Public Administration 1: Laws and Legislation to Safeguards the Rights of Women in India

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भारत में महिलाओं की उन्नति एवं संरक्षण के लिए गठित तंत्र, विधि, संस्थाएँ एवं निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Women in India)

भारत में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानून एवं विधायन (Laws and Legislation to Safeguards the Rights of Women in India)

विशाखा दिशा-निर्देश (Vishakha Guidelines)

विशाखा दिशा-निर्देश कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने से संबंधित हैं। विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने महिला कर्मचारियों को सुरक्षित एवं स्वस्थ्य वातावरण में काम करने के अधिकार को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कुछ नियम तय किए थे। अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न को परिभाषित करते हुए इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना था। इस कारण न्यायालय ने निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्रों के सभी कार्य स्थलों के लिए कुछ आवश्यक तथा बाध्यकारी दिशा-निर्देश तय किए तथा प्रत्येक नियोक्ता के लिए यह अपरिहार्य बना दिया कि वह महिलाओं को सुरक्षित एवं उत्पीड़न रहित कार्य का वातावरण उपलब्ध कराए। यह बाध्यता शैक्षिक संस्थाओं के मामलें में भी लागू होती हैं।

विशाखा दिशा-निर्देश के अनुसार निम्नलिखित अशिष्ट भावों अथवा व्यवहारों को यौन उत्पीड़न के अंतर्गत शामिल किया गया है-

  • शारीरिक संपर्क या इसका प्रयास करना।
  • यौन संबंध बनाने की मांग या अनुरोध करना।
  • यौन संबंधी टिप्पणी करना।
  • अश्लील फिल्में दिखाना।
  • यौन प्रकृति का कोई अन्य शारीरिक, मौखिक या अन्य प्रकार का कोई अशिष्ट कार्य करना।

यौन उत्पीड़न के परिणामस्वरूप महिलाओं के, भारतीय संविधान में उल्लिखित अनुच्छेद 14 और 15 के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो अनुच्छेद 21 में वर्णित गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार का भी उल्लंघन होता है। और इसी के चलते यौन उत्पीड़न से रहित काम के वातावरण में महिलाओं के कोई आजीविका या व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन होता है।

भारत में यौन उत्पीड़न को निम्नलिखित धाराओं के अंतर्गत शामिल किया गया है-

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 292/294: अश्लीलता
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 354: सम्मान (Modesty) को चोट पहुँचाने के उद्देश्य से आपराधिक बल प्रयोग करना या हमला करना।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 375: बलात्कार
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 509: शब्द, हावभाव या कार्य के माध्यम से सम्मान को चोट पहुँचाने का प्रयास करना।
  • मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993

कार्यस्थल और अन्य संस्थाओं में नियोक्ताओं या अन्य जिम्मेदार लोगों का कर्त्तव्य (Duty of the Employer or Other Responsible Persons in World Places and Other Institutions)

कार्यस्थल और अन्य संस्थाओं में नियोक्ताओं एवं अन्य जिम्मेदार लोगों का कर्त्तव्य होगा कि वे यौन उत्पीड़न से संबंधित अपराधों को रोके तथा यौन उत्पीड़न के मामले में सभी आवश्यक कदम उठाते हुए इनके समाधान की कार्यप्रणाली उपलब्ध कराएँ या ऐसे कार्यों के लिए अभियोग चलाएँ।

रोकथाम के उपाय (Preventive Steps)

निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के सभी नियोक्ता एवं कार्य के लिए जिम्मेदार लोगों को यौन उत्पीड़न रोकने के लिए उपयुक्त कदम उठाने चाहिए। अपने इस उत्तरदायित्व के प्रति बिना किसी प्रकार के पूर्वाग्रह रखे उन्हें निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए।

  • उपरोक्त परिभाषित कार्य स्थलों पर यौन उत्पीड़न रोकने संबंधी स्पष्ट निषेध (Prohibition) अधिसूचित, प्रकाशित तथा उपयुक्त तरीके से प्रचारित करने चाहिए।
  • सरकार एवं सार्वजनिक क्षेत्र के निकायों के व्यवहार एवं अनुशासन से संबंधित नियमों/विनियमों में यौन उत्पीड़न रोकने संबंधी नियमों/विनियमों को शामिल करना चाहिए तथा इन नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए उपयुक्त दंड का प्रावधान करना चाहिए।
  • निजी नियोक्ताओं के संदर्भ में ऐसे कदम उठाने चाहिए जिससे कि उपरोक्त निषेधों को औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के स्थायी आदेशों में शामिल किया जाए।
  • कार्य, आराम, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता के संदर्भ में उपयुक्त कार्य दशाएं उपलब्ध कराया जाना चाहिए तथा आगे यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए प्रतिकूल कार्य वातावरण न हो तथा किसी महिला कर्मचारी को यह सोचने का तार्किक आधार नहीं होना चाहिए कि वह अपने रोजार के संदर्भ में सुविधाहीन स्थिति में हैं।

विशाखा दिशा-निर्देश की प्रमुख विशेषताएँ (Salient Features of the Vishakha Guidelines)

  • ऐसा कोई कार्य जो भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य विधि के अंतर्गत किसी विशिष्ट अपराध की श्रेणी में आता हो, तो नियोक्ता सक्षम प्राधिकारी के पास शिकायत करके विधि के अनुसार उपयुक्त कार्रवाई शुरू करेंगा।
  • विशेष रूप से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों का समाधान करते समय पीड़ित या गवाह शोषण या भेदभाव से परेशान न हो। यौन उत्पीड़न का पीड़ित को यह विकल्प मिलना चाहिए कि वह या तो अपराधी का या अपना स्थानातंरण करा सके।
  • यदि ऐसे किसी कार्य से संर्गत सेवा शर्त के अंतर्गत सेवा संबंधी दूराचार साबित होता है तो नियोक्ता उन कानूनों के अनुसार उपयुक्त कार्रवाइ करेगा।
  • यदि ऐसा कोई कार्य विधि या सेवा शर्तो के उल्लंघन के अंतर्गत नहीं होता है तो पीड़ित दव्ारा की गई शिकायतों के निवारण के लिए संगठन के नियोक्ता दव्ारा उपयुक्त शिकायत तंत्र (Complaint Mechanism) गठित किया जाना चाहिए।
  • उपराुक्त संदर्भ में बनाए गए शिकायत तंत्र की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जहाँ आवश्यक हो इसे एक शिकायत समिति (A Complaint Committee) एक विशेष परामर्शदाता तथा अन्य सहायक सेवाएँ उपलब्ध कराने में सक्षम होना चाहिए।
  • शिकायत समिति की प्रमुख तथा कम से कम आधी सदस्य महिला होनी चाहिए। उच्च स्तरीय प्रभावों या अनुचित दबावों की संभावना को रोकने के लिए शिकायत समिति में तीसरे पक्ष को शामिल किया जाना चाहिए। यह तीसरा पक्ष गैर सरकारी संगठन या कोई अन्य निकाय हो सकता है जो यौन उत्पीड़न के मामलों की जानकारी रखता हो।
  • शिकायत समिति को सरकारी विभागों में शिकायत तथा उनके दव्ारा की गई कार्रवाई के संदर्भ में एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करनी होगी।
  • कामगारों की बैठक एवं अन्य उपयुक्त मंचों पर कर्मचारियों को यौन उत्पीड़न से संंबंधित मामले उठाने की अनुमति मिलनी चाहिए तथा नियोक्ता-कर्मचारियों की बैठक के दौरान इस पर सकारात्मक रूप से बातचीत करनी चाहिए।
  • विशेष तौर पर इस विषय में दिशा-निर्देर्शों (इस विषय पर बनाए गए उपयुक्त कानूनों) को सही तरीके से अधिसूचित कर महिला कर्मचारियों को उनके अधिकारों के बारे में बताया जाना चाहिए।
  • जहाँ यौन उत्पीड़न जैसी घटनाएँ किसी तीसरे पक्ष या बाहरी व्यक्ति के कारण होती हो तो ऐसी स्थिति में नियोक्ता या जिम्मेदार व्यक्ति सभी आवश्यक कदम उठाएंगे तथा प्रभावित व्यक्ति को सहायता तथा निवारक उपाय के रूप में उचित मदद करेंगे।
  • केन्द्र एवं राज्य सरकारों से अनुरोध किया गया है कि वे विधायन (Legislation) के साथ उपयुक्त उपाय करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि इन दिशा-निर्देशों का पालन निजी क्षेत्र के नियोक्ता भी कर सकें।
  • ये दिशा-निर्देश मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों से किसी प्रकार पूर्वाग्रह नहीं करेंगें।

कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) ) Act, 2013

  • कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) विधेयक, 2012 को लोकसभा दव्ारा सितंबर 2012 में और राज्यसभा दव्ारा 26, फरवरी 2013 को पास किया गया था।
  • कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न महिलाओं को मिले समानता, जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। यह एक असुरिक्षत एवं प्रतिकूल कार्य का वातावरण उत्पन्न करता है जो कार्य में महिलाओं की सहभागिता को हतोत्साहित करता है। इस कारण उनके आर्थिक सशक्तीकरण एवं समावेशी विकास की लक्ष्य प्राप्ति को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर रहा है। हालांकि इस मामले को सुलझाने के लिए भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों एवं विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय दव्ारा दिए गए दिशा निर्देशों के अलावा कोई घरेलू कानून नहीं है। कार्य में महिलाओं की बढ़ती सहभागिता ने यह अनिवार्य बना दिया है कि यौन उत्पीड़न रोकने के लिए व्यापक कानून बनाने के साथ-साथ इसके समाधान तंत्र का सभी प्रावधान किया जाना चाहिए।

अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं (The Salient Features of the Act Are as Follows)

  • यह विशाखा मामलें में दी गई परिभाषा को ध्यान में रखते हुए “कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न” का व्यापक परिप्रेक्ष्य में वर्णन करता है और महिला कर्मचारियों को दी गई धमकी या महिलाओं के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को प्रभावित करने वाले प्रतिकूल कार्य वातावरण पैदा करने के प्रयास को शामिल कर इसे और भी विस्तृत बना दिया गया है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण पाने वाली पीड़ित महिला (Aggrieved Women) की परिभाषा को अत्यधिक विस्तृत बना दिया गया है ताकि बिना उसकी उम्र या रोजगार प्रस्थिति को ध्यान में रखे चाहे वह संगठित क्षेत्र में हो या असंगठित क्षेत्र में, सार्वजनिक क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में सभी संरक्षण पाने की हकदार होगी। इसमें ग्राहको खरीददारों के साथ-साथ घरेलू कामगारों को भी शामिल किया गया है।
  • जहाँ विशाखा दिशा-निर्देशों में कार्यस्थल परंपरागत ढाँचा जिसमें स्पष्ट नियोक्ता कर्मचारी संबंध पाए जाते हैं तक ही सीमित था, वहीं इस अधिनियम में संगठनों, विभागों कार्यालय सार्वजनिक निजी संगठित, असंगठित क्षेत्र की शाखा इकाई, अस्पतालों, नर्सिंग होम, स्टेडियम, शैक्षिक संस्थानों, खेल परिसर या किसी अन्य स्थान तथा रोजगार के दौरान कर्मचारी दव्ारा किसी स्थान की यात्रा जिसमें परिवहन भी शामिल है आदि को शामिल किया गया है।
  • अधिनियम में शिकायत निवारण तंत्र, आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee-ICC) तथा स्थानीय शिकायत समिति (local Complaints Committee-LCC) के रूप में है। सभी कार्यस्थलों पर जहाँ 10 या 10 से ज्यादा कर्मचारी हैं उनके लिए आंतरिक शिकायत समिति गठित करना अनिवार्य है। आतंरिक शिकायत समिति चार सदस्यी समिति होगी, जिसकी अध्यक्ष वरिष्ठ महिला कर्मचारी होगीं दो सदस्य प्रमुखत: वैसे कर्मचारियों में से शामिल किए जाएंगे जो महिला संबंधी मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध हो या जिन्हें सामाजिक कार्य का अनुभव या कानूनी जानकारी हो, और तीसरे पक्ष के सदस्य के रूप में किस गैर सरकारी संगठन आदि को शामिल किया जाता है।
