Public Administration: National Mid-Day Meal Programme and Indira Awas Yojana

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सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय (Government Policies and Interventions for Development in Various Sectors and Issues Arising Out of Their Design and Implementation)

एकीकृत बाल विकास सेवा योजना की पुनर्संरचना (Restructuring of ICDS)

2005 - 06 में इस योजना का सर्वव्यापीकरण किए जाने के बाद यह योजना सहवर्ती मानव और वित्तीय संसाधनों के अनुरूप नहीं रही, जिसके फलस्वरूप कार्यक्रम जन्य प्रबंधकीय तथा संस्थागत अंतर उभरने लगे। इसे देखते हुए आईसीडीएस की पुनर्संरचना और सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता महसूस की जाने लगी।

सितंबर 2012 में आर्थिक मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति ने आईसीडीएस की पुनर्संरचना को निम्नानुसार स्वीकृति प्रदान की है-

  • एकीकृत बाल विकास सेवा योजना का 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत मिशन मोड के रूप में क्रियान्वयन जारी रखना।
  • प्रथम वर्ष 2012 - 13 में 200 उच्च भारित जिलों से शुरुआत करते हुए तीन वर्षों में सुदृढ़ और पुनर्गठित आईसीडीएस शुरू की जाय। दूसरे वर्ष (2013 - 14) में विशेष श्रेणी राज्यों यथा, जम्मू एवं कश्मीर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्यों तथा तीसरे वर्ष (2014 - 15) में शेष 243 जिलों को इसमें शामिल किया जाय।

आईसीडीएस योजना के सुदृढ़कीरण पुनर्संरचना के निम्नांकित संभावित परिणाम होंगे-

  • 0 - 3 वर्ष के बच्चों में कुपोषण की दर नियंत्रण के साथ इसमें 10 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकेगी।
  • 6 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों के प्रारंभिक विकास का उन्नत किया जा सकेगा।
  • बालिकाओं व महिलाओं की देखरेख और पोषण में सुधार होगा तथा अल्पायु बच्चों बालिकाओं और महिलाओं में रक्ताल्पता (Anaemia) की व्याप्तता में 1/5 की कमी की जा सकेगी।

उल्लेखनीय है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान सुदृढ़ और पुनर्गठित आईसीडीएस पर 1,23, 580 करोड़ रुपये व्यय होने का अनुमान है। इस प्रकार भारत में यह योजना बाल अधिकारों के संरक्षण की दृष्टि से काफी अहम है। अप्रत्यक्ष रूप से यह योजना महिला सशक्तीकरण में भी योगदान देती है। सक्षमता विकास का प्रयास इसका ज्वलंत उदाहरण है।

राष्ट्रीय मध्याह्न भोजन कार्यक्रम अथवा मिड-डे मील कार्यक्रम (National Mid-Day Meal Programme)

