Public Administration: Differences between NGOs and Voluntary Organizations

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

भारत में गैर-सरकारी संगठन (NGOs in India)

  • भारत में गैर-सरकारी संगठनों के गठन संबंधी निश्चित कानून व प्रक्रियाएँ हैं जिनका पालन करना आवश्यक होता है। भारत में एक गैर-सरकारी संगठन के गठन हेतु कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के तहत ट्रस्ट, सोसाइटी या किसी निजी सीमित गैर-लाभकरी कपंनी के रूप में पंजीकरण करना आवश्यक होता है। ऐसा आकलन किया जाता है कि भारत में लगभग 4 मिलियन गैर-सरकारी संगठन कार्यशील हैं। भारत में गैर-सरकारी संगठनों का कार्यक्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। विभिन्न प्रकार के राज्य सरकार के कार्यक्रमों में गैर-सरकारी संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने 1996 में राज्य में जल-प्रबंधन कार्यक्रम को संचालन करने के लिए ‘राजीव गांधी वाटरशेड मिशन’ की स्थापना की थी। इस मिशन का क्रियान्वयन महत्वपूर्ण रूप में गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से किया गया। कुल 1400 परियोजनाओं में से 101 परियोजनाएँ गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से क्रियानिवत की गई। इस कार्यक्रम में यह व्यवस्था है कि कुल परियोजना व्यय की 10 प्रतिशत राशि प्रशासनिक खर्चों के रूप में गैर-सरकारी संगठनों को उपलब्ध व्यय हो।
  • तरूण भारत संघ जैसे स्वयं सेवी संगठन ने राजस्थान में जोहड़ ′ जैसी जल संचय पंरपरा को पुर्नजीवित किया और मरूभूमि को एक नया स्वरूप प्रदान किया। ′ जोहड़ ′ को इस तरह समझा जा सकता है कि वह वर्षाजल को एकत्र करने वाला ऐसा बाँध है, जहाँ वर्षा के पश्चात्‌ इसी भूमि पर खेती की जाती है।

गैर-सरकारी संगठन और स्वयंसेवी संगठन में अंतर (Differences between NGOs and Voluntary Organizations)