  • स्थानीय शिकायत समिति पाँच सदस्यी होगी जिसकी अध्यक्ष सामाजिक कार्य करने वाली या महिला मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध प्रख्यात महिला होगी तथा एक सदस्य जिले की नगरपालिका (Municipality) , प्रखंड (Block) , तालुका, तहसील में कार्य करने वाली महिला होगी। दो सदस्यों में से कम से कम एक महिला सदस्य गैर सरकारी संगठन दव्ारा नामांकित की जाएगी जो महिला मुद्दों के प्रति प्रतिबद्ध हों। यह सदस्य ऐसा व्यक्ति भी हो सकता है जो यौन उत्पीड़न संबंधी मामलों से परिचित हो। नामांकित दो सदस्यों के मामले में शर्त यह है कि कम से कम एक सदस्य की पृष्ठीभूमि विधि या कानूनी जानकार की हो। सामाजिक कल्याण या महिला और बाल विकास से जुड़ा संंबंधित अधिकारी पदेन सदस्य होगा।
  • यौन उत्पीड़न की शिकायत तीन महीने की समय सीमा में दर्ज की जा सकती है। इस समय सीमा को अगले तीन महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है यदि महिला यह साबित कर दे कि मुश्किल परिस्थितियों के कारण वह निश्चित समय सीमा में शिकायत नहीं कर सकी।
  • समिति के लिए अनिवार्य है कि वह 90 दिनों के अंदर जा के अंदर जाँच पूरी करें। जाँच पूरी कर लेने के बाद रिपोर्ट मामले के अनुसार नियोक्ता या जिला अधिकारी (District Officer) के पास भेजनी होती है। उन्हें 60 दिनों के अंदर रिपोर्ट पर कार्रवाई करनी होती है।
  • अधिनियम दुर्भावनापूर्ण या मिथ्या शिकायतों के मामले में सेवा शर्त कानूनों के अनुसार दंड का प्रावधान करता है। हालांकि इस दुर्भावना संबंधी प्रावधान को शामिल करने से पहले जाँच करने के रूप में सुरक्षा प्रावधान भी थे। इसके अलावा केवल मामले को साबित करने में अक्षमता से इसके प्रावधानों के अंतर्गत जुर्माना आरोपित नहीं किया जा सकता है।
  • अधिनियम प्रत्येक नियोक्ता के लिए यह अनिवार्य करता है कि वह यौन उत्पीड़न से मुक्त वातावरण का निर्माण करे। नियोक्ताओं से यह अपेक्षा की गई है कि वे विधेयक के प्रावधानों के बारे में कर्मचारियों को संवेदनशील बनाने के लिए नियमित अंतराल पर कार्यशालाओं एवं जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन करें और आंतरिक समिति के गठन, यौन उत्पीड़न आदि के दंडात्मक परिणामों के बारे में सूचना प्रदर्शित करें।
  • अधिनियम के अंतर्गत नियोक्ता दव्ारा अपने कर्तव्यों के उल्लंघन की स्थिति में उस पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जा सकता है तथा बार-बार उल्लंघन करने की स्थिति में जुर्माने की राशि को दोगुना करने के साथ ही उसके लाइसेंस को रद्द किया जा सकता है या उसके कार्य करने के लिए आवश्यक पंजीकरण को वापस लिया जा सकता है।
  • निगरानी के संबंध में अधिनियम यह प्रावधान करता है कि राज्य सरकारें अपने क्षेत्र के सरकारी एवं निजी प्रतिष्ठानों में क्रियान्वयन की निगरानी तथा आँकड़े सुरक्षित रखने की व्यवस्था सुनिश्चित करवाएंगी। केन्द्र सरकार के प्रतिष्ठानों के मामले में यह जिम्मेदारी भारत सरकार को दी गई। सभी आंतरिक समितियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे वार्षिक रिपोर्ट नियोक्ता को सौंपे जो आगे जिला अधिकारी (District Officer) को सौपेगा। सभी स्थानीय शिकयता समितियाँ अपनी वार्षिक रिपोर्ट जिला अधिकारी (District Officer) को सौपेगी। जिला अधिकारी वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजेगा।

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