Public Administration: Pensioners and Old People in India

Glide to success with Doorsteptutor material for UGC : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

भारत में अन्य असुरक्षित समूहों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण तंत्र, विधि, संस्थायें एवं निकाय (Important Mechanism, Laws, Institutions and Bodied for Betterment and Protection of Other Vulnerable Groups in India)

भारत में वृद्धजन और पेंशन (Pensioners and Old People in India)

  • देश भर में केन्द्र सरकार के पेंशन भोगियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के अंतर्गत 1985 में पेंशन एवं पेंशन भोगी कल्याण विभाग की स्थापना की गई।
  • यह भारत सरकार की सामान्य नीति निर्माण और अन्य सेवानिवृत्ति संबंधी लाभों हेतु नोडल विभाग है। इसके अतिरिक्त यह विभाग पेंशन एवं सेवानिवृत्ति संबंधी शिकायतों का निवारण भी करता है। साथ ही पेंशनभोगियों की अधिक सुविधा और कल्याण को भी सुनिश्चित करता है।

पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण विधेयक, 2011 (The Pension Fund Regulatory and Development Authority Bill, 2011)

  • पेंशन फंड विनियामक और विकास प्राधिकरण विधेयक, 2011,2003 में स्थापित अंतरिम प्राधिकरण को वैधानिक शक्तियाँ प्रदान करता है। यह नई पेंशन नीति का नाम बदलकर राष्ट्रीय पेंशन नीति करता है।
  • राष्ट्रीय पेंशन नीति (NPS) उन सभी केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों हेतु एक परिभाषित योगदान स्कीम है जिन्होंने 2004 के बाद रोजगार पाया है। इसे खुदरा विक्रेता, पेंशन फंड प्रबंधकों और लेखा जोखा रखने वालों के सहयोग से लागू किया जाता है। यह योजना पहले की ‘परिभाषित लाभ’ योजना से अलग है।
  • NPS के अधीन प्रत्येक उपभोक्ता का एक निजी पेंशन खाता होगा जो नौकरी में परिवर्तन के दौरान परिवर्तनीय होगा। उपभोक्ता अपनी पेंशन संपत्ति के प्रबंधन हेतु फंड प्रबंधनकर्ता और योजनाओं का प्रयोग करेंगे। उनके पास योजनायें और फंड प्रबंधनकर्ता बदलने का भी विकल्प होगा।
  • NPS को मई 2009 में सभी सामानय नागरिकों तक केन्द्र सरकार की एक अधिसूचना दव्ारा विस्तृत कर दिया गया था।

स्थायी सेवानिवृत्ति खाता संख्या (Permanent Retirement Account Number: PRAN)

प्रत्येक उपभोक्ता NPS के साथ पंजीकरण कराने पर एक विशष्ट PRAN प्राप्त करता है।

  • PFRDA, पेंशन तंत्र से संबंधित पदोन्नति, विकास एवं विनियमन संबंधी कार्य करेगा। यह विनियमों के हनन संबंधी मामलों में जुर्माना भी लेगा।
  • PFRDA को 5 वर्ष के कार्यकाल हेतु केन्द्र सरकार दव्ारा नियुक्त किया जाएगा जिसमें एक अध्यक्ष, तीन पूर्णकालिक सदस्य और तीन अल्पकालिक सदस्य होंगे। साथ ही इन्हें अपने पद से कुछ विशिष्ट दशाओं में ही हटाया जा सकेगा।
  • PFRDA, NPS को विनियमित करेगा।
  • PFRDA एक पेंशन सलाहकारी समिति का निर्माण करेगा जिसमें अधिकतम 25 सदस्य होंगे।

वृद्ध जनों हेतु राष्ट्रीय नीति (National Policy for Older Persons)

वृद्ध जनों हेतु राष्ट्रीय नीति की घोषणा 1999 में की गई थी, जिसका प्राथमिक उद्देश्य व्यक्ति को स्वयं एवं उसके जीवन साथी की वृद्धावस्था के लिए प्रावधान करने के लिए उत्साहित करना, परिवारों को उसके वृद्धजनों की देखभाल हेतु उत्साहित करना, स्वैच्छिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों को परिवारों दव्ारा प्रदत्त मदद में सहयोग हेतु प्रोत्साहित करना, दयनीय वृद्धजनों की सुरक्षा एवं देखभाल करना तथा वृद्धों को स्वास्थ्य सेवायें प्रदान करना है।

वृद्धजनों हेतु राष्ट्रीय परिषद (National Council for Older Persons: NCOP)

सरकार को वृद्धजनों हेतु नीति और योजना निर्माण के लिए सुझाव एवं मदद देने के लिए सरकार ने वृद्धजनों हेतु राष्ट्रीय परिषद का पुनर्गठन किया है। वृद्धजनों हेतु राष्ट्रीय नीति को लागू करने और वृद्धजनों हेतु विशिष्ट पहल करने के लिए यह सरकार को सुझाव देती है। NCOP वृद्धों की नीतियों के निर्माण एवं इनके कल्याण को सुनिश्चित करने वाली सर्वोच्च संस्था है जो इस संबंध में सरकार को सुझाव और सहयोग देती है।

घूमक्कड़, अर्द्ध-घूमक्कड़ और विमुक्त जनजातियाँ (Nomadic, Semi-Nomadic and Denotified Tribes: DNTs)

  • घूमक्कड़, अर्द्ध-घूमक्कड़ और विमुक्त जनजातियों के अधीन 200 समुदाय आते हैं जिन्हें औपनिवेशिक सरकार दव्ारा ‘अपराधी जनजाति अधिनियम, 1871’ के तहत ‘अपराधी जनजातियों’ के रूप में चिन्हित किया गया था। स्वतंत्रता के बाद इस अधिनियम को रद्द कर दिया गया और उपरोक्त कानून के अधीन चिन्हित जनजातियों को विमुक्त, अर्द्धघूमक्कड़ और घूमक्कड़ (DNTs, SNTs और NTs) नाम दिया गया। DNTs के विषय में कोई सटीक आँकड़ा प्राप्त नहीं है तथा इनकी जनगणना भी नहीं हुई है, यद्यपि ये लगभग सभी राज्यों में मिलते हैं और कुछ बड़े राज्यों में OBC वर्ग के अधीन आते हैं।
  • अन्य राज्यों में ये SC और ST वर्ग के अधीन भी आते हैंं। कुछ समुदायों को इन तीनों यथा SC, ST और OBC में भी स्थान प्राप्त नहीं हैं। जो इन तीनों वर्गों के अधीन आते भी हैं उन्हें भी लाभ नहीं मिलता क्योंकि या तो उनके पास जाति प्रमाणपत्र नहीं होता या गैर घूमक्कड़/गैर-विमुक्त समुदाय के लोग उन्हें प्राप्त आरक्षण कोटा स्वयं हड़प्प लेते हैं।
  • अधिकांश राज्यों घूमक्कड़, अर्द्ध-घूमक्कड़ समुदायों की सूची नहीं बनाई है और ऐसे लोगों की दशा अज्ञात है। DNTs के पास विविध सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण स्थायी आवास नहीं है, परिणामस्वरूप इन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता। अत: एक प्रभावी पुनर्वास दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें DNTs के सामाजिक-आर्थिक विकास की भी प्रभावी योजना हो तथा साथ ही इनके लिए निवास/ग्राम स्थापित करने का प्रावधान हो।
  • वर्तमान में मौजूद कानूनों जैसे अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम, 1989, आदतन अपराधकर्ता अधिनियम 1952, भिक्षावृत्ति रोकथाम अधिनियम 1959 जंतुओं के प्रति क्रूरता की रोकथाम कानून, 1986, वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 और वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 और कर कानून आदि पर पुनर्विचार की आवश्यकता है ताकि DNTs की गरिमा व आजीविका बनाई रखी जा सके।

पदार्थ (ड्रग) कुप्रयोग और मंदिरा/शराब का सेवन (Substance (Drug) Abuse and Alcoholism)

शराब पीने अथवा पदार्थ की लत की समस्या चिंताजनक स्थिति में पहुँच गई है और यह समाज के लिए खतरनाक है। शरीर और स्वास्थ्य पर कुप्रभाव के साथ-साथ ड्रग की लत समाज की बड़ी समस्या बनती जा रही है और ड्रग/शराब के लती लोगों में अपराध की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है। ड्रग की आदत इसके आदी व्यक्ति व उसके परिवार में वित्तीय और मनोवैज्ञानिक समस्या को बढ़ा देती है जिससे ये समस्या व्यक्तिगत व्यवहार की सीमा से बाहर ही जाती है और समुदाय के केन्द्र में आ जाती है चाहे वो परिवार हो या विस्तृत समाज। अत: एक प्रभावी प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण की जरूरत है, जो कि व्यापक हो और कार्यक्रमों को केन्द्रित कर सके। विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालय जैसे-ग्रामीण विकास मंत्रालय जैसे-ग्रामीण विकास मंत्रालय, गृह मामलों का मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय आदि इन वंचित/दयनीय समूहों के विभिन्न पक्षों को सुन रहे हैं। इस संबंध में अधिक बेहतर सहयोग की आवश्यकता है। मंत्रालयों दव्ारा निर्मित सभी योजनागत और गैर योजनागत कार्यक्रमों को एक परियोजना के अधीन लाये जाने की जरूरत है।

स्वापक औषधि एवं मन: प्रभावी (संशोधन) विधेयक, 2011 (The Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (Amendment) Bill, 2011)

  • इस विधेयक को लोकसभा में 8 सितंबर, 2011 को प्रस्तावित किया गया था।
  • विधेयक, 1985 के स्वापक औषधि एवं मन: प्रभावी अधिनियम में संशोधन करता है; जिसमें नशीली दवाओं और नशीले पदार्थों पर नियंत्रण एवं विनियमन का प्रावधान है साथ ही इसमें नशीले पदार्थों की अवैध तस्करी से जुड़े पदार्थों को जब्त करने का भी प्रावधान है।
  • सरकार उन पौधों से (जिनसे रस प्राप्त नहीं किया जाता) उत्पादित पोस्ता (पॉपी) की बिक्री, खरीद और उपयोग को विनियमित कर सकती है या इसकी अनुमति दे सकती है।
  • कानून यह प्रावधान करता है कि ड्रग लेने में संलिप्त पाये गये व्यक्ति को 6 माह तक का कड़ा कारावास या 20000 रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों दिया जाये। जिन ड्रग्स को नामनिर्दिष्ट नहीं किया गया है उनके लिए इस विधेयक में संशोधन करते हुए कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून को तोड़ते हुए ड्रग का सेव करते हुए पाया गया उसे 6 महीने तक का कारावास या 10000 रुपये जुर्माना या दोनों दंड भोगना होगा।
  • पूर्व में दोषसिद्ध हो जाने के बाद, विधेयक में जुर्माना बढ़ाने का प्रावधान है। दोषसिद्ध व्यक्ति की सजा डेढ़ गुना बढ़ाई जा सकती है। जुर्माने में भी यही प्रावधान लागू है।
  • विधेयक यह भी प्रावधान करता है कि स्वापक औषधि, मन: प्रभावी अथवा प्रतिबंधित पदार्थ का निस्तारण विधेयक में उल्लिखत प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।
  • अधिनियम में अध्यक्ष के अधीन अपीलीय प्राधिकरण की व्यवस्था है।

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, पदार्थ (ड्रग) कुप्रयोग और शराब सेवन की रोकथााम की योजना और स्वैच्छिक संगठनों दव्ारा चलाई जाने वाली सामाजिक रक्षा सेवाओं से संबद्ध योजना के तहत प्रभावित व्यक्तियों हेतु एकीकृत पुनर्वास केन्द्रो (IRCAs) को सहयोग दे रहा है।

शराब सेवन एवं पदार्थ (ड्रग) कुप्रयोग रोकथाम हेतु योजना (Scheme for Prevention of Alcoholism and Substance (Drugs) Abuse)

दृष्टिकोण-पदार्थ कुप्रयोग और शराब के सेवन को एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक चिकित्सकीय समस्या मानते हुए स्वैच्छिक संगठनों का दृष्टिकोण सेवायें प्रदान करना होना चाहिए, जिसमें जागरूकता फैलाना, पहचाान, पुनर्वास आदि शामिल हैं। शराब की खपत और निर्भरता बढ़ाने वाले पदार्थों की माँग घटाने के दृष्टिकोण के साथ-साथ जोर इस बात पर होगा कि रोकथाम की शिक्षा दी जाये और प्रभावित लोगों को समाज की मुख्य धारा में पुन: शामिल किया जाये। भारत सरकार, संस्थागत क्रियायें करने वाले संगठनों को वित्तीय सुरक्षा देगी और सरकार का जोर सामुदायिक संसाधनों के संचालन और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने पर होगा।

उद्देश्य-शराब व नशीले पदार्थों का प्रयोग रोकने वाली योजना के निम्न उद्देश्य हैं-

  • व्यक्तिगत, पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर लोगो को शराब व पदार्थ कुप्रयोग के बुरे प्रभावों के बारे में जागरूक एवं शिक्षित करना।
  • शराब सेवन रोकने के लिए संस्कृति आधारित मॉडल अपनाना तथा व्यसनी लोगों का उपचार व पुनर्वास करना।
  • व्यसनी व्यक्तियों को समुदाय आधारित सेवायें प्रदान करना जैसे प्रेरणा, परामर्श नशा मुक्ति, देखभाल और पुनर्वास।
  • लोगों और बुरी आदतों के शिकार वर्गो के बीच सामूहिक पहल और स्व सहायता कोशिशों को प्रोत्साहित करना।
  • शराब सेवन और पदार्थ कुप्रयोग पर राज्य व स्वैच्छिक संगठनों में संबंध स्थापित करना।

भिखारी (Beggars)

  • भारत में भिखारियों की संख्या के विषय में सटीक व निश्चित जानकारी नहीं है। 2001 की जनगणना के आँकड़ों के अनुसार 7.03 लाख भिखारी थे जिनमें से 6.31 गैर-कामगार समूह में थे। अन्य राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों की तुलना में कुछ राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल, असम, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, ओडीशा, पंजाब, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मध्य-प्रदेश उत्तर-प्रदेश में उनकी कुल जनसंख्या का प्रतिशत अधिक है।
  • आवश्यक एवं उत्तरादायी कदम उठाने के लिए राज्य जिम्मेदार हैं। भिखारियों की भिक्षावृत्ति रोकने के लिए न ही कोई केन्द्रीय प्रावधान है, न ही कोई स्पष्ट नीति जिससे इस समस्या को रोका जा सके। हालाँकि भिक्षावृत्ति रोकने के लिए सामान्य प्रावधान किये गये हैं इसमें शामिल हैं-भारतीय दंड संहिता (IPC) , बाल न्याय कानून 2000, भारतीय रेल कानून 1989।

Developed by: