Public Administration: Important Mechanism and Migrant Workers

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भारत में अन्य असुरक्षित समूहों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण तंत्र, विधि, संस्थायें एवं निकाय (Important Mechanism, Laws, Institutions and Bodied for Betterment and Protection of Other Vulnerable Groups in India)

प्रवासी कामगार (Migrant Workers)

  • प्रवासी कामगारों के साथ प्रवास की प्रक्रिया के दौरान सभी स्तरों पर विविध प्रकार का शोषण होने के कारण वे असुरक्षित होते हैं। विभिन्न सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के कारण प्रवास का प्रभाव भी अलग-अलग प्रकार का हो सकता है। लगभग 214 मिलियन लोग, विश्व की जनसंख्या का 3 प्रतिशत अपने जन्मस्थान से बाहर के देशों में रह रहे हैं। पुरुष, महिलायें, बच्चे, किशोर और परिवार अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लाँघ रहे हैं ताकि उनकी जीवन की दशों सुधर सके और कभी-कभी इसलिए कि उनका अस्तित्व बचा रहे। 1975 से 2010 के बीच आर्थिक विषमताओं जनांकिकीय बदलाव नागरिक युद्धों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय प्रवासी लोगों की संख्या दोगुनी हो गई है।
  • हालांकि भारत ने श्रम अधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानकों की पुष्टि करके एक प्रशंसनीय काम किया है और साथ ही इस संबंध में भारतीय श्रम कानून भी पर्याप्त हैं, परन्तु प्रमुख समस्या मौजूदा कानूनों और नियमों को लागू करने के स्तर पर है। भारत विशेषत: वंचित समुदाय के कामगारों के अधिकारों की निगरानी श्रमिकों के प्रति दुर्व्यवहार और कार्यस्थल पर विभेद जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है।
  • विभिन्न अवसरंचनात्मक नीतियों और कार्यक्रमों जैसे-JNNURM MGNREGA और अन्य विकासपरक योजनाओं के उद्भव के साथ-साथ कामगारों और श्रमिकों को बड़े पैमाने पर अंतर राज्यीय प्रवसन भी हुआ हैं। राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (National Sample Survey) के 64वें राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार

भारत में श्रमिकों के प्रवास हेतु उत्तरदायी प्रमुख कारक-

  • क्षेत्रों के बीच आर्थिक विषमता
  • रोजगार के बहुत ही कम अवसर
  • प्राकृतिक आपदायें
  • विकास प्रेरित विस्थापन
  • समुदायों में संघर्ष की स्थिति
  • ग्रामीण क्षेत्र में कृषि में घटते निवेश के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर लोग औद्योगिक रूप से विकसित क्षेत्रों की ओर गमन कर रहे हैं।
  • शहरी/औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों की अधिक माँग

प्रवासी श्रमिकों के परिवारों और बच्चों हेतु कानून एवं विधान (Law and Legislation of the Migrant Labours Families and Their Children)

अंतर-राज्यीय प्रवासी कामगार (नियोजन का विनियमन और सेवा शर्तें) अधिनियम, 1979 (The Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Service Act, 1979) )

अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक साधारणत: अशिक्षित, असंगठित होते हैं और सामान्यत: बेहद कष्टपद दशाओं में कार्य करते हैं अत: इन कठिनाइयों को देखते हुए शोषण से इनकी सुरक्षा हेतु जिस राज्य से इनकी नियुक्ति हुई और जिस राज्य में वे कार्यरत हैं, दोनों में कुछ प्रशासकीय और विधायी व्यवस्था करना जरूरी है। जिस कॉम्पेक्ट कमिटी का गठन 1977 में हुआ था उसने अंतरराज्यीय प्रवासी कामगारों के रोज़गार के नियमन हेतु पृथक केंद्रीय विधायन लागू करने की अनुशंसा की थी।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान (Salient Features of this Act)

  • यह अधिनियम उन कामगारों के हितों और जीवन की गरिमा का संरक्षण करता है जो भारत में अपने गृह राज्य से बाहर सेवा देते हैं। जब भी नियोक्ता स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कामगारों में कौशल की कमी का सामना करता है, अधिनियम राज्य के बाहर उपलब्ध कुशल कामगारों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
  • अंतरराज्यीय कामगारों को नियुक्त करते समय, नियमित नियोक्ता को अंतरराज्यीय प्रवासियों को सामान्य प्रकृति के काम के लिए स्थानीय कामगारों की भाँति ही उनके बराबर या अधिक वेतन अथवा न्यूनतम वेतन अधिनियम, 1948 के तहत निर्धारित न्यूनतम वेतन, दोनों में से जो अधिक हो देना चाहिए। इसके साथ-साथ अंतरराज्यीय कामगारों को विस्थापन का मूल्य भी मिलना चाहिए।
  • यह अधिनियम केवल अस्थायी रूप से अंतरराज्यीय कामगारों के विस्थापन की व्यवस्था करता है ताकि कुशल कामगारों की कमी को पूरा किया जा सके।

अंतरराज्यीय कामगारों के अधिकार (Rights of Interstate Workers)

  • उस कार्य के लिए जिसकी प्रकृति और अवधि स्थानीय कामगारों के कार्य के समान हो इसके लिए अंतरराज्यीय कामगारों को स्थानीय कामगारों से अधिक या बराबर वेतन अथवा न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत निर्धारित वेतन, जो भी अधिक हो।
  • विस्थापित भत्ता।
  • गृह यात्रा भत्ता जिसमें यात्रा की अवधि का वेतन भी सम्मिलित है।
  • अनिवार्य आधार पर मुफ्त चिकित्सा सुविधायें और उपयुक्त आवास।
  • बिना किसी जवाबदेही के अनुबंध की समाप्ति के बाद रोजगार का अंत
  • किसी घटना, दुर्घटना आदि के 3 माह के भीतर प्राधिकरणों के पास शिकायत दर्ज कराने का अधिकार