  • मिड-डे मील कार्यक्रम एक बहुआयामी उद्देश्यों वाली केन्द्र प्रायोजित योजना है जिसे 15 अगस्त, 1995 को प्रारंभ किया गया था। स्कूलों में नामांकन (Enrolment) में वृद्धि, उपस्थिति में वृद्धि, स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति में कमी लाने जैसे लक्ष्यों को पोषणीय आहार युक्त शिक्षा प्रणाली से जोड़ने का महत्वपूर्ण लक्ष्य लेकर मिड डे मील को सरकार के फ्लैगशिप कल्याणकारी कार्यक्रम के रूप में प्रोत्साहन दिया गया।
  • मिड-डे मील कार्यक्रम को ‘प्राथमिक शिक्षा हेतु पोषणीय समर्थन के राष्ट्रीय कार्यक्रम’ (National Programme Nutritional Support to Primary education) के रूप में शुरू किया गया था। वर्ष 2001 में मिड-डे मील योजना एक पके भोजन पर आधारित मिड-डे मील योजना बन गई। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2001 में ही भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिवरटीज (PUCL) दव्ारा दायर एक याचिका में भोजन के अधिकार (Right to Food) को मान्यता पदान की थी। निर्णय के अनुपालन में वर्ष 2001 में इस योजना के तहत प्रत्येक सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल में प्रत्येक बच्चे के लिए पके हुए भोजन के रूप में मध्याह्न भोजन (Midday Meal) को तैयार करने की शुरूआत हुई और यह प्रावधान किया गया कि वर्ष में न्यूनतम 200 दिनों के लिए न्यूनतम 300 कैलोरी ऊर्जा युक्त आहार व 8 - 12 ग्राम प्रोटीन युक्त आहार प्रदान किया जाएगा।
  • वर्ष 2002 में पुन: मिड-डे मील योजना का विस्तार किया गया। इसके दायरे को बढ़ाते हए तय किया गया कि न केवल वे बच्चे जो सरकारी अथवा सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों व स्थानीय निकाय स्कूलों में पढ़ते हैं बल्कि वो बच्चे भी जो एजुकेशन गारंटी स्कीम (EGS) व वैकल्पिक व नवाचारी शिक्षा केन्द्रों (Alternation and Innovative Education Centres) में पढ़ते हैं, मिड-डे मील योजना के अंतर्गत आएगें।
  • सितंबर, 2004 से इस स्कीम को संशोधित कर व्यापक रूप से प्राइमरी स्तर पर लागू किया गया। 2004 में भोजन पकाने की लागत हेतु केन्द्रीय सहायता उपलब्ध कराने का निर्णय हुआ और दालों, सब्जी पकाने वाले तेलों और ईंधन आदि की लागतों को इसके अंतर्गत शामिल करने के लिए प्रत्येक बच्चे पर प्रत्येक स्कूल दिन हेतु 1 रुपये की केन्द्रीय सहायता देने हेतु योजना को संशोधित किया गया।
  • 1 अक्टूबर, 2007 से इस योजना को उच्च प्राथमिक विद्यालय के बच्चों (6वीं से 8वीं कक्षा) के संबंध में भी लागू कर दिया गया है। इस स्कीम के अंतर्गत प्राइमरी स्कूल के बच्चों के लिए 450 कैलोरी तथा 12 ग्राम प्रोटीन तथा उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए 700 कैलोरी तथा 20 ग्राम प्रोटीन की व्यवस्था है।
  • 1 दिसंबर, 2009 से सरकार ने इनकी दरों में परिवर्तन किया है, जिसके अनुसार उच्च प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए दालों की मात्रा 25 ग्राम से बढ़ाकर 30 ग्राम, सब्जियों की मात्रा 65 ग्राम से बढ़ाकर 75 ग्राम तथा तेल व वसा की मात्रा 10 ग्राम से घटाकर 7.5 ग्राम कर दी गई है। खाना पकाने की लागत 2.50 रुपये से बढ़ाकर 3.75 रुपये कर दी गई है।
  • उल्लेखनीय है कि खाना पकाने की लागत, मानदेय और रसोई सहभंडार के निर्माण की लागत केन्द्र तथा राज्यों के बीच उत्तर-पूर्वी राज्यों में 90: 10 तथा अन्य राज्यों में 75: 25 के अनुपात में वहनीय होगी। अप्रैल, 2008 से इस योजना में संपूर्ण देश के सभी क्षेत्रों के सरकारी सहायता तथा गैर-सहायता प्राप्त प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक (कक्षा 1 से 8 तक) स्तर पर अध्ययन करने वाले सभी बच्चों को शामिल किया गया हैं।
  • अक्टूबर 2007 में शैक्षिक रूप से पिछड़े 3,479 प्रखंडों (EBBs) में पढ़ने वाले बच्चों (खासकर 6 से 8 वीं कक्षा में) को इस स्कीम में शामिल किया गया और इस स्कीम का नाम ‘प्राथमिक शिक्षा हेतु पोषणीय समर्थन के राष्ट्रीय कार्यक्रम’ से बदलकर ‘विद्यालयों में राष्ट्रीय मध्याह्न कार्यक्रम’ (National Programme of Mid day Meals in Schools) किया गया। अप्रैल 2008 में पुन: इस योजना में संशोधन करते हुए इस योजना का दायरा बढ़ाया गया ताकि यह सर्वशिक्षा अभियान के तहत समर्थित पहचान न किये गये मदरसों व मकतबों (Unrecognised Madarsasek Maqtabs) की पहचान कर सके।

इंदिरा आवास योजना (Indira Awas Yojana)

  • इंदिरा आवास योजना भारत सरकार का एक फ्लैगशिप कार्यक्रम है। इस योजना को देश में ग्रामीण निर्धनाेें को आवास उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1985 - 86 में प्रारंभ किया गया था। इस योजना का क्रियान्वयन ग्रामीण विकास मंत्रालय के अंतर्गत किया जाता है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में निर्धरता रेखा से नीचे (BPL) के परिवारों के लिए आवास का निर्माण करना है। इंदिरा आवास योजना ने जवाहर रोजगार योजना की एक उप योजना (Sub Scheme) के रूप में कार्य करना शुरू किया था और कालांतर में यह जनवरी, 1996 से एक स्वायत योजना बन गयी।
  • यह एक केन्द्र प्रयोजित योजना है जिसका वित्त पोषण केन्द्र एवं राज्यों के बीच 75: 75 (केन्द्र शासित प्रदेश की स्थिति में 100 प्रतिशत केन्द्रीस सहायता) के अनुपात में किया जाता है। इंदिरा आवास योजना का वित्त पोषण पूर्वोत्तर के राज्यों के लिए 90: 10 के अनुपात में हैं।

इंदिरा आवास योजना की सहायता राशि में वृद्धि का निर्णय (Decision to Increase the Amount for IAY)

  • केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 10 जनवरी, 2013 को भवन निर्माण लागत में तेजी से बढ़ोत्तरी होने के कारण इंदिरा आवास योजना की सहायता राशि में वृद्धि करने का निर्णय लिया है। इंदिरा आवास योजना के तहत अभी तक मैदानी इलाकों में मकान निर्माण के लिए 45,000 रुपये दिये जाते थे, जिसे बढ़ाकर 70,000 रुपये कर दिया गया है। पहाड़ी व दुर्गम इलाकों के लिए अभी तक दी जाने वाली 48,500 रुपये की सहायता राशि को बढ़ाकर 75,000 रुपये कर दिया गया है।
  • गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले ग्रामीण गरीबों, जिनके पास न तो कृषि योग्य भूमि है और न ही मकान बनाने के लिए जमीन, उनके लिए ऋण सहायता को 10,000 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये कर दिया गया है।

योजना आयोग दव्ारा इंदिरा आवास योजना का मूल्यांकन अध्ययन, 2013 (Evaluation Study, 2013 of IAY by Planning Commission)

  • भारत के योजना आयोग की ‘विकास मूल्यांकन परामर्शदात्री समिति’ (The Development Evaluation Advisory Committee) ने वर्ष 2013 में ‘कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन’ (PEO) को इंदिरा आवास योजना के मूल्यांकन व उसकी वर्तमान स्थिति की जाँच का कार्यभार सौंपा। यह अध्ययन योजना की क्रियान्वयन प्रक्रिया, परिणाम और प्रभाव पर केन्द्रित था। मूल्यांकन अध्ययन को यह भी रिपोर्ट देनी थी कि इंदिरा आवास योजना किस स्तर तक अपने लक्ष्यों व उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल रही। कार्यक्रम मूल्यांकन संगठन ने देश के 12 राज्यों के 34 जिलों, 68 ब्लाकों, 204 गाँवों और 2040 लाभार्थियों पर सेंपल आधार पर मूल्यांकन अध्ययन किया।
  • मूल्यांकन अध्ययन में स्पष्ट किया गया है कि लगभग सभी लाभार्थियों ने इस स्कीम के तहत पक्का मकान प्राप्त करने के चलते अपने आर्थिक कल्याण (Economic Well being) में सुधार की बात को स्वीकार किया है। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि इंदिरा आवास योजना के तहत आवास प्राप्ति के बाद लाभार्थियों ने कुछ नयी आर्थिक गतिविधियों जैसे आम किराना दुकान व कपड़े सिलने के कार्य करने की पहल की है।

