Public Administration: Social Safeguards for Scheduled Castes by Constitution of India

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अनुसूचित जातियों, शोषित वर्ग, अल्पसंख्यकों व अनुसूचित जनजातियों की बेहतरी एवं संरक्षण हेतु तंत्र, कानून, संस्थायें और संवैधानिक निकाय (Mechanism, Law, Institutions and Constitutional Bodies for the Betterment and Protection of Scheduled Castes, Depressed Class, Minorities and Scheduled Tribes)

भारतीय संविधान में अनुसूचित जाति हेतु सामाजिक रक्षोपाय (Social Safeguards for Scheduled Castes by Constitution of India)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) (Article 17 of the Constitution of India Abolition of the Practice of Untouchabilty)

अस्पृश्यता का प्रत्येक स्तर एवं प्रत्येक रूप में निषेध किया गया है। अस्पृश्यता का मामला सामने आने पर कानून के दायरे में सजा का प्रावधान है।

अनुच्छेद 17 को नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 (Protection of Civil Rights Act, 1955) दव्ारा लागू किया गया है (इसका पूर्व नाम अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955 था) । इसका मूल उद्देश्य अस्पृश्यता का पूर्णत: समापन करना हैं। अनुसूचित जातियों की सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 17 दव्ारा सुनिश्चित की गई है, इसी के साथ अन्य दुर्बल एवं वंचत तबकों को भी भारतीय संविधान सुरक्षा देता हैं।

  • अनुसूचित जातियों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा एवं सभी प्रकार के सामाजिक अन्याय एवं शोषण से सुरक्षा (अनुच्छेद 46)
  • हिन्दू धार्मिक संस्थाओं को हिन्दू जाति के सभी वर्गो हेतु खोलना (अनुच्छेद 25)
  • कोई नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालयों, होटलों और मनोरंजन के स्थानों में प्रवेश या पूर्णत: अथवा अशत: राज्यनिधि से पोषित स्थानों, सार्वजनिक कुओं, तालाबों, स्नानघाटों, सड़कों आदि में प्रवेश के लिए किसी शर्त के अधीन नहीं होगा (अनुच्छेद 15)
  • कोई भी व्यापार करने अथवा कोई भी उद्यम करने का अधिकार (अनुच्छेद 19)
  • राज्य दव्ारा पोषित या राज्यनिधि से सहायता पाने वाली किसी संस्था में प्रवेश से किसी को वंचित नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 29)
  • सार्वजनिक सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान (अनुच्छेद 16 और अनुच्छेद 335)
  • संसद एवं राज्य विधायिकाओं में 20 वर्षों हेतु विशेष प्रतिनिधित्व (अनुच्छेद 330,332, 334)
  • राज्य स्तर पर सलाहकारी परिषदों एवं पृथक विभागों की स्थापना तथा केन्द्र स्तर पर एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति जो इस वर्ग के कल्याण हेतु कार्य कर (अनुच्छेद 164,338, 5वीं अनुसूची)
  • अनुसूचित व जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन हेतु प्रावधान (5वीं एवं 6वीं अनुसूची)

अनुसूचित जाति के कल्याण एवं संरक्षण हेतु कानून एवं विधायन (Law and Legislation for the Betterment and Protection of Scheduled Castes in India)

परिचय (Introduction)

  • अनुसूचित जाति एवं अन्य दुर्बल वर्गों के कल्याण हेतु किये गए विभिन्न प्रावधानों के बावजूद यह तबका आज भी समस्याओं से ग्रसित है। उन्हें अनेक नागरिक अधिकार नहीं मिलते। साथ ही इस वर्ग को बहुत से कष्टो, दोषों एवं शोषण का सामना करना पड़ता है। अनेक दु: खद घटनाओं में इन्हें अपने जीवन एवं संपत्ति से हाथ धोना पड़ा है। आर्थिक सामाजिक एवं ऐतिहासिक कारणों से इनके विरुद्ध गंभीर अपराध हुए हैं।
  • इस वर्ग में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के कारण यह वर्ग अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है; आज जब यह वर्ग अपने अधिकारों की माँग कर रहा है, अस्पृश्यता का विरोध कर रहा है अथवा वैधानिक न्यूनतम मजदूरी की माँग कर रहा है तो इन्हें अन्य वर्गों की दुतकार व भय का सामना करना पड़ रहा है। जब यह वर्ग अपनी महिलाओं के आत्मसम्मान की रक्षा करने की कोशिश करता है, तब भी इन्हें शोषक वर्ग की उपेक्षा झेलनी पड़ती है। सरकार दव्ारा प्राप्त भूमि पर खेती करने पर भी इनका शोषण होता है। भारतीय समाज के इस पीड़ित तबको के हितों को सुनिश्चित करने के लिए अनेक कानूनों का प्रावधान किया गया है।

नागरिक अधिकारों का संरक्षण अधिनियम, 1955 (The Protection of Civil Right Act, 1955)

परिचय (Introduction)