अनुबंधकर्ताओं की भूमिका (Role of Contractors)

  • राज्य सरकार दव्ारा निर्धारित स्वरूप (Form) के अनुसार कामगारों के वितरण को नियमित रूप से संवर्द्धित करना।
  • रजिस्टर बनाये रखना जिसमें अंतरराज्यीय कामगारों का विवरण हो और वैधानिक संस्थाओं दव्ारा जाँच के समय उसे उपलब्ध कराना।
  • प्रत्येक अंतरराज्यीय कामगार को उसकी पासपोर्ट के आकार की फोटो वाली पासबुक जारी करना जिसमें कामगार का नाम, उसे नियुक्त करने वाली संस्था का नाम, रोजगार की अवधि वेतन की दर आदि अंकित हो।
  • घातक दुर्घटना या गंभीर चोट लगने की दशा में अनुबंधकर्ता दव्ारा दोनों राज्यों की संबंधित विनिर्दिष्ट संस्थाओं को सूचित करना और कामगार के परिजनों को भी सूचित करना।
  • अधिनियम के अधीन, उल्लंघन की स्थिति में निर्धारित दंड हेतु जवाबदेह होना।
  • प्रत्येक नियमित नियोक्ता अपने दव्ारा अधिकृत एक प्रतिनिधि नामित करेगा जो अनुबंधकर्ता दव्ारा वेतन देते समय वहाँ उपस्थित रहेगा और इस प्रतिनिधि का यह कर्तव्य होगा कि वह निर्धारित तरीके से ही वेतन के रूप में प्रदत्त मूल्य को प्रमाणित करे।
  • अनुबंधकर्ता दव्ारा अंतरराज्यीय कामगारों को वेतन या अन्य लाभ देने में असफल होने पर यह पूरा खर्च नियोक्ता उठाएगा।

अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार (रोजगार का नियमन और सेवा की शर्ते) संशोधन विधेयक, 2011 में इस अधिनियम के शीर्षक में संशोधन करके तथा इसके शब्दों ‘कामगार (Worker) और कामगारों’ (Workers) को ‘कर्मचारी’ (Employee) और कर्मचारियों (Employees) दव्ारा प्रतिस्थापित करके इसे लैंगिक रूप से तटस्थ बनाने का प्रावधान है।

सेक्स वर्कर्स, एचआईवी रोग तथा गंमीर रोगों से ग्रसित रोगी (Sex Workers , HIV. Patients, Patients Suffering from Dreaded Diseases)

सेक्स वर्कर्स और समलैंगिक समुदायों के साथ होने वाला भेदभाव (Discrimination Faced by Sex Workers and Queer Communities)

सेक्स वर्कर्स के साथ पूरे विश्व में दुर्व्यवहार होता है और इनके अधिकारों का सर्वत्र हनन भी होता है। सेक्स वर्कर अक्सर बुरी दशाओं में काम करते हैं जिससे उनकी शारीरिक सुरक्षा और स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है और इन्हें कानून के तहत सुरक्षा भी नहीं मिल पाती। सेक्स वर्कर विशेष रूप से जबरदस्ती और बलात्कार के कारण उत्पीड़ित होते हैं। सेक्स वर्करों के प्रति सामाजिक कलंक और भेदभाव, एक हिंसा की संस्कृति को जन्म देता है। उनकी सुरक्षा और सुधार संबंधी मूलभूत अधिकार सामान्यत: भुला दिये जाते हैं, सेक्स वर्कर्स को अक्सर दंड भुगतना पड़ता है और इनके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार होता है।

Sex Workers and Queer Communities

हालाँकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21, जीवन जीने के अधिकार की, अनुच्छेद 14 के अधीन समानता के अधिकार की बात तो करता है परन्तु इस वर्ग के लोगों के साथ गंभीर रूप से भेदभाव किया जाता है। वंचित/संकटग्रस्त समूह के रूप में सेक्स वर्कर्स की सुरक्षा के लिए कोई कानून और विधायन नहीं है। भारत में सैकड़ों संस्थायें सेक्स वर्कर्स और ट्रांसजेंडर समुदायों के कल्याण हेतु कार्य कर रहे हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण हैं-

  • दरबार महिला समन्वय समिति
  • सेक्स वर्कर्स का अखिल भारतीय संजाल (AINSW)
  • राष्ट्रीय एड्‌स नियंत्रण संगठन (NACO)

भारत में समलैंगिक समुदायोंं की असुरक्षा एवं विभेद (Discrimination and Vulnerability of Queer Communities (LGBT) in India)

आज पूरे भारत से विभिन्न आवाज और समूह इन समुदायों के गरिमापूर्ण और बिना हिंसा एवं भय के जीवन जीने के अधिकार, और इन समुदायों के संवैधानिक अधिकारों की पैरवी कर रहे हैं।

भारत में LGBT समूह के साथ होने वाला विभेद (Discrimination Faced by LGBT is India)

  • इन्हें सामाजिक रूाप् से व आचार-विचार में अनैतिक समझा जाता है।
  • सामाजिक रूप से बहिष्कृत
  • LGBT में लिंग आधारित हिंसा
  • हाशियें पर व समाज दव्ारा उपेक्षित स्थिति
  • अपने अधिकारों की रक्षा हेतु कोई कानून या विशेष सरकारी तंत्र नहीं।
  • कार्य स्थलों, संस्थाओं और सामाजिक स्थानों आदि पर उपहास का शिकार

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