Public Administration 1: Protection and Betterment of Children in India

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भारत में बच्चों के संरक्षण एवं बेहतरी हेतु तंत्र, कानून व संस्थायें (Mechanism, Laws and Bodies Constituted for the Protection and Betterment of Children in India)

प्रस्तावना (Introduction)

  • भारत में बच्चों की संख्या 440 मिलियन से अधिक है, और यह संख्या विश्व के किसी भी देश की तुलना में सर्वाधिक है जबकि भारत में शिशु मृत्यु दर (IMR) तथा मातृत्व मृत्यु दर (MMR) अभी भी चिंता का विषय बनी हुई हैं। जीवित बने रहने तथा विकास करने के बच्चों के ये दोनों अधिकार उनकी प्रगति को सुनिश्चित करने के उपाय के रूप में उभरकर आए हैं। बच्चे के जीवित रहने का अधिकार संभवत: सभी अधिकारों में से सर्वाधिक मौलिक है, उदाहरण के लिए स्वास्थ्य संबंधी देखरेख अनेक कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि माँ की स्थिति, नवजात शिशु की देखरेख तथा स्वास्थ्य एवं पोषण सेवाओं तक परिवार की पहुँच इत्यादि।
  • विश्व में सर्वाधिक बच्चे भारत में ही हैं। विश्व में लगभग हर पाँचवाँ बच्चा भारत में रहता है। इसमें 43 करोड़ बच्चे 0 - 18 वर्ष की आयु वर्ग के हैं, जबकि 16 करोड़ बच्चे 0 - 6 वर्ष के आयु वर्ग के, और इनमें से 8.5 करोड़ बालक तथा 7.8 करोड़ बालिकाएँ हैं। साथ ही 6 - 18 वर्ष की आयु वर्ग में से लगभग 27 करोड़ बच्चे हैं। देश की विविधतापूर्ण सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक दशाओं के कारण बच्चों की आवश्यकताओं में भी विविधता देखने को मिलती है। इसी विविधता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बच्चों के विकास एवं संरक्षण के लिए विभिन श्रेणियों विशेषकर सर्वाधिक असुरक्षित समूहों की विशिष्ट आवश्यकताओं तथा अन्य बातों को ध्यान में रखते हुए समावेशी दृष्टिकोण को अपनाया है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है, बच्चों के शारीरिक, मानसिक, संज्ञानात्मक तथा भावनात्मक विकास एवं सामाजिक देखरेख पर बल देते हुए उनके जीवित बने रहने एवं सुरक्षा के अधिकारों को सुनिश्चित करना। इसके अलावा बच्चों की देखरेख, शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल तथा स्वच्छ पेयजल, पर्यावरण, आवास तथा न्याय कुछ अन्य महत्वपूर्ण विषय है, जिन पर असमानता की समाप्ति के लिए ध्यान दिया जाना आवश्यक है क्योंकि यही वे कारण हैं जिनकी वजह से बच्चों को बहिष्कार एवं भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
  • इसलिए भारत में लोक नीति का मुख्य उद्देश्य बाल-अभिमुखी एवं बच्चों के प्रति संवेदनशील नीतियों, कानूनों योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू करके बाल अधिकारी को प्रोत्साहन देना है। यह बात 12वीं योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होती है, जिसमें कहा गया है कि “12वीं योजना में बच्चों को सर्वोपरि प्राथमिकता दी जानी चाहिए।” विकास (Development) योजना और रणनीति के साधन और साध्य के साथ-साथ प्राथमिक संकेतक के रूप में उभर कर आया है।

भारत में बच्चे: स्थिति एक नजर में (Children in India: Status at a Glance)

Children in India: Status at a Glance
शिशु लिंगानुपात (जनगणना 2011)914
शिशु मृत्यु दर50 ⚹ 1
रक्ताल्पता ⚹ 269.5 % बच्चे (6 - 59 माह)

55.8 % लड़कियाँ (15 - 19 वर्ष)

55.3 महिलाएँ (15 - 49 वर्ष)

सामान्यत से कम वनज ⚹ 242.5 % बच्चे सामन्य से कम आयु

14 - 59 वर्ष के आयु वर्ग की 35.6 % महिलाएँ स्थायी रूप से ऊर्जा की कमी से पीड़ित

शिशु प्रतिरक्षा ⚹ 357 % बच्चों को पूर्णत: प्रतिरक्षा प्राप्त

63 % बच्चों को डीपीटी की तीन खुराकें प्राप्त होती हैं।

65.6 % बच्चों को ही पोलियो की दवा पिलाई जाती है।

69.1 % बच्चों को ही खसरे का टीका लगाया जाता है।

  • 1जनगणना 2011
  • 2राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS)
  • 3जला स्तरीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (DLHS)

भारत में बच्चों की असुरक्षा (Vulnerability of Children in India)

