Public Administration: Other Backward Class and Minorities: Issues

Get top class preparation for CTET-Hindi/Paper-2 right from your home: get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-2.

अनुसूचित जातियों, शोषित वर्ग, अल्पसंख्यकों व अनुसूचित जनजातियों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Law, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Scheduled Castes, Depressed Class, Minorities and Scheduled Tribes)

डॉ. अंबेडकर प्रतिष्ठान (Dr. Ambedkar Foundation)

इस संस्था का उद्देश्य बाबा साहब अम्बेडकर की विचारधारा एवं संदेश को भारत एवं विदेशों में पहुँचाना है। भारतरत्न डॉ. बी. आर. अम्बेडकर की शताब्दी वर्ष में चिन्हित योजनाओं व कार्यक्रमों को लागू करवाना ही इस अम्बेडकर प्रतिष्ठान का उद्देश्य है। इसकी अध्यक्षता सामाजिक न्याय व सशक्तीकरण मंत्री करता है। साथ ही इसमें 11 पदेन सदस्य होते हैं जो शिक्षा, सामाजिक न्याय आदि क्षेत्रों से आते हैं (इसमें सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद आदि शामिल हैं)

बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय प्रतिष्ठान (Babu Jagjeevan Ram National Foundation)

बाबू जगजीवन राम राष्ट्रीय प्रतिष्ठान नामक एक राष्ट्रीय प्रतिष्ठान की स्थापना 14 मार्च, 2008 को बाबू जगजीवन राम की स्मृति में उनकी विचारधारा, जीवन-दर्शन और मिशन एवं अलाभांवित वर्गों व देश के प्रति उनके दव्ारा किए कार्यों का प्रसार करने के लिए की गई है।

प्रतिष्ठान की मुख्य विशेषताएँ/उद्देश्य इस प्रकार हैं:

  • बाबू जगजीवन राम की विचारधारा, जीवन-दर्शन और मिशन का प्रचार-प्रसार करना।
  • उनके जीवन और कार्य संबंधित अध्ययन और अनुसंधान को प्रोत्साहित करना।
  • विशेष डिजाइन की गई विकास योजनाआंे के माध्यम से दलित कलाकारों के सामाजिक, सांस्कृतिक शैक्षिक और आर्थिक विकास हेतु इन्हें प्रोत्साहित और संवर्द्धित करना।
  • समाज में अस्पृश्यता और जाति आधारित पूर्वाग्रहों को हटाने के लिए विशेष योजनाओं को कार्यान्वित करना।

अन्य पिछड़ी जाति एवं अल्पसंख्यक (Other Backward Class and Minorities)

अन्य पिछड़े वर्गों से संबंधित मुद्दे (Issues Related to Other Backward Classes)

  • अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों में इस बात को लेकर कुंठा है कि इन्हें अनुसूचित जाति व जनजाति के समान सामाजिक सुधार एवं सुरक्षा पेकैज नहीं मिलते। इसी पीड़ा ने कई बार जातीय हिंसा को भी जन्म दया है। संविधान ने “पिछड़ा वर्ग” को अनुच्छेद 15 (4) , 16 (4) व 340 (1) में संबोधित किया है। जबकि अनुच्छेद 15 (4) व 16 (4) सरकार को यह अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक व शैक्षिणिक रूप से पिछड़ें हेतु विशेष प्रावधान बना सके। साथ ही अनुच्छेद 340 (1) इस संबंध में आयोग के गठन का प्रावधान करता है जो पिछड़़ों की स्थिति का निरीक्षण करेगा। पिछड़ा वर्ग शब्द औपनिवेशिक काल से ही प्रयुक्त होता आया है परन्तु, इसमें कौन सा समूह शामिल होगा या नहीं इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं है।
  • अनुच्छेद 340 (1) , राज्य को पिछड़ों की स्थिति का निरीक्षण व इस संबंध में एक आयोग का गठन करने की मांग करता है। अनुच्छेद 340 (1) के अंतर्गत स्थापित प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग) ने अपनी रिपोर्ट 1955 में दी थी। इसमें 2399 जातियों को पिछड़े वर्ग के अंतर्गत माना गया था। इनमें से 237 को अति पिछड़ों की श्रेणी में रखा गया, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता थी। इसलिए पिछड़े वर्ग को दो श्रेणियों में बाँटा गया-पिछड़ा वर्ग एवं अतिपिछड़ा वर्ग। अत: केन्द्र सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया क्योंकि इसमें पहचान का आधार जाति को बनाया गया था न कि आर्थिक स्थिति को। दव्तीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग) ने अपनी रिपोर्ट 1980 में पेश की। आयोग ने 11 संकेतक बताये-इनमें जाति एवं स्तर दोनों आधारों का मिश्रण था-ताकि सामाजिक एवं शैक्षणिक स्थिति के विषय में पता चल सके। इसने 3473 जातियों को पिछड़े वर्ग के रूप में घोषित किया।
Issues Related to Other Backward Classes

