Public Administration: Issues Relating to Hunger, Poverty and Development

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भूख, निर्धनता व विकास से संबंधित मुद्दे (Issues Relating to Hunger, Poverty and Development)

कुपोषण (Malnutrition)

  • कुपोषण एक ऐसी अवस्था या दशा है जो एक साथ कई गंभीर समस्याओं की तरफ इशारा करती है। इसे सामान्यतया बच्चे अथवा वयस्क के वजन, शारीरिक व मानसिक वृद्धि, रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रभाव के संदर्भ में देखा जाता है। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WEP) का मानना है कि कुपोषित व्यक्ति का शरीर सामान्य क्रियाकलाप करने विशेषकर वृद्धि के संदर्भ में कठिनाई महसूस करता है और रोगों को रोक पाने में सक्षम नहीं होगा। कुपोषण की स्थिति में शारीरिक कार्य करने में समस्या आती ही है साथ ही सीखने की क्षमता (Learning Abilities) घटती जाती है। इस प्रकार स्पष्ट रूप में कहा जा सकता है कि मानव स्वास्थ्य के लिए आवश्यक कुछ अथवा सभी पोषक तत्वों के अभाव की स्थिति को कुपोषण कहा जाता है। कुपोषण मुख्यतया दो रूपों में देखा जाता है। प्रथम, प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण व दव्तीय सूक्ष्मपोषक (Micro Nutrient) जिसमें विटामिन व खनिज की कमी से होने वाला कुपोषण शामिल है।
  • भारत में एकीकृत बाल विकास सेवाएं कार्यक्रम के जरिये बच्चों को कुपोषण की विकराल स्थिति से बाहर निकालने का प्रयास 1970 के दशक में किया गया था। आईसीडीएस कार्यक्रम की एक मुख्य सीमितता अथवा दुर्बलता यह है कि इसके तहत 3 से 6 वर्ष के लक्षित बच्चों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाता है और इस समय तक कुपोषण उनमें अपना स्थान बना चुका होता है। इसी संदर्भ को ध्यान में रखकर भारत सरकार दव्ारा हाल ही में एकीकृत बाल विकास (ICDS) सेवा कार्यक्रम का पुनर्गठन किया गया है जिसके तहत गर्भवती महिलाओं, देखभाल वाली माताओं (Nursing Mothers) और 3 वर्ष के भीतर के सभी बच्चों को पूरक आहार (Supplementary Food) उपलब्ध कराने पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक 106 मिलियन डॉलर की लागत वाली ‘एकीकृत बाल विकास सेवा प्रणाली सुदृढ़ीकरण और पोषण सुधार कार्यक्रम’ (ISSNIP) भारत में चला रहा है। 162 उच्च कुपोषण भारित जिलों (जो 8 राज्यों आंध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान व उत्तर प्रदेश में हैं) पर ध्यान केन्द्रित किया गया है।

विश्व बैंक की भारत में कुपोषण की स्थिति पर रिपोर्ट, 2013 (World Bank Report on Nutrition in India, 2013)