  • अनुच्छेद 17 दव्ारा अस्पृश्यता को पूर्णत: प्रतिबंधित किया गया है। अस्पृश्यता से संबंधित किसी भी मामले में संलिप्त पाये जाने पर सजा का प्रावधान है। चूँकि इस विषय पर कोई कानून नहीं था अत: अनुच्छेद 35 के उपबंध (क) (ii) को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार के कानून की आवश्यकता पड़ी। इसी क्रम में अस्पृश्यता (अपराध) प्रस्ताव संसद में पेश किया गया।
  • इसे संसद के दोनों सदनों ने राष्ट्रपति की सहमति से 8 मई, 1955 को पारित कर दिया और यह 1 जून, 1955 को अस्पृश्यता (अपराध) कानून, 1955 के रूप में अस्तित्व में आया। 19 नवंबर, 1976 से इसे नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के नाम से जाना जाता है।

नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955) के प्रावधान (Provisions Related to Protection of Civil Rights Act (PCR) , 1955)

यह अधिनियम समस्त भारत में लागू है और इसमें अस्पृश्यता की प्रथा के संबंध में दंड के प्रावधान हैं। इसे संबंधित राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासन दव्ारा कार्यान्वित किया जाता है।

अधिनियम के तहत अपराध (Offenses under the Act)

इस अधिनियम की धाराएँ 3 - 7 क निम्नलिखित अपराधों को यदि वे “अस्पृश्यता” के आधार पर किए गए है, परिभाषित करती हैं तथा उनके लिए दंड निर्धारित करती हैं।

  • सार्वजनिक पूजा स्थलों में प्रवेश, पवित्र जल
  • किसी दुकान, सार्वजनिक रेस्टोरेंट, होटल, सार्वजनिक मनोरंजन, शमशान घाट इत्यादि में प्रवेश से मना करना। (धारा 4)
  • किसी अस्पताल, डिसपेंसरी, शैक्षिक संस्थाओं इत्यादि में दाखिले से इंकार करना। (धारा 5)
  • वस्तुएँ बेचने और सेवाएँ प्रदान करने से मना करना (धारा 6)
  • उत्पीड़न, चोट पहुँचाना, अपमान इत्यादि। (धारा 7)
  • अस्पृश्यता के आधार पर किसी व्यक्ति को सफाई करने या झाडू लगाने अथवा किसी मृत जानवर इत्यादि को हटाने के लिए मजबूर करना। (धारा 7क)

इस अधिनियम के तहत दंड (Penalties under this Act)

इस अधिनियम की धारा 8 - 11 में अनेक निरोधक/प्रतिरोधात्मक प्रावधान हैं, जो इस प्रकार हैं-

  • दोषसिद्धि पर लाइसेंसो का रद्दीकरण अथवा निलंबन (धारा 8)
  • सरकार दव्ारा दिए गए अनुदानों को वापस लेना या निलंबित करना। (धारा 9)
  • किसी जनसेवक दव्ारा जाँच-पड़ताल में जानबूझकर लापरवाही के संबंध में दंड (धारा 10)
  • सामूहिक जुर्माना लगाने के लिए राज्य सरकार की शक्तियाँ (धारा 10 क)
  • उत्तरवर्ती दोषसिद्धि पर अभिवृद्ध (धारा 11)

विभिन्न राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में पीसीआर अधिनियम के कार्यान्वयन संबंधी संरचना और तंत्र निम्न प्रकार हैं:-

इस अधिनियम में -

  • विधिक सहायता
  • विशेष अदालत
  • इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों की सहायता करने के लिए समितियाँ

विशेष पुलिस थानों संबंधी प्रावधान हैं जिनके ब्यौरे निम्न प्रकार हैं:-

  • विधिक सहायता: सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 क (2) (i) में, अस्पृश्यता से उत्पन्न किसी अयोग्यता के शिकार व्यक्तियों के लिए विधिक सहायता सहित पर्याप्त सुविधाओं के प्रावधान हैं ताकि वे इस प्रकार के अधिकारों का स्वयं उपभोग कर सकें।
  • विशेष अदालतें: सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 क (2) (iii) में, इस अधिनियम के तहत अपराधों के अभियोजन के लिए विशेष अदालतों के गठन संबंधी प्रावधान हैंं
  • इस अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों की सहायता करने के लिए समितियाँ: सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की धारा 15 क (2) (ii) में, राज्य सरकारों दव्ारा “अस्पृश्यता” के फलस्वरूप उत्पन्न किसी अयोग्यता के अधीन व्यक्तियों के “अस्पृश्यता” के उन्मूलन से उत्पन्न अधिकारों को उपलब्ध कराने और उनके दव्ारा उनका उपभोग सुनिश्चित करने के लिए यथा आवश्यक उपाय करने अथवा क्रियान्यन में उनकी सहायता करने के लिए उपयुक्त समझे जाने वाले ऐसे उपयुक्त स्तरों पर समितियाँ जाति तथा अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के कार्यान्वयन की समीक्षा करती हैं, और जहाँ कहीं भी आवश्यक हो सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 की भी समीक्षा करती हैं।
  • विशेष पुलिस थाने: अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध उनकी अपराधों की शिकायतों के पंजीकरण के लिए विशेष पुलिस थानों की स्थापना की गई है। राज्यों को प्रतिबद्ध देयता के अतरिक्त, उनके दव्ारा पुलिस थानों पर किए गए व्यय के 50 प्रतिशत की सीमा तक केन्द्रीय सहायता प्रदान की जाती है।

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