Public Administration: Issues Related to Social Sector Development in India

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स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय (Issues Relating to Development and Management of Social Sector/Services Relating to Health, Education, Human Resources)

भारत में सामाजिक क्षेत्रक के विकास से संबंधित मुद्दे (Issues Related to Social Sector Development in India)

  • भारत में सामाजिक क्षेत्रक पर प्रतिवर्ष होने वाला सार्वजनिक व्यय (इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार का बजट व्यय संयुक्त रूप से शामिल है) जी. डी. पी. के 7 फीसदी से भी कम है जबकि अधिकांश विकसित देशों में सार्वजनिक धन के एक बड़े हिस्से का निवेश सामाजिक कल्याण में किया जा रहा है।
  • आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के देशों में सामाजिक क्षेत्रक पर होने वाला औसतन बजटीय व्यय, भारत में होने वाले बजटीय व्यय के दुगने से अधिक है।
  • भारत में सामाजिक क्षेत्रक (उदाहरण के लिए स्कूल, हॉस्पिटल, हेल्थ केयर सेंटर और आंगनबाड़ी केन्द्र) में सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए योग्य एवं प्रशिक्षित मानव संसाधन (शिक्षक, चिकित्सक, पैरामेडीकल कर्मी और आंगनबाड़ी कर्मी इसमें शामिल हैं) की कमी, कार्यक्रमों के प्रबंधन के लिए मानव संसाधनों (निगरानी तथा सर्वेक्षण, वित्त एवं लेखा संबंधी कर्मचारी) की कमी तथा इन क्षेत्रकों में सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने में प्रति इकाई लागत का निम्न स्तर सामाजिक क्षेत्रक में सार्वजनिक संसाधनों की कमी है।

भारत में सामाजिक क्षेत्रक की नीति (Policy of Social Sector/Services in India)

देश के लोगों के जीवन स्तर एवं उत्पादक क्षमताओं में वृद्धि करना किसी भी देश की नीति एवं नियोजन का मुख्य उद्देश्य है। भारत में सामाजिक क्षेत्रक विकास की आवश्यकता महसूस करते हुए केन्द्र सरकर ने 2004-. 05 से सामाजिक क्षेत्रक बजटीय प्रावधानों में खासी वृद्धि की है।

भारत में सामाजिक क्षेत्रक विकास का दर्शन दो मापदंडो पर आधारित है-

  • एजेंडा 21
  • स्याुंक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य

एजेंडा 21: एजेंडा 21 मुख्यत: वर्तमान की प्रमुख समस्याओं तथा आने वाली सदी की चुनौतियों के लिए दुनिया को तैयार करने की बात करते हैं। यह विकास के उच्च स्तर तथा पर्याचरण संरक्षण को सुनिश्चित करने के प्रति वैश्विक सहमति एवं राजनैतिक वचन बद्धता को दर्शाता है। एजेंडा 21 सतत्‌ विकास के विषय पर संयुक्त राष्ट्र का गैर बाध्यकारी एवं स्वैच्छिक क्रियान्वयन पर आधरित एक एक्शन प्लान है। यह वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संपन्न हुए पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्रसम्मेलन का प्रतिफल है। एजेंडा 21 संयुक्त राष्ट्र एवं विश्व के अन्य बहुपक्षीय संगठनों एवं व्यक्तिगत सरकारों का एक्शन एजेंडा है। इसे सथनीय राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर कही भी संपादित किया जा सकता है। एजेंडा 21 में “21” 21वीं सदी को संबोधित है।

एजेंडा 21 को चार खंडों में विभक्त किया जा सकता है-

  • सेक्शन (I) : सामाजिक और आर्थिक आयास- यह मुख्यत: गरीबों से लड़ने उपभोग प्रारूप में परिवर्तन करने स्वास्थ्य क्षेत्र को प्रोत्साहन देने तथा अधिकाधिक समावेशी जनसंख्या की प्राप्ति पर केंद्रित है।
  • सेक्शन (II) : विकास के लिए संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन- इसमें पर्यावरण संरक्षण, निर्वधीकरण की रोकधाम, नाजुक पर्यावरण का संरक्षण, जैव विविधता का संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण तथा जैव प्रोद्योगिकी का प्रबंधन शामिल है।
  • सेक्शन (III) : प्रमुख समूहों की भूमिका का सुदृढ़ीकरण, जिसमें बच्चे, युवा, पुरुष, महिलाएँ, गैर सरकारी संगठन, स्थानीय प्रधीकरण, व्यवसायी तथा श्रमिकों के साथ साथ स्थानीय लोगों की भूमिका का सुदृढ़ीकरण सम्मिलित है।
  • सेक्शन (IV) : कार्यान्वयन के साधन- इसके अंतर्गत विज्ञान, तकनीक का हस्तांतरण, शिक्षा, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ तथा वित्तीय व्यवस्थाएँ शामिल है।

एजेंडा 21 में स्पष्ट किया गया है कि गरीबी उन्मूलन तथा मानव संसाधन विकास के साथ साथ आय वितरण में वृहत्तर समता सुनिश्चित करना ही वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनोतियाँ हैं।

समग्र सामाजिक क्षेत्रक विकास के संबंध में एजेंडा 21 का मूलभूत दृष्टिकोण इस प्रकार है-

