Public Administration: Mandatory Executive Functions and Responsibilities

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अनुसूचित जातियों, शोषित वर्ग, अल्पसंख्यकों व अनुसूचित जनजातियों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Law, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Scheduled Castes, Depressed Class, Minorities and Scheduled Tribes)

पेसा कानून के तहत ग्राम सभा एवं ग्राम पंचायत को निम्न अधिकार एवं शक्तियाँ प्राप्त हैं (Under PESA Gram Sabha and Panchayats Are Given Wide Functions Power and Responsibilities as Follows)

अनिवार्य उत्तरदायित्व एवं कार्य (Mandatory Executive Functions and Responsibilities)

ग्रामीण स्तर पर सभी योजनाओं को लागू करने के लिए पंचायतों को ग्राम सभा की अनुमति लेनी होगी। पंचायत दव्ारा वित्त के प्रयोग के संबंध में प्रमाणीकरण का अधिकार ग्राम सभा का अधिकार होगा। लघु जल निकायों (Minor Water Bodies) का प्रबंधन और योजना निर्माण पंचायत करेगी।

अनिवार्य सलाह (Mandatory Consultation)

अनुसूचित क्षेत्रों में विकास योजनाओं हेतु-भूमि अधिग्रहण से पहले तथा प्रभावित लोगों के पूर्नवास से पहले ग्रामसभा एवं ग्राम पंचायत से सुझाव अवश्य लिया जाएगा।

अनिवार्य अनुशंसा (Mandatory Recommendations)

खनिजों के खनन हेतु नीलामी और लाइसेंस देने के अधिकार से पूर्व ग्राम सभा या पंचायत की अनुशंसाओं पर अनिवार्य रूप से विचार करना होगा।

पेसा कानून, 1996 का पुनर्विलोकन (Critical Review of PESA Act, 1996)

  • विभिन्न रिपोर्टो से खुलासा हुआ है कि राज्य सरकार ने इस कानून की शक्तियों में ढील दी है।
  • मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ को छोड़कर अधिकांश राज्यों, ग्राम सभाओं के स्थान पर ग्राम पंचायतों को शक्ति दी है, जोकि पेसा कानून का उल्लंघन है।
  • धोखाधड़ी के दव्ारा बहुत-सी जनजातीय भूमि को गैर जनजातीय भूमि में बदलाव के मामले सामने आये है।
  • ये जानते हुए भी कि कानून के तहत वन्य जनजातियों का वनोत्पादों पर पहला अधिकार है, वन विभाग स्वयं ही उसका उल्लंघन करते हुए वन संपदा को धनी उद्योगों के हवाले कर रहा है।
  • कुछ कानूनों एवं नीतियों का पेसा एक्ट से अंतर्विरोध भी सामने आया है।
Critical Review of PESA Act, 1996
पेसा से कुछ नीतियों में मतभेदकुछ कानूनों से पेसा के मतभेद
परियोजना प्रभावित लोगों के पुनर्वास एवं विस्थापन से संबंधित राष्ट्रीय नीति, 20031894 का भूमि अधिग्रहण कानून
राष्ट्रीय जल नीति, 2003खनिज एवं खान (विकास विनियमन) कानून 1957
राष्ट्रीय खनिज नीति, 2003वन संरक्षण कानून 1980
राष्ट्रीय वन नीति, 2003
वन्य जीव संरक्षण रणनीति, 2002
राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006

अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989)

अधिनियम की विशेषताएँ (Highlights of the Act)

  • ‘अत्याचार’ शब्द की परिभाषा पहली बार अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा (1) (क) 3 के अधीन दंडनीय अपराध के रूप में की गई थी। धारा 3 (1) में यह कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति, जो अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के प्रति विनिर्दिष्ट अपराध करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छ: मास से कम नहीं होगी, लेकिन जो पाँच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से दंडनीय होगा।
  • इसी प्रकार, उक्त अधिनियम की धारा 3 (2) गैर- अनसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति व्यक्तियों दव्ारा अनसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति व्यक्तियों के प्रति किए जाने विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए विभिन्न श्रेणी के दंड और जुर्माने के साथ अपराध विनिर्दिष्ट किए गए हैं।
  • ये अपराध जो मुख्यत: व्यवहार के तरीकों से संबंधित हैं और अनसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के आत्म-सम्मान और स्वाभिमान को चकनाचूर करते हैं और स्थूल रूप से आर्थिक अधिकारों और लोकतांत्रिक सम्मान को नकारने, महिलाओं पर हमला करने अथवा उनका यौन शोषण करने, संपत्ति को क्षति पहुँचाने और अथवा उसे नष्ट करने की कानूनी और अथवा प्रशासनिक प्रक्रियाओं का जानबूझ कर दुरुपयोग करने के बारे में होते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 244 में यथानिर्दिष्ट अनुसचित क्षेत्रों अथवा जनजातीय क्षेत्रों में शामिल किसी क्षेत्र में किसी व्यक्ति दव्ारा इस अधिनियम के अंतर्गत किया जाने वाला संभावित अपराध भी इनमें शामिल है।
  • इस अधिनियम के अंतर्गत सामान्य कारावास की अवधि छ: मास से कम नहीं होगी, जो जुर्माने सहित पाँच वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है। दूसरी बार अपराध करने के दोषी व्यक्ति के लिए कारावास का न्यूनतम दंड एक वर्ष है।
  • अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 में मामलों के शीघ्र विचारण के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना करने, अदालतों में मामलों को चलाने के प्रयोजन से विशेष लोक अभियोजकों और अनुसूचित क्षेत्र अथवा जनजातीय क्षेत्रों में किसी अपराध के लिए, किसी क्षेत्र को अत्याचार-प्रवण क्षेत्र घोषित करने और इन क्षेत्रों में जिला प्रशासन दव्ारा निवारक और दंडात्मक कार्रवाई किए जाने के लिए विशिष्ट रूप से उपबंध किए गए हैं।
  • अधिनियम में यह उपबंध है कि केन्द्रीय सरकार हर वर्ष उसके दव्ारा और राज्य सरकारों दव्ारा किए गए उपायों के बारे में एक रिपोर्ट संसद के प्रत्येक सदन के पटल पर रखेगी।

अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (संशोधन) , 1995 (Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act (Amendment) , 1995)

अधिनियम की विशेषताएँ (Highlights of the Act)

अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 1995 में राज्य सरकार दव्ारा निष्पादित किए जाने के लिए कुछ कर्तव्य और जिला प्रशासन दव्ारा निष्पादित किए जाने के लिए कुछ कर्तव्य समनुद्दिष्ट किए गए हैं।

राज्य सरकारों को मुख्य कार्य सौंपे गए हैं (Important Work Delegated to State Government)

  • अत्याचार-प्रवण क्षेत्र परिलक्षित करना, अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने में सरकार को सहायता देने के लिए उच्च स्तरीय राज्य समिति, जिला और डिवीजनल समितियाँ गठित करना, सतर्कता और निगरानी समिति स्थापित करना और जागरूकता केन्द्र स्थापित करना, अनसूचित जाति/ अनुसूचित जनजाति व्यक्तियों को उनके अधिकारों, आदि के बारे में शिक्षित करने के लिए परिलक्षित क्षेत्रों में कार्यशाला आयोजित करना।
  • जिला मजिस्ट्रटों, पुलिस अधीक्षकों और अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति संरक्षण कक्ष के कार्यकरण का समन्वय करने के लिए राज्य सरकार के सचिव स्तर का नोडल अधिकारी नामांकित करना।
  • मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में राज्य स्तर पर एक सतर्कता और निगरानी समिति स्थापित करना।
  • अधिनियम के उपबंधों के कार्यान्वयन के लिए किए गए उपायों के बारे में केन्द्रीय सरकार को 31 मार्च से पहले एक रिपोर्ट भेजना।

अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 1995 में जिला प्रशासन दव्ारा निष्पादित किए जाने के लिए कुछ कार्य निर्धारित किए गए हैंं।

जिला मजिस्ट्रेट को ये कार्य सौंपे गए हैं (Work Delegated to the District Magistrate)

  • घटना स्थल पर जाना और जीवन की क्षति और संपत्ति को हुए नुकसान को आकना।
  • तत्काल राहत और पुनर्वास सुनिश्चित करना, विशेष न्यायालय को राहत और पुनर्वास के बारे में सूचना देना।
  • यदि उत्पीड़ित चाहे, तो मुकदमा लड़ने के लिए किसी प्रतिष्ठित वकील की सेवाएँ मुहैया करना।
  • अधिनियम और उसके तहत बने नियमों के उपबंधों के कार्यान्वयन की समीक्षा करने के लिए जिले में एक सतर्कता और निगरानी समिति स्थापित करना।

इसी प्रकार, अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) नियम, 1995 के अंतर्गत

जिला पुलिस अधीक्षक के लिए यह कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं (Responsibility Decided for District Superintendent of Police)

  • घटना-स्थल पर जाना।
  • क्षेत्र में ऐसा पुलिस बल तैनात करना और ऐसे अन्य निवारक उपाय करना, जो आवश्यक समझे जाएँं।
  • एक अन्वेषण अधिकारी नियुक्त करना जो पुलिस के उप-अधीक्षक से नीचे के रैंक का न हो और नियुक्ति करने से पहले उसके पूर्व-अनुभव योग्यता और न्याय की भावना को ध्यान में रखना।
  • यह सुनिश्चित करना कि अन्वेषण 30 दिन के अंदर पूरा हो जाए।

भारत में अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की मॉनिटरिंग हेतु संवैधानिक निकाय (Constitutional Body for Monitoring Scheduled Tribes Rights in India)

स्ांविधान के निर्माताओे ने इस तथ्य पर ध्यान दिया था कि देश के कुछ समुदाय अत्यंत सामाजिक शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन से उत्पीड़ित हैं, जो अस्पृश्यता की अति-प्राचीन प्रथा से उत्पन्न हुआ है और कुछ अन्य समुदाय आदिम काल की कृषि पद्धतियों, बुनियादी ढाँचे की सुविधाओं के अभाव और भौगोलिक अलगाव के कारण इन बातों में पिछड़े हुए है और इसलिए उनके त्वरित सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए उनके हितों को सुरक्षित करने के लिए उनकी ओर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इन समुदायों को भारत के संविधान के अनुच्छेद 34 और 342 क खंड के उपबंधों के अनुसार क्रमश: अनसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के शोषण के खिलाफ रक्षोपायो की व्यवस्था करने के लिए और उनके सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा करने के लिए संविधान में विशेष उपबंध किए गए थे। सरकार ने महसूस किया कि अपनी सामाजिक नि: शक्तता और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण, वे निर्वाचित पदों, सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थाओं में अपना युक्तिसंगत हिस्सा प्राप्त करने में घोर रूप से असमर्थ हैं और इसलिए शासन में उनकी उचित भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए इन समुदायों के पक्ष में आरक्षण की नीति का अनुसरण करना जरूरी समझा गया।

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