेखा से नीचे के ऐसे दंपति जो 21 वर्ष की आयु के बाद विवाह करें, छोटे परिवार की संकल्पना स्वीकार करें तथा दूसरी संतान के जन्म के बाद परिवार नियोजन की बंध्याकरण विधि स्वीकार करें, उन्हें पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। लड़की के जन्म पर 500 रुपया नकद तथा ऐसा ही इनाम उस महिला को (जो 19 वर्ष की आयु के बाद प्रथम बच्चे को जन्म देगी, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में) दिया जाएगा।
  • इस प्रकार जनसंख्या नीति, 2000 का अल्पकालिक उद्देश्य गर्भनिरोधकों की अपूरित मांग को पूरा करना, स्वास्थ्य के आधारभूत ढांचे, स्वास्थ्य समन्वयों की व्यवस्था करना है और मध्यकालिक उद्देश्य सकल प्रजनन दर को 2010 तक 201 पर ले जाना और दीर्घकालिक उद्देश्य 2045 तक जनसंख्या स्थिरीकरण करना है।
  • यह माना जाता है कि सकल प्रजनन दर में कमी लाए जाने से भारत की जनसंख्या वृद्धि को स्थिर करने में सहायता मिलेगी, जिसके बदले में आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति को गति मिलेगी। परिवार नियोजन में अधिकाधिक निवेश से महिलाओं को वांछित आकार का परिवार प्राप्त करने तथा अवांछित और असमय होने वाले गर्भधारणों से बचने में सहायता प्रदान करके उच्च जनसंख्या वृद्धि के प्रभाव को कम करने में सहायता मिल सकती है। इसके अतिरिक्त गर्भनिरोधकों के इस्तेमाल, उत्प्रेरित गर्भपात की रोकथाम एवं इन मौतों में अधिकतर का उन्मूलन करने में मदद मिल सकती है। यह अनुमान लगाया गया है कि परिवार नियोजन संबंधी अपूरित आवश्यकताओं की पूर्ति से भारत में 8 वर्षो के दौरान 50 लाख बच्चों की मौतों से बचा जा सकता है। विशेषकर खराब स्वास्थ्य अवसरंचना वाले क्षेत्रों में परिवार नियोजन एक किफायती तथा मातृ मृत्यु में कमी लाने का व्यावहारिक तरीका है, क्योंकि यह जटिल प्रौद्योगिकियों पर निर्भर नहीं है।
  • भारत सरकार ने जन्म अंतराल पद्धतियाँ विशेषकर आईयूसीडी (प्रसवोत्तर और अंतराल दोनों) पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करने लिए अपने परिवार नियोजन कार्यक्रम को नया रूप दिया है। पहले बच्चे के जन्म में विलंब तथा पहले एवं दूसरे बच्चे के जन्म में स्वस्थ अंतराल को बढ़ावा देने के लिए तथा ग्राहकों को परामर्श देने के लिए भी आशा कार्यकर्ताओं की सेवाओं का उपयोग किया जाएगा ताकि सुव्यविस्थत ढंग से परिवार नियोजन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

स्वास्थ्य संबंधी मानव संसाधन की स्थिति व रणनीति (Health Related Human Resource Situation and Strategy)

  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में स्पष्ट किया गया है कि विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त व्यवस्था के लिए मानव संसाधनों का अभाव उतना ही जिम्मेदार है जितना कि भौतिक संरचना का अभाव। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (RHS) , 2010 के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 2,433 चिकित्सकों (आवश्यक संख्या का 10.27 प्रतिशत) , सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 11,361 विशेषज्ञों (आवश्यक संख्या का 62.6 प्रतिशत) और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में संयुक्त रूप से 13,683 नर्सों (आवश्यक संख्या का 24.69 प्रतिशत) की कमी है। इसके अतिरिक्त देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 7,655 फार्मासिस्ट एव 14,225 प्रयोगशाला तकनीशियनों (आवश्यक संख्या का क्रमश: 27.13 एवं 50.42 प्रतिशत) की आवश्यकता है। ये संख्या वर्ष 2001 की जनगणना पर आधारित है।