विश्व के 19 प्रतिशत बच्चे भारत में हैं। ऐसा अनुमान है कि भारत में 172 मिलियन अथवा कुल बच्चों में से 40 प्रतिशत असुरक्षित हैं अथवा कठिन परिस्थितियों में जीवन-यापन कर रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या के जीवित बने रहने और संवृद्धि, विकास एवं संरक्षण के लिए अत्यधिक ध्यान की आवश्यकता है। गली में घूमने वाले, बेगार में संलिप्त, माद्रक द्रव्य दुरुप्रयोग के चंगुल में फंसे एवं सशस्त्र संघर्ष, नागरिक असंतोष, प्राकृतिक विपत्ति बच्चे तथा ऐसे बच्चे जिन्होंने किसी कारणवशय कोई अपराध कर दिया है और कानूनी रूप से उसके दोषी हैं, ऐसे बच्चों के जीवनयापन, विकास एवं सुरक्षा पर सर्वोपरि ध्यान दिया जाना चाहिए।

बाल न्याय अधिनिम, 2000 जैसी एकीकृत बाल संरक्षण योजना (ICPS) ने असुरक्षा को दो श्रेणियों में वर्गीकृत किया है-

  • जिन बच्चों को देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता है।
  • ऐसे बच्चे जिन पर कानूनी कार्यवाही चल रही है।

जिन बच्चों को देखरेख एवं संरक्षण की आवश्यकता है, वे ऐसे बच्चे हैं-

  • जिनके पास रहने के लिए घर या आश्रय नहीं है, और आवास प्राप्त करने का कोई साधन भी नहीं है।
  • जो ऐसे व्यक्ति/व्यक्तियों के साथ रहते हैं, जिसने उन्हें नुकसान पहुँचाने को धमकी दी है और उसके दव्ारा ऐसा किए जाने की संभावना भी है क्योंकि उसके दव्ारा अन्य बच्चों को नुकसान पहुंचाया जा चुका है, और इसी वजह से बच्चों को जान से मारने या उनका दुरुपयोग करने की संभावना है।
  • जो शारीरिक या मानसिक नि: शक्तता से ग्रस्त है, और किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित है जो लाईलाज है तथा कोई भी उसकी देखभाल करने वाला नहीं है।
  • जिसके माता-पिता या अभिभावक उसकी देखभाल करने में सक्षम नहीं है।
  • जो लावारिस है, उसकी देखभाल करने के लिए परिवार नहीं है अथवा वह एक गुमशुदा बच्चा है और एक गहन खोजबीन के बाद भी उसके माता-पिता का पता नहीं लगाया जा सकता है।
  • जो यौन मानसिक भावनात्मक अथवा शारीरिक दुराचार, अत्याचार अथवा शोषण से पीड़ित है जिसका दुव्यापार किया जा रहा हो अथवा जो मादक द्रव्य व्यसन में व्यस्त हो।
  • जिसका अकल्पनीय लाभ अर्जन अथवा गैर कानूनी गतिविधियों के लिए दुरुपयोग किया जा रहा हो।
  • जो शस्त्र संघर्ष, नागरिक असंतोष और प्राकृतिक विसंगतियों से पीड़ित हो।
  • जिस बच्चे पर कानूनी कार्यवाही चल रही हो तथा उसने भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत कोई भी कथित अपराध किया हो, वह बाल अपराधी कहलाएगा। भारतीय अपराध प्रक्रिया संहिता (ICPS) ने बच्चों की एक तीसरी श्रेणी की पहचान की है; ऐसे बच्चे शामिल हैं जो कानून के संपर्क में हैंं। वे बच्चे या तो अपराध से पीड़ित होते हैं अथवा किसी अपराध के गवाह होते हैं; अपराध प्रक्रिया संहिता इसमें असुरक्षित परिवारों अथवा जोखिमों का सामना कर रहे परिवारों के बच्चे, प्रवासी परिवारों जैसे बहिष्कृत समूहों के बच्चे, घोर गरीबी में रह रहे परिवार, अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ तथा अन्य पिछड़े वर्ग, भेदभाव से पीड़ित परिवार, अल्पसंख्यक, एचआईवी एड्‌स से पीड़ित अथवा प्रभावित बच्चे, कैदियों के बच्चे तथा बाल श्रमिक।
    • यूनीसेफ ऐसे बच्चों को असुरक्षित मानता है जो शोषित और उपेक्षित हैं तथा दुरुपयोग के शिकार हैं। असुरक्षित बच्चों की आवश्यकताओं की प्रतिक्रियास्वरूप बाल संरक्षण की शुरूआत हुई। यूनीसेफ ने निम्नलिखित समूहों को असुरक्षित समूह के रूप में रेखांकित किया है।
    • हिंसा से पीड़ित बच्चे, सशस्त्र संघर्ष में फंसे बच्चे, सशस्त्र संगठनों/समूहों से जुड़े बच्चे, एचआईवी/एड्‌स से प्रभावित बच्चे, बिना जन्म पंजीकरण के बच्चे, श्रम कार्य में संलग्न बच्चे/बाल श्रमिक, विवाहित बच्चे, जिन बच्चों पर कानूनी कार्यवाही चल रही है, बिना माता-पिता की निगरानी वाले बच्चे, व्यावसायिक यौन शोषण के लिए प्रयुक्त बच्चे, ऐसी बच्चियाँ जो जननांग विच्छेदन से पीड़ित हैं।
Vulnerability of Children in India

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