  • सतत्‌ आजीविका अक्सर उपलब्ध कराना।
  • जनसांख्याकीय गतिशीलता एवं निरंतरता।
  • शिक्षा (लोगों की क्षमता में सुधार करना) ।
  • स्वास्थ्य (मुख्यत: प्राथमिक स्वास्थ्य देखरेख संबंधी आवश्यकताएँ) ।
  • स्थायी मानव अधिवास।
  • महिला सशक्तिकरण।
  • बालकों एवं युवाओं के हितों को सुनिश्चित करना।

संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य (United Nations Millennium Development Goals)

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के अंतर्गत आठ अंतरराष्ट्रीय विकास लक्ष्य सम्मिलित हैं, जिनकी औपचारिक उद्घोषणा वर्ष 2000 में हुए संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि शिखर सम्मेलन के दौरान की गई थी।

संयुक्त राष्ट्र सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं-

  • अत्यधिक गरीबी एवं भूखमरी का उन्मूलन।
  • सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की प्राप्ति।
  • लैंगिक समानता स्थापित करना।
  • बाल मृत्यु दर में कमी।
  • मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार।
  • एचआईवी/एड्‌स, मलेरिया तथा अन्य बीमारियों से सुरक्षा।
  • पर्यावरणीय सततता सुनिश्चित करना।
  • प्रौद्योगिकी विकास में निजी क्षेत्र एवं नागरिक समाज की सहभागिता के साथ विकास हेतु वैश्विक भागीदारी को सुनिश्चित करना।

भारत में सामाजिक क्षेत्रक/सेवाओंे के प्रमुख लक्षित क्षेत्र (Main Target Area of Social Sector/Services in India)

  • गरीबी निवारण एवं सामाजिक समावेशन भारत मेे विकासीय नियोजन के सर्वप्रमुख लक्ष्य रहे हैं। इसी प्रकार यह भी विदित है कि गरीबी पर्याप्त आय के अभाव में फैलने वाली बहुआयामी प्रघटना है, जिसे वंचना की स्थिति के रूपा में देखा जाना चाहिए। यह लोगों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों तक फैली हुई है।
  • समाजिक असमानता को समाप्त करने की स्वीकृति की परिणति शिक्षा, स्वास्थ्य एवं मानव विकास की दिशा में संयुक्त प्रयासों के रूप में सामने आती है, जो क्षमता निर्माण तथा अन्य सामाजिक एवं पर्यावरणीय कारकों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और कल्याणकारी राज्य पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।

भारत में सामाजिक क्षेत्रक के लिए विकसित तीन आयामी रणनीति इस प्रकार है-

Main Target Area of Social Sector/Services

भारत में सामाजिक क्षेत्रक पहलें (Social Sector Initiative in India)

भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र का विकास: मुख्य नीतिगत प्रयास तथा इससे उत्पन्न होने वाले मुद्दे:

सामाजिक विकास का एक आधारभूत पहलू लोगों की दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन जीने की क्षमता है। किसी भी व्यक्ति की जीवन की गुणवत्ता को जन्म के समय जीवन प्रत्याशा के संकेतक दव्ारा मापा जा सकता है। लोगों में स्वास्थ्य की स्थिति सामान्यत: आवश्यकता, अनुभव, योग्यता एवं उपलब्धता चार कारकों की परस्पर व्यापकता दव्ारा निर्धारित होता है। अनेक व्यक्तियों की स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता जैविकीय कारकों (जैसे कि आनुवंशिक कारक) के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक कारकों (जैसे जीवन स्तर, पर्यावरणीय प्रदूषण तथा परिवारों के लिए संसाधनों का आबंटन) पर निर्भर करती है। स्वास्थ्य सेवाओं की समझ विभिन्न सामाजिक-आर्थिक एवं सांस्कृतिक कारकों जैसे किसी व्यक्ति का शिक्षा का स्तर आय का स्तर और सामाजिक पृष्ठीभूमि इत्यादि पर निर्भर करती है। योग्यता से तात्पर्य है- स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की समझ और उनकी प्राप्ति। स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता मुख्यत: भौतिक अवसरंचना (अस्पतालों, औषधालयों तथा बिस्तरों की संख्या) के साथ-साथ स्वास्थ्य कर्मियों (डॉक्टर, नर्स) की प्रति इकाई जनसंख्या पर उपलब्धता दव्ारा स्पष्ट होती है। इसके अतिरिक्त भारत जैसे विकासशील देशों में बहुसंख्यक जनसंख्या सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर करती है। भारत में सामाजिक क्षेत्रक विकास का प्राथमिक उद्देश्य जनता के कमजोर तबके की आवश्यकताओं का ध्यान रखना है। अत: क्षेत्रों मेंं सामाजिक क्षेत्रक के योगदान का विशेष महत्व हैं।

भारत में स्वास्थ्य संकेतक (Indicators Relating to Health in India)

प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक जनता की पहुँच अर्थात्‌ लोगों तक इनकी उपलब्धता मानव विकास का एक महत्वपूर्ण घटक हैं। भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र के 6 घटक इस प्रकार हैं-

  • जन्म के समय जीवन प्रत्याशा।
  • प्रति एक लाख जनसंख्या पर चिकित्सकों की संख्या।
  • प्रति एक लाख जनसंख्या पर अस्पतलों में उपलब्ध बिस्तरों की संख्या।
  • स्वस्थ लोगों का प्रतिशत।
  • प्रति एक लाख जनसंख्या पर अस्पतलों की संख्या।
  • प्रति एक हजार जन्मों पर जीवित बच्चों की संख्या।

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