Differences between NGOs and Voluntary Organizations
गैर-सरकारी संगठन (NGO)स्वयं सेवी संगठन (Voluntary Organisation)
मानदेय/पारिश्रमिक सहित कार्य करता है।मानदेय/पारिश्रमिक की आशा नहीं करता।
इच्छा के अनुरूप कार्यों का सुनिश्चिय किन्तु अवधि, आरंभ-समापन, संबंधी नियंत्रण वित्त प्रदाता संस्था का होता है।इच्छानुरूप कार्यो का चुनाव किन्तु अवधि आरंभ, समापन संबंधी स्वनियंत्रण।
निश्चित संविधान, पंजीयन, पदाधिकारी व कार्य पद्धति।निश्चित संविधान, पंजीयन, पदाधिकारी व कार्य पद्धति की अनिवार्यता नहीं।
नियमित कार्यालय एवं कार्यावधि होती हैनियमित कार्यालय एवं कार्यावधि आवश्यक नहीं।
चाहे तो स्वयंसेवी संगठन की तरह पारिश्रमिकविहीन कार्य कर सकता है।शर्ते पूरी करने पर गैर-सरकारी संगठन की तरह कार्य कर सकता है।
दस्तावेजों को लेखा-जोखा रखने की अनिवार्यतादस्तावेजों को लेखा-जोखा रखने की अनिवार्यता नहीं।
  • भारत में समाज के कमजोर वर्गो के कल्याण व उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण कार्य करने वाला प्रभावी गैर-सरकारी संगठन गिव इंडिया (Give India) है। इसे कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत एक गैर-लाभकारी संगठन के रूप में वर्ष 2000 में अहमदाबाद, गुजरात में पंजीकृत किया गया था। इस संगठन के प्लेटफॉर्म से लोगों में समाज व इसके जरूरतमंद लोगों को कुछ देने की प्रवृत्ति विकसित करने का प्रयास किया जाता है। इस संगठन का विजन है कि भारतीय लोग प्रत्येक वर्ष अपनी आय का 2 प्रतिशत निर्धनों के हित में दान करें। गिव इंडिया महत्वपूर्ण रूप में नि: शक्त जनों (Disabled People) को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। इनके लिए इस संगठन का दृष्टिकोण शारीरिक व मानसिक पुनर्वास करने का है। इस संगठन का आकलन है कि यदि भारतीय लोग समाज व इसके जरूरतमंद लोगों को उतना ही दान करने लगें जितना अमेरिका करता है तो यह 60,000 करोड़ रुपये का सामाजिक निवेश होगा, जो अभी केवल 1000 से 5,000 करोड़ रुपये के बीच है।
  • भारत में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय एक महत्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन ‘सर्वप्रथम’ (Pratham) है। यह समाज के दुर्बलतम वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा (quality education) देने का सबसे बड़ा फलेटफॉर्म है। ‘प्रथम’ की स्थापना वर्ष 1994 में मुंबई में हुई थी, जहाँ इसने बच्चों को स्कूल-पूर्व शिक्षा प्रदान करने की दिशा में पहल की थी। मुंबई की झुग्गियों (Slums) में रहने वाले निर्धन बच्चों के जीवन के रूपातंरण का यह महत्वपूर्ण प्रयास था। उल्लेखनीय है कि यूनिसेफ ने अपनी प्रस्तावना में कहा है कि विकास रणनीतियों का केन्द्र बिन्दु बाल विकास व बाल अधिकारिता होनी चाहिए ‘प्रथम’ के जरिये स्कूलों में निर्धन परिवार के बच्चों के नामाकंन में वृद्धि तथा स्कूलों व समुदायों में सीख की प्रवृत्ति के विकास पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।
  • ‘प्रथम’ ने अत्यंत महत्वपूर्ण पहल करते हुए भारत के 8 राज्यों की सरकारों के साथ रीड इंडिया (Read India) नामक अपने फ्लैगशिप कार्यक्रम के तहत ज्ञापन पत्र (MOU) पर हस्ताक्षर किये हैं ताकि राज्य सरकारों को भी गरीब बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने की दिशा में प्रेरित किया जा सके। इस फ्लैगशिप कार्यक्रम के संबंध में ‘प्रथम’ ने नगरपालिका निगमों के साथ गठजोड़ किया है और दिल्ली व मुंबई जैसे शहरों में बेहतर प्रदर्शन किया है। प्रथम के ‘एनुअल स्टेट्‌स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट’ की प्रति केन्द्र व राज्य सरकारों के पास भेजी जाती है ताकि वे शैक्षिक नीति नियोजन को अधिक समावेशी बना सके।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार करके मानव पूंजी व मानव संसाधन विकास के अवसर निर्मित करना भी भारत के कुछ गैर-सरकारी संगठन का उद्देश्य रहा है। इस दिशा में कुष्ठ रोग, ट्‌यूबरक्यूलोसिस (T. B.) व एच. आइ. वी एड्‌स जैसे रोगों से ग्रसित समाज के दुर्बल वर्ग के लोगों को चिकित्सकीय सुविधा प्रदान करने में ‘लेप्रा सोसाइटी’ नामक एन. जी. ओ. सक्रिय है।
  • पर्यावरण संरक्षण व जागरूकता के प्रसार की दिशा में कार्य करने वाले प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों में बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री, सेंटर फॉर साइंस एंड एनवारयमेंट, जैविक कृषि व बीज संरक्षण की दिशा में सक्रिय नवधान्य, गोवा फाउंडेशन, कजर्व, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योंरिटी, केयर इंडिया, तरूण भारत संघ जैसे संगठन महत्वपूर्ण है जो भारत में महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण की दिशा में भी कई महत्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन सक्रिय हैं। इस दिशा में सुनीता नारायण दव्ारा स्थापित ‘प्रज्जवला’ इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जो महिलाओं के यौन शोषण, उत्पीड़न, देह व्यापार, अनैतिक खरीद फरोख्त पर नियंत्रण हेतु कार्य करता है। इसके अलावा घरेलू हिंसा के संरक्षण की दिशा में ‘नवज्योति’ व ‘मैत्री’ संगठनों का महत्वपूर्ण प्रयास जारी है। किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य व सुरक्षा की दिशा में स्माइल फाउंडेशन दव्ारा महत्वपूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।
  • भारत में वृद्धों के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण ‘हेल्प एज इंडिया’ नामक गैर-सरकारी संगठन सक्रिय है, जो उनके शारीरिक व मानसिक पुनर्वास संबंधी कार्यक्रमों को तैयार करता है और उनकी अवस्थागत जरूरतों की पहचान करता है तथा कुछ हद तक उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास करता है।

