Public Administration: Description this Articles as Labour Right Welfare and Judiciary View

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भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

श्रम अधिकार कल्याण और न्यायिक दृष्टि से इन अनुच्छेदों की व्याख्या (Description this Articles as Labour Right Welfare and Judiciary View)

अनुच्छेद-14 (Articles-14)

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद -4 कानून के समक्ष समानता की सकंल्पना की व्याख्या करता है। समानता की संकल्पना का अर्थ व्यक्तियों के मध्य पूर्ण समानता नहीं है, क्योंकि ऐसा भौतिक रूप से संभव नहीं हैंं इस संकल्पना में किसी व्यक्ति विशेष को उसके जन्म, पथ या ऐसे किसी प्रकार के कारण विशेष महत्व दिये जाने की बात का अभाव है और साथ ही सभी व्यक्ति एवं वर्ग देश के सामान्य कानून के समक्ष समान हैं।
  • रणबीर सिंह बनाम भारत संघ (एआईआर 1982 एस सी 879) मामलें में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा है कि यद्यपि हमारे संविधान में ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का सिद्धांत स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में घोषित नहीं है, परन्तु निश्चित रूप से यह अनुच्छेदों-14,16 और 39 (ग) के अधीन एक संवैधानिक लक्ष्य है। अत: यह अधिकार असमान वेतन के मामलों में लागू किया जा सकता है।
  • धीरेन्द्र चमोली बनाम यू. पी. राज्य (एआईआर 1986 एस सी-172) मामले में यह निर्णय दिया गया कि समान कार्य हेतु समान वेतन का सिद्धांत दैनिक वेतन भोगी औपचारिक कामगारों पर भी लागू होता है। साथ ही यह निर्णय भी दिया गया कि देश में नेहरू युवा केद्रों में दैनिक वेतन पर नियुक्त औपचारिक कामगार की चतूर्थ श्रेणी के कर्मचारियों (जो नियमित वेतन पाते हैं) के समान ही कार्य कर रहे हैं, इसलिए इन्हें समान वेतन तथा कार्य की दशायें मिलनी चाहिए।

अनुच्छेद-19 (1) (ग) (Article-19 (1) (C) )

  • इस अनुच्छेद में नागरिकों की समिति एवं संघ बनाने की बात कही गई हैं। हालाँकि, अनुच्छेद के उपबंध (4) के अनुसार, सरकार भारत की संप्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था या नैतिकता के आधार पर युक्तियुक्त निर्बधन लगा सकती है।
  • दमयंती बनाम भारत संघ मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि ″ संघ बनाने का अधिकार ″ , ″ आवश्यक रूप से अवधारित करता है कि संघ बनाने वाले व्यक्ति को केवल उन्हीं लोगों के साथ जुड़ने का अधिकार है जिन्हें वे स्वैच्छिक रूप से संघ में शामिल करते हों। कोई ऐसा कानून जिससे सदस्यों को किसी स्वैच्छिक संघ में शामिल किया जाता है, लेकिन उन्हें संघ से अलग होने का विकल्प प्राप्त न हो, अथवा कोई ऐसा कानून जो स्वैच्छिक रूप से संघ में शामिल लोगों की सदस्यता समाप्त करता है, तो ऐसे कानून को संघ बनाने के अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।

अनुच्छेद-21 (Article-21)

अनुच्छेद-21 के अधीन व्याख्यायित ‘जीवन के अधिकार’ की परिसीमा विस्तृत है। ‘जीवन’ का तात्पर्य महज पाशविक अस्तित्व से कहीं अधिक है। ‘मेनका गांधी मामले’ में न्यायालय ने अनुच्छेद-21 को नया आयाम दिया। इसके अनुसार ‘जीवन’ का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है अपितु इसके अंतर्गत मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार सम्मिलित है। अत: ‘जीने’ का अधिकार “मानवीय गरिमा के साथ जीेने का अधिकार” को भी सम्मिलित करता है, तथा इसके साथ अन्य बातें सम्मिलित हैं, मुख्यत: जीवन की मुख्य जरूरतें जैसे पर्याप्त पोषण, वस्त्र, आवास और स्वयं को विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त करने, पढ़ने-लिखने की सुविधा स्वतंत्र रूप से आवाजाही तथा साथी मनुष्यों के साथ मेलजोल।

