Public Administration: Status of Pharmaceutical Industry of India

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

भारत के औषधीय उद्योग की स्थिति (Status of Pharmaceutical Industry of India)

  • भारत का औषधि उद्योग मात्र 6 बिलियन डॉलर का है लेकिन इसकी हिस्सेदारी प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। भारत का औषधि उद्योग निर्यात प्रतिवर्ष 30 प्रतिशत की दर बढ़ रहा है। भारत के इस संगठित औषधि उद्योग में 250 से 300 के मध्य कंपनियाँ शामिल हैं। भारत की दवाईयों की मांग की लगभग 70 प्रतिशत आपूर्ति स्थानीय विनिर्माण (Local Manufacturing) दव्ारा की जाती है।
  • जर्मन केमिकल एसोसिएशन के अनुसार वर्ष 2005 में भारत की 10 शीर्ष औषधि निर्माता कंपनियाँ रेनबैक्सी, सिपला, डॉ रेड्‌डी, लैबोरेटरीज, ल्यूपिन, निकोलस पीरामल, अरविंदो फार्मा, कैंडिला, फार्मास्यूटिकल, सन फार्मा आदि रही।
  • देश में आयातित, विनिर्मित, वितरित एवं बेची जाने वाली औषधियों प्रसाधन सामग्रियों व चिकित्सा उपकरणों को औषध एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम 1940 के उपबंधों एवं उसके अंतर्गत बने औषण एवं प्रसाधन नियम 1945 के अंतर्गत विनियमित किया जाता है। केन्द्र सरकार देश में आयात की जाने वाली इन वस्तुओं का विनियामक नियंत्रण औषध मानक नियंत्रण संगठन (CDSCD) दव्ारा करती हैंं। औषधियों के विनिर्माण बिक्री तथा वितरण को मुख्यतया राज्य सरकारों दव्ारा नियुक्त राज्य औषध नियंत्रण प्राधिकारियों दव्ारा विनियमित किया जाता है। केन्द्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन का मिशन औषधों प्रसाधनों और चिकित्सा उपकरणों को सुरक्षित बनाना, उसकी प्रभावकारिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करके सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा करना है।
  • औषधों के परीक्षण के संबंध में विवाद के मामले में केन्द्रीय औषध प्रयोगशाला, कोलकाता अपीलीय प्रयोगशाला है और यह रसायन तथा जैविक जाँचों के लिए एनएबीएल से मान्यता प्राप्त है। केन्द्रीय औषध जाँच प्रयोगशाला, मुंबई एक सांविधिक प्रयोगशाला है जो पत्तनों से लिये गये औषधों के नमूनों, नई औषधों तथा ओरल गर्भनिरोधक गोलियों की जाँच में संलग्न है। यह कॉपर टी- इंट्रायट्रिन गर्भनिरोधक युक्ति और ट्‌यूबल रिंग के लिए अपीलीय प्रयोगशाला है। देश में विपणन किये जाने के लिए नयी औषधियों को (यह सुनिश्चित किये जाने के बाद कि ये औषधियाँ, औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियमावली की अनुसूची वाई की अपेक्षा के अनुसार सुरक्षित एवं प्रभावोत्पादक और उनके अनुरूप हैं) भारत के औषधि महानियंत्रक दव्ारा अनुमति प्रदान की जाती है। नई औषधों के अनुमोदन तथा नये औषधीय पदार्थों के नैदानिक परीक्षणों के अनुमोदन के लिए आवेदनों की जाँच करने के लिए 12 नई औषध सलाहकार समितियाँ गठित की गई हैं।
  • भारत में 1900 करोड़ रुपये का टीका उद्योग है, जिसमें से देश विनिर्मित दो-तिहाई टीकों का निर्यात किया जा रहा है जबकि एक-तिहाई टीके देश में ही उपयोग किये जाते हैं। टीकों की खरीद करने वाली प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ -डब्ल्यूएचओ, यूनिसेफ, मेटस फाउंडेशन, क्लिंटन फाउंडेशन आदि विश्व भर में उपयोग हेतु टीकों की खरीद करती हैं। ये एजेंसियाँ विश्व स्वास्थ्य संगठन दव्ारा यह सुनिश्चित करने के आधार पर ही टीके खरीदती हैं कि ये उच्च गुणवत्ता के हैं और प्रयोग के लिए प्रभावकारी हैं। भारतीय लोगों में प्रतिकूल औषध अभिक्रिया संबंधी आँकड़ें क्रमबद्ध ढंग से प्राप्त करने के लिए भारतीय फार्माकोविजिलेंस कार्यक्रम की शुरूआत वर्ष 2010 में की गयी। इस कार्यक्रम के तहत वर्तमान में 60 मेडिकल कॉलेजों में प्रतिकूल औषध अभिक्रिया केन्द्र कार्य कर रहे हैं।

मानव संसाधन (Human Resource)

  • मानव संसाधन एक वृहद अवधारणा है। यह राष्ट्रीय अथवा अर्थव्यवस्था के विकास का महत्वपूर्ण उपकरण है। मानव संसाधन प्रबंधन की धारणा व्यक्तियों अथवा मानव को एक संसाधन (Resource) के रूप में देखती है। यह एक व्यवसाय अथवा संगठन के कर्मचारियों, स्टाफ आदि को उनकी दक्षता/कौशल अथवा योग्यता के परिप्रेक्ष्य में एक परिसंपत्ति (Asset) के रूप में देखता है। मानव संसाधन विकास की धारणा के तहत यह मान्यता है कि व्यक्ति की योग्यता, कुशलता, दक्षता, नवाचारी प्रवृत्ति, जोखिम धारिता की प्रवृत्ति, अंतर्निहित क्षमता का प्रयोग कर उन्हें एक प्रभावी उत्पाद के रूप में बदला जा सकता है। कुशल श्रम बल (Skilled Labour Force) और विविध प्रकार की सेवाओं की आपूर्ति मानव संसाधन प्रबंधन के जरिये सुनिश्चित हो पाती है।
  • मानव संसाधन प्रबंधन व विकास की रणनीति का ध्यान इस बात पर प्रमुख रूप से होता है कि व्यक्ति प्राप्त करने के उच्च स्तरों की मानसिकता से जुड़ सके जिससे उनके कार्य निष्पादन में सुधार आये। निर्धनता, बेरोजगारी, भुखमरी जैसी समस्याओं का निराकरण कर व्यक्तियों को आर्थिक विकास की प्रक्रिया में सहभागिता कराने के प्रयास को भी मानव संसाधन प्रबंधन की रणनीति के रूप में देखा जाता है।
  • भारत में दक्षता विकास को मानव संसाधन विकास के प्रमुख रणनीति के रूप में देखा गया है। इस संदर्भ में 11वीं पंचवर्षीय योजना में शुरू किये गये राष्ट्रीय दक्षता मिशन में दक्षता विकास कार्यक्रमों के नियंत्रण हेतु प्रतिमान की तरफ रूख करना होगा एवं प्रोत्साहनों की व्यवस्था करनी होगी। दक्षता विकास के लिए एक समन्वित कार्रवाई योजना के महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रीय दक्षता विकास निगम (N. S. D. C.) ने अच्छी प्रगति की है। लेकिन इसके बावजूद मांग आधारित दक्षता तैयार करने के प्रमुख क्षेत्रों में ठोस कार्रवाई की आवश्यकता है।

नवाचार (Innovation)

  • नवाचार मानव संसाधन अथवा मानव पूंजी के निर्माण हेतु एक आवश्यक दशा है। नवाचार किसी एक विचार को एक वस्तु अथवा सेवा में परिवर्तित करने की प्रक्रिया है जो एक मूल्य का सृजन करता है और जिसके लिए उपभोक्ता भुगतान करते हैं। नवाचार में सूचना कल्पना और पहल का तत्व शामिल होता है, जो विभिन्न संसाधनों से भिन्न-भिन्न मूल्यों को प्राप्त करता है और उपयोगी उत्पादक के निर्माण की प्रक्रिया शुरू करता है।
  • भारत के राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने नवाचार (Innovation) को व्यापक अर्थों में देखा व परिभाषित किया है। आयोग के अनुसार, नवाचार को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जिसके दव्ारा मापन योग्य मूल्य संवर्धन (Measurable Value Enhancement) के विविध स्तरों को किसी वाणिज्यिक गतिविधि में नियोजित एवं प्राप्त किया जाता है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अनुसार यह प्रक्रिया बिल्कुल नयी शुरूआत के रूप में अथवा क्रमिक रूप में हो सकती है।

नवाचार की प्रक्रिया व्यवस्थित रूप में घटित होती है और इसे निम्नांकित रूपों में प्राप्त किया जा सकता है-