पिछड़े वर्ग के लिए संवैधानिक प्रावधान (Constitution Provisions for Backward Class)

  • अनुच्छेद 340 के तहत गठित दव्तीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मंडल आयोग के नाम से ज्ञात) ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। भारत सरकार ने इस रिपोर्ट के आलोक में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को दिनांक 13.8. 1990 को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गो (अन्य पिछड़े वर्गों या ओबीसीज के रूप में भी संदर्भित) के लिए केन्द्रीय सरकार के पदों पर 27 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने का आदेश जारी किया था। इस आदेश की चुनौती में कई रिट याचिकाएँ उच्चतम न्यायालय में दायर की गई थीं। उच्चतम न्यायालय दव्ारा 1992 में इनका एक प्रमुख निर्णय जो कि इंदिरा सहनी मामला निर्णय के रूप में सामान्यत: ज्ञात है, दव्ारा निपटान किया गया था। नयायालय ने इस निर्णय में भारत संघ के तहत सिविल पदों और सेवाओं में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का अनुमोदन किया (बशर्ते संपन्न वर्ग को छोड़ा जाए)
  • जातिगत जनगणना 1931 की जनगणना के बाद बंद कर दी गई। अत: देश में अन्य पिछड़े वर्गों की जनसंख्या पर जनगणना आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। तथापि मंडल आयोग ने अन्य पिछड़े वर्ग की जनसंख्या को कुल जनसंख्या के 52 प्रतिशत का अनुमान लगाया था, जबकि राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन (National Sample Survey Organisations-NSSO) ने 61वें दौर के सर्वेक्षण (2004 - 05) के आधार पर इन्हें 42 प्रतिशत अनुमानित किया है जैसा कि इसकी रिपोर्ट “भारत में सामाजिक समूहों के बीच रोजगार और बेरोजगार स्थिति” में वर्णित हैं।

संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision)

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 का खंड (4) (धर्म, मूलवंश, जाति लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध) राज्य को शैक्षिक संस्थाओं में प्रवेश सहित सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति प्रदान करता है।
  • अनुच्छेद 16 (4) (लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता) नागरिकों के किन्ही पिछड़े वर्गो हेतु नियुक्तियों में आरक्षण हेतु प्रावधान करने के लिए राज्य को अनुमति देता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 340 में यह प्रावधान है कि “राष्ट्रपति आदेश दव्ारा सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गो की स्थितियों की जाँच करने के लिए आयोग” नियुक्त कर सकते है। चूंकि अन्य पिछड़े वर्गों दव्ारा की गई शिकायतों की जाँच करने के लिए स्वतंत्र आयोग को स्थापित करने की परिकल्पना नहीं थी, अत: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को संविधान के अनुच्छेद 338 (10) के तहत ऐसी शिकायतों की जाँच करने का कार्य सौंपा गया है।
  • संविधान के अनुच्छेद 38 का खंड (1) राज्य, ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्ध का प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 46 में यह व्यवस्था है कि राज्य दुर्बल वर्गों की शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करेगा।
  • अनुच्छेद 338 के खंड (10) (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग) में यह उल्लेख है कि इस अनुच्छेद में, अनुसूचित जातियों के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि इसके अंतर्गत ऐसे अन्य पिछड़े वर्गो के प्रति निर्देश, जिनको राष्ट्रपति अनुच्छेद 340 के खंड (1) के अधीन नियुक्त आयोग के प्रतिवेदन की प्राप्ति पर आदेश दव्ारा विनिर्दिष्ट करे, और आंग्ल-भारतीय समुदाय के प्रति निर्देश भी है। इस प्रकार राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अन्य पिछड़े वर्गों की शिकायतों पर भी विचार करने के लिए उत्तरदायी है।

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (National Commission for Backward Class)

  • उच्चतम न्यायालय के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामलें में दिए गए निर्देश, के अनुसरण में भारत सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एन. सी. बी. सी.) अधिनियम, 1993 दिनांक 1.2. 1993 अधिनियमित किया। अधिनियम की धारा 1 के तहत अधिनियम का कार्यक्षेत्र जम्मू व कश्मीर राज्य के सिवाय समस्त देश में विस्तारित होता है।
  • अधिनियम की धारा 3 में यह प्रावधान है कि आयोग में 5 सदस्य अर्थात्‌ अध्यक्ष जोकि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हो या रहें हो, एक समाज वैज्ञानिक, पिछड़े वर्गो से संबंधित मामलों में विशेष ज्ञान रखने वाले दो व्यक्ति और एक सदस्य-सचिव जोकि भारत सरकार में केन्द्र सरकार में सचिव स्तर के अधिकारी हों या रहे हों, होंगे। धारा 4 के तहत, प्रत्येक सदस्य कार्यभार ग्रहण करने की तारीख से 3 वर्ष की अवधि के लिए पदाधारित करेगा।
  • अधिनियम की धारा 9 (1) के तहत आयोग “अन्य पिछड़े वर्गो की ऐसी सूचियों में नागरिकों के किन्हीं वर्गों को अन्य पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल करने के अनुरोधों या अधिक शामिल करने या कम शामिल करने की शिकायतों की जाँच करेगा और केन्द्र सरकार को जैसा यह उचित समझे सलाह देगा।” अधिनियम की धारा 9 (2) में यह उल्लेख है कि आयोग की सलाह केन्द्र सरकार पर सामान्यत: बाध्यकारी होगी।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Minorities)

गृह मंत्रालय के प्रस्ताव पर 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का निर्माण हुआ, इसे ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992’ दव्ारा वैधानिक दर्जा दिया गया तथा इसके राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नाम दिया गया। पहला सांविधिक राष्ट्रीय आयोग 17 मई, 1995 को बनाया गया था। 1995 के संशोधन के पश्चात्‌ आयोग की सदस्य संख्या बढ़ाकर 7 कर दी गई (इसमें एक अध्यक्ष व एक उपाध्यक्ष) । अधिनियम की धारा 3 (2) के अनुसार आयोग के 5 सदस्य (अध्यक्ष के साथ) अल्पसंख्यक समूह के होंगे।

राष्ट्रीय धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यक आयोग (National Commission for Religious and Linguistic Minorities (NCRLM) )

भारत सरकार धार्मिक एवं भाषाई अल्पसंख्यकों में आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग के कल्याण हेतु प्रतिबद्ध है। धार्मिक व भाषाई अल्पसंख्यकों के बीच आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़े तबके के विस्तृत अध्ययन हेतु सरकार ने एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया है, जिसका कार्य इस वर्ग के लिए आवश्यक संवैधानिक, कानूनी एवं प्रशासनिक उपायों की अनुशंसा करना है। इस संबंध में अपने सुझाव एवं प्रतिक्रिया देना भी आयोग का कर्तव्य है।

भाषाई अल्पसंख्यकों हेतु विशेष अधिकारी (Special Officer for Linguistic Minorities)

  • भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारों की नियुक्ति (जिसे सामान्य: भाषाई अल्पसंख्यक अधिकारी के नाम से जाना जाता हैं) जुलाई 1957 में अनुच्छेद 350-बी के तहत हुई थी।
  • भारत के ‘भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त’ का मुख्यालय इलाहाबाद में है तथा इसके क्षेत्रीय कार्यालय कोलकाता, बेलगाम व चेन्नई में हैं।

Developed by: