Public Administration 2: Prevention of Alcoholism and Substance (Drugs) Abuse

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जनसंख्या के असुरक्षित समूहों के लिए केन्द्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाएँ (Welfare Schemes for the Vulnerable Sections of the Population by the Centre and State)

मद्यपान तथा मादक द्रव्य व्यसन रोकथाम (Prevention of Alcoholism and Substance (Drugs) Abuse)

परिचय (Introduction)

  • 2001 - 02 में कराए गए एक सर्वेक्षण में यह अनुमान लगाया गया कि लगभग 73.2 मिलियन लोग मद्यपान तथा मादक द्रव्य व्यसनी हैंं इनमें से 8.7,2.0 तथा 62.5 मिलियन क्रमश: भांग, अफीम और शराब का सेवन करते हैं और इनका सेवन करने वाले क्रमश: 26 प्रतिशत, 22 प्रतिशत और 17 प्रतिशत इन नशीले पदार्थों पर ही निर्भर करते हैं।
  • संविधाान का अनुच्छेद 47 उल्लेख करता है कि “राज्य, अपने लोगों के पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने और लोक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा और राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्थ्य के लिए हानिकर औषधियों के, औषधीय प्रायोजन से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।”
  • स्वापक औषधि और मन: पदार्थ अधिनियम, 1985 अन्य विषयों के साथ-साथ मादक पदार्थ दुरुप्रयोग को रोकने के लिए बनाया गया था। मादक पदार्थों की मांग में कमी लाने के उद्देश्य से सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय 1985 - 86 से मद्यपान एवं नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को रोकने की योजना क्रियान्वित कर रहा है। यह योजना 1994 एवं 1999 में दो बार संशोधित भी की गई। केंन्द्र सरकार ने संशोधित योजना (मद्यपान एवं नशीले पदार्थो के दुरूपयोग को रोकने की योजना) 2008 को स्वीकृति भी प्रदान कर दी है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अधीन कार्यान्वित योजना के तहत सेवाओं की आपूर्ति की जिम्मेदारी गैर-सरकारी संगठनों पर तथा मंत्रालय के लिए वित्तीय जिम्मेदारी (निर्धारित राशि का 90 प्रतिशत) निर्धारित की गई है।

मद्यपान एवं नशीले पदार्थों के दुरुपयोग को रोकने के लिए इस योजना के उद्देश्य इस प्रकार हैं: (The Aims and Objectives of the Schemes for Prevention of Alcoholism and Substance Abuse Are)

  • मादक पदार्थ व्यसन को रोकने तथ व्यसनी व्यक्तियों के पुनर्वास कार्य में संलग्न गैर-सरकारी संगठनों को प्रोत्साहन देना।
  • व्यक्तियों, उनके परिवार और समाज पर मद्यपान एवं मादक पदार्थो के दुरुपयोग के प्रभावों के बारे में लोगों को शिक्षित और जागरूक करना।
  • मादक पदार्थ व्यसन को रोकने, उपचार करने तथा व्यसनी व्यक्तियों के पुनर्वास के लिए संस्कृति विशिष्ट तरीके अपनाना।
  • व्यसनी व्यक्तियों की पहचान, उनके प्रोत्साहन, नशे के व्यसन को छुड़ाने, परामर्श देने तथा उनके पुनर्वास के लिए बड़े स्तर पर समुदाय आधारित सेवाएँ उपलब्ध कराना।
  • नशीले पदार्थों की मांग में कमी के लिए समुदाय भागीदारी और जन सहयोग बढ़ाना।
  • व्यसन के खतरे से असुरक्षित व्यक्तियों और समूहों के बीच सामूहिक पहलों एवं स्वयं सहायता प्रयासों को बढ़ावा देना।
  • मादक द्रव्य व्यसन के क्षेत्र में कार्यरत स्वैच्छिक संस्थाओं और सरकारी संगठनों के बीच उपयुक्त संबंध स्थापित करना।

दी जाने वाली सहायता अनुदान राशि के 90 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। जबकि सात पूर्वोत्तर राज्यों, सिक्किम तथा जम्मू-कश्मीर के विषय में सहायता राशि स्वीकृत व्यय की 95 प्रतिशत होगी। विश्वविद्यालय, सामाजिक कार्य विद्यालय तथा ऐसे ही अन्य उच्च शिक्षण संस्थान 100 प्रतिशत क्षतिपूर्ति (Reimbursement) के पात्र होंगे।

वित्तीय समर्थन के लिए योजना के निम्नलिखित घटक हैं:-

  • जागरूकता और निवारण शिक्षा
  • मादक पदार्थों के संबंध में जागरूकता तथा परामर्श केन्द्र
  • उपचार-सह-पुनर्वास केन्द्र
  • कार्यस्थलों पर सुरक्षा के लिए कार्यक्रम
  • मादक द्रव्य दुरुपयोग को रोकने के लिए एनजीओ फोरम
  • समुदाय आधारित पुनर्वास के सुदृढ़ीकरण के लिए नवाचारी हस्तक्षेप
  • तकनीकी हस्तांतरण तथा मानव शक्ति विकास
  • सर्वेक्षण, अध्ययन, मूल्यांकन और अनुसंधान
  • इस योजना के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता अन्य कोई भी क्रिया-कलाप

सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय (Government Policies and Interventions for Development in Various Sectors and Issues Arising Out of Their Design and Implementation)

प्रस्तावना (Introduction)

भारत में सामाजिक न्याय एवं कल्याण की दिशा में किए गए नीतिगत प्रयासों को समझने से पहले हमें स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व औपनिवेशिक शासन की कार्यप्रणालियों को समझना आवश्यक है। भारत में ब्रिटिश शासन का उद्देश्य आर्थिक शोषण एवं उसके मार्ग में आने वाली बाधाओं, जैसे कि सामुदायिक एकता, राष्ट्रीय चेतना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अन्य नागरिक अधिकारों की मांग को कमजोर करना था। अपने औपनिवेशिक हितों (आर्थिक शोषण) को साधने के लिए ब्रिटिश शासन ने भारत में सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा दिया और इसलिए विभिन्न नीतिगत प्रयासों के माध्यम से भारत के सांप्रदायिक सौहार्द्र को तोड़ने का प्रयास किया गया। यद्यपि ब्रिटिश शासन दव्ारा भारत में सामाजिक सुधार के रूप में कुछ वैधानिक प्रयास भी किए गए-

  • 1833 के चार्टर एक्ट के तहत जाति एवं वर्ण के आधार पर सरकारी नियोजन में भेदभाव को समाप्त कर दिया गया।
  • 1833 के चार्टर एक्ट के के अंतर्गत ही भारत सरकार को दासी की अवस्था सुधारने और अंतत: दासता समाप्त करने की आज्ञा दी गई।
  • वर्ष 1829 के सती निषेध अधिनियम (Sati Abolition Act, 1829) के माध्यम से सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया गया। वर्ष 1830 में गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक दव्ारा ठगी प्रथा का भी अंत कर दिया गया।
  • गवर्नर जनरल लॉर्ड एलनबरो दव्ारा 1843 ई. के ‘अधिनियम’ दव्ारा दास प्रथा का अंत किया गया।
  • गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग खोड जनजाति में प्रचलित नरबलि प्रथा का दमन करने के लिए कैम्पबल की नियुक्ति की।
  • 1854 ई. का शिक्षा पर चार्ल्स वुड का घोषणापत्र शिक्षा में सुधार की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया, जिसमें उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से दिये जाने पर बल दिया गया, लेकिन साथ ही देशी भाषा के विकास को भी महत्व दिया गया। इसी तरह हटर शिक्षा आयोग (1882 - 83) में भी सिफारिशें की गई थी कि सरकार प्राथमिक शिक्षा के सुधार और विकास पर ध्यान दे और प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराई जाए।

उपरोक्त कार्यवाहियों से स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासन दव्ारा भारत में सामाजिक सुधार का संबंध केवल कुछ कुरीतियों एवं कुप्रथाओं पर रोक लगाने तक ही सीमित था। जबकि सामाजिक कल्याण एवं सशक्तीकरण की दिशा में प्रयास करना कभी ब्रिटिश शासन की प्राथमिकता नहीं रही। इसी कारण स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले भारत में लैंगिक भेदभाव, समाज के कमजोर वर्गों के साथ असमान व्यवहार, निरक्षता जैसी सामाजिक समस्याएँ नियमित रूप से विद्यमान रहीं हैं और इन्हीं समस्याओं से देश एवं समाज को निजात दिलाने का संकल्प, स्वतंत्रता प्राप्ति की पूर्व संध्या पर भारतीय प्रधानमंत्री दव्ारा दिए गए भाषण ‘नियति से मिलन’ (Tryst with Destiny) में स्पष्ट रूप से झलकता है, जिसमें तमाम सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से मुक्त भावी भारत के निर्माण की कल्पना की गई।

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ भारत मेें सामाजिक न्याय एवं कल्याण से संबंधित सरकारी नीतियों को संविधान से बल मिला। इसी दिशा में पहले संविधान संशोधन अधिनिम, 1951 के माध्यम से भूमि सुधार विधियों को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने का प्रयास किया गया। इस संशोधन के माध्यम से संविधान में दो नये अनुच्छेद 31-क और 31-ख जोड़े गए हैं। इस संशोधन के तहत अनुच्छेद 31-ख में स्पष्ट किया गया कि 9वीं अनुसूची में शामिल अधिनियमों की वैधता को इस आधार पर न्यायालयों में चुनौती नहीं दी जा सकती है कि वे मूल अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं।
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार दव्ारा महिलाओं के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण नीतियाँ व कानून बनाये गये। इनमें विशेष विवाह अधिनियम, 1954; हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955; हिन्द उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; हिन्दू दत्तक ग्रहण व भरण-पोषण अधिनियम, 1956; महिलाओं एवं बालिकाओं का अनैतिक व्यापार निरोधक अधिनियम, 1956 व दहेज निषेध अधिनियम, 1961 आदि प्रमुख थे।
  • भारत सरकार ने जहाँ एक ओर शिक्षा के क्षेत्र में असमानता समाप्त करने और अनुसूचित जाति एवं जनजाति, पिछड़े वर्गो व अल्पसंख्यकों को शैक्षिक विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ‘आरक्षण’ की नीति अपनाई, वहीं देश के नागरिकों की खाद्यान्न संबंधी आवश्यकताआंे को पूरा करने के लिए खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की नीति भी अपनायी जिसके लिए हरित क्रांति की शुरुआत हुईं।

भारत में मानव पूंजी निर्माण अथवा मानव संसाधन विकास के लिए मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने जो शैक्षिक रणनीति तैयार की, उसके महत्वपूर्ण पहलू निम्नवत्‌ हैं-

कानूनी पहल (Legal Initiative)

  • 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से बालकों के लिए नि: शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम का क्रियान्वयन।
  • अखिल भारतीय मदरसा बोर्ड की स्थापना के लिए आम राय कायम करना।

उच्च शिक्षा (Higher Education)

  • यशपाल समिति और राष्ट्रीय गान आयोग की अनुशंसाओं (Recommendations) के आधार पर उच्च शिक्षा और शोध के लिए एक अधिकार संपन्न सवायत्त प्राधिकरण (Autonomous Tribunal) का गठन।
  • गैरकानूनी शिक्षण गतिविधियों पर प्रतिबंध और दंड के लिए नया कानून बनाया।
  • उच्च शिक्षा में अनिवार्य मूल्यांकन और मान्यता के लिए स्वायत्त नियामक प्राधिकरण का गठन।
  • विदेशी शिक्षा प्रदाताओं के नियमन के लिए नया कानून लाना।
  • उच्च शिक्षा में सभी भागीदारों जैसे शिक्षक, छात्र, कर्मचारी और प्रबंधन के बीच विवादों के शीघ्र निपटारे के लिए एक प्राधिकरण के गठन के लिए कानून बनाया गया।
  • अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर बने राष्ट्रीय आयोग की ओर अधिकार संपन्न बनाने के लिए आवश्यक कानूनी सुधार।
  • कॉपीराइट संबंधी अधिकारों की रक्षा के लिए कॉपीराइट अधिनियम 1957 में संशोधन।

विद्यालयी शिक्षा के लिए नीतिगत पहल (Policy Initiative for School Education)

  • स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में निजी सार्वजनिक भागीदारी मॉडल की शुरुआत के लिए नीतिगत मसौदा तैयार करना और उसकी व्यवहारिकता सुनिश्चित करना।
  • माध्यमिक स्कूल और दूरस्थ स्कूली शिक्षा में ब्रॉडबैंड के जरिए सूचना और संचार तकनीक का इस्तेमाल।
  • शिक्षकों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्‌यक्रम फ्रेमवर्क (NCF) 2005 के दिशा निर्देशों के अनुसार और सभी पक्षों से सलाह-मशविरे के बाद राष्ट्रीय पाठ्‌यक्रम फ्रेमवर्क का विकास।

उच्च शिक्षा (Higher Education)

  • देश के मौजूदा और नए शिक्षण संस्थानों की ओर विदेशो से प्रतिभा लब्धि नीति का निर्माण।
  • समाज के कमजोर तबके के विद्यार्थियों को व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों के लिए रियायती दरों पर शिक्षा ऋण देने के लिए नई स्कीम का शुभारंभ।
  • उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक समूदाय के छात्रों के लिए सुधारात्मक प्रशिक्षण योजना को मजबूत करना और उसका दायरा बढ़़ाना।
  • वंचित तबके तक योजनाओं का लाभ पहुँचाने के लिए सभी विश्वविद्यालयों में ‘समान आवास कार्यालय’ की स्थापना।
  • समाज के कमजोर और अल्पसंख्यक तबके की बहुतायत वाले देश के 100 जिलों में आदर्श महाविद्यालयों की स्थापना।
  • उन राज्यो में जहाँ फिलहाल कोई पॉलीटेक्निक संस्थान नहीं है, वहाँ कम से कम 100 नए पॉलीटक्निकल संस्थान स्थापित करने में सहायता प्रदान करना।
  • सूचना एवं संचार तकनीक के जरिये राष्ट्रीय शिक्षा मिशन के अंतर्गत 5000 कॉलेज और विश्वविद्यालयों और विभागों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्टिविटी की व्यवस्था। इसके साथ ही ग्रामीण युवाओं के प्रतिभा विकास के लिए 700 कम्युनिटी पॉनीटेक्निक के उन्नयन के बाद उनकी पुन: शुरुआत।