Public Administration 3: Nutritional Deficiency and Diseases

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

भारत में स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में प्रारंभ की गयी नवीनतम कार्यक्रम व योजनाएँ (Latest Programs and Schemes Launched in India Towards Health Protection)

किशोरों के लिए राष्ट्रीय आयरन एवं फॉलिक एसिड पूरक कार्यक्रम (National Iron and Folic Acid Supplement Program for Adolescents)

किशोरों के लिए राष्ट्रीय आयरन एवं फॉलिक एसिड पूरक कार्यक्रम 17 जुलाई, 2013 को प्रारंभ किया गया है। 10 से 19 वर्ष के किशारों में आयरन की कमी के कारण होने वाले रक्ताल्पता (एनीमिया) को रोकने के लिए यह अपने आप में एक अनूठा कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम से देश के 13 करोड़ किशारों को लाभ होगा। आयरन की कमी के कारण होने वाली रक्ताल्पता की बीमारी देश में आज एक बड़ी समस्या है। लगभग 58 प्रतिशत गर्भवती महिलाएँ, जननीय उम्र की 50 प्रतिशत महिलाएँ, 56 प्रतिशत किशोरियाँ, 30 प्रतिशत किशोरवय लड़के और 5 वर्ष से कम उम्र के 70 प्रतिशत बच्चे रक्ताल्पता के शिकार हैं। इसके कारण उनका शारीरिक विकास प्रभावित होता है। ऐसे में बच्चों की एकाग्रता पर भी असर पड़ता है और बच्चों का स्कूल में प्रदर्शन बेहतर नहीं हो पाता।

योजनाए की विशेषताएँ: इस योजना की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत्‌ हैं-

  • 13 करोड़ किशोर लड़के एवं लड़कियाँ योजना के दायरे में शामिल होंगे।
  • इसके तहत सरकारी एवं सहायता प्राप्त स्कूलों और आंगनवाड़ी केन्द्रों पर नि: शुल्क आईएफए टैबलेट उपलब्ध करायी जायेगी।
  • आईएफए टैबलेट के उपयोग के बारे में सप्ताह में एक दिन निरीक्षण होगा।
  • किशोरों में रक्ताल्पता की जाँच की जायेगी, और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए रेफर किया जायेगा।
  • वर्ष में दो बार पेट के कीड़ों की सफाई होगी।
  • आयरनयुक्त भोजन एवं संतुलित आहार के बारे में सूचनाएँ एवं सलाह।
  • पोषण एवं स्वास्थ्य आधारित शिक्षा।

यह योजना बाल स्वास्थ्य एवं अधिकारिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Child Health Program)

  • भारत में सार्वभौमिक स्वास्थ्य संरक्षण की दिशा में प्रयास करते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय दव्ारा 0 - 18 वर्ष आयु के बच्चों के लिए हाल ही में यह कार्यक्रम (फरवरी, 2013) में शुरू किया गया। यह कार्यक्रम ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ का हिस्सा है, जिसकी शुरूआत महाराष्ट्र के पालघर में की गयी है। इस कार्यक्रम को ‘बाल स्वास्थ्य परीक्षण एवं शीघ्र निदान सेवा’ के रूप में भी जाना जाता है, जिसका लक्ष्य बच्चों की मुख्य बीमारियों का शीघ्र पता लगाना और उनका निदान करना है। इन बीमारियों में जन्मजात विकृतियो, बाल रोग, कमियों की लक्षणों और विकलांगताओं सहित विकास संबंधी देरी शामिल हैं।
  • बच्चों के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए संचालित स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम को विस्तारित कर इसमें जन्म से लेकर 18 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को शामिल किया गया है। इन सुविधाओं का लक्ष्य सरकारी और सरकार दव्ारा सहायता प्राप्त स्कूलों में पहली कक्षा से लेकर 12 वीं कक्षा तक में पंजीकृत बच्चों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों और शहरी झुग्गी बस्तियों के जन्म से लेकर 6 वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को शामिल करना है। इस कार्यक्रम में शीर्घ परीक्षण व शीघ्र निदान के लिए 30 सामान्य बीमारियों की पहचान की गई है।

पोषणा तत्वों की कमी व बीमारियाँ (Nutritional Deficiency and Diseases)

भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 70 प्रतिशत बच्चों में लौह तत्व की कमी पाई जाती है। वहीं 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 48 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। भारत में स्कूली बच्चों में से 50 से 60 प्रतिशत बच्चे दंत रोगों से ग्रसित होते हैं। गरीबी, दुर्बल स्वास्थ्य, कुपोषण व शुरूआती देखभाल के अभाव के कारण बच्चे अपनी विकासात्मक क्षमता को प्राप्त नहीं कर पाते।