  • 12वीं योजना में चिकित्सकों, नर्सों एवं पैरामेडिक्स के लिए शिक्षण संस्थानों में विस्तार सुनिश्चित करने की बात की गई है। कुल 640 जिलों में ही मेडिकल कॉलेज हैं। शेष 447 जिलों में कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है। इसके साथ ही पैरामेडिकल व्यवसायी बनाने के लिए मौजूदा शिक्षण क्षमता बहुत ही अपर्याप्त है। 335 मेडिकल कॉलेजों के मुकाबले 319 एएनएम प्रशिक्षण स्कूल, 49 स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण प्रशिक्षण स्कूल हैं। पैरामेडिकल व्यवसायियों की प्रशिक्षण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 12वीं योजना में प्रत्येक जिला अस्पताल को ज्ञान केन्द्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों को प्रशिक्षण संस्थानों में विकसित करने का प्रस्ताव है।
  • स्वास्थ्य संबंधी मानव संसाधनों की स्थिति 11वीं पंचवर्षीय योजना अविधि के दौरान बेहतर हुई है। भारत में डाक्टरों का घनत्व प्रति 1000 लोगों पर 0.6 और नर्सो एवं मिडवाइफ का घनत्व प्रति 1000 लोगों पर 1.30 है, दोनों मिलाकर प्रति 1000 लोगों पर 1.9 स्वास्थ्य कार्यकर्ता का घनत्व बनता है। देश के लिए स्वास्थ्य मानव संसाधन हेतु कोई मानदंड नियत नहीं किया गया है। यदि प्रति 1000 लोगों पर 2.5 स्वास्थ्य कार्यकर्ता (मिडवाइफ, नर्स एवं डॉक्टर) को हिसाब में लिया जाए तो स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी का पता चलता है। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के सभी संवर्गो के असंतुलित वितरण के कारण ग्रामीण, आदिवासी एवं पहाड़ी क्षेत्रों में असुरक्षित लोगों का अत्यधिक होना जारी है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के रणनीतिक दस्तावेज में कहा गया है कि जिला चिकित्सालयों एवं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रो में मानव संसाधन प्रशिक्षण के प्रस्तावित स्तरों के बावजूद क्षेत्रीय समानता, ग्रामीण-शहरी वितरण एवं गुणवत्ता के विषयों पर विशेष ध्यान देने की अवश्यकता होगी। इस संबंध में उपेक्षित समुदायों की महिलाओं को प्रशिक्षित कर उनको स्वास्थ्य परिचर्या कार्यबल में भाग लेने के लिए किराये पर लिया जाना चाहिए। स्वास्थ्य क्षेत्र में इन महिलाओं की क्षमताएं बढ़ने, कार्य-कौशल विकास एवं स्थायी रोजगार की सुलभता की कार्यनीति से उनका कई प्रकार से सशक्तीकरण होगा। इसी प्रकार नर्सो एवं पैरामेडिक्स के रूप में प्रशिक्षित करने के लिए उनको प्रोत्साहित करने हेतु छात्रवृत्ति एवं आउटरीच योजनाएंँ बनाई जानी चाहिए।
  • आयुष को शामिल करने एवं अन्य पारंपरिक स्वास्थ्य परिचर्या प्रदायकों अर्थात मेडिकल प्रेक्टिशनर (RMP) और पारंपरिक जन्म परिचरों के लिए चल रही पहलों को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। सार्वजनिक स्वास्थ्य शिक्षा का विकास बहु-विषयक, स्वास्थ्य, प्रणाली केन्द्रित, समस्या निराकरण संबंधी व्यावसायिक पाठयक्रम के रूप में किया जाना चाहिए और यह फिजिशियन एवं गैर-फिजिशियन दोनों के लिए खुला होना चाहिए। 12वीं योजना में बेहतर भर्ती, एवं कार्य निष्पादन के लिए स्वास्थ्य मानव संसाधन प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जाएगी।