Public Administration: Few Important Law & Legislation for the Labour Welfare

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भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

श्रमिक कल्याण हेतु कुछ महत्वपूर्ण कानून एवं विधायन (Few Important Law & Legislation for the Labour Welfare)

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (The Minimum Wages Act, 1948)

  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 प्रारंभकि तौर पर असंगठित क्षेत्र के कामगारों के हितों को ध्यान में रखकर लागू किया गया था, जोकि अशिक्षा व मोलभाव कर सकने की क्षमता के अभाव के कारण शोषित होते हैं।
  • कानून, नियोक्ता को बाध्य करता है कि वह विधि के तहत निर्धारित मजदूरी कामगारों को दे, साथ ही शोषण से उनकी रक्षा करे।
  • अधिनियम के प्रावधानों के अधीन, केन्द्र व राज्य दोनों सरकारों उनके न्यायाधिकार क्षेत्र में कामगारों हेतु न्यूनतम वेतन का निर्धारण, पुनर्विलोकन और उसे लागू कर सकेंगी।
  • न्यूनतम मजदूरी अधिनियम महिला और पुरुष कामगारों में विभेद नहीं करता अथवा दोनों के लिए अलग-अलग वेतन का प्रावधान नहीं करता। इस अधिनियम के सभी प्रावधान दोनों कामगारों पर समान रूप से लागू होते हैं।

मजदूरी की अदायगी अधिनियम, 1936 (The Payments of Wages Act, 1936)

मजदूरों का हितैशी यह अधिनियम, मजदूरों को समय से वेतन अदायगी सुनिश्चित करता है साथ ही यह भी दावा करता है कि मजदूरों के वेतन से अनाधिकृत कटौती नहीं की जाएगी।

बोनस की अदायगी अधिनियम, 1965 (The Payment of Bonus Act, 1965)

यह अधिनियम, 20 या इससे अधिक मजदूरों वाले कारखानों और अन्य संस्थानों दव्ारा श्रमिकों को बोनस देने का प्रावधान करता है। अधिनियम की धारा 10 के अधीन प्रत्येक उद्योग या संस्था के लिए 8.33 प्रतिशत बोनस देय है।

अनुबंध श्रमिक (विनियमन एवं समाप्ति) अधिनियम, 1970 (Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970)

  • अनुबंध श्रमिकों के कामकाज एवं रहन-सहन की दशाओं को बेहतर करने के प्रति चिंता तथा मानक निर्वात शोधनशाला कंपनी (Standard Vacuum Refinery Company) बनाम उसके कामगार मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन का परिणाम, अनुबंध श्रमिक (विनियमन एवं समाप्ति) केन्द्रीय नियम, 1970 के लागू हाने के रूप में सामने आया।
  • यह अधिनिम अनुबंध श्रमिक (विनियमन एवं समाप्ति) केन्द्रीय नियम, 1971 10 फरवरी, 1971 को अस्तित्व में आया। इस अधिनियम के अधीन, केन्द्रीय व राज्य परामर्शदाता अनुबंध श्रमिक बोर्ड के गठन का प्रावधान है ताकि इस कानून के प्रशासन के संबंध में संबंधित सरकारों को सुझाव दिया जा सके। अधिनियम में अनुबंध मजदूरों को कॉन्ट्रैक्टर दव्ारा मजदूरी और कुछ सुविधायें प्रदान करने का विशेष प्रावधान है।
  • केन्द्र व राज्य सरकारों को यह शक्ति प्राप्त है कि वे किसी संस्था की किसी गतिविधि में अनुबंध श्रमिकों को रोजगार देने का निषेध करे। साथ ही आपात स्थिति में अनुबंधकर्ताओं/संस्था को इस अधिनियम के प्रावधानों से छूट भी दी गई है।

बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 (Child Labour (Prohibition & Regulation) Act, 1986)