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की कार्यान्वयन प्रणाली (National Child Health Program Implementation System)

  • इसके अंतर्गत ‘जन स्वास्थ्य सुविधा केन्द्रो’ विशेषकर नर्सो, स्वास्थ्य अधिकारी और स्त्री रोग विशेषज्ञ दव्ारा संस्थात्मक जनन केन्द्रों पर जन्मजात कमियों की जाँच पड़ताल की जाएगी। जन्मजात विकारो/रोगों को दूर करने के लिए ‘आशा’ कार्यकर्ता को प्रशिक्षित किया जाएगा। बीमारियों की पहचान के लिए उन्हें आवश्यक उपकरण दिये जाएगे। आंगनवाड़ी केन्द्रों मे निर्धारित सचल स्वास्थ्य दलों दव्ारा 6 सप्ताह से लेकर 6 वर्ष तक के आयु-समूह के बच्चों की जाँच की जाएगी। 6 से 18 वर्ष तक के बच्चों की जाँच सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में की जाएगी। आंगनवाड़ी केन्द्रों पर वर्ष में 2 बार एवं विद्यालयों में वर्ष में एक बार जाँच की जाएगी।
  • इस कार्यक्रम के लिए ब्लॉक गतिविधि का केन्द्र है। कम से कम 3 निर्धारित सचल स्वास्थ्य दल प्रत्येक ब्लॉक में बच्चों की जाँच करेंगे। सचल स्वास्थ्य दल में 4 सदस्य, 2 चिकित्सक (आयुष) , 1 नर्स और फॉर्मासिस्ट सम्मिलित होते हैं। जिला चिकित्सालय में प्रारंभिक मध्यवर्ती केन्द्र होता है। इस केन्द्र का उद्देश्य बच्चों की स्वास्थ्य संदर्भित सहायता प्रदान करना है। केन्द्र में श्रवण, तंत्रिका संबंधी परीक्षण और व्यवहार संबंधी जाँच के लिए जरूरी सुविधाएँ उपलब्ध करायी जाती है।
  • प्रारंभिक मध्यवर्ती सेवा की यह नई योजना लंबे समय में स्वास्थ्य सेवा खर्चो में कटौती कर आर्थिक रूप से लाभ प्रदान करेगी। ‘रोकथाम’ और समर्थित देखभाल राष्ट्रीय मानव संसाधन को प्रभावित कर बीमारियों पर होने वाले खर्च और सार्वजनिक स्वास्थ्य खर्च को भी कम करेगी। पूर्ण रूप से क्रियान्वित होने पर राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम से देश के 27 करोड़ बच्चे लाभान्वित होंगे।

जापानी इंसेफलाइटिस पर नियंत्रण हेतु योजना को केन्द्र सरकार की मंजूरी (Central Government Approves Plan for Control of Japanese Encephalitis)

  • भारत सरकार ने 18 अक्टूबर, 2012 को जापानी इंसेफलाइटिस पर काबू पाने हेतु 4 हजार करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी प्रदान की है। भारतीय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में दिमागी बुखार से बच्चों की हो रही मौत पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए संयुक्त परियोजना प्रस्ताव को पारित कर दिया गया। उत्तर प्रदेश व बिहार इस बीमारी से सबसे अधिक ग्रसित हुए हैं। इस समग्र योजना हेतु स्वास्थ्य मंत्रालय से 131 करोड़ रुपये शहरी आवास व गरीबी उन्मूलन मंत्रालय से 418 करोड़ रुपये, सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय से 9 करोड़ रुपये, महिला व बाल विकास मंत्रालय से 177 करोड़ रुपये और सर्वाधिक 2,300 करोड़ रुपये पेयजल व स्वचछता मंत्रालय दव्ारा दिये जाने हैं।
  • बच्चों की इस जानलेवा बीमारी से निटपने हेतु केन्द्र सरकार ने मंत्रियों का समूह (GoM) बनाया था। मंत्रियों के समूह (GoM) की सिफारिशों के आधार पर संबंधित मंत्रालयों और विभागों की संयुक्त परियोजना तैयार करने का निर्देश दिया गया था। इसी के आधार पर तय मसौदे को 18 अक्टूबर, 2011 को मंजूरी प्रदान की गई। इस समग्र योजना का लाभ देश के कुल 60 जिले को मिलेगा, जिसमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के 20 जिले और बिहार के 15 जिले शामिल हैं। भारत में 15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के जापानी इनसेफलाइटिस (दिमागी बुखार) की चपेट में आने की संभावनाएँ अधिक रहती हैं। इसलिए नयी योजना के माध्यम से बाल स्वास्थ्य के समक्ष उपस्थित इस गंभीर चुनौती से निपटने का निर्णय लिया गया है।
  • ध्यातव्य है कि रोगों से मृत्यु मानव संसाधन की क्षति का भी एक प्रमुख कारण है। अत: स्वास्थ्य और मानव संसाधन को जोड़कर देखने पर इस योजना के प्रभावी परिणाम प्राप्त होंगे।

