Public Administration: Conceptual Interpretation of Social Welfare

Get top class preparation for CTET-Hindi/Paper-2 right from your home: get questions, notes, tests, video lectures and more- for all subjects of CTET-Hindi/Paper-2.

सामाजिक न्याय और अवधारणात्मक विवेचन (Conceptual Interpretation of Social Justice)

सामाजिक कल्याण का अवधारणात्मक विवेचना (Conceptual Interpretation of Social Welfare)

कल्याणकारी राज्य की परिभाषा (Definition of Welfare State)

  • कल्याणकारी राज्य, शासन की वह अवधारणा है जिसमें ‘राज्य’ नागरिकों के आर्थिक और सामाजिक हितों के संरक्षण और संवर्द्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कल्याणकारी राज्य अवसरों की समानता, संसाधनों के समान वितरण तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व (उनके लिए जो जीवन के न्यूनतम सुखों से वंचित हैं) के सिद्धांतों पर आधारित है।
  • कल्याणकारी राज्य में कुशल प्रशासन, त्वरित निर्णय तथा घूसखोरी, भ्रष्टाचार और अक्षमता रहित प्रशासन अंतर्निहित होता है।

कल्याणी राज्य की पृष्ठभूमि (Background of the Welfare State)

  • समाजवादी राज्य की तरह कल्याणकारी राज्य भी पूंजीवाद की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप विकसित हुआ है। काम के अधिक घंटे, महिलाओं और बच्चों का शोषण, मलिन बस्तियों के विकास, स्वच्छ जल की अनुचित व्यवस्था, जल-निकासी का अभाव, सामाजिक संरक्षण का अभाव और पर्यावरणीय क्षरण जैसे औद्योगीकरण के दोषों तथा ऐसे ही अन्य कारकों ने राज्य को इन्हें दूर करने के लिए विधायी उपाय अपनाने हेतु मजबूर किया। साथ ही प्रथम और दव्तीय विश्व युद्ध से उपजी विशाल सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं के समाधान हेतु राज्य का मार्गदर्शन आवश्यक था।
  • तीव्र, औद्योगीकरण शहरीकरण तथा अनेकों सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं ने राज्य को व्यक्तिगत क्रियाकलापों में हस्तक्षेप करने पर मजबूर किया। इसलिए दो विश्व युद्धों के बाद अधिकांश यूरोपीय देशों ने सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, बीमारी बीमा, बेरोजगारी बीमा तथा वृद्धावस्था पेंशन जैसे कल्याणकारी उपायों की शुरुआत की। अमेरिका में राष्ट्रपति रूजवेल्टस के “न्यू डील प्रोग्राम” (New Deal Programmes) ने कल्याणकारी राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • एक कल्याणकारी राज्य विकास कार्यो, सामाजिक कल्याण तथा आर्थिक असमानता में कमी लाने के उपायों के अलावा सामान्य जनजीवन के उत्थान के भी प्रयास करता है। यह नागरिकों को अनेक प्रकार की सामाजिक सेवायें उपलब्ध कराता है। ऐसा कहा जाता है कि “कल्याणकारी राज्य में व्यक्ति को केवल जन्म लेना होता है शेष कार्य राज्य करेगा।” प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण इसका लक्ष्य होता है और इसके लिए राज्य नियोजन तथा ऐसे ही अन्य उपाय करता है। टी. डब्ल्यू केन्ट कल्याणकारी राज्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि “ऐसा राज्य अपने नागरिकों को बड़े पैमाने पर सामाजिक सेवायें उपलब्ध कराता है।” कल्याणकारी राज्य ने केवल सभी अत्यावश्यक विषयों में नागरिकों के क्रियाकलापों को विनियमित करता है, बल्कि सभी आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं के संबंध में ऐसे प्रावधान करता है कि लाभ का वितरण आवश्यकतानुसार हो जबकि कार्यभार का वृहत व्यक्तिगत क्षमता के अनुरूप हो। यह नागरिक कल्याण हेतु कार्य करती है अत: इस सेवा राज्य के रूप में भी जाना जाता है।

