Public Administration: Policy of Public Expenditure in the Health Sector in India

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकारी व्यय की स्थिति (Policy of Public Expenditure in the Health Sector in India)

  • भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र काफी विविधतामूलक है जिसमें कई परंपरागत स्वास्थ्य प्रणालियाँ जैसे होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी आदि सम्मिलित हैं। भारत सरकार दव्ारा स्वास्थ्य क्षेत्र पर व्यय सकल घरेलू उत्पाद का 1.2 प्रतिशत के आस-पास रहा है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में केन्द्र एवं राज्यों में एक साथ वर्ष 2006 - 07 में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से कम के व्यय को आगामी वर्षों में 2 से 3 प्रतिशत बढ़ाकर इस असंतुलन को दूर करने की योजना थी।
  • योजना आयोग दव्ारा ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल’ (Universal Health Care) पर गठित उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत तक स्वास्थ्य क्षेत्र पर व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के वर्तमान 1.01 प्रतिशत से बढ़ाकर कम से कम 2.5 प्रतिशत करने और वर्ष 2022 तक जीडीपी के 3 प्रतिशत तक करने की सिफारिश की।
  • रिसर्च एजेंसी ‘अर्न्स्ट एंड यंग’ दव्ारा जारी एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 90 प्रतिशत लोग अपने सालाना घरेलू खर्च का आधा हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करते हैं। यही नहीं, इसके चलते भारत की आबादी का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा प्रतिवर्ष गरीबी रेखा के नीचे चला जाता है। रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार को यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज (UHG) प्रोग्राम यानि सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य के क्रियान्वयन के लिए अपनी जीडीपी का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करना होगा। फिलहान सरकार जीडीपी का मात्र 1 फीसदी अपनी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च कर रही है, जिसके कारण लगभग 4 करोड़ लोग, गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं।

इस रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ निम्नवत्‌ हैं-

  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वर्ष 2022 तक जीडीपी का 3.7 से 4.5 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करने की आवश्यकता है।
  • अगर सकल घरेलू उत्पाद का 4 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किया जाय, तो अगले 10 सालों में सबके लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
  • लगभग 80 फीसदी शहरी परिवार और 90 फीसदी ग्रामीण परिवार वित्तीय कठिनाइयों के चलते अपने वार्षिक घरेलू खर्च का आधा हिस्सा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करते हैं।
  • अर्न्स्ट एंड यंग दव्ारा 2008 में किये गये एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित खर्च के कारण भारत की आबादी का लगभग 4 फीसदी हिस्सा हर साल गरीबी रेखा के नीचे फिसल जाता हैं।
  • रिपोर्ट के अनुसार, सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल लक्ष्य के बेहतर क्रियान्वयन के लिए एक रूपरेखा बनाने की आवश्यकता है। इस रूपरेखा के तहत सरकार अपने सभी नागरिकों को सस्ती कीमत पर दवाइयाँ और स्वास्थ्य सुविधाएँ अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएगी।
  • स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले कुल खर्च में 72 प्रतिशत केवल दवाओं पर होता है। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं में फार्मासिस्ट से लेकर चिकित्सक, उद्योग से लेकर दवा निर्माताओं और चिकित्सा बीमा से लेकर अस्पताल प्रबंधन और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा केन्द्रों का बेहतर संचालन, सभी की अहम भूमिका है।
  • इन लक्ष्यों में मरीज की सेवाओं के अलावा सलाह, दवाएँ और डायग्नोस्टिक टेस्ट आदि भी शामिल होंगे, जो फिलहाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और आरोग्यश्री के तहत शामिल होते हैं।

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज कार्यक्रम के तहत केन्द्र और राज्य के बीच एक समन्वित ढाँचे की परिकल्पना की गयी है और केन्द्र सरकार इस कार्यक्रम की प्रमुख फाइनेंसर होगी। वर्तमान में सरकार के सामने स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिए सबसे बड़ी समस्या एक व्यापक कार्यान्वयन ढाँचे और वित्त पोषण का अभाव है।

12 वीं योजना में स्वास्थ्य क्षेत्र की रणनीति के मुख्य बिन्दु (Key Points of the Health Sector Strategy in the 12th Plan)

12वीं पंचवर्षीय योजना में स्वास्थ्य क्षेत्र के संबंध में उपयुक्त कार्यनीतियों को परिभाषित करने में सहायता प्रदान करने के लिए योजना आयोग ने प्रो. के. श्री नाथ रेड्‌डी की अध्यक्षता में व्यापक स्वास्थ्य कवरेज पर उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समूह गठित किया है। 12वीं योजना में स्वास्थ्य क्षेत्र की रणनीति के मुख्य पहलू निम्नवत्‌ हैं-

  • 12वीं योजना में सात महत्वपूर्ण लक्ष्यों-शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, कुल प्रजननता दर, बच्चों में अल्प पोषण, महिलाओं एंव लड़कियों में रक्ताल्पता, सभी के लिए स्वच्छ पेय जल की व्यवस्था, 0 - 6 वर्ष के आयु समूह में बाल लिंगानुपात बढ़ाने की दिशा में तेजी से प्रगति करने के लिए पुन: कार्यनीति बनायी जानी चाहिए।
  • राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में बाल जन्म एवं प्रसव-पूर्व परिचर्या पर काफी जोर दिया गया है। फिर भी, 12वीं योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में इसका विस्तार करके स्वास्थ्य परिचर्या के और अधिक व्यापक दृष्टिकोण विकसित किये जाने पर बल दिया गया है और निवारक एवं उपचारात्मक दोनों सेवाओं को शामिल करने की बात की गई है।
  • 12वीं योजना में लिंग भेद एवं अल्प पोषण के कारण लड़कियों एवं महिलाओं को हो रहे नुकसानों के कुचक्र का प्रभाव 0 - 6 वर्ष के आयु समूह में लगातार गिर रहे लिंगानुपात मेंं और इस तथ्य में देखा जा सकता है कि भारत की प्रत्येक तीसरी महिला अल्पपोषित और प्रत्येक दूसरी महिला रक्तापता से ग्रसित है। लिंग आधारित असमानताओं, भेद-भाव और लड़कियों एवं महिलाओं के प्रति हो रही हिंसा को समाप्त करने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • 12वीं योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में कहा गया है कि इसे योजनाकाल में बच्चों को तत्काल प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसमें स्वास्थ्य एवं बाल परिचर्या सेवाओं का अभिसरण किया जाएगा। इस समय 83 करोड़ ग्रामीण भारतीयों को महिला एवं बाल विकास विभाग के लगभग 11 लाख आंगनवाडी केन्द्रों और स्वास्थ्य विभाग के 1.47 उपकेन्द्रों के नेटवर्क के माध्यम से स्वतंत्र रूप से स्वास्थ्य एवं बाल परिचर्या सेवाएँ प्रदान की जा रही हैं।
  • 12वीं योजना योजना का उद्देश्य है कि प्रत्येक पंचायत में एक स्वास्थ्य उपकेन्द्र और प्रत्येक निवास स्थान में एक आंगनवाडी केन्द्र स्थापित करना चाहिए तथा उनका औपचाारिक अंतर्सबंध स्वास्थ्य पोषण एवं स्कूल-पूर्व शिक्षा सेवाएँ प्रदान करने की व्यवस्था को एकीकृत करने के लिए आवश्यक होना चाहिए। इस पद्धति के जरिये प्रत्येक आंगनवाड़ी केन्द्र में कम से कम एक आशा और प्रत्येक पंचायत में आंगनवाड़ी केन्द्रों के समूहों के लिए कम एएनएम/स्वास्थ्य कार्यकर्ता (महिला) उपलब्ध होगा। दोनों को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय दव्ारा हाल ही में अधिसूचित पंचायत स्तरीय स्वास्थ्य, पोषण एवं स्वच्छता निगरानी मेंं लाया जा सकता है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में कहा गया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत अधिक ध्यान दिये जाने वाले 264 जिलों में मातृ स्वास्थ्य एवं बाल अल्पपोषण में व्याप्त क्षेत्रीय विषमताओं को दूर किया जाना चाहिए। कुछ राज्यों में जनसंख्या की उच्च वृद्धि दर को भी कम किया जाना चाहिए।

12 वीं पंचवर्षीय योजना के दृष्टिकोण प्रपत्र में जनसंख्या स्थिरीकरण की स्थिति का उल्लेख (Mention of the Status of Population Stabilization in the Approach Form of the 12th Five Year Plan)

  • दृष्टिकोण प्रपत्र में उल्लेख किया गया है कि दक्षिण भारत के सभी और 10 अन्य राज्यों ने प्रजनन के प्रतिस्थापन स्तरों से नीचे के स्तरों को प्राप्त कर लिया है, परन्तु चार बड़े उत्तर भारतीय राज्यों बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सकल प्रजनन दर अभी भी 3.3 से अधिक बनी हुई है। चूंकि जनसंख्या वृद्धि की सतत्‌ रूप से उच्च दरें सीमिति संसाधनों पर भार डालती हैं और लोकतांत्रिक ढाँचे में जनसंख्या वृद्धि की व्यापक रूप से भिन्न दरें क्षेत्रीय संघर्ष उत्पन्न कर सकती है, इसलिए जनसंख्या स्थिरीकरण की तात्कालिक आवश्यकता है।
  • 12वीं योजना में उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों में परिवार नियोजन सेवाओं के लिए समर्पित वित्तपोषण के साथ-साथ राष्ट्रीय ग्रामीण मिशन (NHRM) के तहत आरसीएच सेवाएँ प्रदान करके इस मुद्दे का समाधान करने की आशा की गई है। परिवार नियोजन के लिए आवश्यक जरूरतों को पूरा करना होगा। ऊँचे प्रजनन दर के मूल कारकों जैसे शिशु मृत्यु दर महिलाओं को अधिकार, कम उम्र में विवाह आदि का समाधान करने वाले कार्यक्रमों के मध्य समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए।

12 वीं पंचवर्षीय योजना व संक्रामक एवं गैर-संक्रामक रोगों के संबंध में रणनीति ( 12th Five Year Plan and Strategy in Relation to Infectious and Non-Infectious Diseases)

  • एचआईवी/एड्‌स के उपलब्ध आँकड़ों से पता चलता है कि भारत में वर्ष 2008-. 9 में लगभग 23.95 लाख लोग एचआईवी/एड्‌स से ग्रस्त है। इनमें से 38.7 प्रतिशत महिलाएँ एवं 4.4 प्रतिशत बच्चे हैं। जो महिलाएं अपने यौन संबंध पर नियंत्रण नहीं रख पाती हैं, उनका अनुपात एचआईवी/एड्‌स से प्रभावित व्यक्तियों में अधिक है। एक सकारात्मक पहलू यह है कि संक्रमण की व्याप्तता स्थिर हो गयी है और कुछ स्थानों में कुछ कमी भी आयी है।
  • 12वीं पंचवर्षीय योजना में महिलाओं पर समान रूप से ध्यान दिये जाने और सेवा प्रदान करने की व्यवस्था को और अधिक समुदाय-केंद्रित बनाने के वचन को ध्यान में रखते हुए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा, एएनएम समूदाय की महिलाओं का उपयोग, प्रभावित महिलाओं, पुरुषों और कार्यकर्ताओं, पुरुष के साथ यौन संबंध स्थापित करने वाले पुरुष और सुई से ड्रग्स लेने वाले व्यक्तियों को व्यापक परिचर्या प्रदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। उच्च व्यापकता वाले क्षेत्रों, विशेषकर पूर्वोत्तर की अवसंरचना जरूरतों की समीक्षा की जायेगी।
  • अन्य संक्रामक रोगों जैसे क्षय रोग, मलेरिया पर भी ध्यान केंद्रित करने और इनकी रोकथाम और नियंत्रण के लिए सतत्‌ प्रतिबद्धता की जरूरत है। भारत के समक्ष हृदय वाहिका रोगों मधुमेह, कैंसर एवं चिरकालिक रोगों जैसे असंचारिक रोगों का बढ़ता खतरा भी है। हमें तंबाकू नियंत्रण, उच्च रक्तचाप एवं मधुमेह का शुरू में ही पता लगाने एवं प्रभावी नियंत्रण तथा सामन्य एवं उपचार योग्य कैंसर की जाँच सहित नीतिगत उपायों के पैकेज के जरिए इनसे निपटना है। इन कार्यनीतियों को एनआरएचएम एववं एनयूएचएम में शामिल किया जाना चाहिए। यह आपातीय (Emergency) स्थिति होने से पहले ही सार्वजनिक स्वास्थ्य को खतरे से बचाने के लिए सक्रिय उपाय करने में सहायता करेगा।

राष्ट्रीय एड्‌स नियंत्रण सहायता परियोजना (National AIDS Control Support Project)

भारत में आर्थिक मामलों संबंधित कैबिनेट समिति ने हाल ही में राष्ट्रीय एड्‌स नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के एड्‌स नियंत्रण की विभाग की राष्ट्रीय एड्‌स नियंत्रण योजना को मंजूरी प्रदान की है। इस परियोजना पर 2550 करोड़ रुपये की राशि व्यय को जाएगी। इस परियोजना के लिए भारत सरकार और विश्व बैंक दव्ारा बराबर की राशि दी जाती है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य एड्‌स से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले वर्गों में सुरक्षित व्यवहार को बढ़ावा देना है, जो एचाईवी रोग की महामारी को 2017 तक तेजी से रोकने के राष्ट्रीय लक्ष्य के अनुरूप है

इस परियोजना से निम्नांकित कार्यों में सहायता मिलेगी-

  • एड्‌स रोकथाम सेवाओं को प्रोत्साहन देना और इसे मजबूत करना विशेष रूप से अत्यंत संवेदनशील वर्गों के लिए एड्‌स से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले वर्गों और एड्‌स के प्रभावों से आ सकने वाली संभावित आबादी के लिए इन सेवाओं को बढ़़ाना।
  • व्यवहार परिवर्तन संवाद और रोकथाम सेवाओं की माँग में वृद्धि को बढ़ावा देना।
  • संस्थागत सुदृढ़ीकरण और वित्तीय प्रबंधन। देश में एचआईवी संक्रमण बढ़ने से रोकने से संबंधित प्रयासों से प्राप्त लाभों को और सुदृढ़ करने के लिए इस परियोजना से आवश्यक प्रोत्साहन मिलेगा।

इस परियोजना में मुख्य जोर एड्‌स की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशीलता आबादी के उपसमूहों के लिए रोकथाम के उपायों को अपनाना और व्यवहार परिवर्तन संवाद से संबंधित प्रयासों को बढ़ावा देना है। इनमें महिला यौनकर्मी, समलैंगिक, ट्रांसजैंडर और सुई लगाकर नशीली दवाएँ लेने वाले लोग शामिल है। इस परियोजना से अन्य संवेदनशील वर्गों जैसे- एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर काम करने वाले कामगारों और ट्रक चालकों आदि में भी इस रोग को फैलने से रोकने में मदद मिलेगी। परिवर्तन संवाद नीति के अंतर्गत सूचना, शिक्षा और संवाद के जरिये एचआईवी के बारे में लोगों की मौजूदा धारणा भी बदलने पर जोर दिया जाएगा।

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