Public Administration: Role of Voluntary Organizations in Development Process

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विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग (Development Process and Development Industry)

स्वयं सहायता समूह-बैंक संपर्क कार्यक्रम की वर्तमान स्थिति (Current Status of SHG- Bank Linkage Programmes)

1991 में प्रारंभ किये गये इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन में वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अैर सरकारी बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वर्ष 2009 - 10 में 1.59 मिलियन नये स्वयं सहायता समूहों का साख-संपर्क (Credit Linkage) बैंकों के साथ हुआ और इस कालावधि में स्वयं सहायता समूहों को 14,453 करोड़ रुपये का ऋण प्रदान किया गया। मार्च 2010 के अंत तक, लगभग 6.95 मिलियन स्वयं सहायता समूहों ने बैंको के साथ अपना बचत खाता (Saving Account) बनाये रखा। वर्ष 2009 - 10 में, भारत में सूक्ष्म वित्त की स्थिति पर नाबार्ड दव्ारा जारी की गई रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया था कि देश में 69,53, 000 स्वयं सहायता समूह बैंकों के साथ सेविंग लिंक्ड (Saving Linked) हैं और 31 मार्च, 2010 तक 48,51, 000 स्वयं सहायता समूहों को ऋण प्रदान किया गया है। 31 मार्च, 2010 तक स्वयं सहायता समूहों की कुल बचत 6198.71 करोड़ थी। दिसंबर 2011 तक 4.51 लाख स्वयं सहायता समूहों का वित्तीयन इस कार्यक्रम के दव्ारा किया गया। उल्लेखनीय है कि स्वयं सहायता समूह-बैंक संयोजन कार्यक्रम को विश्व के सबसे बड़े वित्तीय समावेशन कार्यक्रम के रूप में देखा जाता है।

स्वयं सहायता समूहों की ग्रामीण भारत की विकास प्रक्रिया में भूमिका (Role of SHGs in the Development Process of Rural India)

स्वयं सहायता समूहों की ग्रामीण भारत की विकास प्रक्रिया में भूमिका का वर्णन निम्नांकित बिन्दुओं के माध्यम से किया जा सकता है-

  • वित्तीय बहिष्करण के समाधान की दृष्टि से: भारत के 6 लाख गाँवों में केवल 30 हजार गाँवों में ही बैंक शाखाएँ हैं। देश के सिर्फ 40 फिसदी लोगों के ही खाते हैं और करीब तीन-चौथाई किसान परिवारों को सगठित वित्तीय सेवाओं की जरूरत है। ऐसी स्थिति में देश भर में फैले 30 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों से जुड़े लोगों को रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं।
  • सामाजिक -आर्थिक विकास व लैंगिक न्याय की दृष्टि से: केन्द्र सरकार ने उग्रवाद प्रभावित जिलों में एक अतिरिक्त स्वयं सहायता समूह बैंक सहबद्धता कार्यक्रम की शुरूआत की है। उग्रवाद प्रभावित जिलों में गरीबी उन्मूलन के लिए शुरू किये गये इस विशेष डब्ल्यूएसएचजी (WSHG) कार्यक्रम के तहत अब तक 6 हजार से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों का गठन किया जा चुका है, जबकि स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना के तहत पहले ही 29 हजार से अधिक समूहों का गठन किया जा चुका है। समूह के माध्यम से महिलाओं का आर्थिक एवं सामाजिक विकास हो रहा है।
    • महिला सहायता समूह-सह बैंक संबद्धता कार्यक्रम के तहत तीन लाख रुपये तक के ऋणों पर ब्याज सहायता देकर इन समूहों को 7 प्रतिशत की वार्षिक दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है। साथ ही साथ समय पर ऋण चुकाने वाले महिला समूहों को तीन प्रतिशत की अतिरिक्त ब्याज सहायता भी दी जाती है। इस प्रकार इन समूहों को वास्तव में 4 प्रतिशत की दर पर ही ऋण उपलब्ध होता है। एक समूह में कम से कम 10 महिलाएँ सदस्य होती हैं। वैसे एक समूह में अधिक से अधिक 15 महिलाएँ ही रह सकती हैं। विशेष योजना के तहत जिले की प्रत्येक पंचायत में 25 - 25 समूहों का गठन किया जा रहा है। स्वयं सहायता समूह विभिन्न महत्वपूर्ण राष्ट्रीय योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने जून 2011 में राष्ट्रीय आजीविका मिशन शुरू किया है। इसके तहत देश के 6 लाख गाँवों, 2.5 लाख पंचायतों, 6000 प्रखंडों एवं 600 जिलों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले 7 करोड़ परिवारों को इसके दायरे में लाया गया है।
  • ग्रामीण वित्तीय स्थिति सुधारने में: ऐसे कई उदाहरण प्राप्त होते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि ग्रामीणों की वित्तीय स्थिति सुधारने में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में स्वयं सहायता समूहों दव्ारा पंजीकृत बैंक ‘चेतना महिला बचत सरकारी संस्था’ की महिलाओं की वित्तीय स्थिति को सुधारने में प्रभावी भूमिका है। इसी तरह राजस्थान के भरतपुर जिले की डीग तहसील में बहताना गाँव की महिलाएँ लुपिन वेलफेयर एंड रिसर्च फाउंडेशन के माध्यम से ‘तुलसी माला’ निर्माण से प्रतिमाह 4 से 5 हजार रुपये कमा रही हैंं स्वयं सहायता समूहों का जाल आदिवासी क्षेत्रों में भी फैल रहा है। बिहार में हजारीबाग के गाँव ‘हुर्हुरू’ में महिलाएँ जनसेवा परिषद नामक स्वयं सेवी संस्था के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक सशक्तीकरण की राह पर अग्रसर हो रही हैं।

स्वैच्छिक संगठनों की विकास प्रक्रिया में भूमिका (Role of Voluntary Organizations in Development Process)

स्वैच्छिक संगठन सुदूर क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, जल पर्यावरण, मानवाअधिकार, बाल अधिकार, नि: शक्तता आदि जैसे अनेक क्षेत्रों में विकास कार्य कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि लोगों को उनका हक मिले। भारत सरकार ने विकास प्रक्रिया में स्वैच्छिक संगठनों की भूमिका को स्वीकार कर लिया है। कई बार स्वैच्छिक संगठन दुर्गम क्षेत्रों और सरकारों के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करते हैं। इस क्षेत्र में स्वैच्छिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए ही वर्ष 2002 में योजना आयोग को सरकारी संगठन और स्वयंसेवी संगठन के समन्वय के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था। स्वयंसेवी क्षेत्र की विस्तृत संभावनाओं के उपयोग के लिए यह एक अत्यावश्यक कदम था।

भारत में स्वैच्छिक संगठनों का विकास (Development of Voluntary Organisations in India)

भारत में विश्व की सर्वाधिक तीव्र गति से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारत में निर्धनों की आजीविका के स्तर में सुधार लाने के लिए स्वयंसेवी सगंठन अनेक वर्षों से सक्रिय रूप सरकार के सहयोगी के तौर पर काम कर रहे हैं। भारत में स्वयंसेवी संगठन क्षेत्र सामाजिक उन्नयन और आर्थिक विकास में योगदान देने वाली एक नई शक्ति के रूप में उभरा है। अनुमानत: भारत में 33 लाख पंजीकृत स्वैच्छिक संगठन हैं और वे सहभागी लोकतंत्र (Participatory Democracy) के क्रियान्वयन और उसको ठोस रूप प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं।

एक स्वैच्छिक संगठन व स्वयं सहायता समूह के रूप से कपार्ट के उद्देश्य (Objective of CAPART as a Voluntary Organisation and CHG)

कर्पाट (काउन्सिल फॉर एडवासमेंट ऑफ पीपुल्स एक्शन एंड रूरल टेक्नोलॉजी) ग्रामीण क्षेत्रों में सुधार के उद्देश्य को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह समाज के दलित तथा सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए कार्यरत है। अत: गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगो, अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोगों, बंधुआ मजदूरों, नि: शक्त बच्चों तथा महिलाओं को प्रमुखता देना कर्पाट का प्रमुख उद्देश्य है। कपार्ट की प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नवत हैं-

  • ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी विकास योजनाओं के कार्यान्वयन में स्वयंसेवी क्षेत्र के संगठनों को सहयोग देना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में उचित अवसर प्रदान करना तथा आर्थिक निर्भरता प्रदान करना।
  • विकास के लिए सामुदायिक कार्यविधि उपलब्ध कराना।
  • विकास के महत्वपूर्ण विषयों पर ज्ञान का निर्माण करना तथा ग्राम स्तरीय जनसमूहों तथा संगठनों का निर्माण और सशक्तीकरण करना।
  • स्वयं सेवी क्षेत्र के संगठनों दव्ारा प्रौद्योगिकी तथा ग्रामीण विकास के लिए डाटा बैंक के रूप में कार्य करना।
  • आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साधनों को सामुदायिक रूप से उपलब्ध कराना।

