Public Administration: Protection of Disabled People in India

Get top class preparation for IAS right from your home: Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

भारत में नि: शक्त लोगों की बेहतरी व संरक्षण हेतु कानून एवं विधायन (Laws and Legislation for Betterment and Protection of Disabled People in India)

नि: शक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार सरंक्षण एवं पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (Persons with Disabilities (Equal Opportunity, Protection of Rights and Full Participation) Act, 1995)

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान (Salient Features of this Act)

  • यह अधिनियम बेहद व्यापक रूप में नि: शक्त/अक्षम लोगों के शैक्षणिक मुद्दों को संबोधित करता है। अधिनियम, सरकार और स्थानीय संस्थाओं के लिए अनेक कर्तव्य निर्धारित करता है ताकि वे नि: शक्त लोगों के लिए मुफ्त व अनिवार्य शिक्षा सुनिश्चित करें। अधिनियम, सरकारी शैक्षणिक संस्थानों और सरकार दव्ारा सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में नि: शक्त लोगों के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण की मांग करता है। सरकार अनौपचारिक शिक्षा के प्रावधानों और व्यापक शिक्षा योजनाओं से संबद्ध लोगों को निर्देश जारी करने की तैयारी में है।
  • अधिनियम में शिक्षा के उपबंध का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे प्रत्येक नि: शक्त बच्चे को शिक्षा प्राप्ति की आशा करने और शिक्षा की माँग करने का अवसर मिल सकेगा।
  • अधिनियम, विविध क्षेत्रों में नि: शक्त लोगों के लिए रोजगार का प्रावधान करता है। यह न केवल सरकारी क्षेत्र में रोजगार में आरक्षण देता है अपितु निजी क्षेत्र में भी सीमित मात्रा में आरंक्षण प्रदान करता हैं यह दीर्घावधि में उठाये गये कदमों पर चर्चा करता है जैसे रोजगार की पहचान हेतु सरकार प्रायोजित अनुसंधान और कारखानों व कार्यालयों में बदलाव।
  • अधिनियम केवल उन्हीं लोगों को रोजगार प्रदान करता है, जो त्रिस्तरीय नि: शक्त वर्ग में आते हैं। मानसिक रोगी और मानसिक रूप से नि: शक्त लोग इन रोगों की गंभीरता के बावजूद भी इस वर्ग के बाहर रखे गये हैं।
  • नि: शक्तता कानून, पहुँच की विस्तृत परिभाषा देता है। यह केवल शारीरिक भौतिक पहुँच प्रदान नहीं करता, अपितु शिक्षा, मीडिया, संचार, मनोरंजन और तकनीक आदि तक भी पहुँच उपलब्ध कराता है। इस अधिनियम की धाराएँ 44 से 46 सार्वजनिक परिवहन, सार्वजनिक भवनों और अनुकूलित शौचालयों आदि तक पहुँच सुनिश्चित करती हैं।
  • कानून नि: शक्त व्यक्तियों के निवास के अधिकार की पहचान करता है चाहे वह व्यक्ति आत्मनिर्भर हो अथवा पारिवारिक। यह निवास उपलब्ध कराने की जरूरत को भी रेखांकित करता है। कानून का उद्देश्य नि: शक्त लोगों को समाज की मुख्य धारा में एकीकृत करने हेतु विशेष प्रावधान करना है। राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 100 करोड़ की धनराशि के साथ बनाया गया था ताकि उन लोगों की समस्याओं का हल ढूंढा जा सके जिनके परिवार नहीं है।

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 (Mental Health Act, 1987)

जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है “मानसिग रोग” नि: शक्त व्यक्ति अधिनियम में उल्लिखित विकलांगताओं में से एक है। तथापि मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति के उपचार एवं देखरेख को एक अलग अधिनियम के दव्ारा शासित किया जाता है जिसे “मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987” कहा जाता है। यह अधिनियम स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय दव्ारा शासित है।

मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 के निम्न मुख्य प्रावधान हैं (Important Provisions of Mental Health Act, 1987)

  • उन मानसिक रोगियों का मनोविकृति संबंधी अस्पतालों या मनोविकृति संबंधी नर्सिंग होम में प्रवेश विनियमित करना जिन्हें स्वेच्छा से उपचार कराने की समझ नहीं है और ऐसे व्यक्तियों को रोकते हुए उनके अधिकारों की रक्षा करना।
  • बगैर पर्याप्त कारण के नागरिकों को मनोविकृति संबंधी अस्पतालों या मनोविकृति संबंधी नर्सिंग होम में रोकने से बचाना।
  • मनश्चिकित्सीय अस्पतालों या मनश्चिकित्सीय नर्सिंग होम भर्ती हुए मानसिक रोगियों के भरण-पोषण के प्रभाव की जिम्मेदारी को विनियमित करना।
  • उन मानसिक रोगियों को संरक्षण अथवा अभिरक्षा नियतन की सुविधाएँ प्रदान करना जो अपने कार्य प्रबंधन के लिए अयोग्य हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए केन्द्रीय प्राधिकरण और राज्य प्राधिकरणों की स्थापना हेतु प्रावधान करना।
  • मानसिक रोगियों के लिए मनश्चिकित्सीय अस्पतालों और मनश्चिकित्सीय नर्सिंग होम की स्थापना, उनकी लाइसेंसिंग और नियंत्रण के लिए सरकार की शक्तियों का निर्धारण करना।
  • कुछेक मामलों में राज्य व्यय पर मानसिक रोगियों को कानूनी सहायता प्रदान करना।

भारतीय पुनर्वास परिषद अधिनियम 1992 (The Rehabilitation Council of India Act, 1992)

भारतीय पुनर्वास परिषद की स्थापना भारत सरकार ने 1986 में एक सोसायटी के रूप में की जिसका उद्देश्य नि: शक्त लोगों के पुनर्वास के लिए प्रशिक्षण नीतियों और कार्यक्रमों को विनियमित और मानकीकृत करना था। लेकिन नि: शक्त लोगों को शिक्षा देने, उनके व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं सलाहकारी गतिविधियों के लिए अधिकांश लोग पेशेवर तरीके से अयोग्य पाए गए। अत: न्यूनतम मानक निर्धारित करने की आवश्यकता महसूस की गई। इसमें दो मत नहीं कि खराब अकादमिक और प्रशिक्षण मानक नि: शक्त लोगों की कार्य सक्षमता को दुष्प्रभावित करते हैं। अत: 1992 में संसद के दव्ारा बनाए गए अधिनियम में निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ इस परिषद को सांविधिक निकाय का दर्जा दिया गया-

  • नि: शक्त लोगों से जुड़े पेशेवरों के प्रशिक्षण पाठयक्रम को मानकीकृत किया जाना।
  • नि: शक्त लोगों से जुड़े पेशेवरों के लिए शिक्षा और विभिन्न वर्गों के पेशवरों के प्रशिक्षण हेतु न्यूनतम मानक निर्धारित करना।
  • इन मानकों को पूरे देश के सभी प्रशिक्षण संस्थानों में सार्वभौमिक रूप से लागू करना।
  • विशेष शिक्षा और पुनर्वास में अनुसंधान को बढ़ावा देना।
  • पेशेवरों के पंजीकरण हेतु केन्द्रीय पुनर्वास रजिस्टर बनाना।

ऑटिज्म, प्रमस्तिष्क अंगघात मंदता और बहु-विकलांगताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याणार्थ राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 (The National Trust for Welfare of Persons with Autism, Cerebral Palsy Mental Retardation and Multiple Disabilities Act, 1999)

चूँकि नि: शक्त लोगों के कुछ समूह अन्य की तुलना में अधिक नाजुक स्थिति में है अत: इन लोगों के संरक्षण हेतु और इनकी संपत्ति आदि की देखभाल हेतु एक विशेष कानून आवश्यक था। ऑटिज्म, प्रमस्तिष्क अंगघात मंदता और बहु-विकलांगताओं से ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याणार्थ राष्ट्रीय न्यास (जिसे राष्ट्रीय न्यास अधिनियम कहा जाता है) का उद्देश्य उन परिवारों की उभयनिष्ठ मांग को पूरा करना है जो अपने अत्यंत नि: शक्त बच्चों हेतु विश्वसनीय व्यवस्था की माँग करते हैंं अधिनियम के विशेष उद्देश्य हैं-

  • नि: शक्त लोगों को सक्षम व शक्तिशाली बनाना ताकि वे अपने समुदाय (जिसमें वे संबंधित हैं) में पूर्ण एवं आत्मनिर्भर रूप से रह सकें
  • नि: शक्त लोगों के अभिभावकों और संरक्षकों की मृत्यु होने पर इन लोगों की देखभाल व सरक्षण करना।
  • नि: शक्त लोगों के परिवारों में संकट के दौरान उनकी माँग के अनुसार पंजीकृत संगठनों की मदद से सहयोग पहुँचाना।

अधिनियम के प्रमुख प्रावधान (Salient Features of this Act)

  • राष्ट्रीय न्यास अधिनियम स्थानीय स्तर की समिति के निर्माण को अनिवार्य बनाता है जिसमें जिलाधिकारी, किसी पंजीकृत संगठन का एक प्रतिनिधि और एक नि: शक्त व्यक्ति होगा।
  • कानूनी अभिभावक बनने के आवेदनों पर स्थानीय स्तर की समिति (LLC) को निर्णय लेने का अधिकार है। अधिनियम वह तरीका बताता है जिससे कानूनी अभिभावक नियुक्त किये जा सकें।
  • अधिनियम के तहत कानूनी अभिभावक को संरक्षित व्यक्तियों की संपत्ति और इसके व्यवस्थापन के मद्देनजर नियमित समयांतराल पर LLC को अदाएगी करनी होती है।
  • इस अधिनियम का संपूर्ण संर्वेक्षण कार्य एक राष्ट्रीय ट्रस्ट बोर्ड को सौंपा गया है, जिसका गठन लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत माता-पिता के पंजीकृत संगठनों और नि: शक्त लोगों की सेवा में समर्पित लोगों के एक वर्ग दव्ारा किया जाता है।

नि: शक्त व्यक्तियों के अधिकार (मसौदा) विधेयक, 2012 [Draft Rights of Persons with Disabilities (RPwD) Bill, 2012]

परिचय (Introduction)

  • वर्तमान में भारत में नि: शक्त लोगों के वैधानिक अधिकार नि: शक्त व्यक्ति (समान अवसर) अधिनियम 1995 (PWD 1995) दव्ारा संरक्षित रखे जाते हैं। भारत सरकार ने डॉ. सुधा कौल की अध्यक्षता में इस संबंध में एक नये कानून का मसौदा तैयार करने के लिए समिति गठित की थी और इस समिति ने नि: शक्त व्यक्तियों का मसौदा अधिकर प्रस्ताव 2011 (Draft Rights of Person will Disabilities -RPOB) सरकार को सौंपा था, जोकि इस समय सरकार के विचाराधीन हैं।
  • भारत में नि: शक्तता संबंधी सभी कानून संशोधन की प्रक्रिया में हैं। हालाँकि इनमें से प्रत्येक के संशोधन की प्रक्रिया एक दूसरे के सापेक्ष पृथक रूप से चल रही है। इन प्रस्तावों को संशोधित करने में पृथक मंत्रालय भी कार्यरत हैंं उदाहरणत: सामाजिक न्याय मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय नि: शक्त लोगों के अधिकार सुनिश्चित करने में लगे हैं। अत: इन कानूनों में विभिन्न संशोधनों के दौरान और अनियमितताओं के विषय में चिंता होनी जायज है।
  • RPDB नि: शक्त लोगों की परिभाषा इस प्रकार देता है “विकासात्मक, तार्किक, मानसिक, शारीरिक या संवदेनात्मक कमियों या हानियों से ग्रसित लोग जिनमें अधिनियम की 12वीं अनुसूची में लिखित लोग भी शामिल हैं, जोकि अस्थायी प्रकृति के नहीं है और जिनके कारण समाज में समान आधार पर अन्य लोगों के साथ इन लोगों की पूर्ण भागीदारी में अवरोध उत्पन्न होता है।”
  • भारत में नि: शक्त लोगों के कुछ वर्गों हेतु संपत्ति को अपनाने या वारिस के संबंध में अधिकार तो है परन्तु इस संपत्ति के विषय में क्या करना है; इससे संबंधित निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। अनेक माता-पिता समूह यह विश्वास करते हैं कि नि: शक्त लोगों को शोषण दुर्व्यवहार और उपेक्षा से बचाने के लिए सुरक्षात्मक प्रकार की और प्रतिस्थापनीय निर्णय लेने में सक्षम संरक्षकता (Guardianship) की आवश्यकता है। दूसरी तरफ बहुत से नि: शक्त लोगों के समूह प्रतिस्थापनीय निर्णायक क्षमता का विरोध करते हैं क्योंकि इससे किसी की इच्छा शक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है, उत्तरदायित्व और वृद्धि में कमी हो सकती है और यह शोषण का कारण भी हो सकती है।
  • RPDB का मसौदा इस विवाद में बीच का रास्ता निकालता है। यह सभी नि: शक्त लोगों के साथ समान आधार पर कानूनी क्षमता की पहचान करता है। RPDB अधिकारों के हनन “जो भी अधिनियम के प्रावधानों, या नियमों का पालन करने में असफल होता है या इनका उल्लंघन करता है” के मामले में कठोर सजा का प्रावधान करता है।

Developed by: