Public Administration: Limitations and Possibilities of E-Governance

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भूख, निर्धनता व विकास से संबंधित मुद्दे (Issues Relating to Hunger, Poverty and Development)

ई-शासन की सीमाएँ व संभावनाएँ (Limitations and Possibilities of E-Governance)

कंप्यूटर पर सरकारी यानी ई-गवर्नेस के प्रति रूझान बढ़ रहा है। आंध्र प्रदेश में ई-सेवा परियोजनाओं के तहत लोग करोड़ों ट्रांजेक्शन कर चुके हैंं। लेकिन क्या ये उपलब्धियाँ उस देश में काफी हैं जिसमें ई-गवर्नेस के दो दशक हो चुके हैं? अब यह विश्लेषण करने की जरूरत है कि क्यों ई-गवर्नेस परियोजनाएँ उस हद तक सफल नहीं हो सकीं, जितनी उनसे उम्मीद की जा रही थी? इन असफलताओं के मुख्य तौर पर 3 बड़े कारक हैं-

  • परियोजनाओं की ठीक तरह से तैयारी न करना।
  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उचित नीतियों का अभाव।
  • पोस्ट प्रोजेक्ट प्लान पर्याप्त न होना।

ज्यादातर परियोजनाएँ विभाग की वास्तविक जरूरतों या नागरिकों की आवश्यकताओं के गहन विश्लेषण व सर्वेक्षण पर कभी-कभार ही आधारित होती हैं।

  • दूसरा बड़ा कारक जमीनी वास्तविकताओं के आकलन का पूरी तरह से अभाव है। बिजली की उपलब्धता, स्टाफ के सदस्यों का मानसिक नजरिया और परिक्षण का स्तर, परियोजन का विरोध करने वालों का निहित हित, टेलीफोन और इंटरनेट कनेक्शन की क्वालिटी जैसे महत्त्वपूर्ण कारकों पर ध्यान न देने के कारण परियोजनाएॅं असफल हो जाती है।
  • तीसरा बिंदू क्रियान्वयन की समुचित योजना का न होना है। जो विभाग अनुदान प्राप्त करता है, वह इसे खर्च करने की जल्दबाजी में एक अधिकारी ज्यादातर अंशकालिक को ही चुनता है, उसके साथ कुछ सदस्यों को लगा देता है और विभागीय स्तर पर परियोजना शुरू हो जाती है। इसकी बजाय मल्टी एजेंसी क्रियान्वयन की योजना बनानी चाहिए जिसमें विभाग की समझ, सलाहकारों की तकनीकी ज्ञान, विक्रेता का अनुभव और जनसामान्य के हितों के अनुरूप सामाजिक संगठन या उपभोक्ता संगठन की संवेदनशीलता का मिश्रण हो। विभागीय स्तर की ज्यादातर परियोजनाएॅं इसलिए असफल हो जातीें हैं क्योंकि आईटी परियोजनाओं के लिए जो रफ्तार और लचीलापन चाहिए वह सरकारी तंत्र नहीं दे पाता।
  • परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उचित नीतियों का अभाव दूसरी श्रेणी की कमी है। सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में जरूरतों का विश्लेषण सबसे कमजोर कड़ी है। जरूरतों का संकलन करते वक्त नागरिक और विशेषकर ग्रामीण जनता, स्टॉफ सदस्यों और अधिकारियों का पक्ष एवं दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होता है। सॉफ्टवेयर का दूसरा पहलू जिसका ई-गवर्नेस में ध्यान नहीं दिया जाता वह यह है कि उसे भविष्य के लिए ध्यान रखकर डिजाइन न किया जाना जबकि इसे यूजर्स फीडबैक के आधार पर या दूसरे सरकारी आई टी सिस्टम के साथ जोड़कर या नए तकनीकी समावेश (मोबाइल, जीआईएस आदि) के साथ बदले या जोड़े जाने की गुंजाइश होनी चाहिए।
  • ई-गवर्नेस परियोजनाओं में इलेक्ट्रिक पावर सिस्टम बनाते समय शायद ही इस बात का ध्यान रखा जाता है की ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में चार से बारह घंटे ही बिजली आती है। शहरी क्षेत्रों में भी यही समस्या है। अत: ग्रामीण इलाकों में ऐसा यूपीएस भी अनिवार्य रूप से लगाना चाहिए जिसका बैट्री बैकअप कम से कम 8 घंटे का हो और जिसे जनरेटर तंत्र की सहायता मिल सके। डाटा एंट्री की कमजोर योजना और समुचित प्रशिक्षण के अभाव के चलते भी परियोजनाएँ असफल हो जाती है। आईटी परियोजनाओं का उद्देश्य यह है कि जनता को चौबीसों घंटे सातों दिन () आँकड़े उपलब्ध हो। चूँकि ज्यादातर नागरिकों की कंप्यूटरों तक पहुँच अभी नहीं है, अत: ई-गवर्नेस परियोजनाओं में उन तर्क आँकड़े टेलीफोन (आईवीआर या काल संटेर आधारित) या मोबाइल फोन की एमएमएस सेवा के माध्यम से भेजना अनिवार्य होना चाहिए।
  • अंतिम श्रेणी की गलती में क्रियान्वयन के बाद की कोई समुचित योजना का न होना शामिल है। सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर को प्रतिस्थापित करने लोगों को प्रशिक्षित करने और डाटा एंट्री करने के बाद यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि भविष्य में परियोजना सुचारू रूप से चलती रहे। दुर्भाग्य से ज्यादतर ई-गवर्नेस परियोजनाओं में ऐसी कोई दूरदर्शी योजना नहीं होती। यदि ई-गवर्नेस परियोजनाओं में इन सब श्रेणियों की गलतियों पर पूरी तरह ध्यान दिया जाये, तो परियोजना की उच्च गुणवत्ता को सुनिश्चित किया जा सकता हैं। लोगों को भी इससे काफी लाभ होगा वरना यह महत्वाकांक्षी परियोजना व्यर्थ न हो जाये।

आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Evaluation)

  • भारत में ई-गवर्नेस यद्यपि धीरे-धीरे फैल रहा है लेकिन इसे एक उपलब्धि के रूप में अभी नहीं देखा जा सकता। विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) ने अपने Global Information Technology Report 07 esa Network Readiness Index के आधार पर भारत को चालीसवें स्थान पर रखा है जो यह दर्शाता है कि भारत में आईटी या सूचना अभिशासन का लाभ समाज के बड़े भाग को नहीं पहुँचा है।
  • वित्तीय निवेश की दृष्टि से यदि देखा जाए तो भारत में सूचना अभिशासन के उन्नयन के लिए किये जाने वाले खर्च में अत्यधिक वृद्धि हुई है। भारत में ई-गवर्नेस पर किया जाने वाला खर्च 2002 - 03 में केवल 280 मिलियन डॉलर था जो 2003 - 04 में बढ़कर 480 मिलियन डॉलर हो गया जो 60 प्रतिशत को दर्शाता है। यही स्थिति 2012 - 2013 में भी देखी जा सकती है।
  • निष्कर्षत: भारी निवेश के अनुपात में वास्तविक उपलब्धि कतिपय सूक्ष्म है। आवश्यकता केवल निवेश बढ़ाने की नहीं बल्कि उन कदमों को उठाने की है जो सूचना अभिशासन को सफल बनाने में सहायक हो सकते हैं; विशेषकर मानव संसाधन विकास, ई-साक्षरता, संचार अवसरंचना का विकास आदि।
  • हालाँकि इन परियोजनाओं की सफलता यह दर्शाती है कि ऐसे अनेक तरीके हैं जिससे आईसीटी (इंर्फोमेंशन एंड कम्प्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी) ग्रामीण भारत में उत्पादकता को बढ़ावा दे रही है। स्थानीय लोगों के समाधानों का आदान-प्रदान कर, कृषि एवं बाजार आदि से जुड़ी महत्वपूर्ण और व्यवाहारिक सूचनाओं को सुलभ कराने जैसे अनेक कार्यो के जरिये आईसीटी ग्रामीण क्षेत्रों का चेहरा बदलने का काम कर रही है। विकास के क्रम में तेजी लाने के लिए राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तरों पर आईसीटी के अनुकरणीय प्रयास किए जा रहे हैं।
  • लेकिन, आईसीटी पर ज्यादा जोर देने के बजाय इन परियोजनाओं को नागरिकों की सेवा के लिए संपोषणीय प्रणालियों व विकास पर ध्यान देना होगा। इसमें लोगों को सस्ती, अधिक कार्यकुशल और त्वरित सेवा प्रदान करने की क्षमता है।
  • वर्तमान में आईसीटी का उपयोग स्थानीय स्तर पर, विशेषत: स्थानीय निकायों और नगरपालिकाओं में खुलापन, पारदर्शिता और प्रभाविता लाने वाले साधन के रूप में किया जा रहा है। अतएव यदि राज्य और केन्द्रीय सरकारें प्रत्येक जिले और विकास खंडों में इसे लागू करने पर जोर दें तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए आईसीटी का पूरा लाभ उठाया जा सकता है।
  • आईसीटी व्यापक भागीदारी का कोई समाधान नहीं है बल्कि केवल उसका साधन भर है और कोई साधन उतना ही प्रभावी होता है जितना कि उसका उपयोग। इन साधनों का उपयोग लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।
  • वेब विशेषज्ञता और काम करने के घंटों का अभाव ई-प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती है। बहुपक्षीय सहयोग तथा वेब विकास के साधन और साँचे संभवत: इसका समाधान हो सकते हैं। इसके अलावा, निजता और सुरक्षा संबंधी मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं और यह सर्वत्र लागू होता हैं, चाहे वह शहरी क्षेत्र हो या ग्रामीण।
  • अनेक ग्रामीण सरकारें लोगों को बहुमूल्य सूचनाएँ प्रदान करने के लिए ई-प्रशासन का इस्तेमाल करती हैं परन्तु सूचना और डाउनलोड करने योग्य दस्तावेज जहाँ आम हो गई है वहीं अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में ऑनलाइन कारोबार का क्रियान्वयन होना अभी बाकी है।
  • जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी का विकास हो रहा है, ई-प्रशासन सेवाओं के दायरे और गहराई में तेजी से विस्तार हो रहा है। ग्रामीण समाजों को अभी ई-प्रशासन के पूरे लाभ उठाने है। यदि आईसीटी के लाभ देश के कुछ भागों में उठाए जा सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि देश के हर कोने में इसका लाभ नहीं उठाया जा सकता। बस इसे दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के साथ लागू करने की आवश्यकता है।

सुझाव (Suggestion)

ई-गवर्नेस प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर प्रभावी रूप से अंकुश लगाए, इसके लिए इसे व्यापक स्तर पर लागू करना होगा। ई-गवर्नेस व्यवस्था की सेवाओं का उपयोग करने के लिए नागरिकों को भी इसके योग्य बनाना होगा। इसके लिए शिक्षा देने के पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करके भी नागरिकों को ई-गवर्नेंस का लाभ उठाने के लिए प्रेरित करना होगा। यदि सूचना का अधिकार लोगों को सूचना की मांग करने का अधिकार देता है तो ई-गवर्नेंस सरकार को सूचना आपूर्ति करने का साधन उपलब्ध कराता है। ई-शासन के चार आधार स्तंभों को मजबूत बनाये जाने की आवश्यकता है।

Four Pillars of E-Governance

भारत में ई-शासन पर कार्यरत्‌ संस्थाएँ (Institutions Working on E-Governance in India)

सेंटर फॉर डवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग (सी डैक) , सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस, डाटाक्वेस्ट, द सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ ई-गवर्नेंस, ई-गवर्नेस ऑनलाइन, ई-गवर्नेस स्टेंडर्ड, ई-गवर्नेस मॉनिटर, ईस्टिट्‌यूट फॉर इलेक्ट्रोनिक गवर्नेस, आई गवर्मेंट, इंफार्मेशन फॉर डेवलपैंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (भारत सरकार) , एस पी पोस्ट, नेशनल इंस्टीट्‌यूट ऑफ स्मार्ट गवर्नेस, राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र, यूनेस्को, संयुक्त राष्ट्र लोक प्रशासन नेटर्क, संयुक्त राष्ट्र ई-गवर्नेस नेटवर्क इत्यादि।

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