योजना आयोग के तत्वावधान में संपन्न कराये गये इस अध्ययन में कुछ सुझाव भी दिये गये हैं, जो निम्नवत्‌ हैं-

  • लाभार्थियों के चयन में ग्राम सभा की भूमिका को वरीयता देना।
  • वित्तीय सहायता के समयानुसार संशोधन (Timely Revision) पर बल।
  • राज्य से राज्य के मध्य वित्तीय आवंटन में विविधता पर ध्यान।
  • क्रियान्वयन प्रतिमानों में एकरूपता लाना और विशेषीकृत निगरानी तंत्रों का विकास करना।
  • इंदिरा आवास योजना के लिए अनन्य रूप (Exclusively) से रिकॉर्डो का उचित ढंग से रख-रखाव।
  • आवासों के आवंटन के सदंर्भ में पारदर्शिता व जागरूकता पर बल देना।
  • क्षमता निर्माण (Capacity Building) के जरिये स्थानीय निर्वाचित निकायों व हितधारकों को मजबूती देने का प्रयास।

इस अध्ययन के लिए 10वीं पंचवर्षीय योजना की अवधि (2002 - 07) को आधार बनाया गया है और इस अवधि का विस्तार कर के 2009 तक की स्थिति को अध्ययन में शामिल किया गया है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act)

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम शुरूआत में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के रूप में सितंबर 2005 में पारित हुआ तथा 2 फरवरी, 2006 को इसकी औपचारिक शुरूआत भारतीय प्रधानमंत्री दव्ारा आंध्र प्रदेश के बंदापाली से की गयी। 2 अक्टूबर, 2009 को इसका नाम बदलकर ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ कर दिया गया। 2 फरवरी को सरकार ने ‘रोजगार दिवस’ के रूप में घोषित किया है।
  • प्रारंभ में यह योजना 200 जिलों में लागू की गयी पर 2007 - 08 के बजट में इसे बढ़ाकर 330 जिलों में कर दिया गया। वर्तमान समय में यह देश के सभी 619 जिलों में लागू है। इसे विश्व के सर्वाधिक बड़े लोकतंत्र दव्ारा सर्वाधिक बड़े रोजगार गारंटी देने वाले कार्यक्रम के रूप में माना गया, जिसकी प्रशंसा संयुक्त राष्ट्र व यूएनडीपी ने भी की है। रोजगार सृजन करने वाली यह पहली योजना है और इस दृष्टि से यह सभी स्कीमों से भिन्न है, जो संसद दव्ारा पारित अधिनियम के दव्ारा ग्रामीण जनसंख्या को रोजगार प्राप्त करने की गारंटी के साथ कानून दव्ारा अधिकार प्रदान करती है। यह कार्यक्रम गाँवों में मानव संसाधन विकास, परिसपंत्तियों के सृजन और अवसरंचनात्मक सुधार के क्रम में बेराजगारी के निवारण का महत्वपूर्ण उपकरण भी साबित हुआ है। मनरेगा के चलते कुछ हद तक गाँवों से शहरों की तरफ प्रवास पर नियंत्रण को भी बल मिला है। कुल मिलाकर निर्धनता व बेरोजगारी उन्मूलन के लक्ष्यों के साथ ही मनरेगा ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयासरत रहा है।

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