लोकापकारी संस्थाओं की भूमिका (Role of Charities)

लोकोपकारी संगठनों का अर्थ (Meaning of Charitable Organizations)

लोकोपकारी संस्था वह संस्था अथवा संगठन है जो लोकोपकार के उद्देश्य से कार्य करती है। लोकोपकारी संगठन गैर-लाभकारी संगठन (Non-Profit Organization) होते हैं लेकिन सभी गैर-लाभकारी संगठन लोकोपकारी संगठन नहीं होते। लोकोपकारी संस्थाओं का प्राथमिक उद्देश्य आम जनता को सहायता प्रदान करना है। विभिन्न चैरिटी शो के जरिये विख्यात लोगों का समूह किसी खास वर्ग, समुदाय के विपत्ति, आपदा में फँसे लोगों के लिए सहायता राशि एकत्र करता है। उदाहरण के लिए हाल ही में बॉलीवुड के अभिनेताओं के समूह दव्ारा उत्तराखंड में आयी प्राकृतिक आपदा से पीड़ित लोगों को वित्तीय सहायता देने के लिए चैरिटी शो का आयोजन किया गया था।

लोकोपकारी उद्देश्य की परिभाषा (Definition of Charitable Purpose)

आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2 (1) में स्पष्ट किया गया है कि लोकोपकारी उद्देश्य में निम्नांकित बातें शामिल हैं:

  • निर्धनों को राहत।
  • शिक्षा के प्रसार व विकास की दिशा में किये गये कार्य।
  • चिकित्सकीय राहत प्रदान करना।
  • किसी सामान्य लोक उपयोगिता (Public Utility) वाली किसी भी वस्तु का उन्नयन करना।

वित्त अधिनियम, 2009 (Finance Act, 2009) में किसी सामान्य लोक उपयोगिता वाली वस्तु के उन्नयन (Advancement of any Other Object of General Public Utility) के अलावा पर्यावरण संरक्षण (वाटरशेड, वन एवं वन्यजीवन का संरक्षण) और कलात्मक व ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों व स्थलों के संरक्षण को लोकोपकारी उद्देश्यों की परिधि में शामिल किया गया है। बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1950 की धारा 9 (1) में भी लोकोपकारी उद्देश्यों को लगभग उन्हीं आधारों पर परिभाषित किया गया है जैसा आयकर अधिनियम, 1961 दव्ारा किया गया है।

लोकोपकारी संगठनों की विशेषताएँ (Features of Charitable Organisation)

लोकोपकारी संगठनों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नवत्‌ हैं:

  • औपचारिक: एक लोकोपकारी संगठन एक औपचारिक संगठन होता है, जिसके पंजीकरण की एक प्रक्रिया होती है। कुछ निश्चित नियमों, कानूनों के अंदर रहते हुए उसे अपने उद्देश्यों को पूरा करना होता है।
  • निजी प्रकृति: लोकोपकारी संस्थाएँ निजी कार्य क्षेत्र व प्रकृति वाली होती हैं और ये सरकार व सरकारी संगठनों से भिन्न होती हैं।
  • स्वाशासी (Self Governing) : लोकोपकारी संगठन का प्रबंधन ‘बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज’ अथवा गवर्निंग काउन्सिल दव्ारा किया जाता है। इन पर कोई बाह्‌य नियंत्रण नहीं होता।
  • गैर-लाभकरी (Not for Profit) : लोकोपकारी संगठन मौद्रिक लाभों के लिए कार्य नहीं करते क्योंकि वे समाज सेवा के कार्यो में संलग्न होते हैं, जिसे लाभ की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता।
  • स्वैच्छिक (Voluntary) : लोकोपकारी संस्थाओं की प्रकृति स्वैच्छिक होती हैं। इसमें स्वैच्छिक आधार पर भाग लेकर कल्याणकारी गतिविधियों को संपन्न किया जाता है।
  • गैर-राजनीतिक व गैर-धार्मिक (Non-Political and Non- religious) : लोकोपकारी संस्थाओं की किसी राजनीतिक दल से संबद्धता नहीं होती, साथ ही ये धार्मिक पूजा-आराधना व धार्मिक शिक्षा की गतिविधियों में संलग्न नहीं हो सकती।

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