कल्याणकारी राज्य के पक्ष में तर्क (Justified Points of the Welfare State)

  • कल्याणकारी राज्य व्यक्तिवाद (Individualism) और समाजवाद (Socialism) में संतुलन स्थापित करता है। यह राज्य को न तो आवश्यक बुराई के रूप में परिभाषित करता है, और न ही इसे सर्वाधक शक्तिशाली संस्था बताता है। इसमें राज्य को व्यक्तियों के “मित्र, दार्शनिक और मागदर्शक” के रूप में देखा जाता है।
  • कल्याणकारी राज्य मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाता है। यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विकास में सार्वजनिक और निजी दोनो क्षेत्रों की भागीदारी सुनिश्चित करता है।
  • कल्याणकारी रूप में राज्य अर्थव्यवस्था को नियोजन (Planning) के माध्यम से नियंत्रित और विनियमित करता है। राज्य ही लोगों के भौतिक कल्याण की भी जिम्मेदारी निभाता है।
  • कल्याणकारी राज्य व्यक्तियों की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति सुनिश्चित करता है, और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी प्रदान करता है। इसके अलावा सभी व्यक्तियों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना राज्य का ही दायित्व माना जाता है।
  • कल्याणकारी राज्य सामाजिक न्याय को बढ़ावा देता है, जबकि सामाजिक न्याय का सिद्धांत लोकतंत्र को सुदृढ़, उद्देश्यपूर्ण अर्धपूर्ण और गतिशील बनाता है तथा समाज में प्रचलित सभी असमानताओं को समाप्त करता है।
  • कल्याणकारी राज्य यह सुनिश्चित करता है कि श्रमिक वर्ग तथा समाज के अन्य कमजोर समूहों के साथ न तो किसी भी तरह का भेदभाव और न ही किसी भी तरह का शोषण किया जाएगा। कल्याणकारी राज्य लोकतांत्रिक राजनीतिक संरचना में सभी महिलाओं एवं पुरुषों के अधिकारों का समर्थन करता है।

भारत में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा (Concept of Welfare State in India)

  • स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में अनेक समस्याएँ एवं चुनौतियाँ विद्यमान थी। सामाजिक और आय संबंधी असामनता सर्वव्यापी थी और आर्थिक रूप से भी भारत की स्थिति दयनीय थी। सामाजिक स्तर पर देश में अनेक समस्याएँ विद्यमान थी। समाज के सभी कमजोर वर्गों जैसे-महिलाएँ बच्चे एवं दलित जीवन की मूलभूत सुविधाओं से वंचित थे। ब्रिटिश शासन के दौरान ‘सामाजिक कल्याण’ सरकार के प्राथमिक उद्देश्यों में शामिल नहीं था। उस समय सरकार का मुख्य बल कानून व्यवस्था को बनाए रखने था ब्रिटिश हितों के लिए भारतीय लोगों के आर्थिक शोषण को सुनिश्चित करने में थे।
  • भारतीय इतिहास में अनेकों राज्यों/शासकों ने आम नागरिकों के कल्याण एवं खुशी को सर्वाधिक प्रमुखता दी है। उदाहरण के लिए मौर्य साम्राज्य और विक्रयादित्य का शासनकाल बहुत हद तक कल्याणकारी राज्य के ही उदाहरण थे। प्राचीन काल में अशोक के शासन का स्वर्णिम युग और मध्यकाल में मुगल काल के दौरान अकबर का शासन दो ऐसे अभूतपूर्व शासकों के उदाहरण हैं, जिन्होने अपने समय में सच्चे अर्थाेेंं में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना की।

भारत ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कैसे अपनाया (How India Adopted the Concept of Welfare State)