भारत में राज्यों के वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (Annual Health Survey of States in India)

जुलाई, 2012 में एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप (EAG) राज्यों का वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण जारी किया गया। इन सशक्त कार्य समूह राज्यों (EAG States) में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान राज्य शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग की वर्ष 2005 में आयोजित बैठक के दौरान ‘वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण’ (AHS) करने का निर्णय लिया गया था। इन सर्वेक्षणों में शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर और कुल प्रजनन दर की उनके सहपरिवर्तनों के बारे में विस्तृत, प्रतिनिधित्वमूलक और विश्वसनीय आँकड़े तैयार करने का उद्देश्य निर्धारित किया गया है। वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण को भारत के महापंजीयक कार्यालय दव्ारा लागू किया गया है। 2012 में जारी सर्वेक्षण के अनुसार 8 सशक्त कार्य समूह राज्यों व असम में देश की कुल जनसंख्या के 48 प्रतिशत लोग रहते हैं।

वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2010 - 11 की अवधि के लिए) के प्रमुख निष्कर्ष निम्नवत्‌ हैं-

  • कुल प्रजनन दर (TFR) के प्रतिस्थापन दर 2.1 की प्राप्ति 284 वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण जिलों (AHS Districts) में से केवल 20 जिलों ने प्राप्त किया है।
  • पहली बार स्वास्थ्य सूचकांकों को जिला स्तर पर उत्पादकता और मृत्यु दर, प्रचलित अक्षमता, आकस्मिक चोट, गंभीर व लाइलाज बीमारी पर बैचमार्क निर्धारण के लिए एएचएस प्रारूप तैयार किया गया है।
  • आधे से अधिक नवविवाहित महिलाएँ (15 - 49 वर्ष आयु वर्ग के) उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड राज्यों में किसी भी प्रकार के परिवार नियोजन विधियों का उपयोग नहीं करती हैं। इसके साथ ही पुरुष बध्याकरण सभी एएचएस राज्यों में सबसे कम पंसदीदा आधुनिक विधि है।
  • सर्वेक्षण में कहा गया है कि कम से कम 1/5 नवविवाहित महिलाएँ सभी एएचएस राज्यों में अभी तक परिवार नियोजन की आवश्यकताओं को पूरा कर सकी हैं।
  • बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों ओडिशा, मध्यप्रदेश, और राजस्थान में भी जननी सुरक्षा योजना का सार्वभौमिक कवरेज चिंता का विषय बना हुआ है जबकि झारखंड और उत्तरप्रदेश की स्थिति में तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।
  • मध्यप्रदेश, ओडशा, राजस्थान में हर 10 प्रसव में 7 प्रसव सुरक्षित होते हैं जबकि यह संख्या झारखंड व छत्तीसगढ़ में 5 से भी कम है। ओडिशा, मध्यप्रदेश तथा राजस्थान में माताओं के लिए प्रसव पश्चात्‌ देखभाल तथा नवजात बच्चे के बेहतर देखभाल की सुविधा के बावजूद हर पाँचवीं माता को प्रसव पश्चात्‌ देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
  • वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के निष्कर्ष में यह तथ्य सामने आया है कि उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे बेहतर प्रदर्शन करने वालों राज्यों में टीकाकरण में 25 से 30 प्रतिशत कमी के कारण पूर्व टीकाकरण प्राप्त नहीं किया जा सका है।
  • जिला स्तर पर मातृ और शिशु देखभाल के विभिन्न पहलुओं पर 63 संकेतकों के कारण शिशु मृत्यु दर, 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर तथा मातृ मृत्यु दर की गतिशीलता को समझने में मदद मिलेगी।
  • इन आँकड़ों के अभाव में जिला योजनाओं को तैयार करने और लक्ष्य निर्धारित करने के लिए राज्य स्तर के अनुमानों का उपयोग कर लिया जाता है।

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