  • नये अथवा परिष्कृत वस्तुओं व सेवाओं की शुरूआत करके।
  • नये अथवा परिष्कृत प्रचालनीय प्रक्रिया (Operational Process) को क्रियान्वित करके।
  • नये अथवा परिष्कृत संगठनात्मक/प्रबंधकीय प्रक्रिया का क्रियान्वयन करके।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अनुसार नवाचार एवं प्रतिस्पर्द्धात्मकता के बीच एक गतिशील पारस्परिक संबंध है। नवाचार प्रतिस्पर्धी माहौल में ही उभरता एवं विकसित होता है। नवाचार आर्थिक मूल्य एवं अर्थव्यवस्था व उद्यमिता की संस्कृति (Cultures of Entrepreneurship) में नये रोजगारों का सृजन करता है। प्रतिस्पर्द्धात्मकता से अपने संबंध के कारण नवाचार आर्थिक संवृद्धि का महत्वपूर्ण कारक बनता है। उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी व अनुसंधान एवं विकास (R&D) नवाचार के दो मुख्य स्त्रोत हैं।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग दव्ारा वर्ष 2007 में भारत में नवाचार की स्थिति पर पहला व्यवस्थित सर्वे कराया गया था, जिसमें संवृद्धि व नवाचारों में वृद्धि को तीन बिन्दुओं में दर्शाया गया है जो निम्नवत्‌ हैं-

  • नवाचार सघनता (Innovation Intensity) , जिसे 3 वर्ष से कम समय वाले वस्तुओं एवं सेवाओं से प्राप्त राजस्व के प्रतिशत के रूप में देखा जा सकता है, में बड़ी फर्मो व लघु मध्यम उपक्रमों के संदर्भ में वृद्धि हुई है। सर्वे में पाया गया है कि लघु मध्यम उपक्रमों ने बड़ी फर्मों की तुलना में नवाचार सघनता (Innovation Intensity) में अधिक वृद्धि दर्ज की है। सर्वे में यह भी स्पष्ट किया गया है कि 42 प्रतिशत बड़ी फर्म व 17 प्रतिशत लघु मध्यम उपक्रम उच्च नवाचारी फर्म (Highly Innovative Firms) हैं। उच्च नवाचारी फर्म उन फर्मो अथवा कंपनियों को कहा गया है जिन्होंने पिछले 5 वर्षों में व्यवसाय के दौरान ऐसे नवाचारों की शुरूआत की है जो विश्व के लिए नये हों।
  • बड़ी फर्मो व लघु मध्य उपक्रमों का लगभग आधा नवाचारों के महत्वपूर्ण कारकों में 25 प्रतिशत तक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है। इन कारकों में प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि, लाभजन्यता में वृद्धि, लागत में कमी और बाजार में हिस्सेदारी में वृद्धि प्रमुख हैं। बड़ी फर्मो के लिए नवाचार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रभाव प्रतिस्पर्धात्मकता पर पड़ा है जबकि लघु मध्यम उपक्रमों के लिए नवाचार का सर्वाधिक प्रभाव बाजार हिस्सेदारी में वृद्धि पर पड़ा है।
  • 17 प्रतिशत बड़ी फर्मो ने नवाचारों को शीर्ष रणनीतिक वरीयता (Top Strategic Priority) प्रदान की है और 75 प्रतिशत ने तो इसे तीन सर्वाधिक प्रमुख वरीयताओं में शामिल किया है। ज्ञान आयोग के सर्वे का कहना है कि सभी बड़ी फर्मो ने माना है कि भारत में आर्थिक उदारीकरण की शुरूआत के साथ ही संवृद्धि व प्रतिस्पर्धात्मकता के संदर्भ में नवाचार ने अत्यधिक महत्व का स्थान प्राप्त कर लिया है। सभी बड़ी फर्मो का यह भी मानना है कि वे नवाचारों में निवेश के बिना न तो बने रह सकती हैं और न ही विकास कर सकती हैं। 96 प्रतिशत बड़ी फर्मो ने अगले 3 से 5 वर्षों में नवाचारों पर व्यय में वृद्धि का मन बना लिया है और इसके लिए रणनीतियाँ बनानी शुरू कर दी हैं।

नवाचार व वैश्वीकरण (Innovation and Globalization)

वैश्वीकरण, उदारीकरण, निजीकरण की प्रवृत्तियों के विकास के साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा मिला है। विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट मेंं स्पष्ट किया गया है कि ‘नवाचार’ वैश्विक स्तर पर संवर्धित उत्पादकता व प्रतिस्पर्धात्मकता का महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है। उत्पादकता में वृद्धि और उच्च जीवन स्तर को बढ़ावा देने के साधन के रूप में यह निर्धनता उन्मूलन में भी मदद करता है। वैश्वीकरण के विकास के साथ ज्ञान आधारित समाज व ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त हुआ है। ये अवधारणाएँ मानव पूंजी के विकास से जुड़ी है और नवाचार को ज्ञान प्रवाह (Knowledge Flows) के उपकरण के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की रिपोर्ट (2007) के अनुसार भारत में नवाचार सघनता (Innovation Intensity) 2001 - 02 में 6.49 प्रतिशत से 2005 - 06 में बढ़कर 11.5 प्रतिशत हो गयी थी।

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