Public Administration: Legal Framework of Charitable Organisation in India

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

भारत में लोकोपकारी संगठनों की वैधानिक रूपरेखा (Legal Framework of Charitable Organisation in India)

लोकोपकारिता (Charity) समवर्ती सूची का विषय है, जिस पर केन्द्र व राज्य दोनों ही सरकारे कानून का निर्माण कर सकती हैं। भारत में लोकोपकारी संगठनों को प्रशासित करने वाली 5 प्रमुख विधियाँ निम्नवत्‌ है:-

  • द रजिस्ट्रेशन ऑफ सोसाइटीज एक्ट, 1860: यदि एक लोकोपकारी संगठन को एक सोसाइटी के रूप में गठित किया जाता है तो वह सोसाइटीज पंजीकरण अधिनियम, 1860 के दव्ारा प्रशासित होता है।
  • इंडियन ट्रस्टस एक्ट, 1882 : पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्टों के पंजीकरण व उनके विनियमन के लिए कोई केन्द्रीय कानून नहीं है। इस संदर्भ में इंडियन ट्रस्ट एक्ट, 1882 ही विभिन्न राज्यों में लागू है और यह केवल निजी ट्रस्टों पर लागू होता है। राज्यों में लोकोपकारी संगठनों के कार्यो व उद्देश्यों की निगरानी के लिए प्रावधान है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र व गुजरात के पास चैरिटीज कमिश्नर के ऑफिस हैं जो बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट्‌स एक्ट, 1950 के अंतर्गत निर्मित हैं। तमिलनाडु के पास एक डिपार्टमेंट ऑफ रिलिजस एंड चैरिटेबल एंडोमेंटस (Development of Religious and Charitable Endowments) है। यदि किसी राज्य में कोई पब्लिक ट्रस्ट एक्ट विद्यमान नहीं है तो उस राज्य में लोकोपकारी संस्थाओं के संदर्भ में इंडियन ट्रस्ट्‌स एक्ट, 1882 लागू होगा।
  • कंपनी अधिनियम, 1956: किसी लोकोपकारी संस्था को गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में भी कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत गठित किया जा सकता है।
  • आयकर अधिनियम, 1961 : आयकर अधिनियम, 1961 भी गैर-लाभकरी क्षेत्र के लोकोपकारी संस्थाओं को विनियमित करता है। इस संबंध में आयकर से छूट संबंधी मामलों की निगरानी आयकर विभाग करता है।
  • विदेशी सहयोग विनिमयन एक्ट, 1976 (Foreign Contribution Regulation Act, 1976-FCRA) : यह अधिनियम एक केन्द्रीय अधिनियम है, जो पूरे भारत में लागू है। बाह्‌य (External) कोषों को सुरक्षात्मक दृष्टि से नियंत्रित करने के उद्देश्य से यह अधिनियम बनाया गया था। लोकोपकारी संगठनों पर भी लागू होता है। इसका स्पष्ट अर्थ है कि गैर-लाभकारी संगठनों के रूप में लोकोपकारी संस्थाएँ गलत ढंग से तथा अनुचित मात्रा में विदेशी मौद्रिक लाभ नहीं ले सकती। ऐसे कोषो के देश में अंतरनिर्गमन पर नजर रखनी आवश्यक है ताकि ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा न बन जायें।

यह अधिनियम चुनावी उम्मीदवारों, पत्रकारों, लोकसेवाओं, संसद व विधान सभा के सदस्यों तथा राजनीतिक दलों दव्ारा विदेशी सहयोग (Foreign Contribution) को स्वीकार करने पर प्रतिबंध लगाता है। यह अधिनियम सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक, धार्मिक व सामाजिक कार्यक्रमों वाले संगठनों को अनुमति देता है कि वे विदेशी सहयोग को स्वीकार कर सकें लेकिन-

  • वह संगठन स्वयं को केंद्र सरकार के साथ पंजीकृत कराये।
  • इस बात पर सहमत हो कि वह किसी एक बैंक की विशिष्ट शाखा में ही विदेशी सहयोग को ग्रहण करेगा।
  • सरकार का सहयोग राशी प्राप्ति के स्रोत और राशि की मात्रा की जानकारी देगा।

वर्ष 2006 में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेग्यूलेशन) बिल, 2006 लाया गया जिसका उद्देश्य 1976 में अधिनियमित कानून में आवश्यकतानुसार संशोधन करना था। इस विधेयक में विनियमन, स्वीकृत व उपयोग के प्रावधानों को अधिक तार्किक बनाने पर जोर दिया गया था।

विश्व दानशीलता सूचकांक, 2011 (World Giving Index, 2011)

पूरे विश्व में लोगों में परोपकारिताया दानशीलता (Charity) के लिए करवाए गए सर्वेक्षण के मुताबिक लोगों में परोपकारिता की भावना बड़ी है। इस दिशा में भारत ने भी विश्व के देशों के साथ आगे कदम बढ़ाया है पर विकसित देशों की तूलना में यह काफी पीछे है। चैरिटी एंड फाउंडेशन के विश्व दानशीलता सूचकांक 2011 में भारत को 91वीं रैंक प्राप्त हुई है, जो कि वर्ष 2010 की 134 वीं रेंकिंग से काफी ऊपर है, पर विकसित देशों के मुकाबले भारत काफी पीछे है। भारत में धन दान, समय दान एवं अपरिचितों को मदद संबंधी व्यवहार में क्रमश: 14 प्रतिशत 6 प्रतिशत और 9 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। उल्लेखनीय है कि यह सूचकांक 153 देशों के लोगों के दानशीलता व्यवहार को आधार बनाकर तैयार किया गया है और इस व्यवहार के लिए तीन मानकों को अपनाया गया है।

  • धन दान
  • समय दान
  • अपरिचितों की मदद

फोर्ब्स एशिया की परोपकार के हीरो नामक सूची व भारत (Forbes Asia՚S List of Heroes of Charity and India)

फोर्ब्स एशिया ने परोपकार के हीरो नामक सूची 23 जून 2011 को जारी की, जिसमें एशिया के 48 परोपकारियों में 4 भारतीय भी शामिल है। ये चार भारतीय है -HCL टेक्नोलॉजीज के शिव नाडार, विप्रो समूह के अंजाम प्रेमजी, जीएमआर समूह के गांधी मल्लिकार्जुन राव और बॉलीवुड अभिनेता विवेक ओबेराय। फोर्ब्स के अनुसार भारतीय परोपकारियों के लिए गरीब बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराना प्रथम प्राथमिकता है।

दानकर्ताओं की भूमिका (Role of Donors)

  • हाल के दशकों में राष्ट्रीय एवं वैश्विक दोनों ही स्तरों पर विभिन्न विकास कार्यक्रमों, समाज सेवा कार्यो एवं दुर्बल वर्गो के उत्थान के लिए दान देने की प्रवृत्ति का विकास हुआ है। इसे व्यक्तिगत (Individual) व संस्थागत (Institutional) दोनों ही स्तरों पर देखा गया। उदाहरण के लिए व्यक्तिगत स्तर पर बिल एवं मिलिंडा गेटस दव्ारा विभिन्न भारतीय राज्यों में एच. आई. वी. एड्‌स से निपटने के लिए दान दिया गया है, वहीं संस्थागत स्तर पर विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक दव्ारा भारतीय राज्यों के विकास कार्यक्रमों में सहायता हेतु राशि दी जाती है।
  • उल्लेखनीय है कि ऑर्गनाइजेशन फॉर इकनॉमिक कोओर्परेशन एंड डेवलपमेंट (OECD) दव्ारा विकासशील देशों को अनुदान व ऋण के रूप में ‘आधिकारिक विकास सहायता’ (Official Development Assistance) प्राप्त होती है। यह अनुदान अथवा ऋण आर्थिक विकास व कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए दिया जाता है। ओईसीडी दव्ारा अपनी हालिया रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2011 में 45 देशों व 22 बहुपक्षीय संगठनों ने आधिकारिक विकास सहायता (ODA) प्राप्त की।

दानकर्त्ता संस्थाओं के समन्वय के लिए अतरराष्ट्रीय रूपरेखा (International Framework for Donor Coordination)

दानकर्ता संस्थाओं दव्ारा आधिकारिक विकास सहायता के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रथम महत्वूपर्ण प्रयास ओईसीडी की ′ डेवलपमेंट असिस्टेन्स कमिटी (DAC) के गठन के साथ 1960 में देखा गया। इसके उपरांत बहुपक्षीय सहायता के लिए वर्ष 1965 में सुयंक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) का गठन किया गया। वर्ष 2003 में ओईसीडी की डेवलपमेंट असिस्टेन्स कमिटी ने ′ सहायता प्रभावशीलता पर एक कार्य दल ′ (Working Party on Aid Effectiveness) का गठन किया। दानशीलता के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निर्मित रूपरेखा को निम्नांकित संस्थागत प्रयासों के रूप में देखा जा सकता है।

  • डोनर हार्मोनाइजेशन पर रोम हाई लेवल फोरम: वर्ष 2003 में आयोजित इस फोरम का प्रायोजक (Sponsor) ओईसीडी था। इस फोरम ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (MDGs) की दिशा में प्रगति पर जोर देने के तरीकों पर ध्यान केन्द्रित किया। फोरम के अनुसार आधिकारिक सहायता (Official Aid) की प्रभावशीलता व उसके समग्र प्रबंधन में सुधार करके अच्छी उपलब्धि प्राप्त की जा सकती है। इस फोरम ने कहा है कि इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाय कि डोनर, सहायता प्राप्त करने वाले देश की प्राथमिकताओं से ही जुड़ा हुआ हो।
  • सहायता प्रभावशीलता पर पेरिस उद्घोषणा (Paris Declaration on Aid Effectiveness) : पेरिस में वर्ष 2005 में सहायता प्रभावशीलता पर एक उच्च स्तरीय बैठक का आयोजन हुआ था। इसमें वैश्विक विकास एजेंडे के बारे में एक ठोस संरचना के विकास की जरूरत पर बल दिया गया। पेरिस उद्घोषणा में दान सहायता प्राप्त करने वाले देशों व दाता संस्थाओं के मध्य साझे दायित्वों को सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया। पेरिस उद्घोषणा में एक महत्वपूर्ण बात यह की गयी कि इसमें सहायता प्रभावशीलता के बारे में विशेष लक्ष्य और एक निगरानी प्रणाली की बात की गयी जो इससे पूर्व रोम उद्घोषणा में नहीं कही गयी थी।
  • अकरा एजेंडा फॉर एक्शन (Accra Agenda for Action) : सितंबर 2008 में अकरा, घाना में एक उच्च स्तरीय बैठक का पुन: आयोजन किया गया, जिसने रोम व पेरिस उदघोषाओं के क्रियान्वयन और इस दिशा में हुई प्रगति आदि का मूल्यांकन किया। अकरा एजेंडा फॉर एक्शन में भी सहायता (Aid) को प्रभावशाली बनाने पर जोर दिया गया। लेकिन अकरा में आयोजित सम्मेलन की एक विशिष्ट बात यह थी कि इसमें समानांतर रूप में सिविल सोसाइटी का एक वर्कशॉप भी आयोजित हुआ।
  • प्रभावी विकास सहयोग हेतु बुसान साझेदारी (Busan Partnership for Effective Development Cooperation) : अंतिम उच्च स्तरीय बैठक जो विदेशी सहायता व अंतरराष्ट्रीय दानकर्ताओं की विकास सहायता में समन्वय पर आधारित थी, का आयोजन बुसान, कोरिया में नंवबर, 2011 मंं किया गया। इसने पेरिस उद्घोषणा का सर्वेक्षण किया। गैर-सरकारी संगठनों ने एक गठंबंधन प्रतिनिधि (Coalition Representative) के रूप में बुसान में आयोजित वार्ता में भाग लिया जो विकास सहायता पर विकेन्द्रित विमर्शों (Decentralized Dualogues) का सूचक था। इसमें सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु दी जाने वाल सहायता को उचित ढंग से प्रयोग करने पर जोर दिया गया।

इसके अतिरिक्त विकास सहायता पर वैश्विक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण प्रयास जारी हैं। मानवीय हस्तक्षेपों (Humanitarian Interventions) के दौरान विकास सहायता के तार्किकीकरण (Rationalization) पर विचार चल रहा है।

सहकारी समितियाँ (Cooperative Societies)

  • एक सहकारी समिति समान उद्देश्य वाले व्यक्तियों का स्वायत संगठन है, जो पारस्परिक सहमति अथवा स्वेच्छा से अपनी समान आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त स्वामित्व वाले (Jointly Owned) और लोकतांत्रिक ढंग से नियंत्रित उपक्रम (Enterprise) के रूप में इसकी स्थापना करते हैं। सहकारी समितियाँ लाभ प्राप्ति के बजाय व्यापक मूल्यों, कार्यपद्धतियों व उद्देश्यों पर ध्यान केन्द्रित करती हैं।
  • एक सहकारी उपक्रम अथवा इकाई कुछ सार्वभौमिक मूल्यों व सिद्धांतों पर आधारित होती है जिसमें स्व-सहायता, लोकतंत्र, समता (Equity) , समानता व एकता प्रमुख हैं।

भारत में सहकारी समितियों का विकास (Development of Cooperative Societies in India)

  • भारत में सबसे पहले वर्ष 1904 में कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसाइटीज एक्ट, 1904 नामक कानून बनाया गया था। कालांतर मे वर्ष 1912 में गैर-साख समितियों (Non-Credit Societies) व संघीर्य सहकारी समितियों (Federal Cooperative Societies) के गठन के लिए ‘सहकारी समिति अधिनियम, 1912’ बनाया गया। 1928 में रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर में सहकारी समितियों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मेरुदंड के रूप में पहचान की गयी। वर्ष 1942 में ब्रिटिश भारतीय की सरकार ने ‘मल्टी यूनिट कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट’ का निर्माण किया।
  • स्वतंत्र भारत में 1990 के दशक में सहकारी समितियों के विकास व भारत में सहकारिता के सुदृढ़कीरण पर विचार हेतु ब्रह्य प्रकाश समिति (1990) , मिर्धा समिति (1996) , जगदीश कपूर समिति (2000) और वी. एस. व्यास समिति (2001) का गठन किया गया।
  • वर्ष 2002 में भारत सरकार ने सहकारी उपक्रमों पर राष्ट्रीय नीति (National Policy on Cooperatives) की घोषणा की।

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