भारत में वर्तमान कल्याणकारी शासन और सामाजिक नीतियों को 1947 के बाद से राज्य की नीति एवं सरकार की कार्यप्रणाली में हुए समग्र परिवर्तनों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

The Concept of Welfare State

आर्थिक उपाय (Economic Measures)

  • 200 वर्षो तक ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के कारण स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था अल्पविकसित अर्द्ध-सामंती, पिछड़ी, गतिहीन होने के साथ-साथ एकीकृत भी नहीं थी। 1947 - 48 में भारत की प्रति व्यक्ति आय थी, जनसंख्या का एक बड़ा भाग अत्यधिक गरीब था, जिसके पास न तो पर्याप्त भोजन की व्यवस्था थी और न ही पहनने के लिए कपड़े और न ही रहने के लिए घर था। 1948 में भारत की लगभग 70 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या कृषि में संलग्न थी और उस समय कृषि भी पिछड़ी हुई थी। उस समय देश में औद्योगिक विकास बहुत ही कम हुआ था और सरकार उत्पादन के लिए मशीनरी तथा अन्य सामान के लिए आयात पर निर्भर थी। 1948 में देश की केवल 14 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में रहती थीं। जबकि शेष 86 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • चूँकि स्वतंत्रता के पश्चात्‌ भारत ने समाजवादी लोकतांत्रिक मॉडल के साथ-साथ सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था के प्रारूप को अपनाया था। स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में जवाहरलाल नेहरू और पी. सी. महालनोविस ने देश की आर्थिक नीति का निर्माण किया। फलस्वरूप भारत ने अत्यधिक नियंत्रित, केन्द्रीकृत नियोजित तथा बंद अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया। भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया जिसमें राज्य और निजी क्षेत्र दोनों को संसाधनों के उपयोग की छूट थी। नागरिकों के कल्याण की अवधारणा का केवल एक ही अर्थ था कि राज्य ही संसाधनों का नियंत्रण तथा वितरण दोनों कार्य करेगा। राज्य के नियंत्रण के अधीन विभिन्न उद्यमों तथा केन्द्र दव्ारा वित्त पोषित शिक्षण-संस्थानों की स्थापना की गई। प्रथम पाँच वर्षों में आर्थिक नीति का उद्देश्य कृषि क्षेत्र, किसानों तथा कुछ सीमित सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की मांग की आपूर्ति करना था। आर्थिक कल्याण की अवधारणा को अब गरीबी, निरक्षरता तथा स्वास्थ्य मुद्दों के संदर्भ में सुरक्षा संजाल के रूप में पहचान मिल चुकी थी, लेकिन 70 - 80 के दशक में हुई हरित क्रांति के बाद जैसे ही लोगों की क्रय-शक्ति में वृद्धि हुई वैसे ही सरकार दव्ारा भी अवसरंचना, जहाजरानी तथा रेलवे जैसे आर्थिक विकास के क्षेत्रों में अपने व्यय मे वृद्धि की गई। लेकिन बेरोजगारी तथा अल्प बेरोजगारी के निरंतर उच्च स्तर ने हरित क्रांति और बंद अर्थव्यवस्था के लाभों की अनदेखी कर दी, इससे श्रम बल, गरीबी, ग्रामीण ऋणग्रस्तता, अत्यधिक निम्न वेतन और उत्पादकता के स्तर में वृद्धि हुई।

इस प्रकार 1991 में भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को खुली अर्थव्यवस्था में रूपांतरित कर दिया और तब से आर्थिक कल्याण की अवधारणा इस प्रकार है-

  • सामाजिक क्षेत्र के व्यय में वृद्धि (विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य में)
  • अल्पविकसित क्षेत्रों के लिए साख आपूर्ति प्रणाली की प्रभावकारिता में वृद्धि।
  • मनरेगा, JNNURM प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना तथा भारत निर्माण जैसे- विभिन्न आय सृजक, वित्तीय समावेशन और सामाजिक समावेशन के कार्यक्रमों की शुरूआत।

Developed by: