Public Administration 1: Infant Milk Substitutes, Feeding Bottles and Infant Foods Act

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भारत में बच्चों के संरक्षण एवं बेहतरी हेतु तंत्र, कानून व संस्थायें (Mechanism, Laws and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Children in India)

शिशु दुग्ध अनुकल्प, पोषण बोतल और शिशु खाद्य (उत्पादन, प्रदाय और वितरण का विनियमन) अधिनियम, 1992 शिशु दुग्ध अनुकल्प संशोधन (Infant Milk Substitutes, Feeding Bottles and Infant Foods Act, 1992 and 2003 [Amendment] )

  • भारत में 55 प्रतिशत शिशु मृत्यु केवल कुपोषण के कारण होती हैं। किसी भी शिशु के जीवन के प्रथम 6 महीने केवल स्तनपान और दो वर्ष की आयु तक पूरक आहार कुपोषण से बचने के लिए आवश्यक हैं। इस अधिनियम तथा 2003 में हुए संशोधन का उद्देश्य नवजात शिशुओं के लिए स्तनपान को प्रोत्साहित करना है। अधिनियम इस बात की भी व्यवस्था करता है कि शिशु का भोजन विनियमित होना चाहिए तथा उसका उपयोग भी उपयुक्त तरीके से सुनिश्चित हो।
  • शिशु भोजन से तात्पर्य उस भोजन से है जो बाजार में उपलब्ध है और 6 महीने से 2 वर्ष तक के बालक की पोषण आवश्यकताओं की आपूर्ति हेतु मां के दूध के पूरक के रूप में उपलब्ध है। दुग्ध शिशु अनुकल्प कोई भी ऐसा भोजन है जो बाजार में उपलब्ध है यानी जो दो वर्ष के शिशु के लिए अंशत: या पूरी तरह से माँ के दूध का विकल्प हैं।

इस अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं (Salient Features of the Act Are as Follows)

  • अधिनियम के अनुसार किसी को भी इस बात को प्रचारित, प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए अथवा लोगों को इस बारे में भ्रमित नहीं करना चाहिए कि शिशु खाद्य, पोषण बोतल और शिशु दुग्ध अनुकल्प मां के दूध के उचित अनुपूरक हैं।
  • कोई भी व्यक्ति बिक्री अथवा बिक्री को प्रोत्साहित करने के लिए न तो शिशु खाद्य, पोषण बोतलों और शिशु खाद्य अनुकल्पों को वितरित कर सकता है, और न ही इस कार्य के लिए किसी भावी मां अथवा किसी नवजात शिशु की माँ से संपर्क कर सकता है और न ही इस कार्य के लिए उन्हें किसी भी तरह का प्रलोभन दे सकता है।
  • अधिनियम की धारा 5 में प्रावधान किया गया है कि स्वास्थ्य व्यवस्था के अतिरिक्त कोई व्यक्ति शिशु खाद्य, पोषण बोतलों और शिशु खाद्य अनुकल्पों अथवा ऐसी किसी सामग्री का दान/वितरण नहीं कर सकता है।
  • कानून में इस बात की आवश्यकता व्यक्त की गई है कि शिशु खाद्य और शिशु खाद्य अनुकल्प के किसी भी आपूर्तिकर्ता अथवा वितरक को उपभोक्ताओं को समझाने के संबंध में खाद्य पैकेटो पर इस प्रकार के चेतावनी लेबल लगाने की आवश्यकता है कि मां का दूध ही शिशु के लिए सर्वोत्तम आहार है और इस तरह के उत्पादों का उपयोग किसी स्वास्थ्य देखरेख कमी की सलाह के बाद ही किया जाना चाहिए।
  • कानून में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि इन उत्पादों पर उनके उपयोग, पोषक तत्वों की जानकरी संघटक सामग्री और उनके विनिर्माण एवं समाप्ति के संबंध स्पष्ट निर्देश होने चाहिए। शिशु खाद्य और शिशु दुग्ध अनुकल्प संबंधी उत्पादों पर बच्चों या उनकी मां की तस्वीर, कोई ऐसी तस्वीर अथवा डिजाइन जिससे इन उत्पादों की बिक्री में वृद्धि हो आदि को इस कानून के अंतर्गत प्रतिबंधित किया गया है।
  • केवल कुछ ही संस्थाओं को इन उत्पादों के वितरण के संबंध में छूट दी गई है जैसे कि अनाथश्रम, स्वास्थ्य कर्मी, स्तनपान कराने में असमर्थ माताओं की देखरेख में संलग्न संगठन आदि।
  • ब्रिकी अथवा वितरित किए गए ऐसे सभी उत्पाद खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम, 1954 अथवा भारतीय मानक ब्यूरो के मापदंडों के अनुरूप होने चाहिए अथवा मापदंड निर्धारित न होने की स्थिति में केन्द्र सरकार दव्ारा सुनिश्चित मापदंडों अथवा शर्तों से संगत होने चाहिए। खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम के तहत नियुक्त कार्यालय किसी भी स्थान की इस संदेह के आधार पर जाँच-पड़ताल कर सकते हैं कि उसके दव्ारा इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। इस कानून के साथ असंगत होने के संदेह के आधार पर कार्यालय किसी भी वस्तु को जब्त भी कर सकते हैं।
  • इस कानून के प्रावधानों का अनुपालन न करने की स्थिति में स्थानीय मुख्य दीवानी न्यायालय जिम्मेदार व्यक्ति पर उसके कब्जे में शिशु खाद्य अनुकल्पों, पोषण बोतलों अथवा शिशु खाद्य की कीमत तक का जुर्माना लगा सकता है।
  • इस कानून के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन होने की स्थिति में अधिकतम तीन वर्ष की कैद या अधिकतम 5000 रुपये का जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं।
  • इस अधिनियम के अधीन कंपनियों को भी दोषी ठहराया जा सकता है और उल्लंघन से भिज्ञ तथा उसके लिए जिम्मेदार व्यक्तियों को दोषी माना जा सकता है। इस कानून के तहत किए गए अपराध जमानती एवं संज्ञेय प्रकृति के होते हैं।

भारत में बच्चों की बेहतरी और संरक्षण हेतु अन्य महत्वपूर्ण कानून और विधायन (Other Important Laws and Legislation for the Betterment and Protection of Child Rights in India)

बंधुआ मजदूर व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976: (Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976)

वर्ष 2002 में यूनेस्को ने काम करने वाले बालकों के संबंध में प्रेस विज्ञप्ति जारी की। विश्व श्रम संगठन की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रत्येक 6 बच्चों में से एक काम करता है, जबकि लाखों बंधुआ मजदूरी अथवा बलात श्रम में संलग्न हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23 (1) भिखारी तथा बंधुआ मजदूरी के अन्य रूपों पर रोक लगाता है। बंधुआ मजदूरी व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 वयस्क और बालक दोनों के ही संबंध में दास अथवा बंधुआ मजदूरी के अवैध होने की बात करता है।

प्रसवपूर्व निदान तकनीक (विनियमन एवं दुरुपयोग की रोकथाम) अधिनियम, 1994 (Pre-Natal Diagnostic Techniques (Regulation and Prevention of Misuse) Act, 1994)

  • इस अधिनियम के प्रावधानों को पूरी तरह से समझने के क्रम में अधिनियम में दी गई दोनों परिभाषाओं को जान लेना आवश्यक है। भ्रूण (Embro) का तात्पर्य निषेचन के बाद 56 दिनों की अवधि तक मानव शरीर का विकास होने से है। गर्भस्थ शिशु (Foetus) से तात्पर्य निषेचन के 57 दिनों के बाद से बच्चे के जन्म के समय तक के गर्भस्थ शिशु से है।
  • अधिनियम में सबसे पहले आनुवंशिक परामर्श क्लीनिक तथा आनुवंशिक प्रयोगशालाओं के विनियमन के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया। इस तरह की सभी क्लीनिकें इस अधिनियम के तहत पंजीकृत होनी चाहिए, तथा प्रसवपूर्व नैदानिक तकनीक का प्रयोग करने वाले चिकित्सा व्यावसायी के पास आवश्यक योग्यता होनी चाहिए।
  • किसी भी व्यक्ति को इस बात की अनुमति नहीं दी जाती है कि वह बच्चे के लिंग के संबंध में किसी को कोई भी जानकारी दे।
  • अधिनियम किसी भी चिकित्सा कर्मी को लिंग-चयन करने अथवा उसमें मदद करने से प्रतबंधित करता हैं। गर्भावस्था से संबंधित सभी चिकित्सा उपकरण केवल पंजीकृत क्लीनिक को ही बेचे जा सकते हैं। केवल गुणसुत्र संबंधी अनियमितताओं, आनुवंशिक रोगों और हीमोग्लोबिनोपैथीस को छोड़कर सभी प्रसवपूर्ण नैदानिकी तकनीकों को अधिनियम के तहत प्रतिबंधित किया गया है।

नि: शक्त व्यक्ति अधिनियम, 1995 (Persons with Disabilities Act, 1995)

  • 1992 में भारत ने एशिया और प्रशांत क्षेत्र में नि: शक्तता से पीड़ित व्यक्तियों की पूर्ण भागीदारी एवं समानता पर उद्घोषणा को अपनया। इस उद्घोषणा के हस्ताक्षरकर्ता के रूप में भारत के विधि, न्याय एवं कंपनी मामलों के मंत्रालय ने नि: शक्तता से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए अधिनियम प्रस्तावित किया। 1 जनवरी, 1996 को भारत सरकार ने नि: शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 पारित किया। निम्नलिखित प्रावधान इस अधिनियम की रूपरेखा स्पष्ट करते हैं जो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों से संबंधित है।
  • इस अधिनियम में अंधापन दृष्टि दोष कुष्ठरोग, बधिर चलने-फिरने में अक्षम तथा कम मानसिक विकास और मानसिक बीमारी को नि: शक्तता के रूप में परिभाषित किया गया हैं।
  • अधिनियम में नि: शक्तता के निवारण हेतु सरकार दव्ारा आवश्यक उपाए किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इस एजेंडे को ध्यान में रखते हुए सरकार को वर्ष में कम से कम एकवार नि: शक्तता के लिए उत्तरदायी कारकों की जाँच के लिए सभी बच्चों का परीक्षण कराना चाहिए ताकि बालकों को ऐसे खतरों से बचाया जा सके।
  • नि: शक्तता से पीड़ित बच्चों को संबंधित सरकार दव्ारा उचित सहायता उपलब्ध करानी चाहिए। सरकार को नि: शक्त बालकों के लिए नियमित विद्यालय की व्यवस्था भी करनी चाहिए, लेकिन ऐसे बालकों के लिए विशेष विद्यालयों पर अलग से ध्यान देना चाहिए क्योंकि ऐसे विद्यालय इन बालकों की विशिष्ट आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं।

अभािवक एवं वार्ड अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890)

इस अधिनियम के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का हर व्यक्ति बालक हैं। न्यायालय अथवा इस कार्य हेतु नियुक्त प्राधिकारी को यह अधिकार है कि वह किसी व्यक्ति को बालक के अभिभावक के रूप में नियुक्त करके या अभिभावक की जिम्मेदारी से हटाकर उसके अभिभावक का निर्धारण कर सकता है। इस संबंध में बिना प्रार्थना-पत्र दिए कोई भी आदेश जारी नहीं किया जा सकेगा।

भारतीय दंड संहिता और बालकों से संबंधित अपराध (India Penal Code and Child Related Offences)

  • भारतीय दंड संहिता में बालकों के साथ होने वाले अपराधों की एक सूची दी गई है। भारतीय दंड संहिता की धारा 82 एवं 83 के अनुसार यदि सात वर्ष से कम आयु के बालक ने कोई अपराध किया है तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। सात से बारह वर्ष की आयु का कोई भी बालक, जिसे अपने दव्ारा किए गए कार्यों की समझ नहीं है, उसे भी अपराध करने में सक्षम माना गया हैं।
  • धारा 315 एवं 316 में भ्रूण हत्या और शिशु हत्या का उल्लेख किया गया है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा कृत्य करता है जिससे जीवित बच्चे का जन्म बाधित होता है या फिर उस कृत्य की वजह से जन्म के पश्चात्‌ बच्चे की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसे कृत्य को भ्रूण हत्या अथवा शिशु हत्या ही माना जाएगा, क्योंकि ऐसा कोई भी कृत्य मां के स्वास्थ्य अथवा जीवन के लिए हितकर नहीं हैं।
  • धारा 305 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति किसी बालक को आत्महत्या के लिए उकसाता है तो इसे अपराध माना जाएगा, चाहे उस व्यक्ति की आयु 18 वर्ष से कम हो।
  • धारा 361 के अनुसार यदि 18 वर्ष से कम आयु का बालक एवं 16 वर्ष से कम आयु की किशोरी को उनके विधिक अभिभावक की सहमति के बिना कहीं ले जाया जाता है तो इसे अपहरण माना जाएगा।
  • धारा 366ए में विशेष रूप से 18 वर्ष से कम आयु की किशोरी के साथ होने वाले किसी अपराध के संबंध में प्रावधानों को स्पष्ट किया गया है।
  • बालकों के साथ होने वाले यौन अपराधों को भी आई. पी. सी. के अंतर्गत शामिल किया गया है। धारा 372 में इस बात का उल्लेख किया गया है कि यदि किसी 18 वर्ष से कम आयु के बालक/किशोरी को वैश्यावृत्ति अथवा अवैध यौनकर्म के लिए बेचा जाता है अथवा यह जानते हुए कि बालक/किशोरी को ऐसे ही उद्देश्यों के लिए बेचा गया है। इसी को ध्यान में रखते हुए धारा 372 में किसी बालक/किशोरी को वैश्यावृत्ति अथवा अवैध यौन कर्म के उद्देश्य से बेचने को अपराध माना गया है।

कारखाना अधिनियम, 1948 (Factories Act, 1948)

  • यह अधिनियम 15 वर्ष की आयु पूरी कर चुके बालक को अल्पवयस्क मानता है। इसके अनुसार किशोर/किशोरी वह है, जिसने 15 वर्ष की आयु पूरी कर ली है लेकिन अभी वह 18 वर्ष का नहीं हुआ/हुई है। इसमें बालक अथवा किशोर/किशोरी को अल्पवयस्क माना गया है। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी कारखाने में कार्यरत युवाओं की चिकित्सकीय स्थिति की जाँच कर सत्यापित करने का उत्तरदायित्व किसी चिकित्सा कर्मी अथवा सर्जन का है।
  • इस अधिनियम के अनुसार कोई भी अल्पवयस्क किशोर किसी ऐसी मशीन पर सफाई आदि कार्य नहीं कर सकता है, जिससे उसे चोट पहुँचे।
  • अधिनियम ऐसे किशोर के कार्य के समय पर पांबदी लगाता है, जिसने वयस्क होने का प्रमाण-पत्र प्राप्त किया हुआ है। जब तक कि राज्य सरकार निर्धारित न करे, कारखाने में कोई भी किशोर सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक कार्य कर सकता है। ऐसे बच्चे अथवा किशोर जिन्हें वयस्क नहीं माना गया है, उन्हें कारखाने में साढ़े चार घंटे से अधिक तथा रात के समय कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • जिन बच्चों ने पहले कैलेण्डर वर्ष में 240 दिनों से अधिक कार्य किया है, उन्हें हर 15 दिन कार्य करने के लिए एक दिन का अवकाश दिया जाएगा।

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