अनुच्छेद-23 (Article-23)

संविधान का अनुच्छेद-23 मानव तस्करी, भिक्षावृत्ति या इस जैसे किसी भी बलात श्रम का निषेध करता है। अनुच्छेद के दूसरे भाग में यह प्रावधान है कि इस प्रावधान का उल्लंघन, कानून के दायरे में दंडनीय अपराध है। हालाँकि अनुच्छेद के उपबंध (2) के अनुसार- इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनिवार्य सेवा अधिरोपित करने से निवारित नहीं करेगी। सेवा अधिरोपित करने में राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग या इनमें से किसी एक के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। इस अनुच्छेद का अनुसरण करते हुए संसद ने महिलाओं और लड़कियों की अनैतिक तस्करी का दमन अधिनियम 1956 पारित किया था। अनुच्छेद-23 व्यक्ति की न केवल सरकार से बल्कि आम नागरिकों (Private Citizens) से भी रक्षा करता है। यह सरकार पर एक सकारात्मक दायित्व आरोपित करता है कि वे “मानव तस्करी” और “भिक्षावृत्ति अर्थात बिना वेतन के अनैच्छिक कार्य करना” को समाप्त करने हेतु उचित कदम उठाएगी। यह सुरक्षा केवल भिखारियों को नहीं अपितु “बलात श्रम के अन्य रूपों” अर्थात किसी व्यक्ति के उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करने को बाध्य करन के मद्देनजर भी दी गई है।

अनुच्छेद-39 (क) और 41 (Article-39 (A) and 41)

  • अनुच्छेद-39 (क) और 41 में निहित सिद्धांत मौलिक अधिकारों की समझ और अर्थ की व्याख्या के स्तर पर भी समान रूप से मौलिक हैं राज्य पर यह उत्तरदायित्व है कि वह नागरिकों को समाप्त आजीविका एवं कार्य का अधिकार दे। परन्तु कोई व्यक्ति, जिसे कानून सम्मत प्रक्रिया के अलावा, उसके आजीविका के अधिकार से वंचित रखा जाता है, तो वह अनुच्छेद-21 के तहत अधिकार के हनन का मामला दर्ज करा सकता है।
  • अनुच्छेद-39 (क) “समान न्याय” और “नि: शुल्क विधिक सहायता” उपलब्ध कराता है। यह कानून के अनुसार न्याय का प्रावधान करता है। विधि के शासन दव्ारा किसी लोकतांत्रिक नीति में यह सरकार का उत्तरदायित्व है कि वह उचित न्यायिक तंत्र विकसित करे।

कामकाजी महिलाओं के अधिकार (Right of Working Women)

  • ऐसे अनेक मामले हैं जिनमें उच्चतम न्यायालय ने महिला अधिकारों का समर्थन किया है तथा विभेदकारी कानून या प्रथाओं के खिलाफ कार्यवाही की है। मुथाम्मा नामक वरिष्ठ विदेश सेवा अधिकारी ने 1978 में भारतीय विदेश सेवा (नियुक्त, कैडर, वरिष्ठता और पदोन्नति) नियम 1961 के विरुद्ध रिट दायर की और कहा कि इसके कुछ नियम विभेदकारी हैं। इस नियम में प्रावधान था कि विवाहित महिला को इस सेवा के लिए नियुक्ति नहीं मिलेगी। ऐसी स्थिति में महिला को अपने विवाह से पूर्व सरकार से लिखित अनुमति लेनी होगी कि अगर सरकार को यह भरोसा हो गया कि वह अपने परिवार व घरेलू दायित्वों के कारण अपने कर्तव्यों का ठीक से निर्वहन नहीं कर पा रही है तो उसे त्यागपत्र देना होगा। उच्चतम न्यायालय ने इन नियमों को इस आधार पर खारिज किया कि उनसे अनुच्छेद 16 के अधीन लोक नियोजन में अवसर की समानता का महिला कर्मचारियों का अधिकार प्रभावित होता है।
  • विशाखा एवं ओर्स बनाम राजस्थान राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। यह एक रिट याचिका थी, जिसे अनेक गैर सरकारी संगठनों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण पर किसी कानून के अभाव के कारण इसमें न्यायिक हस्तक्षेप हेतु दायर किया था। न्यायालय ने महसूस किया यौन शोषण की प्रत्येक घटना, संविधान के अधीन समानता के अधिकार और जीवन व स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है और साथ ही न्यायालय ने यह भी महसूस किया कि यौन शोषण के तार्किक परिणाम के फलस्वरूप, महिलाओं को अनुच्छेद-19 (1) (छ) के अधीन कोई भी व्यवसाय या व्यापार करने के अधिकार का हनन होता है। आगे न्यायालय ने निर्णय दिया कि लैंगिक समानता में यौन शोषण से सुरक्षा और आत्मसम्मान से कार्य करने का अधिकार सम्मिलित है, जोकि मूलभूत मानवाधिकार है।

हड़ताल का अधिकार (Right to Strike)

  • संविधान के अधीन श्रमिकों को प्राप्त अधिकारों को सार रूप में देखकर एक तरफ जहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि हड़ताल एक वैध और कभी-कभी श्रमिकों के हाथ में न टालने वाले हथियार के रूप में होती है, साथ ही दूसरी तरफ यह भी महत्वपूर्ण है कि इस हथियार के अविवेकी और उतावलापूर्ण प्रयोग को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।
  • सिंडिकेट बैंक बनाम के. उमेश नायक (1994) मामले में, न्यायमूर्ति सावंत ने मत दिया, “एक साधन के रूप में हड़ताल का उदय कामगारों दव्ारा नियोक्ता के साथ उनकी लंबी संघर्ष प्रक्रिया के दौरान प्रत्यक्ष कार्यवाही के रूप में हुआ है। इसे श्रमिकों दव्ारा उपयोग किए गए उनकी आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जाता है। लेकिन यह उत्पादन और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ पूरे समाज की कुशलता के लिए अहितकर भी होता है।”
  • इसी कारण औद्योगिक विधायन में (हालाँकि श्रमिकों के हड़ताल पर जाने के अधिकार की मनाही नहीं है) इस अधिकार को नियोक्ता तालाबंदी के अधिकार के साथ विनियमित किया गया है। साथ ही शांतिपूर्ण जाँच, मध्यस्थता दव्ारा समझौता और श्रमिक-नियोक्ता के बीच विवाद का अधिनिर्णय करने के लिए उपयुक्त तंत्र भी स्थापित किया है।

भारत में मजदूरों की बेहतरी और संरक्षण हेतु कानून एवं विधायन (Law and Legislation for Betterment and Protection of Labours in India)

श्रम कानून के विधायन के निम्न वर्ग हैं-

  • केन्द्र सरकार दव्ारा आरोपित श्रम कानून, जिसमें कानून लागू करने का पूर्ण उत्तरदात्यिव केन्द्र पर होता है।
  • केन्द्र दव्ारा आरोपित श्रम कानून और इसे केन्द्र व राज्य दोनों दव्ारा लागू किया जाना।
  • केन्द्र दव्ारा आरोपित श्रम कानून और राज्य दव्ारा लागू किया जाना।
  • विभिन्न राज्यों दव्ारा आरोपित श्रम कानून जो उन्हीं राज्यों में लागू होते हैं।

भारत में श्रम और रोजगार से जुड़े कानून प्रारंभिक स्तर पर “औद्योगिक कानून” की विस्तृत परिधि में आते हैं। भारत में श्रम कानूनों के विधायन की रूपरेखा बनाने में वर्तमान सामाजिक व आर्थिक दशाओं का प्रमुख योगदान है। इसमें कामकाज के घंटे, वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सुविधाओं के विनियमन की बात की गई है।

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