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 (क) के अधीन 6 से 14 वर्ष के सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा मिलनी चाहिए। अनुच्छेद-45 के अधीन यह प्रावधान है कि राज्य 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों की प्रारंभिक देखभाल करें व उसे शिक्षा प्रदान करे और अंतिम रूप में अनुच्छेद-51 (ट) में माता-पिता/अभिभावकों को 6 से 14 वर्ष के बच्चों को शिक्षा का दायित्व सौंपा गया है।

बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 के प्रमुख बिन्दु (Key Features of the Child Labour (Prohibition & Regulation) Act, 1986)

  • बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को खतरनाक कार्यों एवं प्रक्रमों में नियोजित करने का निषेध करता है।
  • अधिनियम अपेक्षाकृत कम खतरनाक कार्यो एवं प्रक्रमों में भी बच्चों के रोजगार का विनियमन करता है। वर्तमान में 16 खतरनाक व्यवसाय हैं तथा 65 प्रक्रम हैं, जिनमें बच्चों को नियोजित करना निषेध हैं। कुछ महत्वपूर्ण निषिद्ध रोजगार एवं प्रक्रम हैं-कालीन बुनना, भवन एवं निर्माण कार्य, ईंट भट्‌टा में कार्य, होजरी निर्माण कार्य, घरेलू नौकरों के रूप में कार्य, चाय की दुकानों और सड़क के किनारे की दुकानों में काम करना।
  • अधिनियम के ए और बी भागों में उल्लिखित रोजगारों में उस व्यक्ति के कार्य करने पर रोक है जो 14 वर्ष से कम आयु का है।
  • कोई भी बच्चा 6 घंटो से अधिक काम नहीं करेगा, जिसमें आधे घंटे का विश्राम भी शामिल है।
  • किसी बच्चे को शाम 7 से सुबह 8 बजे के बीच काम करने की अनुमति नहीं होगी।
  • किसी बच्चे को अतिरिक्त समय (Overtime) के लिए कार्य करने की अनुमति नहीं होगी।
  • हर बच्चे को साप्ताहिक अवकाश मिलेगा।
  • यह प्रत्येक नियोक्ता का कर्तव्य होगा कि वह अधीक्षक को बच्चों की नियुक्ति के विषय में जानकारी देगा। यह नियोक्ता के लिए अनिवार्य होगा कि वह इस मामले में एक रजिस्टर की व्यवस्था करेगा।

बाल श्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2012 (The Child Labour (Prohibition and Regulation) Amendment Bill, 2012)

  • इस विधेयक को राज्यसभा में 4 दिसंबर, 2012 को रखा गया।
  • विधेयक में बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 में संशोधन की बात कही गई है। इस अधिनियम में बच्चों को कुछ प्रकार के रोजगारों में नियोजित करने पर रोक है साथ ही इसमें रोजगार में कार्य की दशाओं का भी विनियमन किया गया है।
  • नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा पर बच्चों का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009) के अनुसार, उपरोक्त विधेयक में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सभी कार्यो में रोजगार देने को निषेधीत किया है सिवाय उन कार्यो के, जिनमें विद्यालय अवधि के बाद बच्चा, परिवार की मदद हेतु कोई काम करता है।
  • विधेयक में एक नया वर्ग “किशोर” जोड़ा गया है। किशोर से तात्पर्य उस व्यक्ति से है जो 14 वर्ष से अधिक किन्तु 18 वर्ष से कम आयु का है। विधेयक में किशारों को उल्लिखित खतरनाक कार्यो (खानों, ज्वलनशील पदार्थों और खतरनाक कार्यो) में लगाए जाने पर रोक लगाई है।
  • विधेयक में किसी बच्चे को किसी कार्य में लगाने पर मिलने वाले दंड को सख्त किया गया है। साथ ही इसमें किसी किशोर को खतरनाक कार्य में लगाने पर जुर्माने का प्रावधान है।
  • सरकार, जिला अधिकारी को यह शक्ति दे सकती है कि वह कानून के प्रावधानों को उचित तरीके से लागू करवाये।