  • विश्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत के बच्चों में कुपोषण का स्तर चीन के बच्चों से लगभग 5 गुना व सब सहारा अफ्रीकी देशों से 2 गुना अधिक है। रिपोर्ट में कुपोषण की भारत के मौन आपात (Silent Emergency) की संज्ञा दी गयी है। यह भी कहा गया है कि कुपोषण भारत में मानवविकास की चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर चुका है। रिपोर्ट का मानना है कि यद्यपि भारत ने पिछले 20 वर्षो के दौरान अच्छी आर्थिक संवृद्धि दर्ज की है परन्तु पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण के मामले में भारत का विश्व में प्रथम स्थान बना हुआ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में माना गया है कि भारत में लगभग 60 मिलियन बच्चे अल्पवजन (Underweight) के अथवा अल्पभारित हैं, लगभग 45 प्रतिशत बच्चे बौने अथवा अपनी आयु से कम लंबाई वाले हैं, 20 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो अपनी लंबाई की तुलना में काफी दुबले-पतले हैं, 75 प्रतिशत बच्चे एनीमिया जैसे रोग से पीड़ित हैं और 57 प्रतिशत बच्चे विटामिन ए की कमी से पीड़ित हैं।
  • विश्व बैंक का मानना है कि कुपोषण बच्चों के जीवित रहने अथवा उनकी उत्तरजीविता (Survival) के अवसरों को प्रभावित करता है, बीमारियों की आशंकाओं में वृद्धि करता है, सीखने की क्षमता को कम करता है, स्कूल से जल्दी अनुपस्थित रहने की संभावनाओं को बढ़ाता है और आगामी जीवन के लिए बच्चों को कम उत्पादकीय (Less Productive) बनाता है। विश्व बैंक का कहना है कि इनमेंं से अधिकांश अल्पपोषण (Undernourishment) गर्भावस्था के दौरान घटित होता है और बच्चों के जीवन के शुरूआती 2 वर्षो में इस स्थिति को विशेषकर देखा जाता है। सकरात्मक हस्तक्षेप के अभाव में मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है और कार्यशील क्षमता भी घटती जाती है।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक उत्पादकता पर प्रभाव डालने वाले इस कुपोषण, अल्पपोषण आदि स्थितियों से मानव विकास के समक्ष गंभीर खतरा उत्पन्न होता है जो भारत के जनांकिकीय लाभांश पर गहरा प्रभाव डालता है और अंतत: भारत की आर्थिक संवृद्धि को प्रभावित करता है। राज्यों व सामाजिक-आर्थिक समूहों में कुपोषण की स्थिति के संदर्भ में अंतर विद्यमान है। लड़कियों, ग्रामीण क्षेत्रों, निर्धन लोगों, अनुसूचित जाति के लोगों, आदिवासियों आदि सामाजिक-आर्थिक समूहों में कुपोषण की दर अपेक्षाकृत अधिक है। भारत के 6 राज्य बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान एवं उत्तर प्रदेश देश कुपोषण के आधे मामलों के लिए जिम्मेदार हैंं अतिरिक्त 8 से 10 प्रतिशत मामलों हेतु आंध्र प्रदेश व महाराष्ट्र के कुछ विशिष्ट क्षेत्र जिम्मेदार हैं।
  • विश्व बैंक कुपोषण के अंतरपीढ़ीय चक्र (Intergenerational Cycle) की बात भी करता है। विश्व बैंक का मानना है कि कुपोषण के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। इसमें अनुपयुक्त खान-पान (Inappropriate Feeding) व अपर्याप्त देखभाल शामिल हैं। बच्चों के जन्म के आरंभिक वर्षो खासकर 2 से 3 वर्षों के मध्य उन्हें जिस प्रकार का आहार, दुग्धपान, टीकाकरण, देखभाल की जरूरत होती है, उसकी ग्रामीण क्षेत्रों में काफी हद तक अनदेखी की जाती है। अत्यधिक सघन जनसंख्या वाले इलाकों में अत्यधिक खराब स्वच्छता की दशा (Poor Hygiene Level) बच्चों में विभिन्न संक्रामक बीमारियों को उत्पन्न करने में सहायक होती है। गंदगी की स्थिति से जो कुछ अल्प पोषक तत्व शरीर को प्राप्त होता भी है, उसका शारीरिक व मानसिक विकास में कोई खास स्थान नहीं रह जाता। दूषित जल व दूषित भोजन अनेक विकारों को उत्पन्न करने में सहायक होता है जिससे क्रमिक रूप से बच्चों में स्वास्थ्य गिरता रहा है।
  • विश्व बैंक का मानना है कि अधिकांश नयी माताएँ किशोरियाँ होती हैं जिनमें से 75 प्रतिशत रक्ताल्पता (खून की कमी) की समस्या से पीड़ित होती हैं।

भारत में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में हुई प्रगति (Progress in Line of Finding Millennium Development Goals is India)

संयुक्त राष्ट्र मानव विकास कार्यक्रम (UNDP) दव्ारा भारत में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में हुई प्रगति का मूल्यांकन किया गया है। 8 सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की दिशा में भारत की स्थिति निम्नवत हैं-

  • अत्यधिक भूखमरी व निर्धनता का उन्मूलन-संयुक्त राष्ट्र मानव विकास कार्यक्रम का मानना है कि भारत निर्धनता को हटाने में धीमी गति से ही सही परन्तु सफल रहा है। यूएनडीपी का कहना है कि भारत में पोवर्टी हेडकाउंट रेशियो जिसके 2015 तक 18.6 प्रतिशत तक पहुँचने का आकलन किया गया है (भारत सरकार के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य रिपोर्ट, 2009 के अनुसार) के लगभग 3.5 प्रतिशतांक बिन्दु के लक्ष्य को प्राप्त न कर पाने की संभावना है। यूएनडीपी का कहना है कि प्रगति के बावजूद भूखमरी एक गंभीर अथवा प्रमुख चुनौती है। जनसंख्या का वह अनुपात जिसका आहार ऊर्जा (Dietary Energy Consumption) उपभोग 2100 व 2400 कैलोरी के न्यूनतम स्वीकृत मानक से कम है, 1987 - 88 के 64 प्रतिशत से बढ़कर 2004 - 05 में 76 प्रतिशत हो गया है। दूसरे शब्दों में, यूएनडीपी का मानना है कि वर्ष 2004 - 05 में 76 प्रतिशत जनसंख्या को भोजन के संबंध में कैलोरी मानक को प्राप्त करने में सफलता मिली। यूएनडीपी का कहना है कि कुपोषण खाद्यान्न असुरक्षा का एक प्रमुख संकेतक हैं। वर्ष 1990 में जब सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की रूपरेखा तय की गयी थी, उस समय सभी भारतीय बच्चों में 53.5 प्रतिशत बच्चें कुपोषित थे। तब से अब तक प्रगति बहुत धीमी रही है।
    • संयुक्त राष्ट्र मानव विकास कार्यक्रम के अनुसार भारत में 3 वर्ष से कम के अल्पभारित बच्चों (Underweight Children) का अनुपात 1998 - 99 के मध्य केवल 1 प्रतिशत व 2005 - 06 में 46 प्रतिशत घटा। ऐसा आकलन किया गया है कि कुपोषण में 2015 तक 40 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। इसके बावजूद यह सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (कुपोषण को घटाकर 28.6 प्रतिशत पर ले जाना) से काफी पीछे है।
  • सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धता- सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धता के संदर्भ में भारत सही दिशा की तरफ अग्रसर है और भारत प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण करने के कुछ मामलों में तो लक्ष्य से काफी आगे है। वर्ष 2006 - 07 में लड़कों व लड़कियों दोनों के ही संदर्भ में सकल नामांकन अनुपात 100 प्रतिशत को पार कर गया है। सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की प्राप्ति पर जोर को सरकार की कुछ योजनाओं के अंतर्गत देखा जा सकता है-
    • बुनियादी अथवा प्राथमिक स्तर पर (Elementary Level) बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर में 2003 - 04 के 52.2 प्रतिशत की तुलना 2011 - 12 तक 20 प्रतिशत की कमी के लक्ष्य को प्राप्त करना।
    • गुणवत्तायुक्त शिक्षा को सुनिश्चित करने के लिए प्राथमिक स्कूलों में शैक्षिक उपलब्धता के न्यूनतम मानक को विकसित करना।
    • 7 वर्ष या अधिक आयु के व्यक्तियों के संदर्भ में साक्षरता दर को 2011 - 12 तक बढ़ाकर 85 प्रतिशत करना।
    • 2011 - 2012 तक साक्षरता में लैंगिक अंतराल (Gender Gap in Literacy) को 10 प्रतिशतांक बिन्दु तक कम करना। भारत में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के मुद्दों पर ध्यान देने वाली कुछ महत्वपूर्ण केन्द्र प्रायोजित योजनाएँ सकिय हैं जैसे- सर्वशिक्षा अभियान, मिड डे मील स्कीम, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय स्कीम आदि।
  • लैंगिक समानता को बढ़ावा देना तथा महिलाओं को सशक्त करना-भारत वर्ष 2005 की निर्धारित अवधि तक प्राथमिक व दव्तीयक शिक्षा में लैंगिक असमानता का उन्मूलन करने में सफल नहीं हो पाया है लेकिन प्राथमिक व दव्तीयक/माध्यमिक शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात की दृष्टि से लैंगिक समानता सूचकांक (GPI) में प्रगति हुई है। कुछ प्रगति के बावजूद लैंगिक समानता प्राप्ति के लक्ष्य की दिशा में संताेाजनक प्रगति नहीं हो पायी है। भारत सरकार के सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य रिपोर्ट, 2009 में उल्लेख किया गया है कि, रोजगार व निर्णय-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में कम है और इस विषमता को वर्ष 2015 तक खत्म कर पाना संभव नहीं हो सकेगा। उद्योग व सेवा क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी 1990 - 91 व 2004 - 05 के मध्य 13 - 18 प्रतिशत ही बढ़ी है।
  • शिशु मृत्यु को घटना-संयुक्त राष्ट्र मानव विकास कार्यक्रम का चौथा सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु को दो-तिहाई तक घटाना है। भारत का पाँच वर्ष से कम आयु के शिशुओं की मृत्यु दर 1990 में प्रति एक हजार उम्र जीवित जन्म पर 125 थी जो 2005 - 06 में घटकर प्रति एक हजार जीवित जन्म पर 74.6 हो गयी। इसके वर्ष 2015 तक 70 होने की संभावना व्यक्त की गयी थी। भारत के लिए इस संदर्भ में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य वर्ष 2015 तक प्रति 1000 जीवित जन्म पर शिशुओं/बच्चों की मृत्यु को 42 तक सीमित करना है। इस प्रकार भारत में बच्चों को विविध बीमारियों व खासकर प्रसव के दौरान सुरक्षा के सदंर्भ में विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है जिससे बाल अधिकारिता संरक्षण एक यथार्थ बन सके।
  • मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार- भारत में वर्ष 1990 - 91 में मातृत्व मृत्यु दर (MMR) प्रति एक लाख जीवन जन्म पर 437 था। सहस्त्राब्धि विकास लक्ष्यों के तहत भारत को वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु दर को प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 109 करना है। वर्ष 1990 और 2006 के मध्य मातृत्व मृत्यु दर में कुछ सुधार अवश्य हुआ है और यह 1990 के 327 की तुलना में 254 हुआ। उल्लेखनीय है कि सुरक्षित मातृत्व प्रशिक्षित कर्मचारी दव्ारा प्रसव व संस्थागत सुविधाओं के जरिये ही संभव हो सकता है। भारत में मातृत्व मृत्यु दर के संदर्भ में प्रसवों हेतु संस्थागत सुविधाओं को स्तर जानना आवश्यक है। इन संस्थागत सुविधाओं में 1992 - 93 में 26 प्रतिशत वृद्धि की जबकि 2007 - 08 में 47 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस कालावधि में प्रशिक्षित अथवा दश लोगों दव्ारा प्रसव की दर में भी वृद्धि (33 प्रतिशत से 52 प्रतिशत तक) हुई है। ऐसी संभावना व्यक्त की गई है कि वर्ष 2015 तक भारत में प्रशिक्षित कर्मचारी के साथ संस्थागत सुविधा के दायरे में 62 प्रतिशत जन्म होने को संभव बनाया जा सकेगा। इस दिशा में सार्वभौमिक कवरेज के लक्ष्य को प्राप्त करना तभी संभव हो सकेगा।
  • एचआईवी एड्‌स मलेरिया और अन्य बीमारियों से निपटना भारत में एचआईवी एड्‌स संक्रमण की दर व रोगियों की संख्या में कमी करने के लक्ष्य को दिशा में हाल के समय में सफलता प्राप्त की गई है। भारत में वयस्को में एड्‌स की दरों में 2002 में 0.45 प्रतिशत से 2007 में 0.34 प्रतशत की कमी दर्ज की गयी है।
    • इस प्रकार मलेरिया के फैलाव व इससे होने वाली मृत्यु से भी कमी हुई है। मलेरिया की आशंका वाले राज्यों जैसे उत्तर पूर्वी राज्यों, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में वर्ष 2006 से मलेरिया से होने वाली मौतों में कमी आई है। ट्‌यूबरक्लॉसिस के नियंत्रण की दिशा में भी भारत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। टीबी की सफलता पर पिछले 5 वर्षों में 86 - 87 प्रतिशत रही है।
  • पर्यावरणीय धारणीयता को सुनिश्चित करना भारत ने पर्यावरणीय धारणीयता को सुनिश्ति करने में सफलता प्राप्त की है। वनाच्छादन लगभग 23 प्रतिशत तक बड़ा है। संरक्षित क्षेत्र कवर में भी 4.83 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। भारत सुरक्षित पेयजल तक धारणीय पहुँच की दिशा में भी संतोषजनक स्तर तक पहुँचा है। 1992 - 93 में जहाँ 68.2 प्रतिशत परिवारों की परिष्कृत जलीय स्त्रोतों तक पहुँच थी वह 2007 - 08 में 84.4 प्रतिशत हो गयी। स्वच्छता के लक्ष्य प्राप्त करने की दिशा में कुछ उपलबिधयाँ प्राप्त की गई है। 2015 की अवधि तक उन लोगों तक, जिनकी स्वच्छता सुविधाओं तक पहुँच नहीं है कि संख्या 38 प्रतिशत के स्तर तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है।
  • विकास के लिए वैश्विक भागीदारी को विकसित करना- वैश्वीकरण प्रक्रिया और वैश्विक अर्थव्यवस्था से एकीकरण के क्रम में भारत विश्व भर में वैश्विक साझेदार बना है और कई विकासशील व विकसित देशों, देशों को तकनीकी, आर्थिक व बौद्धिक सहायता प्रदान कर रहा है। भारत का सूचना और संचार प्रौद्योगिकी उद्योग वैश्विक समुदाय में विकास साझेदारी व संयुक्त उपक्रमों के लिए एक विश्वसनीय स्थान प्राप्त कर चुका है।

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