स्वयं सहायता समूह व विकास प्रक्रिया में उनकी भूमिका (Self Help Groups and Their Role in Development Process)

  • स्वयं सहायता समूह 15 - 20 सदस्यों का विशेषकर आर्थिक दृष्टि से एकसमान ग्रामीण निर्धनो का छोटा समूह होता है। इस समूह की जरूरतें समूह के भीतर एक जैसी होती हैं और सब मिलकर सामूहिक रूप से एक ही कार्य करना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में इस समूह के सदस्य अपने विकास की साझी रणनीतियाँ तय करते हैं। स्वयं सहायता समूह स्वप्रेरणा से बचत के लिए बनाया गया समूह है, जिसके सभी सदस्य एक साधारण निधि (Common Fund) में योगदान करने पर सहमत होते हैं। इस विधि से स्वयं सहायता समूह के निर्णय के अनुसार जरूरतमंद सदस्यों को उत्पादक तथा उपभोग के प्रयोजनों के लिए ऋण दिये जाने का प्रावधान होता है ताकि उनकी आय में वृद्धि हो और उनके जीवन स्तर में सुधार हो सके।
  • स्वयं सहायता समूह का उद्देश्य केवल वित्तीय मध्यस्थता (Financial Intermediation) ही नहीं, बल्कि यह स्व्रपबंधन व विकास के जरिये कम लागत वाली वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लक्ष्य को लेकर संचालित होता है। दूसरे शब्दों में, इसका उद्देश्य ग्रामीण निर्धनों की ऋण की जरूरतों की पूर्ति के लिए ऋण नीतियाँ बनाना है। इसके साथ ही बैंकिंग गतिविधियों को बढ़ावा देना, बचत तथा ऋण के लिए सहयोग करना तथा समूह के सदस्यों के भीतर आपसी विश्वास और आस्था बढ़ाना भी इनके उद्देश्यों में शामिल हैं।
  • स्वयं सहायता समूहों का गठन सामन्यतया गैर-सरकारी संगठनों अथवा सरकारी निकायों दव्ारा किया जाता है। ये अनौपचारिक समूह (Informal Group) होते हैं जिनके अधिकतम 20 सदस्य भारतीय विधिक प्रणाली के अंतर्गत स्वयं सहायता समूह के रूप में अपना पंजीकरण कराते हैं। परिवार का कोई एक सदस्य, पुरुष या स्त्री स्वयं सहायता समूह का सदस्य बन सकता है। स्वयं सेवी संगठन इन समूहों को आपस मेें कर्ज देने, वसुली करने, बचत खाता खोलने आदि में प्रशिक्षण देते हैं और निकट के बैंक से जोड़कर समूह का खाता खुलवाते हैंं, सभी औपचारिकाताएँ पूरी होने के बाद बैंक इनकी कैश क्रेडिट लिमिट या ऋण साख तय कर देते हैं फिर स्वयं सहायता समूह उस धन से सदस्यों में कर्ज बाँटता है। बैंक को किश्त अदा करने की जिम्मेदारी स्वयं सहायता समूह की होती है।

स्वयं सहायता समूहों की उत्पत्ति (Origin of Self Help Groups)

स्वयं सहायता समूहों की उत्तपति भारत में 1970 के दशक में हुई जब वर्ष 1972 में सेल्फ इम्प्लॉयड वीमान्स एसोसिएशन (सेवा) का गठन हुआ जिसने निर्धनता उन्मूलन, महिला रोजगार व महिला सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी लेकिन अधिक असंगठित व व्यवस्थित रूप में स्वयं सहायता समूह आंदोलन की शुरूआत बांग्लादेश के नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में हुई। इसने पूरे विश्व को प्रभावित किया। इसने लोगों में बचत की आदत डालने में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की।

‘स्वयं सहायता समूह की भारत में वर्तमान संरचनात्मक व प्रकार्यात्मक स्थिति’ (Current Structural and Functional Scenario of Self Help Groups in India)

वर्तमान समय में भारत में लगभग 30 लाख स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं। मार्च 2002 के अंत तक स्वयं सहायता समूह व बैंक संबंध कार्यक्रम के अंतर्गत 461478 स्वयं सहायता समूहों में 78 मिलियन परिवार शामिल थे, जिनमें 60 प्रतिशत सदस्य महिलाएँ थीं। स्वयं सहायता समूह के सदस्यों ने इस समय तक 1026.30 करोड़ रुपये के ऋण प्राप्त किये। समय पर पुर्नभुगतान 90 प्रतिशत से अधिक रहा। इस कार्यक्रम में 2155 गैर-सरकारी संस्थाएँ और अन्य संगठन शामिल थे। भारत में स्वयं सहायता समूहों ने विभिन्न समूहों जैसे किसान, दस्तकार, मछुआरे, विकलांग, सामाजिक रूप से पिछड़े समूह, वृद्ध-किशोर किशोरियों और महिलाओं की जरूरतों के संदर्भ में विशेष कार्य किये हैं।

स्वयं सहायता समूह बैंक संंयोजन कार्यक्रम (Self Half Group-Bank Linkage Programme)

भारत में स्वयं सहायता समूह बैक संयोजन कार्यक्रम एक पायलट कार्यक्रम के रूप में एस. के. कालिया समिति की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 1992 में नाबार्ड दव्ारा शुरू किया गया। इस मॉडल के आधार पर नाबार्ड ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से गरीब महिलाओं को लघु वित्त (Micro Fiancé) की सुविधा उपलब्ध कराते हुए उन्हें संगठित बैंकिंग सेवा से जोड़ने का प्रयास किया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत सर्वप्रथम 10 - 12 महिलाएँ अपनी छोटी-छोटी बचतों को एकत्रित कर कोष बना लेती हैं। फिर इसका उपयोग सदस्यों के दव्ारा अपनी उत्पादक या उपभोग संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है। निश्चित समयांतराल पर इन समूहों को बैंकों से संबंद्ध करके ऋण प्रदान किया जाता है। यही नहीं, ऋण का सार्थक उपयोग करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए सरकार दव्ारा महिलाओं के प्रशिक्षण हेतु ‘राष्ट्रीय प्रादेशिक व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्रो’ की स्थापना की गई है। एसएचजी बैंक लिंकेज प्रोग्राम के उद्देश्यों को निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-

  • ग्रामीण निर्धनों व बैंकरों के मध्य पारस्परिक विश्वास व आत्मविश्वास को विकसित करना।
  • अनौपचारिक साख प्रणाली (Informal Credit System) के स्थान पर संगठित, संस्थागत व औपचारिक साख प्रणाली का विकास जिससे न्यायपूर्ण रूप से वित्तीय सेवाएँ मिल सकें।
  • निर्धनता का उन्मूलन एवं महिला सशक्तीकरण तथा साख प्रवाह (Credit flow) का विस्तार करना। ग्रामीण निर्धनों को कम लागत पर वित्तीय सेवाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित करनां

स्वयं सहायता समूह-संयोजन बैंक कार्यक्रम के कई मॉडल हैं जिनमें पहले मॉडल के तहत बैंकों दव्ारा स्वयं सहायता समूहों का गठन भी किया जाता है और उनका वित्तीयन (Financing) भी। इस मॉडल में बैंक खुद ही स्वयं सहायता समूहों के बैंक खाते खोलता है और उन्हें ऋण प्रदान करता है। मार्च 2006 तक सरकारी आँकड़ों के अनुसार, स्वयं सहायता समूहों की कुल संख्या के 20 प्रतिशत का वित्तीयन इसी मॉडल के तहत किया गया। मार्च 2005 तक स्वयं सहायता समूह को ऋण देने में 61.63 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

स्वयं सहायता समूह-संयोजन बैंक कार्यक्रम के दूसरे मॉडल के तहत इन समूहों का गठन तो गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) दव्ारा किया जाता है, पर इन्हें वित्तीय सहायता प्रत्यक्ष रूप से बैंकों दव्ारा दी जाती हैं। इस मॉडल के तहत सरकारी निकायों (Government agencies) दव्ारा भी स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा सकता है। इन निकायों दव्ारा ही इन समूहों को प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके उपरांत बैंक इन समूहों की साख अवशोषण क्षमता (Maturity to absorb credit) और उनके कार्यो को देखते हुए इन्हें ऋण प्रदान करती है।

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