महिला श्रमिकों के लिए मुख्य कानून एवं विधायन (Main Law and Legislation for Women Labour)

  • भारत के श्रमबल में महिलाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है परन्तु वे काम के स्तर एवं गुणवत्ता में पुरुषों से काफी पीछे हैं। अधिकांश महिला कामगार ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत हैं। ग्रामीण महिला कामगारों का 87 प्रतिशत कृषि में श्रमिकों और खेतीहरों की भाँति कार्यरत है। शहरी महिला कामगारों में 80 प्रतिशत असंगठित क्षेत्रों जैसे घरेलू उद्योग, भवन एवं निर्माण कार्यों, छोटे स्तर के व्यापार आदि में कार्यरत हैं।
  • समान वेतन अधिनियम, 1976 एक सुरक्षात्मक और गैर शोषणकारी कानून है जिसे कार्यस्थल पर महिलाओं के हितों की सुरक्षा हेतु लागू किया गया था। समान वेतन अधिनियम, 1976 में समान कार्य या एक जैसे कार्य हेतु पुरुषों व महिला कामगारों के लिए समान वेतन देने का प्रावधान है।
  • भारत के उच्चतम न्यायालय ने विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य मामले में 13.08. 1997 के अपने उल्लेखनीय निर्णय में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण को रोकने के लिए विशेष दिशानिर्देश दिये थे। इन दिशा निर्देशों को संविधान के अनुच्छेद 14 के जरिए कानून की संज्ञा दी गई है।

बंधुआ श्रमिकों हेतु कानून और विधि (Law and Legislation for Bonded Labours)

  • बंधुआ मुक्ति मोर्चा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि कभी भी यह दिखे कि श्रमिक को बलात श्रम करने के लिए विवश किया गया है तो न्यायालय यह समझ सकता है कि उस श्रमिक को अनुचित अग्रिम या अन्य आर्थिक मुआवजा ही मिल सकेगा।
  • अत: बंधुआ श्रमिको की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें मुक्त करके पुनर्वासित किया जाना चाहिए। राज्य सरकार के दव्ारा बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम 1976 के प्रावधानों को लागू कराने के स्तर पर कोई असफलता; संविधान के अनुच्छेदों 21 और 23 का उल्लंघन मानी जायगी।
  • यदि किसी व्यक्ति को बिना वेतन अथवा न्यून वेतन पर काम करने के लिए बाध्य किया जाएगा, तब ऐसा माना जाएगा कि यह बंधुआ श्रम है जब तक कि राज्य सरकार या नियोक्ता इसे गलत सिद्ध न कर दे (नीरजा चौधरी बनाम म. प्र. राज्य) ।

बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 (महत्वपूर्ण बिन्दु) (The Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976 (Key Features) )

  • बंधुआ श्रम का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के पटल पर तब आया जब इसे 1975 में पुराने 20 सूत्री कार्यक्रम में शामिल किया गया। इसे लागू करने के लिए बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अध्यादेश लाया गया। बाद में इसे बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 दव्ारा प्रतिस्थापित किया गया। इसने सभी बंधुआ श्रमिकों को समान रूप से मुक्त कर दिया। साथ ही इनके ऋण भी समाप्त हो गए।
  • अधिनियम में जिला और सबडिवीजन स्तर पर निगरानी समितियों के गठन का प्रावधान है ताकि इस कानून के प्रावधानों को लागू किया जा सके।
  • जो व्यक्ति किसी को बंधुआ श्रम करने हेतु बाध्य करेगा उस पर 2000 जुर्माना और तीन वर्ष तक की कैद का प्रावधान हैं।
  • बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 के अधीन यह प्रावधान है कि बंधुआ श्रमिकों की पहचान और उन्हें मुक्त करना, साथ ही उनको पुनर्वासित करने संबंधित दायित्व राज्य सरकार का होगा।
  • उच्चतम न्यायालय ने निर्देश दिया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बंधुआ श्रम के मामले में हस्तक्षेप करेगा।

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