Public Administration: Betterment and Protection of Labourers in India

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भारत में श्रमिकों की बेहतरी और संरक्षण के लिए तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Laws, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Labourers in India)

परिचय (Introduction)

18वीं और 19वीं शताब्दियों में यूरोप में औद्योगिक क्रांति के आगमन के साथ-साथ विश्व अर्थव्यवस्था में कारखाना श्रमिकों के एक नये वर्ग का उदय हुआ। औद्योगिक क्रांति की उत्पादन प्रक्रिया में पूँजी और श्रम उत्पादन के प्रमुख कारक थे। परिणामस्वरूप निजी अर्थव्यवस्था में उत्पादनकर्ताओं और कामगारो का उदय हुआ। जहाँ तक समाज के कल्याण का प्रश्न था, कामगारों के लिए श्रम के मानकों का पालन करना आवश्यक था और श्रम मानकों के अनुसार ही उन्हें कल्याण सुविधाओं उपलब्ध करानी थी। अत: 1919 में वर्साय की संधि के अधीन अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना हुई।

ILO के अनुसार संपूर्ण विश्व में श्रमिकों कामगारों हेतु बेहतर कार्य के आयाम इस प्रकार हैं-

Protection of Labourers in India

अंतरराष्ट्रीय श्रम मानक विभिन्न क्षेत्रों में श्रमिकों की सुरक्षा करता हैंं इन मानकों के अंतर्गत सहयोग की स्वतंत्रता, समान कार्य हेतु समान वेतन, सुरक्षित कार्य दशायें, बलात श्रम और लिंग भेद की समाप्ति रोजगार संरक्षण, सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान, प्रवासी कामगारों का संरक्षण, महिला कामगारों के यौन शोषण का उन्मूलन आदि प्रावधान आते हैं।

भारत में श्रमिक (Labourers in India)

भारत की श्रमबल जनसंख्या 460 मिलियन है जिसमें 43 मिलियन कामगार असंगठित क्षेत्र की विषम परिस्थितियों से संबंधित हैं। भारत के कल घरेलू उत्पाद का 65 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के कामगारों से प्राप्त होता है। आज भी कृषि, भारतीय कृषि की रीढ़ है और भारतीय अर्थव्यवस्था में सर्वाधिक योगदान करती है। असंगठित क्षेत्र का 48.5 प्रतिशत महिला कामगारों का है, इन पर उत्पादन कार्य एवं प्रजनन का दोहरा बोझ है। यह दोनों ही किसी समाज के अस्तित्व के लिए आवश्यक हैं, परन्तु असंगठित क्षेत्र की महिला कामगार सर्वाधिक उत्पीड़न एवं विभेद की शिकार हैं। भारतीय श्रमबल जनसंख्या की आजीविका का प्रधान स्त्रोत हाेेने के बावजूद असंगठित क्षेत्र की दशा कुछ ऐसी है-

  • खराब कार्य दशायें
  • न्यूनतम आय
  • अकुशल श्रम
  • तकनीक का न्यूनतम प्रयोग
  • बजार का कम ज्ञान
  • शिक्षा एवं प्रशिक्षण तक कम पहुँच
  • सामाजिक सुरक्षा मानकों का अभाव
  • रोजगार सुनिश्चितता और सुरक्षा तंत्र की कमी

भारत में श्रमिकों के प्रकार (Types of Labourers in India)

  • कृषि श्रमिक- औद्योगिक श्रम के विपरीत, कृषि श्रमिकों को परिभाषित करना कठिन है। इसका कारण यह है कि जब तक कृषि में पूँजीवाद और औद्योगीकरण की जड़ें पूर्णत: जम नहीं जाती, तब तक पूर्णत: वेतन (मजदूरी) पर निर्भर एक पृथक वर्ग नहीं उभर सकता। कृषि श्रमिकों को 4 वर्गों में बांटा जा सकता है-
    • भूमिहीन श्रमिक, जो भूस्वामियों से जुड़े हैं।
    • भूमिहीन श्रमिक जो व्यक्तिगत रूप से स्वतंत्र हैं परन्तु बड़े भूस्वामियों के लिए काम करते हैं।
    • छोटे कृषक जिनके पास भूमि का छोटा टुकड़ा है और जो दूसरे भूस्वामियों के लिए कार्य करते हैं।
    • बहुत छोटे कृषक, जिनके पास अत्यंत छोटा व सीमांत खेत होने के कारण मुख्य आजीविका दिहाड़ी वेतन ही है।
    • कृषि श्रमिक अशिक्षित और अनभिज्ञ होते हैं। ये विभिन्न गाँवों में रहते हैं। अत: ये संघ नहीं बना सकतें अधिकांश कृषि श्रमिक निम्न जाति एवं वचित वर्ग से हैं, जिससे इनकी दशा और दयनीय है।
  • अनुबंध श्रमिक- अनुबंध श्रमिकों से तात्पर्य उन कामगारों से है जो किसी मध्यस्थ दव्ारा काम पर लगाये जाते हैं और यह प्रयोक्ता उद्यम, अनुबंधकर्ता (उप-अनुबंधकर्ता समेत) और कामगारों के बीच त्रिपक्षीय संबंध पर आधारित होते हैं। इनकी संख्या लाखों में है और प्राय: ये असंगठित क्षेत्र से संबंद्ध होते हैंं ये अपने अनकूल लेन-देन की बात करने में अक्षम होते हैं। और ये अधिकतर खतरनाक कार्यों में अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य को खतरे में डालकर काम करते हैं। इन्हें कई बार न्यूनतम वेतन भी नहीं मिलता और रोजगार में सुरक्षा की भी नगण्य संभावना रहती है।
  • प्रवासी श्रमिक-विभिन्न सरकारों दव्ारा अपनाई गई नव उदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप आय की असमानता, कृषकों में तनाव, अपर्याप्त रोजगार, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में तीव्र वृद्धि के कारण ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों, शहरी से शहरी क्षेत्रों तथा पिछड़े क्षेत्रों से तुलनात्मक रूप से अधिक सक्षम क्षेत्रों में प्रवास की स्थिति बनती है। निम्न जातियों, देशज समुदाय और आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्र के भूमिहीन निर्धन ही व्यापक तौर पर प्रवासी श्रमकों के रूप में कार्य करते हैं।
    • प्रवासी श्रमिकों के पास आर्थिक स्थायित्व सामाजिक सुरक्षा और पेयजल उपलब्धता नहीं होती है तथा ये प्रवासित क्षेत्रों के संसाधनों पर अधिक दबाव डालते हैं। चूंकि ये प्रवासी श्रमिक होते हैं अत: इनके पास सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के कार्ड नहीं होते और इसलिए ये खाद्य अनाज और मिट्‌टी का तेल ऊँचे बाजार मूल्य पर खरीदने को विवश होते हैंं अधिकांश प्रवासी श्रमिक घरेलू कामगारों निर्माण या भवना निर्माण श्रमिकों के रूप में कार्य कर रहे हैं।
  • बंधुआ श्रमिक-इन्हें ऋण बंधक के नाम से भी जाना जाता है। बंधुआ श्रम एक विशिष्ट प्रकार का बलात श्रम होता है, जिसमें दासता की अनिवार्यता का आधार ऋण होता है। सभी प्रकार का बंधुआ श्रम जबरन नहीं होता परन्तु बलात श्रम की अधिकांश क्रियायें, चाहे उनमें बच्चे हों या वयस्क, बंधुआ प्रकृति की होती हैं। बंधुआ श्रम ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रचलित है, जहाँ उद्योग मुख्य रूप से अनुबंधित (प्राय: प्रवासी) मजदूरों पर निर्भर है। भारत में बंधुआ श्रमिक पूरी तरह आर्थिक कारकों का परिणाम नहीं हैं बल्कि इन्हें पारंपरिक रूप से या अनेक क्षेत्रों जैसे कृषि, रेशम, खनन, माचिस उत्पादन, पटाखा बनाने और ईंट भट्‌टा उद्योग आदि में जबरन बंधुआ श्रम में ढकेला जाता है।
  • बाल श्रमिक- बाल श्रम, बाल अधिकारों के हनन की अभिव्यक्ति है और भारत में इसे एक गंभीर व जटिल सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाता है। बाल श्रमिक उत्तरजीविता और विकास, शिक्षा, छुट्‌टी, खेलने और पर्याप्त जीवन स्तर से अछूता रह जाते हैंं। भारत की जनगणना 2001 के अनुसार भारत में 5 - 14 वर्ष आयु समूह के 12.26 मिलियन बच्चे मजदूरी करते हैं। अधिकांश बाल श्रमिक खतरनाक उद्योगों, अनौपचारिक क्षेत्रों और घरेलू नौकरों के रूप में काम करते हैं।
Types of Labourers in India

भारत में श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा हेतु संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions to Safeguard the Rights of Labourers in India)

भारत के संविधान में श्रम समवर्ती सूची का विषय है जिसके अनुसार संघ व राज्य सरकारें श्रम मामलों तथा इनके प्रशासन संबंधी विषयों पर कानून बना सकती हैंं। संसद दव्ारा महत्वपूर्ण विधायी कानून लागू किए गये हैं।

Constitutional Provisions to Safeguard the Rights of Labourers in India
संघ सूचीसमवर्ती सूची
प्रविष्टि संख्या 55: खानों और तेल क्षेत्रों में श्रम व सुरक्षा का विनियमनप्रविष्टि 22: व्यापार संघ, औद्योगिक और श्रम विवाद
प्रविष्टि 61: संघीय कामगारों से संबंधित औद्योगिक विवादप्रविष्टि 23: सामाजिक सुरक्षा और बीमा, रोजगार और बेरोजगारी
प्रविष्टि 65: “व्यावसायिक … प्रशिक्षण” हेतु संघीय एजेंसियाँ व संस्थायेंप्रविष्टि 24: श्रमिकों का कल्याण जिसमें काम की दशायें, भविष्य निधि, नियोक्त की जिम्मेदारी, कामगारों का मुआवजा, वृद्धावस्था पेंशन, मातृत्व लाभ आदि शामिल हैं।

श्रमिकों के अधिकारों के संरक्षण के लिए संविधान ने अनेक कानून बनाये हैंं। ये निम्न हैं-

  • संविधान के भाग- (मौलिक अधिकार) के अधीन: अनुच्छेद-14,21, 23 और 24
  • संविधान के भाग (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के अधीन: अनुच्छेद-38,39, 39क, 41, 42,43, 43क और 47

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